चिट्ठाकारी और व्यक्तित्व परिवर्तन

gyan datt blog personality

क्या चिट्ठाकारी से व्यक्तित्व परिवर्तन संभव है?

संभवत:, हाँ.

आज जब मैं इस परिवर्तन के बारे में पढ़ने-जानने के लिए चिट्ठे पर गया तो क्या देखता हूँ कि चिट्ठाकार तो क्या, पूरा का पूरा चिट्ठा ही व्यक्तित्व परिवर्तन का शिकार हो गया है.

कहाँ ज्ञानदत्त शान से रेलगाड़ी चलाते थे अपने चिट्ठे के बाजू पट्टी में. वहाँ शीर्ष पट्टी में, सबसे ऊपर, देखा कि हवाई जहाज उड़ रहा है.

और, साथ ही साथ, यात्रा के लिए बीमा करवाने हेतु एक विज्ञापन भी आगाह कर रहा था. रेलगाड़ी के परिचालन से जुड़े ज्ञानदत्त के रेल दुर्घटनाओं के कुछ अंदरूनी किस्सों वाले चिट्ठापोस्टों को पढ़ कर बगैर बीमा करवाए भला कौन बहादुर रेल यात्रा करने का साहस करेगा! (बीमा कंपनी ने अपना उत्पाद विज्ञापित के लिए कितना सही स्थल चुना है). वैसे, एक और अदृश्य इशारा हो रहा है – अब तो रेलगाड़ी छोड़ो, अपने व्यक्तित्व में परिवर्तन लाओ, और हवाई यात्रा करो!

ज्ञानदत्त ने स्वयं माना है कि चिट्ठाकारी ने उनके व्यक्तित्व को परिवर्तित कर दिया है. उनके चिट्ठे का व्यक्तित्व तो खैर बदल ही गया है. उनके व उनके चिट्ठे के नए इनकारनेशन के लिए बधाई.

मानसिक हलचल के एक चिट्ठा-पाठक के रूप में, मेरे व्यक्तित्व में भी परिवर्तन आया है. रेलयात्रा बन्द, हवाई यात्रा चालू, वो भी आईसीआईसीआई बीमा सहित!

क्या आपको भी ये नहीं लगता कि एक पाठक-लेखक और टिपेरे के रूप में, चिट्ठाकारी ने आपके भी व्यक्तित्व में परिवर्तन ला दिया है? घोर परिवर्तन ला दिया है?

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बहुत पते की बात पकडी और कही है आपने !

संजय बेंगाणी

क्या दृष्टि पायी है!?


चिट्ठे व्यक्तित्व परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते है. ज्ञानजी नए नए शिकार हुए है इसलिए चमत्कृत है. अब वे पक्के ब्लॉगर बन गये है.

ब्लॉग हो तो यात्रा की क्या जरूरत जी? और व्यक्तित्व परिवर्तन तो ऐसे हों जो बीमा को अनावश्यक बना दें!
आप तो मेरे ब्लॉग पर मैटर पढ़ें और विज्ञापन को क्लिक कर छोड़ दें! बस!!! :-)

चटके मारने का अनुरोध करना ऐडसेंस के करार के खिलाफ़ है।

नज़र तो गज़ब की पाई है आपने पर उस नज़र के देखे गए के विश्लेषणात्मक क्षमता की तारीफ़ करना चाहूंगा मै

क्या ... चिट्ठाकारी ने आपके भी व्यक्तित्व में परिवर्तन ला दिया है? - यह तो अनुगूंज का विषय लगता है।

@ आलोक 9211 - अच्छा किया मैं वापस आया और आपका कमेण्ट देख लिया। मैं अपने शब्द - "और विज्ञापन को क्लिक कर छोड़ दें! बस!!! :-)" वापस लेता हूं।
हास्य में भी व्यक्तिगत शुचिता और ईमानदारी के साथ समझौता नहीं होना चाहिये। आपको धन्यवाद, आलोक।

मस्त !! :)

क्या मस्त पकड़ा है आपने, ज्ञानजी के इस परिवर्तन पर मुझे कहना पड़ेगा, 'आये थे हरि भजन को, लोटन लगे कपास'

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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