करम करे तो फल की इच्छा क्यों न करे चिट्ठाकार?

 

karmafan

 

कर्मा-फैन हमारे जैसे लोगों के लिए ही है. जो कर्म करते हैं तो लागत से दो-गुना, तीन गुना, कई-कई गुना फल की इच्छा पालते हैं.

 

कर्मा-फैन इंटरनेट पर बेहद उम्दा, नया और नायाब विचार है. कम से कम चिट्ठाकारों के लिये तो है ही.

 

वैसे तो यह दो तरफा  काम करता है, परंतु इसका टैग-लाइन है-

 

गेट सपोर्ट फ्रॉम योर फैन्स!

 

यानी अपने चिट्ठा फैनों से आप कर्मा-फैन के जरिए सहयोग व भरणपोषण स्वरूप नकद राशि प्राप्त कर सकते हैं. जब आप अपने अनवरत चिट्ठा-पोस्टों से अपने पाठकों का मनोरंजन करते हैं, उनके ज्ञान में वृद्धि करते हैं तो क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि वे भी आपको कुछ वापस दें?

इस काम के लिए कर्मा-फैन चिट्ठाकारों व चिट्ठापाठकों के सहयोग के लिए तत्पर है. आप कर्मा-फैन से जुड़कर अपने चिट्ठे में अपने पाठकों से सहयोग प्राप्त तो कर ही सकते हैं, आप अपने पसंदीदा चिट्ठाकारों को नकद राशि देकर उनका उत्साहवर्धन भी कर सकते हैं.

तो, यदि आपको इस चिट्ठाकार को कुछ गिव-बैक, कुछ धन्यवाद स्वरूप वापस करना है तो कर्मा-फैन में अभी ही खाता बनाएँ. यदि आप चिट्ठाकार हैं और अपने पाठकों से कुछ आशीर्वाद (मात्र आशीर्वचन नहीं,) स्वरूप, प्रशंसा स्वरूप ‘नकद’ प्रसाद प्राप्त करना है तब तो कर्मा-फैन आपके लिए ही है.

बहुत से चिट्ठा-पोस्टों – खासकर अंग्रेजी भाषा के – में पे-पॉल की कड़ी लगी हुई होती है जिसमें लिखा होता है सपोर्ट दिस ब्लॉग. रचनाकार व इस चिट्ठे में मैंने भी बहुत दिनों तक यह ‘गहना’ लगा रखा था – परंतु जब एक सेंट का भी सपोर्ट कहीं से नहीं मिला तो दुःखी मन से इसे हटा दिया था.

 

कर्मा-फैन ने एक नई आशा तो जगाई है. अब इसका लिंक लगा देखते हैं कि हमारे पाठक ‘वास्तव’ में प्रशंसा करते हैं या फिर ‘ऊपरी’.

 

और अगर आप स्वयं चिट्ठाकार हैं तो फिर आप भी अपने पाठकों की असली प्रशंसा परख लीजिए...

 

(डिस्क्लेमर – कर्मा-फैन की जांचपड़ताल इस चिट्ठाकार द्वारा नहीं की गई है, व इस प्रविष्टि को मात्र हँसी-ठट्ठा के रूप में लिया जाए)

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संजय बेंगाणी

अपन तो बहुत ही गम्भीरता से खुश हुए और आप ने कह दिया हँसी ठट्ठा कर रहा हूँ :(

सपनो पर पानी फेर दिया. :)

"जब आप अपने अनवरत चिट्ठा-पोस्टों से अपने पाठकों का मनोरंजन करते हैं, उनके ज्ञान में वृद्धि करते हैं तो क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि वे भी आपको कुछ वापस दें?"

दायित्व जरूर बनता है. हां पे पेल को आपने समय से पहले ही हटा दिया क्योंकि अभी कितने हिन्दी चिट्ठाकार हैं जिनके पास उसकी सद्स्यता है. आप उसे चिट्ठे पर लगाये रखते तो कल कम से कम पांच दस लोग पूछते कि यह क्या बला है. फिर वहा से चालू होता एक नया अध्याय!!

-- शास्त्री जे सी फिलिप



आज का विचार: चाहे अंग्रेजी की पुस्तकें माँगकर या किसी पुस्तकालय से लो , किन्तु यथासंभव हिन्दी की पुस्तकें खरीद कर पढ़ो । यह बात उन लोगों पर विशेष रूप से लागू होनी चाहिये जो कमाते हैं व विद्यार्थी नहीं हैं । क्योंकि लेखक लेखन तभी करेगा जब उसकी पुस्तकें बिकेंगी । और जो भी पुस्तक विक्रेता हिन्दी पुस्तकें नहीं रखते उनसे भी पूछो कि हिन्दी की पुस्तकें हैं क्या । यह नुस्खा मैंने बहुत कारगार होते देखा है । अपने छोटे से कस्बे में जब हम बार बार एक ही चीज की माँग करते रहते हैं तो वह थक हारकर वह चीज रखने लगता है । (घुघूती बासूती)

बहुत ही मुबारक कदम है. सरल और सहज काम हो जाता है. क्या यह नेट के सिवा कारगर है? हिन्दी को साधनों से सजाया जाने का उत्तम प्रयास है ये.
शुभकामनाओं सहित

देवी नागरानी

आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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