दिन में 24 के बजाए 31 घंटे!


क्या आप भी जब तब समय का रोना रोते रहते हैं? क्या आप इस बात पर दुःखी रहते हैं कि आपके पास करने को बहुत कुछ हैं, मगर समय का सदैव टोटा लगा रहता है? दूसरी तरफ एक अध्ययन ये सिद्ध करता है कि ज्यादा नहीं, सिर्फ कोई दस साल पहले के आपके जीवन के मुकाबले आपके पास दिन के चौबीस के बजाए इकत्तीस घंटे हैं! यह अध्ययन ये बताता है कि आज का मनुष्य बेहतर उपकरणों, नए नायाब किस्म के गॅजेटों इत्यादि की सहायता से बहुत से मल्टीटास्किंग किस्म के कार्य एक ही समय में करता है और इस वजह से वो इतना सारा कार्य कर लेता है जो आज से दस साल पहले का आदमी इकत्तीस घंटे में भी न कर सकता था. यानी दूसरे शब्दों में आज आपके पास दिन के इकत्तीस घंटे होते हैं. और, कमाल ये है कि आप फिर भी समय के टोटे का रोना रोते रहते हैं!

आप कम्प्यूटर पर अपने चिट्ठे टाइप कर रहे होते हैं तो साथ में चल रहा विनएम्प मीडिया प्लेयर छोड़ गए बालम हाय अकेला छोड़ गए गाना बजा रहा होता है. एक तरफ थंडरबर्ड का विंडो खुला होता है जिसमें ईमेल का आदान प्रदान चल रहा होता है तो दूसरी तरफ चैट विंडो खुला होता है जिसमें दोस्तों से गप बाजी चल रही होती है. ऊपर एक छोटे से विंडो में समाचार वीडियो म्यूट मोड में चल रहा होता है और हेडलाइन शेयर सेंसेक्स पर नजर जब तब टिक जाती है. नीचे टास्कबार में आर एस एस फ़ीडों जिसमें तकनीकी समाचार से लेकर चुटकुले तक शामिल होते हैं, एक के बाद एक नई प्रविष्टियों की सूचना आपको दे रहे होते हैं. उधर ब्लॉगवाणी का ब्राउज़र विंडो अलग खुला होता है जिसमें कौन ब्लॉगर किस ब्लॉगर को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष गाली दे रहा है, ऐसे मजेदार, रस युक्त ब्लॉग पोस्टों और प्रतिपोस्टों के लिए ललचाई निगाह अलग जमी हुई होती है. इस बीच पति/पत्नी बीच-बीच में आस-पड़ोस की कोई कहानी किस्सा अलग सुना रहा/रही होता/होती हैं जिन्हें आप आदतन हां – हूँ कर सुनते हैं और कभी बिना सुने भी हां हूं कर देते हैं, जिसके कारण आमतौर पर घरेलू हिंसाएँ भी होती हैं.

इस बीच घर का लैंडलाइन दूरभाष व बाजू में लटका मोबाइल जब तब अलग अलग नए नए किस्म के रिंगटोन घनघनाते रहते हैं और कभी वार्ता तो कभी एसएमएस संदेश पठन-लेखन का दौर अनवरत जारी रहता है.

कहीं बाहर जाने निकलते हैं तो कार का इंजन चालू होने से पहले एफ़एम या कार स्टीरियो पहले चालू होता है. फुरसत में गाना सुनने के लिए किसी के पास आज टाइम है भला? खाना खाते वक्त डाइनिंग टेबल के सामने लगे टीवी पर समाचार से लेकर रीयलिटी शो – सब पर बराबर-बराबर निगाह लगी रहती है, और सभी शो देखना मजबूरी रहती है. रिमोट की कुंजियाँ दब दब कर बेहाल हुई जाती हैं मगर ढंग का चैनल कभी भी नहीं मिलता. सुबह अख़बार वाचन के साथ साथ दैनिंदनी कर्म तो ख़ैर दशकों से साथ-साथ चल रहा है. कुल मिलाकर, एक ही समय में दो या दो से अधिक कार्य करना तो आदत बन गई है, और उसके बगैर अब तो किसी की हाजत भी संभव नहीं.

सोने जाने से पहले आप अपने पोस्ट का ड्रॉफ़्ट समय सुबह पाँच बजे सेट करना नहीं भूलते ताकि सोते समय भी इंटरनेट पर कहीं दूर स्थित सर्वर आपकी खातिर ठीक पाँच बजे आपके पोस्ट को ठेल दे. इधर आपके कम्प्यूटर पर कैलेण्डर व स्वचालित रिमाइन्डर शेड्यूलर अनुप्रयोगों के जरिए बहुत से कार्य जैसे कि किसी को जन्मदिन का संदेश ईमेल करना या रात्रि दो बजे के पश्चात (मुफ़्त असीमित डाउनलोड सुविधा समय काल पर) स्वचालित डाउनलोड जैसे कार्य आपके लिए स्वचालित होते रहते हैं.

मगर, फिर भी, आपके पास समय का टोटा रहता है. बहुत टोटा रहता है. बहुत से कार्य करने के लिए आपके पास समय ही नहीं होता है. टाइम ही नहीं होता है.

तो, फिर, आपको दिन में कितने घंटे चाहिए? बहत्तर? छियान्बे? निन्यान्बे?

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पूरे सौ घंटे का.


"आप आदतन हां – हूँ कर सुनते हैं और कभी बिना सुने भी हां हूं कर देते हैं, जिसके कारण आमतौर पर घरेलू हिंसाएँ भी होती हैं."


घर घर की कहानी लगती है :)

हम तो अपने २४ घंटे से खुश हैं जी... समय कम नहीं होता... काम ज्यादा हो जाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे पेट बड़ा हो जाता है ना की पैंट टाईट होती है.

समय कम है, तभी तो एक साथ कई काम करने पड़ते हैं। वरना सभी काम एक-२ करके ना करते।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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