बुधवार, 9 जनवरी 2008

उलटी तरफ चलना तो मेरे जीन में है…


बहुत-बहुत धन्यवाद इस शोध का. आभार, इस नए अध्ययन निष्कर्ष का. अब मैं अपनी असफलता का ठीकरा अपने जीन के सिर पर फोड़ सकता हूँ. किसी भी असफल काम के लिए, अब मैं अपने जीन को जिम्मेदार ठहरा सकता हूँ.

वैसे भी, जब किसी शिशु का जन्म होता है, लोग नवजात को देखते ही बोलते हैं – यह अपनी मां/पिता पर गया/गई है. कभी-कभी दादा-दादी या नाना-नानी की प्रतिकृति भी दिखाई देने लगती है, और कभी किसी टिप्पणी से ये भी आभास हो सकता है कि जैसे जेनेटिक गुण पड़-पड़दादा से भी ट्रांसफर हो के चले आ रहे हों.

तो, अब मैं पूरी तरह रिलेक्स हो गया हूँ. अपनी असफलताओं के पीछे अब तक मुझे बड़ा टेंशन होता था. अपने आपको मैं कोसता रहता था. अपनी अलाली, अपनी अकर्मण्यता, अपनी कूपमण्डूकता और न जाने क्या क्या के लिए मैं शर्मिंदा रहता था और सोचता कि अब मैं आगे से और अधिक मेहनत करूंगा, अपने आलस्य को छोड़कर सफलता के पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ जाऊंगा.

मगर इससे होता क्या. वही होता जो मंजूरे जीन होता. और जो होता आया है, और जो मुझे अब पता चला है – मेरे अब तक के सफलताओं-असफलताओं, आचार-व्यवहार-विचार के लिए निगोड़ा मेरा ये जीन जिम्मेदार है. अब जबकि मुझे पता चल गया है कि मेरे पर्सोना से लेकर मेरे उठने बैठने के अंदाज और सिर के झड़ते बालों से लेकर सार्वजनिक जीवन में सफल-असफल होने तक में मेरे जीन का हाथ है, तो फिर किस बात का टेंशन.

अब मैंने अपना टेंशन खत्म कर दिया है. मुझे मालूम हो गया है कि अब तक जो होता आया है और आगे जो होता रहेगा उसके लिए मैं नहीं, मेरा जीन जिम्मेदार है. और, जीन को तो मैं बदल नहीं सकता – जब तक कि ऐसे वैज्ञानिक आविष्कार न हो जाएँ कि आदमी अपना जीन बदलने लगे – (तब फिर मैं सर्वाधिक सफल बनने वाले ब्रेड पिट, टॉम हैंक्स या अंबानीज़-मित्तल्ज़ के से जीन, अपने में डलवा लूंगा,) तब तक तो रिलेक्स. फुल रिलेक्स.

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माट्साब की क्लास मैं ध्यान से अटेंड करता रहा था. नए साल पर (जिसमें मैंने नया-नया कुछ देखने की खूब कोशिश की थी, और असफल रहा था - शायद ये भी जीन का असर रहा हो...) माट्साब ने मुशायरा आयोजित किया था. उसके लिए मैंने दो व्यंज़ल रचे थे जो कि जाहिर है उन मापदण्डों पर खरे नहीं थे अतः मुशायरे में अपना स्थान बनाने में असफल रहे थे...

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व्यंज़ल 1

लोग तो कहेंगे कि है भी ये कोई ग़ज़ल

परंपराएं तोड़ने पर बनती है इक ग़ज़ल


जमाना चपलता से कुछ यूं बदल गया

मोहब्बतों से प्रकाशवर्ष दूर हो गई ग़ज़ल


सच मानें तो वो भी एक दंगा फसाद था

उस भीड़ में यूँ हमने भी गाई थी ग़ज़ल


जुमलों की जमावटें करें तो किस तरह

मेरी कराहों से बने तो बने कोई ग़ज़ल


रवि है अपना शागिर्द खुद उस्ताद खुद

मेरी ग़ज़ल को माने न माने कोई ग़ज़ल

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व्यंज़ल 2

नए साल पर है मेरी ग़ज़ल

कायदों से परे है मेरी ग़ज़ल


यूँ रस्ते तो बहुत गुजरते हैं

नई पगडंडी पे है मेरी ग़ज़ल


न मुहब्बत और न मजहब

नए खयालात है मेरी ग़ज़ल


तुम्हारी वो कल की बात थी

आने को कल है मेरी ग़ज़ल


रवि ने कहा वो कहता रहेगा

भले ही बेकार है मेरी ग़ज़ल


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दिनांक 5 जनवरी 2008 शनिवार की ऑनलाइन चिट्ठा समस्या निवारण गोष्ठी के संबंध में एक मित्र ने पूछा –

रवि भाई
स्काईप गोष्ठी का क्या रिस्पांस रहा। आपके चिठ्ठे पर भी इसका कोई विवरण नहीं है, क्या आप इस पर एक रपट भेज सकते हैं...
सधन्यवाद

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मेरा उत्तर था-

भाई जी,
स्काईप गोष्ठी घोर असफल रही. आयोजक और मेरे अलावा सिर्फ सागर नाहर ही पहुँचे. अब या तो चिट्ठाकारों को कोई समस्या ही नहीं रही या फिर उन्हें स्काइप का प्रयोग करने में समस्या रही :)
तो, इसकी रपट क्या बनेगी. और इसीलिए चिट्ठे पर विवरण भी नहीं है ;)

बहरहाल, आयोजक श्री प्रतीक शर्मा को बहुत बहुत धन्यवाद एवं श्री सागर नाहर का अत्यंत आभार जिन्होंने शामिल होकर इस आयोजन की लाज तो रखी... :)

(श्री दिनेश राय द्विवेदी एवं श्री रामचंद्र मिश्र तकनीकी कारणों से कनेक्ट नहीं हो पाए, जिसका अफ़सोस है)

इस पर उनका प्रत्युत्तर आया –

मुझो तो अफसोस से ज्यादा खुशी इस बात की है कि आपने इतने आगे की सोची, आप क्या समझते हैं कि कोई भी नया प्रयोग पहले दिन ही सफल हो जाता है...

तो, चलिए, इस ऑनलाइन चिट्ठा समस्या गोष्ठी की इस असफलता का ठीकरा भी जीन पर फोड़ते हैं – चिट्ठाकारों के जीन पर!

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व्यंज़ल 3

लीक से हट के चलना तो मेरे जीन में है

किसी रूटीन से बच के जीना रूटीन में है


यूँ तो कब्र में लटके हैं अपने पाँव मगर

हमने अपने को अब भी माना टीन में है


ये तो पता है कि सांपों के कान नहीं होते

मगर, जाने क्या जादू संपेरे के बीन में है


सियासतों का दौर अब कुछ ऐसा चला है

निर्मम अपराधी हर जगह, हर सीन में है


नए जमाने में परिभाषाएँ कुछ यूँ बदलीं

गिना जाता वो जाहिल रवि जहीन में है

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5 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. चलो जी ये अच्छा हुआ!!
    हम तो एक टांग पर तैयार हैं सब बातों का ठीकरा जीन पर फोड़ने के लिए!

    ऑनलाईन गोष्ठी वाले दिन ही दोपहर तीन बजे एक मीटिंग मे जाना पड़ा और शाम के करीब साढ़े पांच बजे फ़्री हुआ!!
    जानकर अफसोस हुआ कि लोग इकट्ठा नही हुए!

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  2. मैं व्यस्तता की वजह से गोष्टी में शामिल नहीं हो पाया, जीन को ही दोष दे देते है... :(

    पहले कहते थे की को विधाता ने लिखा है वही होता है. लगता है विधाता जीन पर लिखता है. :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. मैं तो सोचता था कि समस्या निवारण गोष्ठी के विवरण छपेंगे बाद में। उसमें से अपने काम का हम चुन लेंगे। पर यहां तो आप व्यंजल छाप रहे है

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  4. आपकी प्रस्तुति और कहने की शैली प्रशंसनीय है ,वैसे सारी व्यंजल रचनाये अच्छी है!

    उत्तर देंहटाएं
  5. व्यंजल और ग्यंजल
    दे रहे हैं खूब श्रीफल
    यश भी दें सीख भी
    पास हों समीप भी
    जब फिर करें गोष्टी
    हमें भी बतलाएं
    हमें पता हो और
    हम व्यस्तता का
    बहाना बनाएं,
    बहते हुए पहुंच जाएं
    स्वच्छ हो पाएं।

    उत्तर देंहटाएं

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