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उम्रदराजी और स्मार्टनेस

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ये माना जाता रहा है कि महिलाएँ अपनी उम्र को लेकर बहुत सतर्क रहती हैं और वो हमेशा से ये चाहती रही हैं कि उनकी उम्र 16 बसंत पार करके ठीक वहीं पर ठहर जाए. उधर पुरुष वर्ग भी अपने बाइसेप्स को 20-21 वर्ष पर या बहुत हुआ तो 25 वें ग्रीष्म पर स्थिर कर देना चाहते हैं. माथे पर उम्र की लकीरें, बालों पर उम्र की सफेदी, गालों पर उम्र के गड्ढे छुपाने के लिए अरबों-खरबों जतन किये जाते रहे हैं. महिलाओं के उम्र से संबंधित ढेरों चुटकुले आपको याद होंगे तो पुरुषों के उम्र से पहले ही सठियाने के चुटकुले भी कोई कम नहीं होंगे. ये तो कहावत भी है कि किसी भद्र महिला से उसकी उम्र और भद्र पुरुष से उसकी आय नहीं पूछनी चाहिए.पर, अब आप राहत की सांस ले सकते हैं. आप पुरुष हों या महिला, अब किसी को भी अपनी उम्र छिपाने की जरा सी भी आवश्यकता नहीं है. अब अपनी असली उम्र को बताने में किसी को भी कोई झिझक, कोई शर्म नहीं होनी चाहिए. बल्कि कुछ मायनों में, विश्वास रखिए, लोग कुछ जोड़ जाड़कर अपनी उम्र बताने लगेंगे – अपनी वास्तविक उम्र से अधिक बताने लगेंगे. आखिर, कोई भी अपने आपको डम्ब, बेवकूफ़, बुद्धिहीन कहलवाना पसंद करेगा भला?एक नए अध्…

मैं स्मार्ट या तू?

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स्मार्टनेस कहाँ – चिट्ठा लेखक में या चिट्ठापाठक में? एक डॉक्टर में या इंजीनियर में? एक प्रोफ़ेसर में या एक लिपिक में ? ठहरिए, पहले पूरी पोस्ट पढ़िए, फिर बताइएगा.दैनिक भास्कर में एन रघुरामन् मैनेजमेंट फंडा नाम से नित्य एक कॉलम लिखते हैं जिसमें वे प्रबंधन के गुर बताते हैं. आमतौर पर वे संक्षिप्त में बहुत सी काम की बातें बताते हैं और प्रायः उनमें से अधिकतर उनके स्वयं के अनुभवों से भरे रहते हैं. और अच्छे खासे दिलचस्प होते हैं.परंतु आज के (इंदौर उज्जैन संस्करण 25 जनवरी 2008) अपने आलेख में उन्होंने प्रोफ़ेशनल स्मार्टनेस की जो बातें कहीं हैं, वे निहायत ही बेतुकी और उनकी सीमित सोच को दर्शाती हैं. या फिर शायद जिस तरह से लोगों की जुबान फिसलती है, वैसी उनकी लेखनी फिसल गई है.अपने आलेख – स्मार्टनेस कहाँ एमबीए या सीए? में (जो शायद एमबीए कोचिंग संस्था पीटी द्वारा प्रायोजित प्रतीत होती है...) उन्होंने इंटरनेट पर सदियों पुराने टहल रहे और लाखों मर्तबा फारवर्ड किए जा चुके चुटकुले को एमबीए और सीए हेतु जिस तरीके से एडॉप्ट किया है वो किसी भी रूप में सही प्रतीत नहीं होता. और अंत में उनका निष्कर्ष कि “फंडा य…

केंद्रीय हिंदी संस्थान की पत्रिका : गवेषणा में हिन्दी चिट्ठाकारी पर आलेख

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केंद्रीय हिंदी संस्थान – आगरा की पत्रिका – गवेषणा का अक्तूबर – दिसम्बर 2007 का अंक भाषा एवं सूचना प्रौद्योगिकी पर केंद्रित है. इस अंक में सूचना प्रौद्योगिकी (इनफ़ॉर्मेशन तकनालॉजी) पर कोई 29 आलेख हैं जो पत्रिका के 200 पृष्ठों में समाए हुए हैं. हिन्दी भाषा व फ़ॉन्ट की समस्याओं से लेकर यूनिकोड और हिन्दी इंटरनेट इत्यादि पर लगभग सभी विषयों पर इसमें आलेख हैं. रेडहैट के राजेश रंजन जो कि लिनक्स के हिन्दी में स्थानीयकरण का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, ने “भारतीय उप महाद्वीप, स्थानीयकरण आंदोलन और मुक्त स्रोत” नाम से एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा है.चिट्ठाकारी पर भी मेरा एक आलेख छपा है (जिसे कोई छः आठ माह पहले लिखा गया था) जिसका चित्र नीचे दिया जा रहा है. चित्रों पर क्लिक कर उन्हें बड़ा कर आप पढ़ सकते हैं.पृष्ठ 1 (बड़े आकार में पढ़ने के लिए चित्रों पर क्लिक करें)पृष्ठ 2पृष्ठ 3पृष्ठ 4पृष्ठ 5अन्य विवरण व संपर्क:
पत्रिका - गवेषणाअंक 88/2007मूल्य - 40/- रुपएकेंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगराहिंदी संस्थान मार्ग, आगरा 282005
--------.छटांक भर सेंस ऑफ़ ह्यूमर तो लाओ यार...मेरे कल के चिट्ठाजगत् की सुविधा के बारे में…

ब्लॉगिंग का झुमरी तलैया बनाम थू थू चौकड़ी से बचने का #1 सॉलिड उपाय.

यूं तो (यहाँ हिन्दी माना जाए) ब्लॉग पोस्टों में 80 प्रतिशत कूड़ा कबाड़ा सदैव सर्वदा मिलते रहने की थ्योरी और वाद-विवाद हिन्दी ब्लॉगिंग के पुरातन समय http://hindini.com/fursatiya/?p=119 से ही जारी है, मगर ये बात भी तय है कि कूड़े के कूड़ा-पन की ग्रेविटी दिनोंदिन बढ़नी ही है, भले ही प्रतिशत वहीं पर झूलता रहे.हाल ही में जे पी नारायण http://behaya.blogspot.com/2008/01/blog-post_2134.html ने इस बात को फिर http://behaya.blogspot.com/2008/01/blog-post_20.html गहराई से उठाया. कुछ इसी तरह की समस्या अशोक पाण्डेय http://kabaadkhaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_27.html#c3007857872533696971 के साथ भी हुई थी. तब अशोक पाण्डेय व जेपी नारायण की बातों पर मेरा कहना था कि आप ब्लॉगिंग के कूड़े फैलने से किसी क़िस्म की रोक नहीं लगा सकते. हाँ, कूड़े-कबाड़ से आप कल्टी मार सकते हैं. आप इस बात पर स्वतंत्र हैं कि आप अपनी नाक कहाँ घुसाएँ – ताकि गंध अपने पसंद, अपने विचारों के अनुरूप हो. और हिन्दी के हर चिट्ठाकार से मेरा यही कहना है. इंटरनेट पर तमाम तरह की तकनीक उपलब्ध है जिससे यह काम किया जा सकता है, और आसानी से…

रचनाकार के नित्य के नियमित पाठक - 4389!

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और इस चिट्ठे के 439!
ये चित्र देखें-
ये फ़ीड बर्नर फ़ीड काउंट के चित्र हैं जो अभी भारतीय समयानुसार 11 बजे दिनांक 19 जनवरी 2008 को लिया गया है. 4389 पाठक संख्या वाला चित्र रचनाकार का है और 439 आंकड़ा वाला चित्र इस चिट्ठे का है.
अगर ये सही है, तो ये तो वाकई कमाल है. परंतु ठहरिये. ये तो सीधा सीधा फ़ीडबर्नर की तकनीकी दिक्कत मालूम देती है. या फिर कोई स्पैमर इन्हें बॉट के जरिए सब्सक्राइ किए जा रहा है. ठंड रखिए. मामला सही होगा तो ये भी सेंसेक्स की तरह मुंह के बल गिरेगा. हिन्दी ब्लॉगों के पाठक इतने नहीं हैं. ये आंकड़ा हासिल करने में कोई पाँच साल और लगेंगे - मेरे चिट्ठे के 439 पहुँचने के लिए. रचनाकार के लिए कोई भविष्यवाणी नहीं, क्योंकि ये तो पाठकों व रचनाकारों का स्थल है.

अपने चिट्ठे पर फ़ीडबर्नर का फ़ीड काउंट और ईमेल से चिट्ठा पढ़ने की सुविधा कैसे लगाएँ?

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आपके चिट्ठे को आपके बहुत से पाठक नियमित सब्सक्राइब कर पढ़ते हैं और गूगल-वर्डप्रेस के डिफ़ॉल्ट आरएसएस फ़ीड में ये बात दिखाई नहीं देती कि ऐसे पाठक कितने हैं. इसे जानने के लिए और तमाम अन्य एनालिसिस तथा पाठकों की सुविधाओं के लिए फ़ीडबर्नर की फ़ीड अलग से कई चिट्ठों पर दी जाती रही है जैसा कि इस चिट्ठे में है. ऑनलाइन चिट्ठा समस्या निवारण गोष्ठी जो स्काईप के जरिए हुई थी, उसमें सागर नाहर ने अपने चिट्ठे पर फ़ीडबर्नर के चिकलेट व ईमेल से चिट्ठा पढ़ने की सुविधा लगाने में आ रही समस्या के बारे में बताया था. मेरा पन्ना में जीतेन्द्र चौधरी अपने चिट्ठे का वर्ष 2008 के रूझान की बातें करते समय फ़ीडबर्नर जैसी सुविधा अपने चिट्ठे में नहीं रखने के कारण उनके चिट्ठे को नियमित सब्सक्राइबर द्वारा पढ़े जाने वाले आंकड़े नहीं बता पा रहे हैं. यदि उनके चिट्ठे पर फ़ीड बर्नर लगा होता तो वे इस आंकड़े को अवश्य बता पाते. तो आज नाहर जी की समस्या दूर की जा रही है – परंतु सिर्फ ब्लॉगर के लिए. शायद यह उनके नए तकनीकी दस्तक में काम आ जाए. मैं वर्डप्रेस इस्तेमाल नहीं करता हूँ, अतः ये नहीं कह सकता कि इनमें बताए चरण वर्डप्रेस के…

अइयो रब्बा कभी निर्णायक न बनना.....

आपने रेशमा की आवाज में वो गाना सुना होगा. अइयो रब्बा कभी प्यार न करना. शायर ने अपनी लेखनी में दर्द तो भरा ही था, रेशमा की दर्दीली आवाज ने उसमें और चार चाँद लगा दिए. तो जो हाल उस गीत में वर्णित है, यारों, सचमुच वही हाल इधर भी है. आप पीएम बन जाना, सीएम बन जाना, ये बन जाना, वो बन जाना, पर निर्णायक न बनना. और, हिन्दी ब्लॉगों के तो कतई नहीं. बहुत दर्द है यहाँ. इससे पहले इंडीब्लॉगीज़ में एक बार निर्णायक बना था. तब भी कुछ बातें उठी थीं. मगर इतनी नहीं. एकाध साल बाद देबाशीष ने फिर से निर्णायक बनने के लिए कहा तो मैंने व्यस्तता का बहाना कर टाल दिया था (देबू भाई, शायद आपको याद हो,). इस बार मानस जी के आग्रह को टाल नहीं सका था. और, यदि पुरस्कृतों में दूसरे कोई तीन अन्य नाम होते, इंडिकेटिव सूची में कोई पचीसेक अन्य दूसरे नाम होते, तब भी, यकीन मानिए, बात वही, उसी तरह की होती जो अभी भी हो रही है! और हद तो ये हो रही है कि आदरणीय ममता जी, जिनका ईमेल पता तक मेरे पास नहीं था, और निर्णय के बारे में उन्हें खबर करने और बधाई देने के लिए मैंने उनका ईमेल पता चिट्ठाकार समूह पर सार्वजनिक पूछा था (लोग तो ये भी क…

लिनक्स एवं विंडोज के लिए डेस्कटॉप वातावरण केडीई 4.0 जारी...

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(लिनक्स/यूनिक्स तंत्र का बेहतरीन, लोकप्रिय डेस्कटॉप वातावरण केडीई 4, जिसके हिन्दीकरण के लिए सराय द्वारा स्वीकृत परियोजना पर कार्य जोरों से चल रहा है, जारी किया जा चुका है. इसकी प्रमुख खासियत यह है कि अब इसके सैकड़ों मुफ़्त उपलब्ध अनुप्रयोग विंडोज तंत्र - जी हाँ, आपने सही सुना... विंडोज तंत्र के लिए भी उपलब्ध हैं. यह घोषणा केडीई के मूल साइट पर यहाँ उपलब्ध है जिसे नीचे पुन: उद्धृत किया जा रहा है. आप देखेंगे कि तमाम विश्व में जारी इस घोषणा में भारतीय भाषाएँ छाई हुई हैं - बांग्ला, गुजराती, मलयालम, मराठी, पंजाबी तथा हिन्दी में यह घोषणा हुई है. )इनमें भी उपलब्ध हैं: अंग्रेज़ीबांग्ला (भारत)कटलनचेकस्पेनीफ़्रांसीसीगुजरातीइब्रानीइतालवीलातवियाईमलयालममराठीपंजाबीपुर्तगाली (ब्राजीलियाई)रूसीडचस्लोवियाईस्वीडिशकेडीई परियोजना प्रस्तुत करता है बेहतरीन मुफ़्त सॉफ़्टवेयर डेस्कटॉप का चौथा प्रमुख संस्करण अपने चौथे प्रमुख संस्करण के साथ केडीई समुदाय केडीई ४ के युग में प्रवेश कर गौरवान्वित महसूस कर रहा है. जनवरी ११, २००८ (इंटरनेट). केडीई समुदाय को यह घोषणा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि केडीई ४.०.० अब उपलब्…

सूचना-तकनीक और जालजगत में वर्ष 2007 के हिट और फ़्लॉप का लेखा जोखा

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2007 के प्रारंभ में सूचना तकनीक के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव की संभावनाओं को देखते हुए हमेशा की तरह कुछ वार्षिक भविष्यवाणियां की गई थीं जिनमें कुछ तो पूरे हुए और कुछ का तो पता ही नहीं चला. सबसे बड़े असफल भविष्यवाणियों में से एक - गूगल के कम्प्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम के 2007 में अवतरण की अटकलों को माना जा सकता है जो कि अंततः महज कोरी कल्पना ही सिद्ध हुई. मगर यह कोरी कल्पना 2007 के अंत तक आते-आते गूगल के मोबाइल फ़ोनों के लिए मुक्त स्रोत के ऑपरेटिंग सिस्टम एंड्राइड के नाम से अंततः परिवर्तित रूप में फलीभूत हो ही गई. अब देखना यह है कि एंड्राइड आने वाले वर्षों में क्या गुल खिलाता है. वैसे, ये बात तो तय है कि आने वाले वर्ष मोबाइल कम्प्यूटिंग के ही होंगे, क्योंकि हर व्यक्ति के जेब में अब एक अदद मोबाइल फोन अब वक्त की जरूरत बन चुकी है. वर्ष 2007 के कुछ सबसे बड़े फ़्लॉपों की सूची में माइक्रोसॉफ़्ट का विंडोज विस्ता अपने आप को शामिल रखने में सफल रहा है. हालाकि यह नवंबर 2006 में जारी हुआ था, मगर इसे 2007 का उत्पाद कहना उचित होगा. सीनेट और जेडडीनेट से लेकर टेक-रिपब्लिक और पीसीवर्ल्ड तक की 2007 की श…

उलटी तरफ चलना तो मेरे जीन में है…

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बहुत-बहुत धन्यवाद इस शोध का. आभार, इस नए अध्ययन निष्कर्ष का. अब मैं अपनी असफलता का ठीकरा अपने जीन के सिर पर फोड़ सकता हूँ. किसी भी असफल काम के लिए, अब मैं अपने जीन को जिम्मेदार ठहरा सकता हूँ. वैसे भी, जब किसी शिशु का जन्म होता है, लोग नवजात को देखते ही बोलते हैं – यह अपनी मां/पिता पर गया/गई है. कभी-कभी दादा-दादी या नाना-नानी की प्रतिकृति भी दिखाई देने लगती है, और कभी किसी टिप्पणी से ये भी आभास हो सकता है कि जैसे जेनेटिक गुण पड़-पड़दादा से भी ट्रांसफर हो के चले आ रहे हों. तो, अब मैं पूरी तरह रिलेक्स हो गया हूँ. अपनी असफलताओं के पीछे अब तक मुझे बड़ा टेंशन होता था. अपने आपको मैं कोसता रहता था. अपनी अलाली, अपनी अकर्मण्यता, अपनी कूपमण्डूकता और न जाने क्या क्या के लिए मैं शर्मिंदा रहता था और सोचता कि अब मैं आगे से और अधिक मेहनत करूंगा, अपने आलस्य को छोड़कर सफलता के पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ जाऊंगा. मगर इससे होता क्या. वही होता जो मंजूरे जीन होता. और जो होता आया है, और जो मुझे अब पता चला है – मेरे अब तक के सफलताओं-असफलताओं, आचार-व्यवहार-विचार के लिए निगोड़ा मेरा ये जीन जिम्मेदार है. अब जबकि …

चिट्ठे में समस्या? हिन्दी में समस्या?

चिट्ठे में विजेट कैसे लगाएँ? चिट्ठे में एडसेंस कैसे लगाएँ? चिट्ठे में चित्र कितने आकार का लगाएँ? फ़ॉन्ट परिवर्तन कैसे करें? शुषा कृति देव से मंगल में कैसे बदलें? सबसे सरल रूप में हिन्दी कैसे टाइप करें? ये कैसे करें, वो कैसे करें..... इन सबका समाधान आज दिनांक 5 जनवरी 2007 को ऑनलाइन चिट्ठा समस्या गोष्ठी में भारतीय समयानुसार, दोपहर 3 से 5 बजे प्रस्तावित है. विस्तृत जानकारी यहां देखें. आप सभी सादर आमंत्रित हैंअद्यतन - अब से कोई पौन घंटे बाद भारतीय समयानुसार दोपहर तीन बजे गोष्ठी प्रारंभ हो रही है. स्काइप में इस गोष्ठी में शामिल होने के लिए निम्न नंबर डायल करें. यदि कोई समस्या हो तो बाजू पट्टी में सी-बॉक्स में ऑनलाइन संदेश देंस्काइप पर डायल करने का नंबर +9900111759345403406

संकट में सबसे बड़ा साथी कौन होता है?

वाह! मनी. जी हां, पैसा. और इस बात को फिर से, गंभीरता से बताया जा रहा है वेब-दुनिया में. इस दफ़ा वेब दुनिया में ब्लॉग चर्चा में अवतरित हुआ है कमल शर्मा का ब्लॉग वाह मनी. ब्लॉग चर्चा में कमल शर्मा का विस्तृत साक्षात्कार भी प्रकाशित हुआ है – जिसमें वे बता रहे हैं कि किस तरह अपने ब्लॉग -  वाह मनी के माध्यम से सौ लोगों को करोड़ पति बनाने का लक्ष्य उन्होंने रखा है. और, पंद्रह तो रास्ते पर पहले से ही हैं. तो यदि आप भी अभी करोड़ पति नहीं हैं, और बनने की इच्छा रखते हैं तो सबसे पहला काम आपको क्या करना है? क्या इसे भी बताने की आवश्यकता है?

चिट्ठाकारों के लिए नए साल के टॉप 10 संकल्प

प्रत्येक हिन्दी चिट्ठाकार को निम्न दस संकल्प लेने चाहिएँ. ये संकल्प उन्हें चिट्ठासंसार में प्रसिद्धि, खुशहाली व समृद्धि दिलाने में शर्तिया मददगार होंगे. मैं टिप्पणी करूंगा – हर तरह की, हर किस्म की, नियमित, नामी-बेनामी-सुनामी-कुनामी. शुरुआत इस चिट्ठे पर टिप्पणी देकर कर सकते हैं. प्रति दस टिप्पणियों पर एक प्रति-टिप्पणी की गारंटी, तथा साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इस चिट्ठे पर टिप्पणी प्रदान करने पर सफलता की संभावना अधिक है. मैं नित्य कम से कम एक चिट्ठा पढूंगा – ठीक है, प्रतिदिन सौ दो सौ चिट्ठे प्रकाशित होने लगे हैं और इनकी संख्या 2008 में एक्सपोनेंशियली बढ़नी ही है और एक पाठक के रुप में कोई भी इनमें से सभी पोस्टों को अपनी पूरी जिंदगी में नहीं पढ़ सकता मगर वो रोज कम से कम एक, इस चिट्ठे को तो पढ़ ही सकता है. तो, अच्छे प्रतिफल के लिए अपने संकल्प में इस चिट्ठे की हर प्रविष्टि को पढ़ने में अवश्य शामिल करें मैं सप्ताह में कम से कम एक पोस्ट लिखूंगा. वैसे तो कोई भी हिन्दी चिट्ठाकार नित्य न्यूनतम चार पोस्ट (अमित अग्रवाल और डेरेन रोज़ इसीलिए सफल हुए हैं, पर वो अंग्रेज़ी की बात है) ठेल सकता है, मग…

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