टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

October 2007

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मेरे एक मित्र को पिछले दिनों एक ईमेल मिला जिसमें कहा गया था कि उसे याहू और विंडोज लाइव मेल के संयुक्त तत्वावधान में कोई सात लाख पौंड स्टर्लिंग (यानी कोई चार करोड़ रुपए) की लॉटरी उसके ईमेल खाते के नाम से खुली है. और उसे क्लेम करने के लिए कुछ जानकारियाँ मांगी गई थीं.

हम सबको, जो कुछ समय से इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं, यह भली प्रकार से पता है कि इस तरह के ईमेल कर लोगों को फांसा जाता है और शिकार बनाकर डाक्यूमेंटेशन और दीगर खर्चे के नाम से शिकार से पैसा ऐंठा जाता है और उन्हें उल्लू बनाया जाता है.

मगर मेरा वह मासूम मित्र उनके जाल में फंस गया और उसने उस ईमेल का उत्तर दे दिया जिसमें उसने अपना मोबाइल नंबर भी दे दिया था.

बस क्या था, उसके मोबाइल पर फोन आने लगे (ब्लैंक नंबर युक्त!) कि कोई आदमी इंगलैंड से चलकर एक बड़े बक्से में इंडियन करेंसी लेकर आ रहा है (जिसे यह बताया नहीं गया है कि उस बक्से में क्या रखा है) और उससे अपनी आइडेंटिटी और कोड बताकर 2000 पौंड के समतुल्य राशि देकर वह ईनाम वाला बक्सा ले लेना है.

अब उस मित्र का माथा ठनका. उसने सोचा कि ये कैसा ईनाम है जो इंग्लैंड से चलकर बक्से में भारतीय रूपया आ रहा है? क्या दुनिया में चेक-ड्रॉफ़्ट का प्रचलन बंद हो गया? जबकि उसे इससे पहले ईनाम के सर्टिफ़िकेट का फ़ोटू भी ईमेल के जरिये भेजा गया था.

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भला हो कि उसने मुझसे पूछ लिया. मैंने उसे बताया कि मेरे खाते में ऐसे दर्जनों ईमेल नित्य आते हैं, और ये निर्दोष, मासूम लोगों को फांसने के अलावा कुछ नहीं होते हैं. मैंने उसे अपना ईमेल खाता दिखाया जिसमें मुझे दुनिया की तमाम किस्म के – याहू से लेकर गूगल और माइक्रोसॉफ़्ट तक के लॉटरी मिलने के बारे में दर्जनों ईमेल थे. यदि उन्हें मैं गिनता होता तो खरबपति-शंखपति बनकर बहुत पहले ही विश्व के सबसे धनी आदमी भारतीय – मुकेश अंबानी को पीछे छोड़ चुका होता.

पहले ऐसे ईमेल बहुत आते थे जिसमें बहुत बड़ी धनराशि को ठिकाने लगाने के एवज में उस राशि का कुछ हिस्सा देने के लालच में लोगों को फांसा जाता था. पर इधर कुछ दिनों से ऐसे लॉटरी का प्रलोभन देने वाले ईमेलों की संख्या में भारी इजाफ़ा हुआ है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनका धंधा जोरों से चमकने लगा है. शिकार आमतौर पर पुलिस इत्यादि में नहीं जाता क्योंकि फिर वो अपने आप को उपहास का पात्र समझता है.

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अतः ऐसे ईमेल लॉटरी और अन्य प्रलोभन वाले ईमेलों से बचकर रहें, और दोस्तों-मित्रों को जो खासतौर पर इंटरनेटीय दुनिया में नए-नए आए हैं उन्हें भी इन बोगस लाटरियों के बारे में बताएँ ताकि जाने अनजाने वे भी शिकार न बन जाएँ.

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जब नारद-बाजार प्रकरण हुआ था तो मैंने ब्लॉग पोस्ट नारद के आगे जहां और भी हैं.... में कहा था कि किसी संकलक को पूरा अधिकार है कि वो किसी भी चिट्ठे को हटाए या रखे. वो चाहे जिस चिट्ठे को हटा सकता है और चाहे जिसे रख सकता है. अपने लिए नियमावलियाँ बना सकता है. परंतु फिर, कोई तार्किकता तो होनी ही चाहिए. अब इस ताज़ातरीन प्रकरण में दुखद प्रसंग यह दिखाई देता है कि 9-2-11 को उसकी सामग्री के चलते नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्विता के चलते निकाला गया. इस बीच, चिट्ठाजगत् से भी कुछ चिट्ठे निकाले गए ऐसे आरोप भी लगे.

एक चिट्ठाकार होने के नाते मेरे चिट्ठे किसी संकलक पर रहें या न रहें इससे भले ही मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता परंतु लोगों को पड़ सकता है जैसा कि आलोक को पड़ा - उन्हें लगा कि उनके चिट्ठे की सामग्री क्या इतनी आपत्तिजनक है कि एक सार्वजनिक संकलक से बाहर कर दी जाए. अब जबकि बहुत सी बातें जाने अनजाने स्पष्ट हुई हैं, तो यह निश्चित तौर पर लग रहा है कि सारा प्रसंग दुःखद किस्म का ही रहा है. प्रतिद्वंद्विता स्वस्थ क़िस्म की कतई नहीं रह पाई.

वैसे, इस प्रकरण का एक मजेदार, अहम पहलू (टेढ़ी दुनिया पर तिरछी नज़र?) यह रहा कि आदि ब्लॉगर आलोक अब लंबी-लंबी पोस्टें लिखने लग गए हैं. अन्यथा अब तक तो वे एक दो लाइनों में ही मामला निपटा दिया करते थे. इसके लिए उन्हें ब्लॉगवाणी संचालक मंडल का आभार मानना चाहिए व उन्हें हार्दिक धन्यवाद देना चाहिए :)

निरंकुश दुनिया जीने को अंततः सिखा ही देती है!

और, साथ ही विश्व के सर्वश्रेष्ठ टैम्प्लेट को देखें....

चलिए, पहले सी-बॉक्स की बात करते हैं फिर समय बचा तो वो टैम्प्लेट भी देख लेंगे.

बहुत से हिन्दी चिट्ठों में सी-बॉक्स लगाया गया है. चिट्ठों के बाजू पट्टी में सी-बॉक्स सूचनाओं के त्वरित आदान प्रदान के लिए सबसे सस्ता सुंदर और टिकाऊ किस्म का असबाब है.

परंतु सी-बॉक्स की डिफ़ॉल्ट सेटिंग बहुत से हिन्दी चिट्ठा टैम्प्लेटों के लिए ठीक नहीं है. जैसे कि यह  –

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जैसा कि चित्र में दिखाई दे रहा है, नीचे का अहम हिस्सा कट रहा है. यहाँ प्रोफ़ाइल व स्माइली इत्यादि की कड़ियाँ हैं.

इसी प्रकार, सी-बॉक्स हिन्दी में भी उपलब्ध है, जबकि कुछ चिट्ठाकार बंधुओं ने डिफ़ॉल्ट अंग्रेजी ही लगाया हुआ है.  जैसे कि यह-

c-box8

सी-बॉक्स के आकार में आप आसानी से परिवर्तन कर सकते हैं. ताकि ये अहम हिस्से दिखाई दें. आप ये काम दो तरीके से कर सकते हैं. आप अपने सी-बॉक्स के खाते में जाकर वहाँ कंट्रोल पैनल में सी-बॉक्स ऑप्शन में फ़ॉर्म हाइट को डिफ़ॉल्ट 91 से बढ़ाकर 120 कर दें, या फिर अपने चिट्ठे में लेआउट में जाकर जहाँ आपने सी-बॉक्स का कोड लगाया है उसमें चित्र में दिए अनुसार डिफ़ॉल्ट ऊँचाई 91 को 120 कर दें. इससे आपके चिट्ठे पर सी-बॉक्स पूरा नजर आएगा और सी-बॉक्स के नीचे के विकल्प भी दिखेंगे. c-box5

c-box4 

(डिफ़ॉल्ट सी-बॉक्स ऊँचाई)

c-box3

(परिवर्धित ऊँचाई)

इसी प्रकार इसके अन्य आकार को भी आप बदल सकते हैं जैसे कि चौड़ाई डिफ़ॉल्ट रूप में 160 होती है तो उसे भी छोटा बड़ा कर सकते हैं.

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(आकार सही करने पर सी-बॉक्स कुछ यूं दिखाई देगा)

हिन्दी भाषा सेट करने के लिए सी-बॉक्स के कंट्रोल पैनल में माइ एकाउन्ट में जाएँ, और लैंगुएज में हिन्दी भाषा चुनें.

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चूंकि सी-बॉक्स त्वरित संदेश आदानप्रदान के लिए होता है अतः हो सकता है कि कोई बुली या स्पैमर आपके सी बक्से को अवांछित सामग्री से भर दे. आप वह सामग्री अपने सी-बॉक्स के कंट्रोल पैनल से मिटा सकते हैं तथा उस उपयोक्ता (आईपी) पर प्रतिबंध लगा सकते हैं. आप चाहें तो सेटिंग कुछ यूं कर सकते हैं कि सिर्फ पंजीकृत उपयोक्ता ही वहाँ संदेश लिख सके.

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अब आइए, देखते हैं विश्व के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग टैम्प्लेट को. मैं जब वहां देखने गया तो मुझे वहाँ ये मिला –

worlds best blogger blog template

जाहिर है, इसे विश्व का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग टैम्प्लेट तो होना ही चाहिए!

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olpc (WinCE)

मित्रों,

कम्प्यूटर जगत् की महात्वाकांक्षी परियोजना ओएलपीसी (एक लैपटॉप प्रतिबच्चा) को हिन्दी भाषा में लाए जाने का कार्य प्रस्तावित है. शुरूआत के लिए इस स्थल पर दिए गए लैपटॉप में काम शुरू कैसे करें नाम के दस्तावेज  का हिन्दी में अनुवाद किया जाना है.

मैंने इस दस्तावेज का हिन्दी अनुवाद प्रारंभ कर दिया है. समस्या है कि इसे आज और कल में ही पूरा करना है.

तो यदि आपके पास कुछ अतिरिक्त समय हो, और आप अनुवाद कर सकते हों तो शीघ्र ही मुझे बताएँ. यहाँ टिप्पणियों में या मुझे ईमेल कर (पता इसी चिट्ठे में बाजू पट्टी में है)

अंतिम चार भाग नितिन के सिंह कर रहे हैं. शुरूआत के चार भाग को मैं कर रहा हूँ. बाकी के सात भागों के लिए आपके स्वयंसेवी प्रयासों की दरकार है...

 

अद्यतन - बीच के चार भागों का अनुवाद -  कमल कर रहे हैं. शेष बच रहे हैं - 3 भाग. आपकी भागीदारी अपेक्षित है.

अद्यतन # 2 - बाकी के तीन भागों का अनुवाद भी कमल कर रहे हैं. अतः अब संपूर्ण भागों का अनुवाद किया जा रहा है. आप सभी ने इस परियोजना में रूचि ली, आपका धन्यवाद.

 अद्यतन # 3 - अनुनाद व संजय ने अपने अपने स्तर पर (संभवतः संवाद नहीं होने के कारण, जिसका मुझे अफसोस है) क्रमशः तीन व दो भागों के अनुवाद कर दिए हैं. आप दोनों को धन्यवाद. कमल को इन तीन भागों का अनुवाद न करने हेतु ईमेल किया जा चुका है.

 

वर्तमान स्थिति - अनुवाद कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है और संपादन चल रहा है. आप सभी का एक बार और धन्यवाद.

 

धन्यवाद सहित,

आपका

रविरतलामी

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t i d p ahirwar shame on you

पिछले दिनों इंदौर के एक पुलिस थाने में एक व्यक्ति को झाड़ पर बाँध कर इतना पीटा गया कि उसकी मृत्यु हो गई.

इस तरह के अबू-गरीब किस्म के अत्याचार भारत के थानों में आम हैं. भारतीय पुलिस वसूली, भ्रष्टाचार और अत्याचार के लिए ज्यादा जानी जाती है बनिस्वत जनता की सेवा और उसकी रक्षा के.

मेरे एक जहीन मित्र का सहपाठी पुलिस में टीआई है. एक दिन वो उससे मिलने उसके घर गया तो उस पुलिसिये ने मित्र की ओर इशारा करते हुए अपने बेटे से कहा – बेटा थोड़ा पढ़ लिख लेना ठीक ठाक नहीं तो बाद में मेरी तरह हर तरफ से गाली खाएगा. देखो ये मेरा दोस्त पढ़ लिख कर अफसर बन गया है. मैंने पढ़ने में कोताही की थी तो देखो कहाँ फंसा हूँ.

मित्र ने मजाक में प्रतिवाद किया कि भइए, तुम भी तो थाने में टीआई हो, अच्छे अच्छों की हवा निकालते हो. इस पर उस पुलिसिए ने कहा – यार मैं सीरियस हूँ. लोग सामने तो भले ही सलाम ठोंकते हैं, परंतु पुलिस को पीठ पीछे गाली देते हैं. पुलिस (यहाँ ‘भारतीय’ समझा जावे) और अपराधी की जन्म कुंडली एक ही होती है. वो एक जैसे ही कर्म करते हैं. बस, पुलिस के पास ऐसा करने का लाइसेंस स्वरूप उसकी पदवी और वर्दी होती है.

उस निलंबित टीआई – डी पी अहिरवार, जिसके थाने में पुलिसियों की पिटाई से युवक की मौत हुई थी ने इंदौर के समाचार पत्र की संवाददाता मनीषा दुबे से कहा – मैं टीआई हूँ... कुछ भी कर सकता हूँ.

माफ़ कीजिएगा टीआई – डी पी अहिरवार साहब! मैं चिट्ठाकार हूँ. मैं कुछ भी लिख सकता हूँ... शेम ऑन यू! शेम ऑन मी (एक जागरूक नागरिक के रूप में मैं ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहा)! शेम ऑन इंडिया जिसके पास ऐसा घटिया पुराना, सड़ा गला पुलिस तंत्र है जिसमें निरीह लोगों को मरते तक पीटा जाता है, प्रमोशन पाने के लिए खुले आम एनकाउंटर किया जाता है... इत्यादि!

sarthak sahamati

अब तक तो सिर्फ सहमति और असहमति का नाम सुना था. आदमी या तो सहमत होता था या असहमत. और कुछ मेरी तरह के लोग जो संतुलन में यकीन रखते हैं, - जिसमें नॉनएलाइन्ड बने रहने में भारतीय राजनीति का भी बड़ा योगदान रहा था – न तो सहमत होते थे और न असहमत. बस मुंडी हिलाने में यकीन रखते थे. जो समझना हो समझ लो. सहमत या असहमत. अपने फायदे के लिए, दूसरों के फायदे के लिए, सबके फायदे के लिए. जो भी हो, बात सहमति और निरी असहमति पर ही टिकी रहती थी.

परंतु अब तो बड़ी समस्या हो गई है. यदि आप किसी बात पर सहमत होते हैं तो अब इतने भर से काम नहीं चलेगा. आपको सार्थक सहमति दर्शानी होगी. सार्थकता का बोध अतिरिक्त रूप से दिखाना होगा, बताना होगा. और यदि आप असहमत हैं तो आपको सार्थक (या अनर्थक?) असहमति जतानी होगी. सार्थकता (या अनर्थकता) का अंश उसमें घुसाना होगा तभी बात बनेगी. हमारे जैसे सिर हिलाने वालों के लिए तो और समस्या है. अब पोकर फेस जैसा चेहरा बनाकर सिर हिलाने से काम नहीं बनेगा. उसमें कुछ सार्थकता लाने के लिए आँख मिचकाने होंगे और नाक भौं सिकोड़ने होंगे और बॉडी लैंगुएज बदलना होगा, होठों में मुस्कान या विद्रूपता लाना होगा और पता नहीं और क्या क्या करना होगा.

बाबुओं को फ़ाइल अटकाने का एक और मोहरा मिल गया है. अफ़सर फ़ाइल में सहमति की टीप जड़ देगा तो बाबू बोलेगा इसमें सार्थक सहमति तो लिखा ही नहीं है. काम किसी सूरत हो ही नहीं सकता. ऑडिट वालों के पास वसूलने के लिए एक अतिरिक्त, सार्थक पैरा बनाने के लिए सार्थक मसाला मिल गया है. और, उन्हें महज जवाब नहीं, सार्थक जवाब भी चाहिए होंगे. भई, अगर सार्थकता, सहमति में घुस सकती है तो वो जीवन के हर हिस्से में घुस सकती है. बाकायदा घुस सकती है.

अब इसी चिट्ठे की, इसी चिट्ठा प्रविष्टि की बात ले लें. जब से सार्थक सहमति पर लिखना शुरू किया है, कुंजीपट पर उंगलियाँ रुक रुक कर चल रही हैं. बार बार खयाल आ रहा है कि क्या ये सार्थक पोस्ट है? क्या ये पोस्ट कुछ टिप्पणियाँ प्राप्त कर पाएगा? सार्थक टिप्पणियों की बात तो बहुत बाद की है...

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व्यंज़ल

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बेहाली में क्या नहीं है मेरी सहमति

अवाक् था मैं नहीं थी मेरी सहमति

 

नादां है वो महबूब मेरा जो ढूंढता है

मेरी असहमतियों में मेरी सहमति

 

मूढ़ था मैं जो यह सोचा करता था

हर हाल में पूछेंगे वो मेरी सहमति

 

उठा के चल दिए मेरा सामान और

पूछा कि कौन मैं कैसी मेरी सहमति

 

मुहब्बत में वो दिन भी देखे हैं रवि

मुझको खुद नहीं मिली मेरी सहमति

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icann top level hindi domain name testing

यदि हमारा ईमेल पता कुछ ऐसा हो – रवि@रतलामी.कॉम , या फिर हमारे ब्लॉग का पता कुछ यूँ हो – एचटीटीपी://चकल्लस.ब्लॉगस्पॉट.कॉम तो कितना सुंदर हो!

पर, अब धीरे धीरे ये संभव होने लगेगा. इस क्षेत्र में एक कदम आगे बढ़ाया जा चुका है और हिन्दी नामधारी जाल-पतों के परीक्षण किए जा रहे हैं.

आपसे आग्रह है कि आप भी इनका परीक्षण करें. व अपने अनुभव बांटें.

परीक्षण क्यों आवश्यक हैं?

हम सभी विभिन्न प्लेटफ़ॉर्मों में सैकड़ों तरह के अनुप्रयोग इस्तेमाल करते हैं. ये सभी अनुप्रयोग अब तक के मानक, अंग्रेजी जाल पतों व ईमेल पतों को ही समझ पाते हैं. और इनमें से बहुत से तो यूनिकोड कम्पायलेंट भी नहीं हैं. और इनमें हिन्दी नामधारी जालपतों का इस्तेमाल करने पर आप सभी के अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं.

इन अनुभवों के आधार पर हिन्दी जालपतों की भविष्य की योजनाएँ बनाई जा सकेंगी व अनुप्रयोगों को हिन्दी जालपता सक्षम बनाया जा सकेगा.

मैंने कुछ जांच परख की हैं, जिन्हें आप यहाँ पर देख सकते हैं. कुछ इसी तरीके से आप भी यह जांच-परख कर सकते हैं व अपने अनुभवों को साझा कर सकते हैं.

इसके लिए या तो आप इसी विकि पृष्ठ पर खाता खोल कर अपना अनुभव लिख दें या फिर मुझे ईमेल से भेज दें या फिर यहीं पर टिप्पणी के माध्यम से बता दें. आपके अनुभवों को आपके नाम के साथ इस पृष्ठ पर जोड़ दिया जाएगा. आपके समय के लिए आपको अग्रिम धन्यवाद.

 

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manmohan singh rajneeti mein galati se

गलतियाँ कौन नहीं करता? हम सभी गलतियाँ करते फिरते हैं. कुछ लोग जानबूझ कर गलती करते हैं, तो कुछ लोग जाने-अनजाने. कुछ विशेष किस्म की, ख़ूबसूरत गलतियाँ करने का अपना अलग मजा होता है – जैसे लड़कपन में प्रेम करने की गलती. मनमोहन सिंह कहते हैं कि वे राजनीति में गलती से आ गए. अब ये जुदा बात है कि वे इस तरह की प्रदूषित राजनीति में ठहर कर, बने रह कर नित्यप्रति गलतियाँ क्यों कर रहे हैं भला.

शायद ये भी खूबसूरत किस्म की ही गलती है जो वे कर रहे हैं.

मनमोहन सिंह जैसे इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ दें तो राजनीति में लोग गलती से नहीं आते. वे तो राजनीति में बाकायदा केलकुलेटेड मूव से आते हैं. अलबत्ता उन्हें चुनकर गरीब जनता जरूर गलती करती है. और, पप्पू यादवों, और शहाबुद्दीनों जैसों को चुनकर तो वो और भी भारी गलतियाँ करती है, और बारंबार गलतियाँ करती रहती है.

कभी कभी हम बहुत सोच-समझकर, ठोंक बजाकर, ऊंच-नीच देखकर, आगा-पीछा जानकर कोई निर्णय लेते हैं तो पाते हैं कि वो तो हमारे जीवन का सबसे बड़ा गलत निर्णय था. यदि आपको यकीन नहीं हो तो जरा बाजार घूम आएँ. दस में से नौ – ठोंक बजाकर जमाए गए पति-पत्नी के जोड़े सिरे से गलत नहीं दिखें तो कहिए! और, यदि आज नहीं दिख रहें हों, तो उन्हें साल-दो-साल बाद देख लीजिएगा.

कोई किसी कंपनी को गलती से ज्वाइन कर लेता है तो कोई गलती से किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश ले लेता है. उदाहरण के लिए, जिसे अभियंता बनना चाहिए होता है वो गलती से चिकित्सक बन बैठता है और जिसे चिकित्सक बनना होता है वो गलती से पत्रकार बन बैठता है. कुछ लोगों को ये पता होता है, वे स्वीकार लेते हैं, और बाकी को तो पता ही नहीं रहता कि उन्होंने अपने प्रोफेशन के चुनाव में सचमुच में गलतियाँ की हैं.

विद्युत मंडल में एक अधीक्षण अभियंता हुआ करते थे. तो दौरे पर जब चीफ इंजीनियर आते थे तो उन अधीक्षण अभियंता को कहते थे कि तुम्हें तो घसियारा होना चाहिए था. तुम्हें आता जाता कुछ नहीं है. कहीं से (किसी राज्य से) फेक डिग्री ले आए हो क्या? तो वो अधीक्षण अभियंता, जिन्हें बकौल मुख्य अभियंता, घसियारा होना चाहिए था और जो गलती से अभियंता बन गए थे, बाद में जब स्वयं मुख्य अभियंता बन गए तो उन्होंने इस तरह का प्रलाप जारी रखा – वे अपने अधीनस्थ अधीक्षण / कार्यपालन अभियंताओं को उनकी गलतियाँ बताते रहे – कि उन्हें अभियंता के बजाए कुली, कबाड़ी, पनवाड़ी और न जाने क्या-क्या होना चाहिए था.

बहरहाल, इस बात को अनर्थक आगे खींचने की गलती मैं करूँ, आपको एक राज की बात बताता हूँ. क्या आपको पता है कि आप ब्लॉगिंग में गलती से आ गए हैं? नहीं मानते? कोई बात नहीं. कोई भी मासूम दीवाना ये बात नहीं मानता कि वो गलती पर है.

मगर, फिर, ये तो जरूर है कि ये ब्लॉग पोस्ट पढ़ कर आप गलती कर रहे हैं, जो गलती से लिखा गया है!

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व्यंज़ल

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मुझको बख़ूबी मालूम थी मेरी हर गलतियाँ

फिर भी कर रहा था गलतियों पे गलतियाँ


किस किस को बताता फिरा उनकी गलतियाँ

इस तरह मैंने भी की हैं बहुत सी गलतियाँ


ये तो नजर नजर का फेर है ऐ मेरे दोस्त

कतई नहीं हैं मेरी नजर में मेरी गलतियाँ


कुछ तो ऐसा खास है महबूब के नाम में

उनका नाम आते ही हो जाती हैं गलतियाँ


ये तो उम्र का ही तकाजा है शायद रवि

सोचते हैं कि अब हम भी कर लें गलतियाँ

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भारत में गूगल ने मोबाइल फोनों के जरिए एसएमएस सेवा से इंटरनेट पर ढूंढने की सुविधा प्रदान की है. आपको इसके लिए 54664 ('5GOOG') को अपना सर्च टर्म (ढूंढा जाने वाला शब्द या वाक्यांश) एसएमएस करना होगा और गूगल तत्काल ही आपको वापस आपके मोबाइल फोन पर एसएमएस कर परिणाम देगा.

यह सेवा प्रीमियम सेवा है जिसमें आपको आपके मोबाइल फोन सेवा प्रदाता के अनुसार प्रति एसएमएस तीन रुपए तक का भुगतान करना होगा. इनकमिंग एसएमएस के लिए कोई शुल्क नहीं है.

मैंने ढूंढने की कुछ कोशिश की. ‘रविरतलामी’ हिन्दी को यह समझ नहीं पाया.

google mobile search

(गूगल साइट पर सिमुलेटेड खोज का चित्र)

अंग्रेजी में मैंने जान बूझकर सर्च टर्म भरा ravi tatlami तो इसने बाकायदा इंटेलिजेंट प्रश्न पूछा – डिड यू मीन रवि रतलामी? और फिर बताया कि ऐसा कोई परिणाम नहीं मिला. Ravi ratlami पर भी कोई परिणाम नहीं मिला.

google mobile search actual search result

(मेरे रिलायंस मोबाइल फोन पर वास्तविक खोज परिणाम का चित्र )

गूगल इंडिया मोबाइल एसएमएस खोज साइट पर सर्च करने के लिए एक सिमुलेटेड मॉडल रखा हुआ है. वहां पर दर्शाए अनुसार movies Bhopal या movies Indore का कोई परिणाम नहीं मिला. हाँ, movies Delhi पर खोज परिणाम मिले – ढोल – सन क्रास रिवर माल 1.40 बजे....

google mobile search movies delhi

(movies delhi खोज परिणाम)

यानी ये सेवा अभी सिर्फ बड़े शहरों के लिए है, और मूवीज़, शॉपिंग, होटल, रेस्त्रां इत्यादि के लिए ही है.

फिर भी, उम्मीद करें कि निकट भविष्य में सर्च में वे सारी सुविधाएँ हमें मिलने लगेंगी जिनकी हमें मोबाइल रहते समय अच्छी खासी आवश्यकता होती है.

मसलन? मसलन – सुविधाघर की स्थिति. जैसे मैं सर्च करूं दो-बत्ती रतलाम सुविधाघर तो यह मुझे एकदम निकट का स्थान बता दे ताकि मुझे किसी दीवार का सहारा न लेना पड़े. वैसे भी, अब दीवारों पर भगवान की फोटुओं वाले टाइल्स लगाने लग गए हैं भाई लोग.

 

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जी, हाँ. ये कोई सनसनी नहीं है, बल्कि ये अत्यंत मजेदार, सच्ची खबर है.

एफ़सेक्योर एंटीवायरस के ताजा ब्लॉग प्रविष्टि में इस बात का खुलासा किया गया है. भारतीय राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद के एक सर्वर पर हैकरों ने अपना अड्डा जमा लिया है और अपनी फिशिंग गतिविधियाँ इस पर से चला रहे हैं. इससे पहले एक भारतीय बैंक की साइट पर भी हमले हुए थे, और हालिया समाचारों के अनुसार चीनी हैकरों ने भारतीय अफ़सरों के ईमेल खाते हैक कर लिए थे.

एफ़ सेक्योर ने पुलिस अकादमी के जालस्थल प्रबंधक को इत्तिला दे दी है, और, उन्हें उम्मीद है कि अकादमी अपना जालस्थल न सिर्फ दुरुस्त कर लेगी, बल्कि आगे के लिए सचेत भी हो जाएगी – आखिरकार, पुलिस अकादमी के पाठ्यक्रम में साइबर अपराधों पर लगाम लगाना भी शामिल है!

यह है तू डाल-डाल, मैं पात-पात का सीधा सच्चा उदाहरण!

पूरी खबर (अंग्रेज़ी में) यहाँ पढ़ें

चित्र – साभार : एफ़ सेक्योर

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हिन्दी के पारंपरिक फ़ॉन्ट को यूनिकोड में परिवर्तित करने के लिए हमारे पास अब कई तरीके के औजार हैं, और कुछ तो ऑनलाइन भी हैं, जो वास्तव में बढ़िया काम करते हैं.
माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया द्वारा कुछ इसी तरह का एक बेहतरीन औजार मुफ़्त इस्तेमाल हेतु कुछ समय पूर्व जारी किया गया है.
टीबीआईएल (ट्रांसलिट्रेशन बिटवीन इंडियन लैंगुएज) डाटा कन्वर्टर नाम का यह प्रोग्राम न सिर्फ हिन्दी भाषी बल्कि अन्य भारतीय भाषी लोगों के लिए भी बड़े काम का है और बढ़िया है.
टीबीआईएल डाटा कन्वर्टर को आप माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया के जाल स्थल पर यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. यह कोई 6.5 मेबा की संपीडित (जिप) फ़ाइल है जिसे आप अनजिप कर सेटअप प्रोग्राम चला सकते हैं. संस्थापना आसान है, और इसका इस्तेमाल भी बहुत ही आसान है.
इस मुफ़्त के प्रोग्राम के जरिए आप अपने अर्जुन, कृतिदेव, चाणक्य, लीप ऑफ़िस, आकृति, शुषा, एपीएस, भास्कर, वेब-दुनिया इत्यादि हिन्दी फ़ॉन्टों को यूनिकोड में बदल सकते हैं और यूनिकोड हिन्दी को भी वापस इन फ़ॉन्टों में बदल सकते हैं.
इतना ही नहीं, आप एक भाषा की सामग्री (जैसे कि हिन्दी सामग्री) को दूसरी भाषा की सामग्री (जैसे कि पंजाबी सामग्री, ट्रांसलिट्रेशन के जरिए) में भी आसानी से बदल सकते हैं. प्रक्रिया एकदम सहज और सरल है.
tbil data converter
हाँ, यह टैक्स्ट मोड में बढ़िया काम करता है. अन्य मोड जैसे कि डॉक, एक्सेस (एमडीबी) तथा एक्सेल मोड में यह यदा कदा फ्रीज़ हो जाता है. आप एक साथ दर्जनों फ़ाइलों को भी परिवर्तित कर सकते हैं.
हिन्दी के अतिरिक्त इसमें निम्न भाषाओं में फ़ॉन्ट परिवर्तन की सुविधाएँ हैं –
गुजराती,
कन्नड़,
मराठी,
मलयालम,
पंजाबी,
तमिल, तथा
तेलुगु





हालाकि हिन्दी भाषा के बहुत से आम प्रचलित फ़ॉन्ट को इसमें शामिल किया गया है, परंतु फिर भी कुछ फ़ॉन्ट छूट गए हैं. उदाहरण के लिए गुरबानी हिन्दी फ़ॉन्ट के लिए परिवर्तन की सुविधा इसमें नहीं मिली. फिर भी, यह परिवर्तन और रूपांतर जैसे औजारों की तुलना में बेहतर है और परिवर्तन में बेहतर परिणाम देता है. यदि आप पुराने हिन्दी फ़ॉन्ट में काम करते रहे हैं तो आपके लिए एक आवश्यक, मस्त डाउनलोड!
टीबीआईएल डाटा कनवर्टर यहां से डाउनलोड करें

यदि डाउनलोड में समस्या हो तो नए ताजा लिंक के लिए भाषा इंडिया डाउनलोड साइट पर यहाँ जाएँ -

http://www.bhashaindia.com/Downloads/Pages/home.aspx
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क्या आप इस जाल स्थल पर लिखी गई बातों को पढ़ सकते हैं?

यह जाल स्थल है – हिन्दी के जाने माने चिट्ठाकार जगदीश भाटिया का जो पंजाबी में भी लिखते हैं.

http://punjabi1.wordpress.com/

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यदि आपको लिपि समझ में नहीं आती है तो आपका उत्तर होगा नहीं.

 

परंतु आप इस जाल स्थल पर लिखी गई इबारतों को आप आसानी से पढ़ सकते हैं और बहुत संभव है कि इसमें लिखी गई अधिकतर बातों को आप समझ भी सकते हैं. यह कोई नया, हिन्दी का जालस्थल नहीं है, बल्कि वही, ऊपर दिया गया, जगदीश भाटिया का पंजाबी भाषा का जाल स्थल ही है. बस, इसकी पंजाबी लिपि को भोमियो के जरिए हिन्दी में ट्रांसलिट्रेट कर दिया गया है.

http://bhomiyo.com/hi.xliterate/punjabi1.wordpress.com/

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मैंने तो पूरी की पूरी पंजाबी पढ़ ली और पूरा का पूरा समझ गया. ओए, तुसी चंगा लिखे हो जगदीश जी.

 

कुछ कुछ यही हाल है गुजराती के इस चिट्ठे का:

http://bhomiyo.com/hi.xliterate/kartikm.wordpress.com/

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और, बंगाली के इस चिट्ठे के बारे में आपका क्या विचार है?

http://bhomiyo.com/hi.xliterate/bn.globalvoicesonline.org/2007/10/05/302/

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और, यदि आप तेलुगु को देवनागरी में पढ़ें, तो शायद ये भाषा भी एकदम से आपको अजनबी नहीं लगेगी. बहुत से हिन्दी व संस्कृत के शब्द भी इसमें हैं, और आप कोशिश करें तो थोड़ा सा समझ भी सकते हैं. और, यदि आपको बोली आती है, लिपि पढ़ नहीं पाते तब तो ये आपके लिए वरदान के समान ही है.

http://bhomiyo.com/hi.xliterate/koodali.org/

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तो ये है ट्रांसलिट्रेशन की महत्ता. इससे घबराएँ नहीं, न इसे नकारें. अब चाहे बात रोमन अंग्रेजी लिपि की भी हो रही हो. इसे मात्र कम्प्यूटर की असिस्टिव तकनॉलाजी के रूप में मानें. मुझ जैसे असक्षम व्यक्ति के लिए जो दूसरी भाषाओं में लिखे को पढ़ नहीं सकता, उसे हिन्दी में पढ़ने की सुविधा यदि उपलब्ध अधुनातन तकनीकों के जरिए ऑनलाइन ट्रांसलिट्रेशन/ट्रांसलेशन औजारों से मिलती है, और एक लेखक को उसका लिखा पढ़ने को दूसरी भाषाओं के भी अतिरिक्त पाठक यदि इससे मिलते हैं – तो इससे बेहतर स्थिति और कुछ नहीं हो सकती. ऐसे और इस तरह के प्रयासों का सदैव स्वागत् किया जाना चाहिए.

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मेरे पिछले आलेख पर हरिराम जी ने पूछा –

कुछ स्पष्ट करें-- उदाहरण के लिए इस टिप्पणी को लिखने के लिए खुले बॉक्स के ऊपर की कड़ी "सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें (Atom)" प्रकट हुई। उस पर क्लिक किया तो एक default नामक फाइल सेव हो गई। इस फाइल को कहाँ, कैसे और क्या करना है?

तो आइए, देखते हैं कि किसी चिट्ठे या चिट्ठे की टिप्पणी की फ़ीड सब्सक्राइब करने का सबसे आसान तरीका क्या हो सकता है.

हम सभी फ़ॉयरफ़ॉक्स इस्तेमाल करते ही हैं. (ऑपेरा 9 तथा इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 में भी लगभग यही प्रक्रिया है. हरिराम जी, कृपया ध्यान दें - आईई6 में संभवतः यह उपलब्ध नहीं है, अत: या तो अपना ब्राउजर अद्यतन करें या दिए गए वैकल्पिक ब्राउज़रों का इस्तेमाल करें)

फ़ॉयरफ़ॉक्स में अपना पसंदीदा चिट्ठा खोलें. जैसे कि उड़नतश्तरी.

वहां पता-पट्टी में दाईं ओर आपको नारंगी रंग में सफेद धारियों युक्त एक वर्गाकार चिह्न दिखाई देगा. यह चिह्न हर उस जाल पृष्ठ पर दिखाई देता है जिसकी फ़ीड उपलब्ध होती है. उस चिह्न पर क्लिक करें.

how to subscribe rss feed1

आपके लिए विकल्प चयन पृष्ठ खुलेगा. जिसमें लिखा होगा – सब्सक्राइब टू दिस फ़ीड यूजिंग – लाइव बुकमार्क. लाइव बुकमार्क ड्रापडाउन मेन्यू में आपके पास गूगल, माईयाहू या ब्लॉगलाइन्स के लिए सब्सक्राइब करने के विकल्प होंगे. अभी हम फ़ॉयरफ़ॉक्स में ही लाइव बुक मार्क में सब्सक्राइब करते हैं, क्योंकि अन्य सेवाओं के लिए अलग से पंजीकृत होना होता है.

how to subscribe rss feed2

तो चयन लाइव बुकमार्क ही रहने दें व सब्सक्राइब नाऊ पर क्लिक करें. आपके सामने एड लाइव बुकमार्क नाम से पॉपअप विंडो खुलेगा.

how to subscribe rss feed3

यहाँ आप चिट्ठे का नाम अता पता बदल सकते हैं. अभी हम इसे ऐसा ही रहने देते हैं, और ओके पर क्लिक करते हैं. आपने फ़ॉयरफ़ॉक्स पर उड़नतश्तरी को सब्सक्राइब कर लिया.

अब फ़ॉयरफ़ॉक्स के बुकमार्क > बुकमार्क फोल्डर टूलबार मेन्यू में जाएँ, और उड़नतश्तरी पर माउस लाएँ. उड़न तश्तरी पर उपलब्ध ताज़ा प्रविष्टियों के शीर्षक दिखाई देंगे. जिस प्रविष्टि को आपने पढ़ा नहीं है, उस पर क्लिक करें, और आनंद लें.

how to subscribe rss feed4

यदि आप ऑपेरा 9 का इस्तेमाल करते हैं तो आपको अपने पसंदीदा चिट्ठों को ऑफलाइन पढ़ने की भी सुविधा मिलती है. क्योंकि ऑपेरा सब्सक्राइब किए गए चिट्ठों की उपलब्ध फीड (पूरी या अधूरी जैसी भी हो) को पूरा का पूरा डाउनलोड (चित्र व मल्टीमीडिया छोड़कर) कर हार्डडिस्क के स्थानीय फोल्डर में रखता है. फ़ीड में से प्रविष्टियों को मैं ऑपेरा में खोज सकता हूँ, उन्हें दिन, सप्ताह, माह के हिसाब से देख सकता हूँ, लेखक और चिट्ठों के हिसाब से जमा सकता हूँ, और न जाने क्या क्या कर सकता हूँ. और इसीलिए वह मेरा पसंदीदा फीडरीडर-कम-ब्राउजर है.


आईई 7 में आरएसएस फीड का नारंगी डब्बा पता पट्टी के बजाए बुकमार्क बटन के बाजू में कुछ यूं दिखता है-







इसी तरह यदि आप नारंगी डब्बे के बजाए सीधे फीड की लिंक को ही क्लिक करते हैं, तो भी यही प्रक्रिया होती है. आमतौर पर ब्लॉगर की फीड लिंक ब्लॉग पते में feeds/posts/default?alt=rss जोड़कर बनती है. जैसे कि रचनाकार का फ़ीड पता होगा -

http://rachanakar.blogspot.com/feeds/posts/default?alt=rss

इसे पते पर सीधे जाकर भी चिट्ठों की फ़ीड सब्सक्राइब की जा सकती है.

यदि अब भी कोई समस्या हो तो बताएँ.

और, यदि आप पहले से ही चिट्ठों को सब्सक्राइब कर पढ़ते हैं तो फिर आप कौन सा फ़ीड रीडर इस्तेमाल करते हैं और क्यों? अपने अनुभवों को अवश्य साझा करें.

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मेरे पिछले आलेख – आप चिट्ठा किसलिए लिखते हैं पर ममता जी ने टिप्पणी दी-

जानकारी देने का शुक्रिया पर हम अभी पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं.

इस पर शास्त्री जी ने टिप्पणी की

ममता जी ने जो कहा वह अधिकतर चिट्ठाकरों के लिये सत्य है. अत: मेरा अनुरोध है कि "फीड क्या है" नाम से एक या दो सचित्र लेख और छाप दें

तो मैंने उन्हें यह प्रत्युत्तर दिया था –

शास्त्री जी, धन्यवाद, आपकी टिप्पणी मेरे जेहन में है और शीघ्र ही इस पर कुछ और लिखता हूँ.

इसके जवाब में उनका उत्तर आया -

कृपया यह ध्यान में रखें कि मुझ जैसे तकनीकी

व्यक्ति को फीड के बारे में समझने में बहुत

संघर्ष करना पडा था. आम चिट्ठाकर की बात

तो और कठिन है. अत: आपका यह लेख अंधे को

दो आंखें देने के समान होगा

तब मेरी भी आंखें खुली. आमतौर पर एक तकनीकी लेखक अपने आपको सामने रख कर लेख लिखता है (जैसे कि मैं) और इसी कारण वो अपनी बात समझाने में असफल हो जाता है. यदि वो अपने पाठक को, पाठक के तकनीकी स्तर को सामने रखकर लेख लिखे तो बात निश्चित ही दूसरी हो सकती है.

आरएसएस, एटम और नए नवेले जेसन फीड पर – कि ये क्या हैं और कैसे काम करते हैं, बहुत कुछ लिखा जा चुका है और अब तो हिन्दी में भी तमाम कड़ियाँ हैं.

आइए देखते हैं कि हिन्दी में इस विषय में इंटरनेट पर पहले कहां और क्या-क्या लिखा गया है.

  • आरएसएस का परिचय – माइक्रोसॉफ़्ट के हिन्दी के जाल स्थल पर इस विषय पर एक संपूर्ण आलेख उपलब्ध है.

इसके प्रथम अनुच्छेद में आरएसएस फीड का परिचय कुछ इस तरह दिया गया है –

RSS क्या है?

किसी मानक स्वरूप में जानकारी वितरित करने के लिए RSS सामग्री प्रकाशकों को कोई सुविधाजनक तरीका प्रदान करती है. मानक XML फ़ाइल स्वरूप जानकारी को तुरंत प्रकाशित होने और विभिन्न प्रोग्राम्स जैसे Outlook द्वारा देखे जाने की अनुमति देता है. RSS सामग्री का सामान्य उदाहरण जानकारी स्रोत जैसे वे मुख्य समाचार हैं, जो बार-बार अद्यतन होते हैं.

RSS का लाभ एकाधिक वेब स्रोतों की सभी सामग्रियों का एक स्थान पर समेकन है. अपने पसंद के विषयों की नवीनतम जानकारी प्राप्त करने के लिए आपको विभिन्न वेब साइट्स पर जाने की आवश्यकता नहीं होगी. RSS के साथ, सामग्री के सारांश आपको प्रदान किए जाते हैं, और तब आप कोई लिंक क्लिक करके इच्छित आलेखों को पढ़ने का निर्णय लेते हैं‍ ... आगे पढ़ें>>

· विकिपीडिया हिन्दी पर फीड क्या है को कुछ इस तरह बताया गया है –

फीड क्या है

हर वेबसाइट पर हमेशा कुछ न कुछ नयी सूचना आती रहती है और इसे देखने के लिये निम्न तरीके हैं,

  • वेबसाइट पर जाकर नयी सूचना देखना।
  • वेबसाइट से नयी सूचना के बारे में ई-मेल प्राप्त करना।
  • RSS अथवा ATOM फीड के द्वारा जानकारी प्राप्त करना।

वेबसाइट पर जाकर सूचना प्राप्त करना सबसे पुराना तरीका है। उसके बाद जैसे, जैसे तकनीक में सुधार होता गया, सूचना प्राप्त करने के तरीके भी सुलभ होते गये। पहले ई-मेल से सूचना प्राप्त करने की सुविधा आयी फिर RSS/Atom फीड की तकनीक आयी।

यदि कोई वेबसाइट उस पर आने वाली नयी सूचना के बारे में ई-मेल नहीं भेजती है या फिर RSS/Atom फीड नहीं देती है तो आप इन दोनों के द्वारा इस वेबसाइट से इस तरह से सूचना नहीं प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी सूरत में आपको इस वेबसाइट पर जाकर ही सूचना पता करनी होगी।

RSS/Atom फीड यह नयी तकनीक है। इन दोनों में प्रारूप का अन्तर है लेकिन व्यवहार में कोई अन्तर नहीं है। वे एक तरह से प्राप्त की जा सकती हैं। RSS पुरानी तकनीक है, ज्यादा आसान है[तथ्य चाहिए], और ज्यादा लोकप्रिय है। आर.एस.एस कि पृष्ठभूमि में प्रयुक्त हो रही मूल तकनीक पुश तकनलाजी है। The Internet Engineering Task Force (IETF), इन्टरनेट के मानकीकरण व उन्नतिकरण में कार्यरत है। Atom इसी के द्वारा दिया गया एक मानक प्रारूप है। यह लिखने और पड़ने दोनो प्रारूप एक प्रारूप में लाने का प्रयत्न है।

RSS/ Atom फीड उस नयी सूचना हेडलाइन के रूप में आप तक पहुंचाती है और यदि आप उनकी हेडलाइन, जो दरअसल लेख की स्थाई कड़ी यानी पर्मालिंक होती है, को क्लिक करें तो वह आपको पूरे लेख तक पहुंचा देती है। नयी सूचना जानने के लिये यह सबसे अच्छी सुविधा है। जिस वेबसाईट में निम्न तरह का कोई भी चिन्ह हो तो आप समझ लीजिये कि वह अपना RSS/Atom फीड देती है। आगे पढ़ें >>

· याहू हिन्दी पर भी आरएसएस की परिभाषा कुछ इस तरह बताई गई है –

आर एस एस क्‍या है?
आर एस एस ‘रियली सिंपल सिंडीकेशन’ का संक्षिप्‍त रूप है। यह संपूर्ण वेबसाइट पर अपनी पसंद व जरूरत के मुताबिक सामग्री खोजने का सरल तरीका है। इसमें अखबार, पत्रिकाएँ और ब्‍लॉग भी शामिल हैं।

इंटरनेट की दुनिया में न्‍यूज फ़ीड को सरलता से बनाने और देखने के लिए आर एस एस का इस्‍तेमाल किया जाता है, जिसमें लिंक, शीर्षक तथा संक्षिप्‍त विवरण भी शामिल होते हैं। क्रिश्चियन साइंस मॉनीटर, CNN और CNET न्‍यूज आदि कुछ ऐसी प्रमुख वेबसाइटों में से हैं, जो आर एस एस के माध्‍यम से ताजा समाचार और सूचनाएँ प्रदान करती हैं।

याहू न्‍यूज भी ऐसे अनेकों आर एस एस फ़ीड की सुविधा प्रदान करता है। आप इसे My Yahoo ! पर या किसी अन्‍य आर एस एस न्‍यूज रीडर सॉफ्टवेयर के इस्‍तेमाल से देख सकते हैं। आर एस एस और याहू न्‍यूज पर इसके इस्‍तेमाल के संबंध में और अधिक जानकारी प्राप्‍त करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

याहू न्‍यूज में आर एस एस के द्वारा कौन-सी सामग्री प्राप्‍त होती है?
याहू न्‍यूज आर एस एस के रूप में बहुत-सी सुविधाएँ प्रदान करता है। निजी तौर पर कोई भी व्‍यक्ति और गैर-व्‍यावसायिक संगठन बिना किसी शुल्‍क के इस न्‍यूज फ़ीड का प्रयोग कर सकते हैं। प्रत्‍येक फीड में दिए गए स्रोत का उल्‍लेख अनिवार्य है। आगे पढ़ें >>

· गूगल के समाचार फीड पंजीकरण पन्ने पर आरएसएस व एटम फीड को कुछ इस तरह परिभाषित किया गया है –

फ़ीड्स क्या है मैं इनका कैसे उपयोग करूँ?

फ़ीड वेब सामग्री का लगातार अद्यतन किया जाने वाला सारांश है, जिसके साथ उस सामग्री के पूर्ण संस्करण के लिए लिंक दिए होते हैं. जब आप फ़ीड रीडर का उपयोग करके किसी वेब साइट की फ़ीड की सदस्यता प्राप्त करते हैं, तो आप उस वेब साइट की नई सामग्री का सारांश प्राप्त करेंगे. महत्वपूर्ण: वेबसाइट फ़ीड की सदस्यता प्राप्त करने के लिए आपको फ़ीड रीडर का उपयोग करना आवश्यक है. जब आप RSS या एटम फ़ीड लिंक पर क्लिक करते हैं, तो हो सकता है आपका ब्राउज़र बिना स्वरूपित तकनीकी भाषा से भरा पेज प्रदर्शित करें.

RSS और एटम क्या है?
RSS और Atom दो फ़ीड स्वरूप है. अधिकतर फ़ीड रीडर दोनों स्वरूपों का समर्थन करते हैं. वर्तमान में, Google समाचार एटम 0.3 और RSS 2.0 का समर्थन करता है.

आगे पढ़ें >>

बहुत से हिन्दी चिट्ठाकारों ने भी इस विषय पर लिखा हुआ है. आइए, देखते हैं कि किसने क्या क्या कैसा लिखा है –

· देबाशीष जी की लेखनी पहले पहल इस विषय पर चली जब फीड नया नया प्रचलन में आया ही था –

असाधारण है रियली सिंपल सिंडिकेशन

बातें तकनीकी श्रेणी में June 13, 2005 को Debashish ने लिखा

ब्लॉग जब खूब चल पड़े और चारों और इनके चर्चे मशहूर हो गये तो इसी से जुड़ा एक और तंत्र सामने आया। जिस नाम से यह पहले पहल जाना गया वह ही इसका परिचय भी बन गया। यूं तो आर.एस.एस एक तरह का क्षमल प्रारूप है और इसके बाद आर.डी.एफ, एटम यानि अणु जैसे अन्य प्रारूप भी सामने आये हैं पर आर.एस.एस एक तरह से क्षमल फीड का ही पर्याय बन गया है। जिस भी जालस्थल से आर.एस.एस फीड प्रकाशित होती है पाठक ब्लॉगलाईंस जैसे किसी न्यूज़रीडर के द्वारा बिना उस जालस्थल पर जाये उसकी ताज़ा सार्वजनिक प्रकाशित सामग्री, जब भी वह प्रकाशित हो, तब पढ़ सकते हैं। यह बात दीगर है कि जालस्थल के मालिक ही यह तय करते हैं कि फीड में सामग्री की मात्रा कितनी हो और यह कितने अंतराल में अद्यतन रखी जावेगी।

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(जिस जाल स्थल पर पता पट्टी में यह चिह्न दिखाई देता है तो समझिए कि उसकी फीड उपलब्ध है)

आज आलम यह है कि ब्लॉग हो या समाचारों की साईट, जिन जालस्थलों की विषय वस्तु नियमित रूप से बदलती रहती है, आर.एस.एस फीड का उनके जालस्थल से चोली दामन का साथ बन गया है। आर.एस.एस कि पृष्ठभूमि में प्रयुक्त हो रही मूल तकनीक, यानि पुश तकनलाजी, कोई नयी बात नहीं है। 90 के दशक में काफी जोरशोर से काम में लाये गये हैं ये। इस बार जो बात अलग है वो यह है कि आर.एस.एस को व्यापक रूप से मान्यता दी गयी और अपनाया गया। तकनीकी तौर पर आर.एस.एस काफी आकर्षित करता रहा है जालस्थल कंपनियों को। आगे पढ़ें >>

· इसके बाद जीतेन्द्र जी का कुंजीपट टकटकाया और उन्होंने कुछ मजेदार अंदाज में फीडों की फीड कुछ इस तरह से दी –

ये RSS क्या बला है?

Posted on फरवरी 22nd, 2006 in मिर्जा पुराण, तकनीकी.

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इससे पहले कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाले हमारे खिलाफ़ कोई फ़तवा जारी करें या दण्ड उठाकर हमारे पीछे दौड़े, हम बता दें कि हम उनके बारे मे बात नही कर रहे।

अब क्या? ये RSS क्या होता है? और क्यों होता है? ये फीड का क्या फन्डा है?

clip_image005अक्सर ये सवाल मै, अपने कई जानकारों से सुनता हूँ । और सवाल करने वाले भी कम्प्यूटर के जानकार लोग होते है। कुछ लोग हर ब्लॉग पर RSS का आइकान देखकर पूछ बैठते है। अब हम जब किसी को समझाने की कोशिश करते है और कोई सरल सा जवाब बताने की कोशिश करते हैं। लेकिन कंही ना कंही कुछ तकनीकी मसला बीच मे आ ही जाता है, जिससे लोग उचक जाते है। इसी बीच मिर्जा से बातचीत हुई, बोले देखो मिंया,ये तकनीकी मसले जेब मे रक्खो, हमको तो साफ़ सीधी भाषा मे बताओ, नही बता सकते तो ये RSS गया तेल लेने।जब तक ये तकनीकी मामलों को सरल और सीधी साधी भाषा मे जनता को नही समझाओ, तब तक बात नही बनेगी। ऐसे किसी को RSS का मतलब समझाओगे, तो लोग तुमको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाला समझेंगे, और खांमखां मे बुरे बनोगे। इसलिये अगर तुम मुझे सीधी सीधी भाषा मे फीड का फन्डा समझाओगे, तभी मै समझूंगा कि तुमको RSS की समझ है।” मिर्जा की बाद दिल को चुभ गयी, लेकिन होठों पर मुस्कान फैलाते हुए हम समझाने लगे, तो आइये भाई लोग आप भी मिर्जा के साथ साथ फीड का फन्डा समझिये। आगे पढ़ें>>

· इस बीच चिट्ठाकारों के बीच परिचर्चा पर फीड विषयक परिचर्चाएँ चलीं. एक छोटी सी चर्चा यहाँ भी हुई. तब फिर रविरतलामी ने अपना तकनीकी ज्ञान झाड़ा –

मेरा वाला, बढ़िया आरएसएस फ़ीड …

श्रेणी तकनीक़ी नज़र चिट्ठाकार रवि दिन: बुधवार 2 अगस्त 2006 समय: 5:14 pm

आप कौन सा आरएसएस रीडर इस्तेमाल करते हैं?

बेतरतीब समय में लिखे व प्रकाशित किए गए ब्लॉग पोस्टों को पढ़ने के लिए ही आरएसएस फ़ीड का सृजन किया गया था. आज की तिथि पर देखें तो पाएंगे कि तीन दर्जन से अधिक आरएसएस रीडर अपनाए जाने के लिए इंटरनेट के पृष्ठों पर डाउनलोड हेतु तत्पर बैठे हैं. पर इनमें से किसे अपनाएँ? कौन अपनी आवश्यकता में खरा उतरता है?

पिछले साल भर से मैंने भी बहुत से फ़ीड रीडरों को आजमाया है. कोई कहीं से अच्छा दिखाई देता है तो कोई कहीं से. किसी का फ़ीड प्रबंधन अच्छा है तो कोई तेज चलता है. कोई जरा सी एक्सएमएल में गड़बड़ी पाते ही फ़ीड बंद कर देता है तो कोई बेरोकटोक चलता रहता है ... आगे पढ़ें>>

  • इसके बाद उन्मुक्त जी ने भी इस पर लिखा –
आर.एस.एस. फीड (RSS Feed) क्या बला है?

हर वेबसाइट पर हमेशा कुछ न कुछ नयी सूचना आती रहती है और इसे देखने के लिये निम्न तरीके हैं,

  • वेबसाइट पर जाकर नयी सूचना देखना।
  • वेबसाइट से नयी सूचना के बारे में ई-मेल प्राप्त करना।
  • RSS/ ATOM फीड के द्वारा जानकारी करना।

वेबसाइट पर जाकर सूचना प्राप्त करना सबसे पुराना तरीका है। उसके बाद जैसे, जैसे तकनीक में सुधार होता गया, सूचना प्राप्त करने के तरीके भी सुलभ होते गये। पहले ई-मेल से सूचना प्राप्त करने की सुविधा आयी फिर RSS/ ATOM फीड की तकनीक आयी।

आगे पढ़ें>>

  • दस्तक में सागर जी ने आरएसएस फीड लेकर चिट्ठों को पढ़ने का सविस्तार सचित्र वर्णन कुछ यूं किया है-

चिठ्ठों की फीड लेने का सबसे आसान तरीका

August 23rd, 2007 at 5:54 pm (तकनीकी)

Easiest way to take blog’s feed

फॉयरफॉक्समें चिठ्ठों की फीड लेने का सबसे आसान तरीका

कई बार वरिष्ठ चिठ्ठाकार अपनी पोस्ट में कहते हैं कि हम अपने पसन्द के चिठ्ठों को फीड के द्वारा ही पढ़ लेते हैं। तब नये चिठ्ठाकार अक्सर सोचते हैं ( मैं भी सोचता था) कि भला चिठ्ठों की फीड क्या होती है और इसे कैसे लेते हैं? तो मित्रों आप सबके लिये प्रस्तुत है चिठ्ठों और तीनो ब्लॉग एग्रीग्रेटर तथा अपने मनपसन्द चिठ्ठे की फीड लेने का एक आसान तरीका जिससे आपको बार बार उनकी साईट को खोलने की जरूरत नहीं होगी।

इसके लिये हमें sage इन्स्टाल करना होगा, डरिये मत यह कोई सोफ्टवेर नहीं है बल्कि फॉयरफॉक्स के लिये बना आर एस एस रीडर और एटम फीड रीडर एक्सटेंशन है जो बहुत छोटा सा (मात्र 135Kb) है, और जितनी आसानी से इन्स्टाल होता है उतनी ही आसानी से अपना काम करता है।

sage इन्स्टाल करने के लिये सबसे पहले आप इस पोस्ट को दोबारा से फॉयरफॉक्स में खोलें

और ... आगे पढ़ें>>

मिर्ची सेठ उर्फ पंकज जी ने अग्निलूमड़ (जीहाँ, वही फ़ॉयरफ़ॉक्स ब्राउज़र) पर लाइव बुकमार्क लेने यानी उस पर फीड लेने के बारे में लेखों की बढ़िया शृंखला लिखी थी निरंतर पर जो कि संभवतः अब उपलब्ध नहीं है. (मुझे नहीं दिखी) और, विभिन्न फीड से और फीड तकनॉलाजी से कई कारनामे किए जा सकते हैं उसके कई उदाहरण हैं. जैसे कि यह और यह.

तो, उम्मीद है, अब आपको ये समझ आ गया होगा कि फीड क्या होता है. वैसे, ऊपर दिए गए तमाम तकनीकी विवरणों का सार यही है कि जैसे कि आप किसी मासिक पत्रिका को न्यूजस्टैंड पर जाकर खरीदते हैं तो आप महीने के आरंभ में एक दो चक्कर लगाते हैं कि पत्रिका आई या नहीं. कभी वह 1 तारीख को मिल जाती है तो कभी 10 तारीख को. परंतु जब आप इसी पत्रिका के सालाना ग्राहक बन जाते हैं तो जब भी यह प्रकाशित होती है तो यह आपके घर पर आ जाती है नियमित – पोस्टमैन या कोरियर के द्वारा. फीड यही काम करता है. आपके लोकप्रिय चिट्ठे जिस समय भी प्रकाशित होते हैं, वे फीड बनाते हैं. यदि आप उस चिट्ठे के फीड के ग्राहक हैं तो आपको उसके चिट्ठे पर नया क्या लिखा है यह देखने के लिए बार बार जाना नहीं पड़ता. यह काम पोस्टमैन की तरह आपका फीडरीडर करता है.

तो देर किस बात की? बाजू में इस चिट्ठे के ग्राहक बनने की कड़ी है. आप कई तरीके से इसके ग्राहक बन सकते हैं. सबसे आसान तरीका है ईमेल के द्वारा इस चिट्ठे को पढ़ना. यानी जब भी इस चिट्ठे में नई प्रविष्टि प्रकाशित होगी वह आपको ईमेल के जरिए पूरी की पूरी मिल जाएगी. आपको यहाँ आने की आवश्यकता ही नहीं!

और, यदि आप चिट्ठाकार हैं, तो अब आपको समझ आ जाना चाहिए कि आपके चिट्ठे की पूरी फीड क्यों आवश्यक है. आधी अधूरी पत्रिका का कोई ग्राहक बनना चाहेगा क्या?

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