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December, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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मरफ़ी के नए साल के नए नवेले नियम

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· नया साल नई समस्याएँ लेकर आता है. · नया साल सर्वथा नवीन, नूतन समस्याएँ लेकर आता है. · नया साल पुराने संकल्पों को ही लेकर आता है. . नए साल के संकल्प जिस गंभीरता से लिए जाते हैं वे उससे ज्यादा गंभीरता से निभाए नहीं जाते. · नए साल में पुराने संकल्प ज्यादा गंभीरता से लिए जाते हैं और वे उसी गंभीरता से निभाए नहीं जाते. · नए साल के नए संकल्पों का भी आमतौर पर वही हश्र होते हैं जो आपके पिछले संकल्पों के हुए थे. · नए साल के नए संकल्प लेने में आसान परंतु निभाने में असंभव होते हैं. · नए साल की पहली सुबह हमेशा हैंगओवर लेकर आती है. · नया साल भी पुराने साल की तरह गुजरता है. · नया साल पुरानी चीजों को ही लेकर आता है. · नए साल में भी आपके विचार कोई जादू नहीं करेंगे. · नया साल आता बहुत देर से और गुजरता बहुत जल्दी से है. · नए साल में प्रगति निश्चित है – टैक्सेशन में, प्रदूषण में, महंगाई में, वायरस में, स्पैम में... · नए साल में नए विचार आएंगे जो पहले के विचारों की तरह ही, काम नहीं करेंगे. · नए साल के बीतने का अनुभव भी पुराने साल जैसा ही रहेगा. · मुस्कुराएँ. नया साल क्रूर होता है. · किसी भी…

2007 में इंटरनेटी हिन्दी – कैसे बीता साल?

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इंटरनेटी हिन्दी के लिए वर्ष 2007 अच्छा-खासा घटनाओं भरा रहा और कुल मिलाकर एक विहंगम दृष्टि डालें तो यह वर्ष हिन्दी के लिए बड़ा ही लाभकारी रहा. साल के शुरूआत में ही हिन्दी जगत को नायाब तोहफ़ा मिला था – इंटरनेट के जाने पहचाने, सुप्रसिद्ध साहित्यिक जाल स्थल अभिव्यक्ति और अनुभूति अंततः यूनिकोड में आ गए. इसके ठीक कुछ ही दिनों बाद खबर मिली कि हिन्दी समाचारों की लोकप्रिय साइट प्रभासाक्षी ने नित्य 3 लाख हिट्स पाने का रेकॉर्ड प्राप्त कर लिया. प्रभासाक्षी कृतिदेव श्रेणी के फ़ॉन्ट पर आधारित है और यूनिकोड पर आने हेतु प्रयोग चल रहे हैं. फरवरी 07 आते आते विश्व की सबसे बड़ी वेब पोर्टलों में से एक, याहू ने भी हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं को अपना लिया. बाद के कई महीनों में तो कई बड़ी साइटें और समाचार पत्र स्थल जैसे कि वेब दुनिया से लेकर दैनिक भास्कर तक शामिल हैं, सभी यूनिकोड में परिवर्तित हो गए. तब तक विंडोज विस्ता भी आ चुका था जिसमें हिन्दी का अंतर्निर्मित समर्थन उपलब्ध है – यानी आपको विंडोज एक्सपी की तरह इसके संस्थापना सीडी के जरिए अलग से हिन्दी संस्थापित करने की आवश्यकता नहीं है. और इसके इंटरफेस…

विज्ञापन अच्छे हैं...

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किसी बढ़िया तेज रफ़्तार फ़िल्म के क्लाइमेक्स के ठीक पहले टीवी पर एक छोटा सा ब्रेक ले लिया जाए और अंतहीन विज्ञापनों का सिलसिला प्रारंभ हो जाए तो शर्तिया आपको विज्ञापनों से घृणा होने लगेगी. परंतु रुकिये, हममें से बहुतों के लिए विज्ञापन अच्छे हैं, और, वे और बेहतर होने जा रहे हैं...
गूगल अपना नया नवेला सेलफोन, जिसके बारे में कयास लगाए जा रहे हैं कि वो फरवरी 2008 में आने वाला है, उन लोगों को मुफ़्त में वितरित किए जाएंगे जो विज्ञापनों को पसंद करते हैं – मेरा मतलब है, विज्ञापनों को झेल सकते हैं. माइक्रोसॉफ़्ट भी पीछे नहीं है. माइक्रोसॉफ़्ट का स्लिमट्रिम ऑफ़िस सूट जो कि माइक्रोसॉफ़्ट वर्क्स कहलाता है, बहुत संभव है आपको आपके नए कंप्यूटर पर पहले से संस्थापित मिले, वो भी मुफ़्त. बस, इसके लिए आपको कुछ विज्ञापनों को झेलना होगा, जो कि आपके आनलाइन होने पर रीफ्रेश होते रहेंगे.
किसी उत्पाद को मुफ़्त में प्रयोग के लिए यदि हमें विज्ञापनों को कुछ सेकंड झेलना भी हो तो क्या फ़र्क पड़ता है. अगर लाइसेंस्ड विंडोज और एमएस ऑफ़िस विज्ञापनों के साथ मुफ़्त में मिलें, तो भाई, कोई पायरेटेड क्यों ले?
विज्ञापनों के भरोसे…

हनी, आई श्रंक द पिक्स...

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पिछले दिनों मेरा पॉप3 ईमेल क्लाइंट जाम हो गया. मेरा थंडरबर्ड जाम हो गया, जबकि कनेक्शन बढ़िया था. वो किसी एक ईमेल को डाउनलोड करने का प्रयास कर रहा था. समस्या की जड़ में जाकर देखा तो पता चला कि वो कोई 6 मेबा के एक चित्र को डाउनलोड करने की कोशिश कर रहा था. वह चित्र मेरे एक मित्र ने भेजा था जिसने नया नया हाई एण्ड कैमरा लिया था. हम सभी अपने ईमेल व चिट्ठों में चित्रों का जमकर प्रयोग करते हैं. चाहे वे डिजिटल कैमरे से खींचे गए हों या फिर कम्प्यूटर स्क्रीनशॉट से लिए गए. डिजिटल कैमरों से खींचे गए चित्रों की गुणवत्ता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और इसी वजह से उनका आकार भी. जब 39 मेगापिक्सल कैमरा कैमरे से कोई चित्र खींचा जाएगा तो जाहिर है उसका आकार 8-10 मेगाबाइट से कम क्या होगा. और, यदि आप जाने अनजाने इस चित्र को किसी मित्र को भेज देते हैं तब? तब उसका ईमेल क्लाइंट यदि डायलअप पर हुआ तो वो जाम ही हो जाएगा. और यदि ब्रॉडबैण्ड पर हुआ तब वो इसे डाउनलोड तो कर लेगा, परंतु यदि उसे देखना भर है, या कहीं जाल-पृष्ठ में प्रयोग करना है, इसका प्रिंटआउट नहीं लेना है तब इतने बड़े आकार के फोटो का कोई अर्थ ही नहीं है. ब…

देखन में छोटे लगें लाभ दें भरपूर...

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ये किसी एडसेंसिया ब्लॉग पोस्ट की बात नहीं हो रही है. दरअसल इस ब्लॉग पोस्ट का आइडिया मोकालू गुरु के भूत ने पिछले दिनों मेरे सपने में आकर दिया था. किताबों की फुटपाथिया दुकानों में आपको ऐसी सैकड़ों किताबें मिल जाएंगीं जिनमें लाल किताब से लेकर तंत्र मंत्र और जादू टोने तक – यानी हर किस्म की सामग्री मिलेगी. और, शायद यही वजह है कि भारत में आज भी जादू टोना और तंत्र मंत्र चल रहा है. कुछ समय पहले तक कादम्बिनी जैसी प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिका में राजेन्द्र अवस्थी वार्षिक तंत्र मंत्र विषेशांक निकाला करते थे जिसकी बिक्री और अंकों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती थी और अंक निकलते ही मार्केट में सोल्ड आउट हो जाता था. और क्यों न हो, आखिर, तंत्र मंत्र की शक्ति ही ऐसी होती है. तो उस सपने से वशीभूत हो एक किताब मैं भी ले आया. किताब है पं. शशि मोहन बहल की लिखी और मनोज पब्लिकेशन्ज, बुराड़ी दिल्ली से प्रकाशित “देखन में छोटे लगें लाभ दें भरपूर – सरल टोनों-टोटकों द्वारा सर्वबाधाओं से मुक्ति” संस्करण 2007 – आईएसबीएन नं. 978-81-313-0315-2 मूल्य 60 रुपए. किताब में कोई बीस खण्डों में विविध प्रकार के टोने टोटके दिए गए ह…

ऑनलाइन चिट्ठा समस्या निराकरण गोष्ठी का सादर निमंत्रण

दोस्तों, हम सभी चिट्ठाकारों को समय समय पर तकनीकी दिक्कतें झेलनी होती हैं. खासकर हिन्दी के मामले में. हममें से कोई भी – फिर से एक बार, कोई भी सर्वज्ञ नहीं है, और आज का विषय विशेषज्ञ कल को बेकार हो जाता है क्योंकि तकनीक नित्य बदलती रहती है. जाहिर है, आज का हमारा लिखा-पढ़ा कल को बेकार हो जाता है. ऐसे में अपने ज्ञान को नित्य ब्रशअप करने के अलावा कोई चारा नहीं होता है. इसी बात को मद्देनजर रखते हुए होशंगाबाद के श्री प्रतीक शर्मा, दिनांक 6 5 जनवरी 2008 दिन शनिवार को दोपहर 3 बजे से 5 बजे तक एक ऑनलाइन चिट्ठा समस्या निराकरण गोष्ठी का आयोजन कर रहे हैं. इस तरह की (परंतु तकनीकी नहीं,) गोष्ठी पहले भी आयोजित की जा चुकी है. यह गोष्ठी ऑनलाइन होगी, और स्काइप के जरिए आपसी वार्तालाप (इंस्टैंट मैसेंजर से नहीं,) के जरिए होगी – यानी ज्ञान का आदान-प्रदान आपस में बोल-बताकर किया जा सकेगा. इस ऑनलाइन गोष्ठी में पूरे समय तक बने रहना आवश्यक नहीं है – आप अपनी सुविधानुसार 10-15 मिनट का भी समय दे सकते हैं. इसके लिए आपको अपने कम्प्यूटर पर स्काइप (यहां से डाउनलोड करें) को संस्थापित करना होगा, और प्रतीक शर्मा के इस …

ओपन ऑफ़िस 2.x में हिन्दी वर्तनी जांचक लगाएँ.

ओपन ऑफ़िस मुफ़्त एवं मुक्त उपलब्ध ऑफ़िस सूट है, जिसे एमएस ऑफ़िस के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. उन्मुक्त इसे प्रारंभ से ही इस्तेमाल करते रहे हैं और लिनक्स तंत्र में मैं भी इसे प्रयोग करता रहा हूँ. ओपन ऑफ़िस में हिन्दी वर्तनी जांच की सुविधा अंतर्निर्मित नहीं है. परंतु आप स्वयं इसे कुछ सरल चरणों के जरिए संस्थापित कर सकते हैं. इसके लिए निम्न चरण हैं- हिन्दी शब्दकोश यहाँ से डाउनलोड कीजिए – http://ftp.services.openoffice.org/pub/OpenOffice.org/contrib/dictionaries/hi_IN.zipइसे आप किसी उपयुक्त फोल्डर/डिरेक्ट्री में अनजिप कर लें.अनजिप करने पर आपको अतिरिक्त फ़ाइलों के साथ ये निम्न दो फ़ाइलें मिलेंगी –hi_IN.aff hi_IN.dic

इन दोनों फ़ाइलों को आपको ओपन ऑफिस के शब्दकोश डिरेक्ट्री/फोल्डर में नकल करना होगा. आमतौर पर ओपन ऑफिस की शब्दकोश फ़ाइलें लिनक्स में इस डिरेक्ट्री में होती हैं – /usr/lib/openoffice/share/dict/ooo
तथा विंडोज तंत्र में प्रोग्राम फ़ाइल/ओपन ऑफ़िस डिरेक्ट्री में किसी dict सब-डिरेक्ट्री में (आरंभिक संस्थापना के समय यदि इसे बदला गया होगा तो यह जुदा भी हो सकता है.)

इसी डिरेक…

ब्लॉग यायावरी में यूनुस खान का कवितामयी दस्तक

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दैनिक भास्कर उज्जैन के आज (गुरूवार 20 दिसंबर 2007) के संस्करण में यूनुस खान (जी हाँ, अपने रेडियोवाणी वाले) की निम्न कविता प्रकाशित हुई है – (मुझे भास्कर की साइट पर रचना की कड़ी खोजने से भी नहीं मिली, हालांकि अब ये साइट यूनिकोड पर आने लगी है. अतः कविता की स्कैन की गई छवि के साथ ही कविता भी प्रस्तुत है:) --------. छोटे शहर के संकोची बच्चेहम छोटे शहर के बच्चे थे अब बड़े शहर के मुंशी हैं और जा रहे हैं और बड़े शहर के मजदूर बनने की तरफ. हमने जवानी में कविताएँ लिखी थीं और कलम चलाते रहने का वादा किया था खुद से. जवानी की डायरी में अभी भी मौजूद हैं वे गुलाबी कविताएँ. पर कलम अब मेज पर पड़ी जंग खा रही है और हम कीबोर्ड के गुलाम बन गए हैं. मित्र हम दुनिया को बदलने के लिए निकले थे और शायद दुनिया ने हमें ही बदल दिया भीतर-बाहर से अब हम नापतौल कर मुस्कराते हैं अपनी पॉलिटिक्स को ठीक रखने की जद्दोजहद करते हैं... झूठी तारीफ़ें करते हैं, वादे करते हैं कोरे और झूठे और हर शाम सिर झटककर दिनभर बोले झूठों को जस्टीफाई कर लेते हैं हम छोटे शहर के बड़े दोस्त थे, जिंदगीभर वाले दोस्त. लेकिन बड़ी द…

हिन्दी कंप्यूटरी की कहानी : वेद प्रकाश की जुबानी

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पुस्तक समीक्षा हिन्दी कंप्यूटरी सूचना प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिक सरोकारहिन्दी कम्प्यूटरी के भूत-वर्तमान-भविष्य की रोचक, उत्तेजक, मनोरंजक, अत्यंत ज्ञानवर्धक, और साथ ही, जाहिर है विडंबना-गाथाओं से भरपूर, कहानी हिन्दी अधिकारी वेद प्रकाश ने अपनी किताब - हिन्दी कंप्यूटरी - सूचना प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिक सरोकार में लिखी है. (वेद प्रकाश) प्रारंभ में ही अपनी बात कहते हुए वेद प्रकाश बताते हैं – .....हमारे कार्यालय में सभी सरकारी कार्यालयों की तरह अंग्रेज़ी का माहौल था. हिंदी के नाम पर प्रतियोगिताएँ, पुरस्कार योजनाएँ, हिंदी बैठकें भी चलती रहती थीं. इनके साथ ही अंदर ही अंदर हिंदी में काम की मात्रा धीरे-धीरे ही सही बढ़ती जा रही थी. इसी बीच कार्यालय में कंप्यूटर का प्रवेश हुआ. शुरू में यह काफी सीमित था. कंप्यूटर पर टाइप मात्र करने वाले लोग किसी टैक्नोक्रेट के समान श्रद्धा से देखे जाते थे. हिंदी विभाग के लोग तो सहम कर उधर ताकते तक न थे. ...अपनी बात को वे कुछ इस तरह आगे बढ़ाते हैं – ...हिंदी अधिकारी होने के नाते मन में कम्प्यूटरों में हिन्दी इस्तेमाल नहीं कर पाने की बातें कहीं कसकती भी थ…

ब्लॉगर, साहित्यकार से आगे है, और रहेगा.

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(पिछले दिनों अनिल ने ब्लॉगर बनाम आम साहित्यकार पर विचारोत्तेजक लेख लिखा था जिसे आगे बढ़ाते हुए दिलीप ने हिन्दी चिट्ठाजगत् में गैंग और माफ़िया की बातें कीं और आरोप लगे कि लोगों ने ब्लॉग दुकानें सजा ली हैं. मगर, मेरा मानना है कि चिट्ठाकारी में गैंग और माफिया जैसी चीजें सिर्फ और सिर्फ काल्पनिक हैं, ठेठ कल्पना की उपज हैं और न कभी हो सकती हैं और न हो सकेंगी. जिसकी दुकान में माल बढ़िया, सार्थक होगा मक्खियों के माफ़िक पाठक और टिप्पणीकार वहीं मंडराएंगे. और, साथ ही, चिट्ठाकार सदैव ही आम साहित्यकार से एक कदम आगे रहेगा. और, यकीन मानिए, भविष्य में चिट्ठाकारी के जरिए ऐसे साहित्य रचे जाएंगे जिसकी कल्पना भी हमें (अब भी!) नहीं होगी. कारण ऑब्वियस है. चिट्ठों में संपादकीय संस्तुति, संपादकीय कैंची जैसी चीजों का सर्वथा अभाव और चिट्ठों की सर्वसुलभता, उसका अमरत्व और चिटठों के बहुआयामी-मल्टीमीडिया युक्त होना. प्रस्तुत आलेख बालेंदु के वृहत आलेख से प्रेरित है और इसे रेडियो वार्ता हेतु बेस के लिए तैयार किया गया था. चूंकि ब्लॉगर बनाम साहित्यकार की बहस कई मंचों पर चल रही है, इसे यहाँ प्रकाशित करना समीचीन होगा)--…

कष्ट, क्रोध और उदासी भरा एक दिन...

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सुबह 6 बजे अलार्म की घंटी बजी तो मजबूरन ठंड में ठिठुरते हुए उठना पड़ा. सुबह 6 बजे नल आता है. वह भी एक दिन छोड़कर. आज नल आने की बारी थी. और कभी तो ये भी होता है कि उठ कर नल को निहारते रहो... और वो आता नहीं. थोड़ी देर बाद नगर निगम का पोंगा चिल्लाता है - नल शाम को या दोपहर आएगा. और अपनी कमी छुपाने के लिए बहाने भी बनाता है - बिजली सप्लाई सही नहीं मिलने के कारण पानी की टंकिया पूरी भर नहीं पाईँ....

यूँ तो घर पर ट्यूबवेल भी है. पर, जब यह भवन बना था तबके भू-जल स्तर के अनुरूप इसे कोई 175 फीट गहरा किया गया था. आज स्थिति यह है कि 400 फीट में भी पानी नहीं है. लिहाजा फरवरी के बाद ट्यूबवेल सूखने लग जाता है और जब मई जून में वास्तविक में पानी की आवश्यकता होती है, तब यह मुँह चिढ़ाता पूरी तरह सूखा बना रहता है.

तो, बात सुबह की हो रही थी. जैसे ही जमीन में कोई दो फुट नीचे टंकी में लगा नल (उससे ऊपर तो ससुरा पानी का प्रेसर ही नहीं आता!) खोल कर उठना चाहा, टंकी का भारी भरकम लोहे का ढक्कन मेरे घुटने पर धाड़ से गिर पड़ा. दर्द की अनुगूंज सिर तक पहुँच गई और मेरा सिर चकरा गया. तब समझ में आया कि लोग-बाग "दिमाग घ…

एमएस ऑफ़िस हिन्दी 2007 – एक त्वरित नजर

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यूँ तो हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 के लिए मैंने कोई तीन-चार महीने से पंजीकरण करवाया हुआ था. माइक्रोसॉफ़्ट की साइट पर वादा किया गया था कि वो सीडी या डीवीडी पंजीकृत पते पर भेजेंगे. परंतु इंतजार करता रहा था – कब वो मिले और कब उसे जांचें-परखें. इससे पहले एमएस ऑफ़िस 2007 का अंग्रेज़ी संस्करण देख चुका था और, उसमें उसके ऊटपटांग किस्म के, कन्फ़्यूजिंग रिबन इंटरफेस के अलावा कोई नई चीज मेरे जैसे साधारण उपयोक्ता के लिए काम की नहीं मिली थी.

आलोक ने कुछ दिन पहले बताया कि अब हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 ऑनलाइन उपलब्ध है तो फिर से उत्सुकता जगी और सुखद आश्चर्य हुआ कि हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 डाउनलोड कर इवेल्यूएशन प्रयोग के लिए उपलब्ध है. इसका कोई 450 मेबा डाउनलोड उपलब्ध है जिसे आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. परंतु हो सकता है कि आपको पहले यहाँ पर पंजीकरण करवाना पड़े.

इसकी संस्थापना आसान है और आरंभिक संस्थापना स्क्रीन से लेकर अंत तक हिन्दी में ही मेन्यू प्रकट होता है. पूर्व के संस्करणों (एमएस ऑफ़िस हिन्दी 2003) की अपेक्षा इस नए संस्करण की खासियत यह है कि आप इसके इंटरफेस को हिन्दी या अंग्रेजी में जरूरत के अनुसार ब…

मुझे इस पोस्ट से नफ़रत है...

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आउटब्रेन - एक नो नॉनसेंस ब्लॉग रेटिंग सेवा आपके लिए अब पूरी तरह हिन्दी में अपनी सेवा लेकर आ गए हैं.इसे अब आप अपने ब्लॉग पर लगाइए, और औरों की रेटिंग एक क्लिक पर पाइए. और, यदि आपको कहीं पर किसी चिट्ठे पर आउटब्रेन की रेटिंग लगी हुई दिखाई देती है, जैसे कि इस चिट्ठे पर, और उस पोस्ट से आपको नफ़रत है तो बजाए एक पेजी विवादित टिप्पणी लिखने के, बस एक चटखा वहां पर लगाइए जहाँ यह उभर कर आता है - मुझे इस पोस्ट से नफ़रत है...
और, आउटब्रेन को लगाना है अत्यंत आसान. इस साइट पर जाएँ, ब्लॉगर या वर्डप्रेस जो भी हो वो प्लेटफ़ॉर्म चुनें, हिन्दी भाषा चुनें, और अपने ब्लॉग का नाम चुनें. यदि आवश्यक हो तो उपयोक्ता नाम और पास वर्ड भरें, औरइंस्टाल रेटिंग आन योर ब्लॉग पर क्लिक करें. बस हो गया.इस पोस्ट पर अपने विचार अपनी टिप्पणियों से नहीं, यहाँ पर चमकते सितारों पर क्लिक करके दें तो उत्तम! बताएँ कि आप इस पोस्ट से नफ़रत करते हैं या नहीं. या फिर ये पोस्ट बेकार है, उबाऊ है या फिर ठीक-ठाक?

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