व्यंग्यविविध | तकनीकीहिन्दीछींटें और बौछारें

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Monday, May 12, 2008

कहीं आप भी एजेंट तो नहीं...


पुराने दिनों को लोगबाग याद करते हैं तो क्या बुरा करते हैं. हर गुजरा हुआ पुराना दिन मीठी याद लिए हुए होता है और वो शर्तिया वर्तमान और आने वाले दिनों से ज्यादा अच्छा होता है.

अब, बीमा के मामलों को ही ले लें. ज्यादा नहीं, अभी चार-पाँच साल पुरानी बात ही ले लें. क्या खुशनुमा दिन थे वो भी. ले देकर इक्का दुक्का सरकारी बीमा कंपनियां होती थीं भारत में और उसके पूर्णकालिक-अंशकालिक एजेंट होते थे जो आमतौर पर वर्ष के आखिरी महीनों में टैक्स प्लानिंग और इंश्योरेंस और कभी कभी बचत के नाम पर इंश्योरेंस हेतु आग्रह करते दिखाई पड़ते थे.

मगर, बेड़ा गर्क हो इन मनमोहनी और चिदंबरमी आर्थिक सुधारों का कि दर्जनों बीमा कंपनियाँ देखते ही देखते चली आई हैं और कई चली आने की कवायद में हैं. गली मुहल्लों में इनके लकदक और चकाचक करते ऑफ़िस पे ऑफ़िस खुलते चले आ रहे हैं.

बात इन बेहिसाब कंपनियों और गली मुहल्ले में खुलते बीमा कंपनियों के ऑफ़िसों तक सीमित नहीं है. समस्या ये नहीं हैं. समस्या की जड़ दूसरी है. पुराने दिनों की मीठी यादों को और मीठी करती वर्तमान की समस्याएँ कुछ और ही हैं.

आप किसी पार्टी में गए हुए होते हैं. वहां कोई परिचित सा लगने वाला चेहरा नामालूम कहां से नमूदार होता है और तपाक से हाथ मिलाता है. बड़ी ही आत्मीयता से हाल चाल पूछता है. घर-परिवार स्वास्थ्य नौकरी व्यवसाय इत्यादि. आप कयास लगाते रह जाते हैं कि बंदे को कहां देखा था. फिर वो असली बात पर आ जाता है – मैंने फलॉ नई बीमा कंपनी की एजेंसी ली है. इसमें ये ये स्कीमें हैं और बहुत फ़ायदे मंद हैं. सरकारी एलआईसी तो लूटता है. फलॉ ये दूसरी कंपनी का रिटर्न ठीक नहीं है, उसमें निवेश उचित नहीं है. बोलिए, कब आऊँ?

आप कहीं ट्रेन या बस में जा रहे होते हैं, या फ़्लाइट के पकड़ने के लिए इंतजार कर रहे होते हैं, तब भी इसी किस्म की दुर्घटना आपके साथ होती है. आप बैंक में किसी काम से गए होते हैं, बुक शॉप में किताब खरीद रहे होते हैं, या फिर चौराहे पर कड़क मीठी चाय सुड़क रहे होते हैं या फिर सिनेमा या स्टेशन के सार्वजनिक मूत्रालय में आप होते हैं, और आपके साथ ये दुर्घटना घट जाती है.

हालात ये हैं कि आपका दूर के रिश्तों में चाचा, बाबा, काका, फूफा, फूफी और न जाने कौन लोगों को भी इन नए इंश्योरेंस कंपनियों ने लगता है जबरन एजेंसी पकड़ा दी है. रविवार की दोपहरी को आप आराम कर रहे होते हैं और या तो डोरबेल बजता है या टेलिफोन की घंटी. फिर उधर से प्रेम-प्यार और मनुहार से हाल चाल पूछे जाते हैं फिर अंत में असली मुद्दे पर आने में ज्यादा देर भी नहीं लगती – फलॉ बीमा कंपनी अभी अभी जॉइन की है. टारगेट पूरा करना है. आपकी कृपा हो जाए तो... रिश्तेदारी है, भई निभानी पड़ती है. आपको भी निभानी पड़ेगी ही.

आपके पास कुछ पैसा आ जाता है. आप सोचते हैं कुछ बढ़िया जगह निवेश किया जाए. चौराहे पर लगा फटा, परंतु विशाल पोस्टर याद दिलाता है – बजाज एलाएंज का बीमा निवेश – सबसे बेहतर. अख़बार के पहले पृष्ठ पर अवीवा का दावा चमक रहा होता है – सबसे फॉरवर्ड थिंकिंग निवेशक – अवीवा निवेशक. जबकि आईसीआईसीआई के एजेंट, जो जाहिर है, आपके दूर के परिचित रहे हैं, आपको समझा गए होते हैं कि उनका ही प्रॉडक्ट सबसे बेहतर है. उधर टीवी पर अलग राग अलापा जा रहा है – जो बीवी से करे प्यार वो कैसे करे रिलायंस इंश्योरेंस से इंकार. एचडीएफसी कहता है सिर उठा के जिओ. यानी अब तक आप सिर झुका के जी रहे थे. वैसे, भारत में सिर उठा कर जीने का बढ़िया सपना बेचा जा रहा है. और, किसी बीमा कंपनी का एक नहीं कोई दर्जनों प्रॉडक्ट होते हैं और उनमें से हर एक सबसे बेहतर होता है. आप पैसा जिसमें लगाएं, वो ही सबसे बेहतर प्रॉडक्ट होता है.

अंततः आपके साथ हालात ये हो जाते हैं कि आप लोगों से मुँह चुराने लग जाते हैं. जब सामने वाला हर व्यक्ति आज आपको इंश्योरेंस एजेंट नजर आने लगा है तब करें भी तो क्या?

ठीक आपकी ही तरह की समस्या से जूझते जूझते अचानक मेरे दिमाग में एक दिन बिजली सी कौंधी और एक बढ़िया सा हल जेहन में आया. दूसरे दिन मैं एक इंश्योरेंस दफ़्तर में गया और तुरत फुरत एक एजेंसी ले ली. घर पर नाम पट्टिका में बड़े अक्षरों में लिखवाया - बीमा एजेंसी.

तब से पता नहीं क्यों, परिचितों, रिश्तेदारों के फोन आने बंद हो गए. घर पर भी परिचितों, रिश्तेदारों का आना जाना कम हो गया (अब ब्लॉग लेखन-पठन पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा,). अब सरे राह कोई परिचित चेहरा आत्मीयता दिखाता नहीं दीखता. बल्कि कई तो कतराते हुए निकल जाते हैं. यदि कोई अज्ञानी-परिचित मिल भी जाता है, और आत्मीयता दिखाते हुए बीमा की बात निकालने की कोशिश करता भी है तो उससे पहले मैं ही बीमा के लिए आग्रह कर देता हूं. आखिर, बीमा आग्रह की विषय वस्तु है.

मेरी तो सलाह ये है कि आप अपनी न सही, अपने ब्लॉग का बीमा अवश्य करवाएं. कौन जाने कब, कैसी मुसीबत आन पड़े. कब वायरस और ट्रोजनों से आपका ब्लॉग संक्रमित हो जाए और इस इंटरनेटी आभासी दुनिया से ग़ायब हो जाए.

तो, देर किस बात की? हर चिट्ठाकार के लिए, हर चिट्ठाकार के जेब के अनुसार, शानदार, बेहतरीन ऑफर. न्यूनतम प्रीमियम किश्तें व अधिकतम रिटर्न के लिए मुझसे आज ही संपर्क करें.

बीमा, आग्रह की विषयवस्तु है...

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व्यंज़ल
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दोस्त सारे एजेंट हो गए

दोस्त सारे जब एजेंट हो गए
दोस्ती में हम भी एजेंट हो गए

मेरे शहर की फ़िजां यूं बदली
यहां के लोग सब एजेंट हो गए

रिश्तों में तब्दीलियाँ ऐसी हुईं
एक दूजे के लोग एजेंट हो गए

दिल के बदले मांगा दिल था
कहते हैं वो तुम एजेंट हो गए

दिन अब हमारे भी फिरेंगे रवि
आखिर हम भी एजेंट हो गए
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9 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

Udan Tashtari said...

बहुत गैप के बाद मेरी पसंद व्यंजल लाये हैं, आभार. उम्दा है/.

बहुत बढ़िया. पढ़कर अच्छा लगा.
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आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.

यह एक अभियान है. इस संदेश को अधिकाधिक प्रसार देकर आप भी इस अभियान का हिस्सा बनें.

शुभकामनाऐं.

समीर लाल
(उड़न तश्तरी)

Ghost Buster said...

बहुत सही राह निकाली आपने. पर वक्त बेवक्त आने वाले टेलिमार्केटिंग कॉल्स का क्या कीजिए?

Suresh Chiplunkar said...

बेहतरीन व्यंग्य, लेकिन ऐसे ही व्यंग्य को पढ़कर हम एक असफ़ल एल-आई-सी एजेंट हैं, बेशर्मी न दिखा पाने का मलाल है हमें… :) :)

PD said...

Aaj Apake post se sambandhit comment main apne blog par ek post karke karunga.. :)

सागर नाहर said...

मेरे ब्लॉग का बीमा करवाना है, मासिक कितने रुपये देंगे?
आप बड़े भाई हैं हजार पन्द्रह सौ देंगे तो भी चला लेंगे, क्या करें रिस्तेदारी भी तो कोई चीज है कि नहीं?
:)