यूज़ इट आर लूज़ इट

जी हाँ, और, ये बात ब्लॉगिंग में भी लागू होती है और लिनक्स कमांडों में भी!

इस बात को सिद्ध करने के लिए आपको अभी हाल ही की एक मजेदार घटना सुनाता हूं.

दिलकार नेगी की किताब ब्लॉगिंग छोड़ें सुख से जिएं से प्रेरित एकोऽहम् श्री विष्णु बैरागी कल रात एक वैवाहिक प्रीतिभोज समारोह में टकरा गए. अभी वे राइटर्स ब्लॉक की स्थिति में हैं और ब्लॉग लेखन बंद है. हालांकि स्थानीय समाचार पत्र में उनका नियमित स्तंभ नियमित प्रकाशित हो रहा है.

परंतु वे हिन्दी ब्लॉगों का अध्ययन मनन करते रहते हैं. चिट्ठा-पठन के दौरान विस्फ़ोट के किसी प्रविष्टि ने उन्हें प्रेरित किया कि वे भी अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से रखें.

विष्णु बैरागी पहले कुछ समय तक सक्रिय चिट्ठाकार रह चुके हैं, और उनकी धारदार टिप्पणियाँ भी चिट्ठों को मिलती रही थीं.

परंतु, अरे, यह क्या? वे भूल गए कि टिप्पणी देने के लिए हिन्दी कैसी लिखी जाती है! जबकि सक्रिय ब्लॉगिंग से वे ज्यादा दिनों से दूर नहीं हैं.

है कि नहीं यूज़ इट ऑर लूज़ इट का परफ़ेक्ट मामला?

और, इस बात को तो धुरंधर लिनक्स मास्टर भी स्वीकार रहे हैं. एकदम बोल्ड और पूरे अपरकेस में!

इस लेख की सीख:

अपने हुनर का इस्तेमाल करते रहें अन्यथा शर्तिया आप उन्हें खो देंगे.

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विषय:

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गुरू आपकी बातों से हम अकसर सहमत रहते हैं । इस बात से नहीं हैं । जिस तरह इंसान सायकिल चलाना नहीं भूलता उसी तरह तकनीक से जुड़े मुद्दे भी नहीं भूलने चाहिए । विष्‍णु जी के लेखन का प्रशंसक हूं । हो सकता है कि किसी खास मन: स्‍थिति में हों तो याद ना आया हो । भुलक्‍कड़ी और स्‍मृतिलोप में तो फर्क है ना सरकार । और हां विष्‍णु जी से कहें कि अभी पिछले महीने बालकवि जी से मुलाकात के दौरान उनकी चर्चा निकली थी और दद्दा कह रहे थे कि विष्‍णु अगर आलस छोड़ दे तो मेरे से बड़ा लेखक हो जाए ।
अपार प्रशंसा की उन्‍होंने विष्‍णु जी की ।

यूनुस भाई, दरअसल इस लेख का उद्देश्य वही है जो आपने अंत में बताया है उन्हें लेखन के लिए उत्प्रेरित करना - वे आलस छोड़ दें तो नामी लेखक बन जाएं बड़े तो हैं ही. वो तो मास्टर स्टोरी टेलर हैं. परंतु मैंने जो बात कही है, वो भी पूर्ण सत्य है. तकनीक के मामले में न सिर्फ ज्ञान को नित्य परिमार्जित करते रहना होता है, बल्कि उसका उपयोग भी करते रहना होता है, अन्यथा कुशलता दूर होने में देर नहीं लगाती. इस लेख पर दी गई अंतिम कड़ी फिर से पढ़ें. मैं स्वयं भी जब तब शिकार होता रहता हूं...

टिप्पियाना न भूल जायें इस चक्कर में टिप्पिया रहे हैं. :)


नामी लेखक बनने के लिए ही कब से लिख रहे है, मगर न लेखक बन पाये न नाम कमा पाये. कब तक लिखना होगा? :)

संजय जी, प्रोब्लॉगर का कहना है - जब तक आपके 1000 पोस्ट पूरने न हो जाएँ, समझिए कि अभी आपने कुछ नहीं सीखा है. लगे रहिए. मेरे भी अभी पांच सौ तक पहुँचने वाले हैं...

रवि जी आप तो विष्णु जी के गुरू है. कैसे भी उन्हें पकड़ कर वापिस लाईये. मैं तो उन्हें बहुत मिस कर रहा हूं.

आप की बात तो सही है कि हूनर का इस्तेमाल न करो तो भूल जाते हैं या उसे जंग लग जाता है। जैसे ही पता चल जाएगा कि हममें क्या हूनर है जोर शोर से इस्तेमाल करना शुरु कर देगें।

बिल्कुल है.

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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