टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

सबसे बड़ा बेवकूफ़ कौन? मैं!



सबसे बड़ा बेवकूफ़ कौन? एक अख़बार का सर्वे बता रहा है कि संसार का सबसे बड़ा बेवकूफ़ बुश है. पर वो तो अमरीका का है. उससे हम भारतीयों का क्या लेना देना. तो चलिए दूसरे स्थान के विजेता पर नज़र मारते हैं. अरे, वहां तो आप विराजमान हैं! आम आदमी का झंडा लेकर पगुराए बैठे हैं. पहले लगा कि ये सर्वे बकवास है – ऐसा कैसे कोई सर्वे आपके या मेरे जैसे ‘आम आदमी’ को सबसे बड़ा बेवकूफ़ कह सकता है भला? इससे पहले कि मैं सर्वेयरों और उस अख़बार को गरियाता और उन्हें लानतें मलामतें भेजने के लिए कुंजीपट टकटकाता, मेरे ज्ञान चक्षु कुछ खुले और मुझे मेरी बेवकूफ़ियाँ एक-एक कर नज़र आने लगीं.

कल ही की तो बात है. चौराहे से स्टेशन तक का ऑटो किया. ऑटो वाले ने बड़े ही शराफत से मीटर डाउन किया और बिना कोई मोल तोल किए ले चला. स्टेशन पर पहुँचा तो देखा कि मीटर पर किराया सामान्य से डेढ़ गुना बता रहा था. मैं शराफत से बेवकूफ़ बन चुका था. जाहिर है, ऑटो का मीटर टैम्पर किया हुआ था, और रीडिंग ज्यादा बता रहा था.

लौटते में जाने कैसे याद आ गया कि घर पर मूंग खत्म हो गया है. वरना जेब में परची डालकर खरीदारी को निकलता हूँ तो भी भूल जाता हूं कि जेब में कोई परची भी है. किराने की एक दुकान पर रुका और पूछा – भाई साहब बढ़िया क्वालिटी का मूंग है क्या? बड़ा दाने का, हरा. दुकानदार मुस्कराया और बोला हां, है ना साहब. उसने सेंपल दिखाया. बोला, अंकुरित मूंग सेहत के लिए अच्छा रहता है. बड़े बड़े दाने एकदम चमक रहे थे. रंग ख़ूब हरा था. मैंने ले लिए. बाद में घर आकर पानी में भिगोया तो पाया कि मूंग का पूरा हरा रंग पानी में आ गया है. आह! तो चमचमाते हरे रंग के मूंग को हरे रंग से रंगीन चमचमाता बनाया गया था – कृत्रिम तरीके से. ये पता भी नहीं था कि रंग खाने वाला था या कपड़ा रंगने वाला. मैंने वो मूंग फेंक दिया – किसी जानवर के खाने लायक भी नहीं लगा था. जाहिर है, मैं बेवकूफ़ बन गया था. अब मुझे उस दुकानदार की मुस्कुराहट का राज पता चला. वो मुझे, एक आम आदमी को, बेवकूफ़ बनाकर व्यंग्यात्मक मुस्कान फेंक रहा था.

सरकारी तंत्र तो मुझ जैसे आम आदमी को जब तब बेवकूफ़ बनाते ही रहते हैं. उदाहरण के लिए, मेरे घर पर नगरनिगम का जलप्रदाय कनेक्शन है. जलप्रदाय की चाक-चौबंद व्यवस्था यूं है कि मानसून में जब ऊपर से बारिश हो रही होती है, और सर्वत्र पानी ही पानी नजर आता है तब नल भी बिलानागा, पूरे फोर्स से पानी उगलता रहता है. जहाँ अप्रैल का खतरनाक महीना आता है, वातावरण में सर्वत्र सूखा हो जाता है तो इसका भी फ़ोर्स डाउन हो जाता है. मई जून की भयंकर गर्मी में यह सूख सा जाता है. ऊपर से ऐसे समय अड़ोस-पड़ोस के लोग नल में डायरेक्ट पम्प लगाकर पानी खींचने की कोशिश में एक दूसरे को और नगरनिगम के जलप्रदाय व्यवस्था को बेवकूफ़ बनाने की नाकाम कोशिशें करते रहते हैं. ऐसे में बिजली विभाग भी अंडरफ्रिक्वेंसी के नाम पर अघोषित विद्युत कटौती कर जब तब मुझ आम आदमी को और ज्यादा बेवकूफ़ बनाता रहता है. धरती मैया को भी अपने सपूतों की कारस्तानी पर गुस्सा आने लगा है लिहाजा, वो भी मेरी बेवकूफ़ियों पर हंसते हुए अपना जलस्तर मई जून में और ज्यादा नीचे कर लेती है.

नेता लोगन की तो बात ही छोड़ दीजिए. जब दस हजार करोड़ के कर्ज माफ़ी की घोषणा सुनी तो मेरे मित्र का बधाई संदेश आया. अब तो बढ़िया चल रहा होगा बंधु. तुम्हारे सारे कर्ज माफ करने की घोषणा हो चुकी है. मैं पलट कर भिन्नाया. क्या यार, तुम भी क्या बात करते हो. इससे हमारे गांव के पटेल का ही फायदा हुआ है जो बैंकों से न जाने किस किस स्कीम से लाखों का कर्ज उठाया है. हम गरीब किसान पर तो साहूकार का कर्ज है. वो माफ करने के बजाए ब्याज दर बढ़ा रहा है. हमको तो रात बेरात पैसे की दरकार होती है. साहूकार से पैसा लेना ही पड़ता है...

लालू ने शान से कहा ट्रेन का किराया घटाया है, बढ़ाया नहीं. बहुत दिन से कहीं जाना था जो टाल रहा था. किराया घटाने की बात सुनकर मन प्रसन्न हो गया और वहां जाने का मन बनाया. जाने आने का टिकट लिया. सीट खाली नहीं था. तत्काल कोटा में खाली था सो मजबूरी में उसी का टिकट लिया. किराया तत्काल प्रभार के नाम पर 200 रुपये ज्यादा था. वापसी का टिकट दस रूपये और ज्यादा का. पूछा क्या वापसी में ट्रेन का किलोमीटर बढ़ जाता है? टिकट बाबू हंस दिया – सोचा अजीब बेवकूफ़ है. समझता नहीं.

अब छोड़िए, क्या क्या बेवकूफ़ियाँ गिनाऊँ. सिद्ध तो ख़ैर, हो ही गया है!

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व्यंज़ल

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मुझे प्यारी हैं मेरी अपनी बेवकूफ़ियाँ

जिंदा रहने को हैं जरूरी बेवकूफ़ियाँ


मुहब्बत में दानिशमंदो का काम नहीं

चलती हैं वहां सिर्फ निरी बेवकूफ़ियाँ


इश्क गर ज़िंदा है तो कुछ इस तरह

कुछ उसकी तो कुछ मेरी बेवकूफ़ियाँ


ऐसा करें क्यों न कुछ ठहाके लगा लें

चलो सुनें सुनाएं मेरी तेरी बेवकूफ़ियाँ


जमाना मुझे किस तरह बताएगा रवि

बखूबी मालूम हैं मुझे मेरी बेवकूफ़ियाँ

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(चित्र साभार, टाइम्स ऑफ इंडिया)


एक टिप्पणी भेजें

अब आप हमारी बेवकूफी सुनियेगा तो क्या कहियेगा? दो दिन पहले हमारी कुर्सी का पहिया अचानक ही निकल गया और हम जमीन पर गिर पड़े और पाँव में मोच आ गई।
उसी रात को प्रेस करने के बाद याद आया कि प्रेस से थोड़ा पाँव सेक लिया जाये तो दर्द जरा कम होगा, सो पाँव पर चादर डाल दी और धीरे धीरे टीवी देखते हुए चादर पर प्रेस घुमाने लगे पता नहीं कब चादर सरक कर नीचे गिर गई और ... :(
ज्यादा नहीं दो इंच लम्बा फफोला ही हुआ है।

ऐसा कहना है तो अकेले में कहें। सरेआम कहेंगे तो कई खिताब छीनने आ जायेंगे! :D

मूर्ख देखन मैं चला, मूर्ख न मिलिया कोय.

दर्पन झाँका जो मैने, मुझसा मूर्ख न कोय.

क्‍या संजय जी ई खिताब अकेले अकेले हड़पने में लगे हुए हैं, हम सब आपके साथ खड़े हैं, संयुक्‍त रुप से यह अवार्ड हमें मिलना चाहिए

एक्दमै सई विश्लेषण है जी, सबै का यही हाल है!!

लेख तो बड़िया है ही बेवकूफ़ी भरी कविता का तो क्या कहना…:) हर शेर में बेवकूफ़ी (शब्द) है।…:)
हम भी मूर्खों की लाइन में खड़े है जी

चलो अच्‍छा हुआ रवि भाई फिर से साबित हो गया कि हम अकेले नहीं हैं जो शेविंग ब्रश लेकर दांत साफ करने चलने लगते हैं । जो गाड़ी खड़ी करते हैं एक पार्किंग में खोजते हैं दूसरी जगह पर । पत्‍नी जी धनिया पत्‍ती यानी कोथमीर मंगवाती हैं और हम ले आते हैं धनिया पाउडर । हमारा साथ निभाने का शुक्रिया ।

मैं कितना बड़ा बेवकूफ हूं ये अगर आप जानना चाहते हैं तो कभी मेरे प्रोजेक्ट मैनेजर या प्रोजेक्ट लीडर से पूछ लीजिये.. :)
वैसे सोचता हूं कि क्यों ना अपनी इस बेवकूफी पर एक पोस्ट ही चिपका दिय़ा जाये.. :D

इश्क गर ज़िंदा है तो कुछ इस तरह

कुछ उसकी तो कुछ मेरी बेवकूफ़ियाँ

क्या बात है रवि जी ,आपने टू आपने बात बात मे सारी बात कह डाली

मुझे आप धीरे धीरे सॉफ्टवेयर के अनुवादक से अधिक कुशल व्यंग्यकार लगने लगे हैं...यूँ भी मध्यप्रदेश व व्यंग्य के बीच अधिक तालमेल दिखता है :-)

बहुत खूब रवि जी। खैर आप जैसे ब्लॉगस्टार ने मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी छोड़ी उसके लिए धन्यावाद

दलजीत

कुछ हम से बेफकूफ बनते हैं,कुछ हम को बनाते हैं।
बस ऐसे ही कुछ हम से कमाते हैं, कुछ से हम कमा जाते हैं।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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