टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

चाहिए एक अदद सार्थक सहमति...

sarthak sahamati

अब तक तो सिर्फ सहमति और असहमति का नाम सुना था. आदमी या तो सहमत होता था या असहमत. और कुछ मेरी तरह के लोग जो संतुलन में यकीन रखते हैं, - जिसमें नॉनएलाइन्ड बने रहने में भारतीय राजनीति का भी बड़ा योगदान रहा था – न तो सहमत होते थे और न असहमत. बस मुंडी हिलाने में यकीन रखते थे. जो समझना हो समझ लो. सहमत या असहमत. अपने फायदे के लिए, दूसरों के फायदे के लिए, सबके फायदे के लिए. जो भी हो, बात सहमति और निरी असहमति पर ही टिकी रहती थी.

परंतु अब तो बड़ी समस्या हो गई है. यदि आप किसी बात पर सहमत होते हैं तो अब इतने भर से काम नहीं चलेगा. आपको सार्थक सहमति दर्शानी होगी. सार्थकता का बोध अतिरिक्त रूप से दिखाना होगा, बताना होगा. और यदि आप असहमत हैं तो आपको सार्थक (या अनर्थक?) असहमति जतानी होगी. सार्थकता (या अनर्थकता) का अंश उसमें घुसाना होगा तभी बात बनेगी. हमारे जैसे सिर हिलाने वालों के लिए तो और समस्या है. अब पोकर फेस जैसा चेहरा बनाकर सिर हिलाने से काम नहीं बनेगा. उसमें कुछ सार्थकता लाने के लिए आँख मिचकाने होंगे और नाक भौं सिकोड़ने होंगे और बॉडी लैंगुएज बदलना होगा, होठों में मुस्कान या विद्रूपता लाना होगा और पता नहीं और क्या क्या करना होगा.

बाबुओं को फ़ाइल अटकाने का एक और मोहरा मिल गया है. अफ़सर फ़ाइल में सहमति की टीप जड़ देगा तो बाबू बोलेगा इसमें सार्थक सहमति तो लिखा ही नहीं है. काम किसी सूरत हो ही नहीं सकता. ऑडिट वालों के पास वसूलने के लिए एक अतिरिक्त, सार्थक पैरा बनाने के लिए सार्थक मसाला मिल गया है. और, उन्हें महज जवाब नहीं, सार्थक जवाब भी चाहिए होंगे. भई, अगर सार्थकता, सहमति में घुस सकती है तो वो जीवन के हर हिस्से में घुस सकती है. बाकायदा घुस सकती है.

अब इसी चिट्ठे की, इसी चिट्ठा प्रविष्टि की बात ले लें. जब से सार्थक सहमति पर लिखना शुरू किया है, कुंजीपट पर उंगलियाँ रुक रुक कर चल रही हैं. बार बार खयाल आ रहा है कि क्या ये सार्थक पोस्ट है? क्या ये पोस्ट कुछ टिप्पणियाँ प्राप्त कर पाएगा? सार्थक टिप्पणियों की बात तो बहुत बाद की है...

----------.

व्यंज़ल

----------.

बेहाली में क्या नहीं है मेरी सहमति

अवाक् था मैं नहीं थी मेरी सहमति

 

नादां है वो महबूब मेरा जो ढूंढता है

मेरी असहमतियों में मेरी सहमति

 

मूढ़ था मैं जो यह सोचा करता था

हर हाल में पूछेंगे वो मेरी सहमति

 

उठा के चल दिए मेरा सामान और

पूछा कि कौन मैं कैसी मेरी सहमति

 

मुहब्बत में वो दिन भी देखे हैं रवि

मुझको खुद नहीं मिली मेरी सहमति

-------.

एक टिप्पणी भेजें

नमस्कार रवि जी,
आपको पढ़ा भी है और सुना भी है लेकिन टिप्पणी देते समय हमारी भी उंगलियाँ रुक रुक जाती थीं.
अब भी रुकी हैं लेकिन फिर भी कहना चाहूँगी कि बेशक यह सार्थक पोस्ट ही है.

हम बालकों के लिए तो आपकी हर पोस्ट सार्थक ही होती है!!

आपकी इस पोस्ट को हमारी सार्थक सहमति है!

हमेशा की तरह एक बार फिर मेरी सार्थक सहमति.

व्यंजल करारा एवं बेहतरीन रहा. :)

सच्ची रवि जी ये तो बड़ी मुश्किल हो गयी। अब तक तो अपुन भी मुंडी हिला कर निकल लेते थे, पर अब सार्थक टिप्पणी की बात है तो अपनी भी उंगलियाँ कुछ रुक रुक कर चल रही हैं , थोड़ा तेल वेल लगा कर आती हूँ…।:)

रवि भाई, देर से आया और निकलने वाला था पर सार्थक टिप्‍पणी की बात पढ़ कर रुकना पड़ा. मेरे ख्‍याल से सार्थक के साथ निरर्थक आना चाहिए न कि अनर्थ‍क. बहरहाल आप जो कहें सो सार्थक ही है निरर्थक कैसे होगा.

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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