टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

बस, एक अदद डिजाइनर पैरेंट की दरकार है बाबा...




आप सभी माता-पिताओं, पालकों के लिए खुशखबरी है कि अब आप विज्ञान और तकनीक के सहारे डिजाइनर बच्चे पा सकते हैं. स्टेम सेल पर हालिया हुई खोजों और जेनेटिक इंजीनियरिंग के बलबूते डिजाइनर बच्चे अब कल्पना की वस्तु नहीं रह गए हैं.

ऐसे में कुछ मजेदार परिस्थितियों की कल्पना क्या आप कर सकते हैं? दो डिजाइनर बच्चे आपस में झगड़ेंगे तो एक दूसरे के जेनेटिक क्वालिटी की मीनमेख कुछ यूँ निकालेंगे – मेरे में तीव्र बुद्धि का, जीनियस बनने का जीन है – तू मुझसे मैथ्स में पार नहीं पा सकता. दूसरा प्रतिकार करेगा - मुझमें सुपर एथलीट बनने का जीन है – एक मुक्का मारूंगा तो बत्तीसी बाहर आ जाएगी. एक कहेगा - मेरे पालक ने दस लाख खर्च कर ब्यूटी और ब्रेन का जीन डलवाया है. दूसरा बगलें झांकेगा और शाम को अपने पालकों से झगड़ा करेगा कि यदि उनमें अपने बच्चों में स्पेशल जीन डलवाने की, बच्चों को डिजाइनर बनवाने की कूवत नहीं थी तो आखिर उन्होंने बच्चे पैदा ही क्यों किए.

दो पालक कभी आमने सामने होंगे तो उनके मन में पहला प्रश्न ये उठेगा कि सामने वाले ने अपने बच्चे में क्या क्या डिजाइनर गुण डलवाए हैं. वे एक दूसरे के निर्णय का उपहास करेंगे – हुँह, ये भी कोई डिजाइनर गुण हुआ? और अपने निर्णय पर, अपने डिजाइनर बच्चे पर गर्व करेंगे. कभी वो निराशा में सिर छुपाया करेंगे कि सामने वाले जैसी कूवत उनकी नहीं थी अन्यथा वे भी अपने बच्चों को उनसे भी ज्यादा डिजाइनर बनवा सकते. कुछ डिजाइनर बच्चों के पालक घर में अपने बच्चों को गरियाया करेंगे – शर्म नहीं आती? तुम पर हमने बीस लाख रुपए खर्च कर डिजाइनर जीन क्या इसीलिए डलवाया है? उसका कोई प्रतिफल ही नजर नहीं आ रहा है. डिजाइनर बच्चे अपने पालकों से शर्म महसूस करेंगे – काश हमें भी डिजाइनर पालक मिलते! पालक डाक्टरों से झगड़ा करेंगे, सिविल सूट दाखिल करेंगे – जो डिजाइन हमने चाहा था – वो तो मिला ही नहीं, बल्कि कुछ दूसरा ही डिजाइन मिल गया है.

जाहिर है धार्मिक, जाति और रंग के आधार के अतिरिक्त एक और विभाजन व्यक्तियों में होने लगेगा. व्यक्ति की औकात इस बात पर निर्भर रहेगी कि कौन कितना डिजाइनर है. बिना डिजाइनर टैग लगे व्यक्ति की औकात जंगली, बाबा आदम के जमाने के, पिछड़े व्यक्ति की तरह होगी. जो ज्यादा डिजाइनर होगा, वो उतना ही ज्यादा प्रगतिशील कहलाएगा और आधुनिक-महाराजाओं यानी मंत्रियों की तरह लोगों की इज्जत उसे मुफ़्त में मिला करेगी.

आपको ऐसा नहीं लगता कि काश ये तकनीक पचास साल पहले आ चुकी होती तो आज हम भी डिजाइनर पैदा हुए होते...

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व्यंज़ल
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जूते और लिबास तो हैं डिजाइनर
क्या दिल और मन हैं डिजाइनर

वक्त वक्त में फ़र्क़ तो है यकीनन
हमारे मुकाबले उनके हैं डिजाइनर

दुनिया उसी की जमाना उसी का
पलटकर जो बन गए हैं डिजाइनर

कह ले जमाना हमें इश्क में अंधा
उनकी तो हर अदाएं हैं डिजाइनर

देखो ये लौट के आ गया बुद्धू रवि
कहे थे बनने जा रहे हैं डिजाइनर

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(समाचार कतरन साभार - टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

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क्या बात है!!! वाह वाह, छा गये. सच, पचास से थोडे कम में भी होती तो भी चला लेते..अपना तो काम बन जाता. :)

कुछ उम्दा डिजाइन के साथ पैदा होते हैं। कुछ में डिजाइनत्व उढ़ा दिया जाता है। कुछ ही हैं जो सेल्फ डिजाइनत्व का सृजन करते हैं।
आप तीसरी केटेगरी में हैं।

एक बार डिजायनर की हवा चल पड़ी तो इस बाज़ार के तो पौ-बारह। एक नया ‘एलीट क्लास’ पैदा होगा जिसके ड्राइंग रूम में ‘एंटीक पीस’ के रूप में प्राकृतिक वस्तुएं शोभा बढ़ाएंगी।

theory of adding genes what an idea /

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