शुक्रवार, 7 सितंबर 2007

एक मरीज का चिकित्सा-यात्रा संस्मरण 2

 

(भाग 1 में आपने पढ़ा कि सीएमसी वेल्लोर में चिकित्सकीय परीक्षण के लिए आवश्यक राशि जमा करवाने के लिए हम टोकन लेकर काउन्टर पर इंतजार कर रहे थे...)

 

मैंने चारों ओर जरा बारीकी से निगाहें फिराईं. मेरे बाजू की कुर्सी पर एक सज्जन बैठे थे. वो बिहार से आए थे. मैंने जरा सी बात छेड़ी कि लाइन तो बहुत लंबी है. पता नहीं कब नंबर आएगा. बस फिर क्या था. वह तो जैसे भरे बैठे थे - फट पड़े.

उन्होंने बताया कि वे कोई पंद्रह दिन से वहां डेरा डाले बैठे हैं. उनकी पत्नी को किडनी स्टोन संबंधी कुछ जांच पड़ताल व चिकित्सा करवानी थी. इसके लिए वे कोई छटवीं दफा जांच फीस जमा करवाने के लिए लाइन में बैठे हैं. और हर बार कोई दो से पाँच घंटे की लाइन में उन्हें लगना पड़ा है. यही नहीं, परीक्षण केंद्रों की तो और भी बुरी गत है. एक-एक परीक्षण के लिए बहुत लंबी लाइन लगती है और वो भी बेहद उबाऊ और बीमार कर देने वाली होती है.

भीड़ में आधी से अधिक संख्या में बिहार, झारखंड और विशेष कर बंगाल के मरीज दिखाई दे रहे थे. बंगाली मरीजों की अधिकता के कारण अस्पताल में कई स्थानों पर अंग्रेजी, तमिल के साथ बंगाली भाषा में भी निर्देश दर्ज थे. बंगाल में पच्चीस वर्षों से राज कर रही साम्यवादी कम्युनिस्ट सरकार का नंगा चेहरा इन मरीजों के उदास, बीमार चेहरों से स्पष्ट झलकता दिखाई दे रहा था – वेल्लोर जैसी टक्कर का कोई हस्पताल सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में पूरे बंगाल में कहीं भी क्यों नहीं बन पाया अब तक? मप्र, बिहार और झारखंड की बात तो ख़ैर छोड़ ही दें.

कोई पाँच बजे मेरा टोकन नंबर प्रदर्शित हुआ तो लगा कि एक जंग जीत लिया हमने. काउंटर पर पैथॉलाजी, सीटी स्कैन, एन्डोस्कोपी इत्यादि के विभिन्न जाँचों के लिए कोई आधा दर्जन कम्प्यूटर जेनरेटेड पर्चियाँ हमें दी गई. कैश काउन्टर के बगल में ही पैथालॉजी के लिए जांच नमूने एकत्र करने का काउंटर था. वहां पहुँचे तो देखा कि यहाँ भी कोई डेढ़ सौ से ऊपर मरीज लाइन में लगे हैं – अपने रक्त इत्यादि के नमूने देने हेतु. लाइन के लिए बैंचें लगाई गई थी, जिसमें मरीज एक एक इंच कर आगे खिसकते जा रहे थे. मेरे ठीक पीछे एक बंगालन मरीज थी. वह भीड़, लाइन और लग रहे समय से ज्यादा ही परेशान हो रही थी. मैंने भीड़, लाइन और इसी लग रहे समय के कारण हो रहे अपने भीतर की परेशानी को छुपाते हुए उससे थोड़ा शांति बनाए रखने को कहा तो वह उबल पड़ी. उसने बताया कि पिछले दो दिनों में वह तीन बार यहाँ जाँच नमूने देने के लिए लाइन में लगी है, और उसे हर बार दो-तीन घंटे का समय लगा. सिस्टम नाम की कोई चीज ही नहीं है यहाँ. न तो प्रबंधन है, न भीड़ प्रबंधन. और ऊपर से स्टाफ सीधे मुंह बात ही नहीं करता. किसी से कुछ पूछो तो बस कहता है – वेट वेट वेट.

कोई दो घंटे बाद मेरा नंबर आया तो रक्त व मूत्र परीक्षण हेतु नमूने लिए गए तथा मुझसे कहा गया कि रक्त का एक नमूना खाली पेट लिया जाएगा उसके लिए अगले दिन सुबह आओ. पता चला कि ओपीडी में नमूने एकत्र करने का कार्य सुबह सात बजे से प्रारंभ होता है, परंतु इसके लिए लाइन सुबह पाँच बजे से ही लग जाती है. तौबा! भगवान बचाए, इस लाइन लगने की बीमारी से!

मैंने रेखा से कहा कि यहाँ जांच इत्यादि करवाने से कोई मतलब नहीं है, क्योंकि मरीजों के समय का यहां किसी के पास कोई मूल्य ही नहीं है. यहाँ समय नष्ट करने का कोई फ़ायदा ही नहीं है. पर वह अडिग रही. उसने कहा कि इतनी दूर आ गए हैं, तो कुछ भी हो, जांच करवाकर ही चलेंगे. पर जाने क्यों मुझे लग रहा था कि यहाँ जांच के नतीजे सिफर ही रहेंगे...

चूंकि 29 अगस्त को जांच पूरी ही नहीं हो पाई थी, अतः अब हमें ईएनटी3 को दिखाने के लिए अगली ओपीडी 1 सितम्बर की तारीख मिली – यानी चौथे दिन – बीच के दिन आप अनावश्यक बिना काम के रुके रहें – भले ही आप बाहर से आए हैं, बाहर होटल में रुके हैं, पर उससे क्या? और अगली तारीख भी पक्की तब होगी जब आप इसके लिए विशेषज्ञ के एप्वाइंटमेंट की फीस काउंटर पर पहले से जमा कर दें.

तो बीच के दिन को हमने हृदय-रोग जांच के लिए लगाया. 30 अगस्त को दोपहर ढाई बजे का समय इकोकार्डियोग्राम जाँच के लिए दिया गया. वहां कार्डियोलॉजी में हम नंबर लगा कर इंतजार करने बैठ गए. दो-चार मरीज और उनके परिजन पहले ही चिल्ला रहे थे – हम सुबह से बैठे हैं, हमारा नंबर अब तक नहीं आया. न कोई टोकन न कोई नंबर सिस्टम, बस अंदर से एक मरीज को पुकारा जाता तो उस नाम का प्राणहीन मरीज अचानक चेतनावस्था को प्राप्त हो उछल बैठता और कॉरीडोर से लगभग दौड़ते हाँफते इको रूम की ओर चल पड़ता. क्षणांश को तो वह भूल भी जाता कि वह हृदय-रोगी है, और उसे दो कदम चलने में ही पसीना आता है और हाँफ छूटने लग जाता है.

कोई चार बजे मेरा नाम पुकारा गया. मेरे भीतर भी जान आई. हृदय जोरों से धड़कने लगा. चलो अपना नंबर तो आया.

मेरे इको के लिए जारी कम्प्यूटर जनित जांच पर्ची को पकड़े एक तकनीशियन अंदर इको लैब में थी. उसकी सूरत ही बता रही थी कि वो रोबॉटिक तरीके से सैकड़ों हजारों मरीजों के इको कर कर के निहायत ही बोर हो चुकी थी और आज उसका आइन्दा आगे कोई इरादा भी नहीं था. उसने मुझे कहा कि कल सुबह आठ बजे आओ. मैंने प्रतिवाद किया कि मैं दोपहर दो बजे से जांच के लिए बैठा हूँ, और मुझे अब बताया जा रहा है कि कल सुबह आओ. कल सुबह तो मेरा कार्डियोलॉजिस्ट के साथ एप्वाइंटमेंट है, जो इस जांच के बगैर कैसे संभव होगी?

उसने कुछ सुना ही नहीं और कहा कि कल सुबह आओ. और पर्ची में नया समय डाल कर मुझे पकड़ा दिया.

मेरा दिल डूब गया. कल सुबह फिर इंतजार करना होगा. साढ़े आठ बजे के नंबर के लिए आठ बजे आकर लाइन में बैठना होगा फिर एक अंतहीन इंतजार में लगना होगा – अपने कान लैब की ओर उठाए हुए – न जाने कब अपना नाम पुकार लिया जाए.

यह सारा सिलसिला मुझे बेहद उबाऊ, निरर्थक, कष्टप्रद, अस्वास्थ्यकर और न जाने क्या क्या प्रतीत हो रहा था. मेरा बस चलता तो मैं कब का भाग खड़ा होता वहाँ से. मगर मेरे स्वास्थ्य की चिंता मुझसे ज्यादा रेखा को है, और अगर मैं उसकी जगह होता तो भी वही करता जो वो कर रही थी. उसने कहा कि जाँच करवाकर ही चलेंगे, जब आ ही गए हैं. मैंने उसे लालच दिया कि चलो आसपास घूम लेते हैं – तिरूपति दर्शन कर लेते हैं – जो जांच का पैसा सीएमसी वेल्लोर के खाते में कम, और होटल में रहने में और भोजन में ज्यादा खर्च हो रहा है, उसे तिरुपति में दान कर देते हैं – भगवान की प्रतिदिन की करोड़ों की कमाई में कुछ रुपये और जोड़ देते हैं – परंतु उसने मेरे इस नायाब विचार को अनसुना कर दिया. रेखा, तू ने ये अच्छा नहीं किया. भगवान तिरूपति अवश्य तुझसे नाराज हो जाएंगे.

बहरहाल, अगले दिन, जबरन, लगभग खींचते हुए ही, रेखा मुझे कॉर्डियोलॉजी में ले गई. पर्ची लेकर मुझे फिर से इंतजार करने को कहा गया. कोई दस बजे मेरा नाम पुकारा गया. जब इको करने के लिए तकनीशियन ने पन्ने पलटे तो पुरानी रपटों में कॉम्प्लीकेटेड केस हिस्ट्री होने के कारण उसने किसी डॉक्टर को फोन किया. डॉक्टर कहीं व्यस्त था, अतः वह कोई आधा घंटे के अतिरिक्त इंतजार के बाद आया. उसके आने तक मुझे फिर से एक बार बाहर बिठा दिया गया. डॉक्टर मुखर्जी ने कोई बीस-पच्चीस मिनट इको टेस्ट किया. इस दौरान उन्होंने मुझसे पूछा कि मुझे कोई तकलीफ तो नहीं हो रही?

मैंने न में जवाब दिया. और फिर कहा कि हाँ, एक तकलीफ हो रही है. उन्होंने एकदम से पूछा क्या – उनके हँसमुख चेहरे पर अचानक गंभीरता झलकी. मैंने कहा – यहाँ का प्रबंधन, भीड़ प्रबंधन बहुत ही खराब है. हर किसी को अनावश्यक, अकारण इंतजार करना होता है. जांच के लिए तो बात समझ में आती है, पर यहाँ तो जांच फीस जमा करने के लिए भी मरीजों को पाँच पाँच घंटे तक इंतजार करना होता है. यह तो बहुत ही कष्टकारी है. उनके चेहरे पर व्यंग्यात्मक स्मित की लहर क्षणांश को झलकी – हाँ, ये तो है – हर तरफ केओस (chaos) जैसी सिचुएशन है. भीड़ बहुत ज्यादा है. कैपेसिटी से कई-कई गुना ज्यादा.

मेरे पेसमेकर टेस्ट के लिए पेसमेकर मिनिलैब में परीक्षण के लिए भी पर्ची दी गई थी. पेसमेकर मिनिलेब को ढूंढने में ही काफ़ी वक्त जाया हो गया. रिसेप्शनिष्ट से लेकर हेल्प डेस्क और समाज सेवक – हर किसी ने अलग-अलग मुकाम बताया. बाद में पता चला कि यह तो ट्रेड-मिल स्ट्रेस टेस्ट वाले कमरे में है! मेरा पेसमेकर सीमेन्स का पेस-सेटर ब्रांड का था. उसे जांचने के लिए चेन्नई से तकनीशियन को दूसरे दिन बुलाने की बात की गई. मेरे पास दूसरा रास्ता नहीं था सिवाय इसके कि हाँ कहूं. दूसरे दिन पता चला कि वो तकनीशियन नहीं आ पा रहा है.

बहरहाल, इको जाँच के बाद हम कार्डियोलॉजी ओपीडी में कार्डियोलॉजिस्ट के पास उनकी राय लेने के लिए पहुँचे, जिसके लिए हम पहले ही एक और बार लाइन में लगकर एप्वाइंटमेंट की राशि जमा कर चुके थे. पता चला कि विशेषज्ञ आज थोड़ा देर से आएंगे. वैसे तो पर्ची में सुबह 10-30 बजे का समय लिखा था.

हम फिर वहाँ इंतजार करते बैठ गए. अपना नाम पुकारे जाने के इंतजार में. इतने दिनों से इंतजार करने की आदत सी पड़ गई थी हर कहीं, अत: हम कोई आधा दर्जन पत्र पत्रिका साथ लेकर बैठ गए इंतजार कक्ष में. शाम कोई छः बजे मेरा नाम पुकारा गया.
यानी सुबह साढ़े आठ बजे से हम हस्पताल में थे और कार्डियोलॉजिस्ट के लिए सुबह ग्यारह बजे से इंतजार में थे. कोई हृदय-रोगी जिसे दिल का दौरा पड़ा हो तो सोचिए कि इतनी देर में वो कहाँ से कहाँ पहुंच जाएगा.

ई-एन-टी में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही रही. तमाम परीक्षणोंपरांत हमें विशेषज्ञ की राय जानने के लिए उससे मिलने के लिए फिर से एप्वाइंटमेंट फीस काउन्टर पर नंबर लगा कर अदा करनी पड़ी. हमें सुबह 10.30 का समय दिया गया था – कम्प्यूटर-जेनरेटेड पर्ची से जिसमें मरीज को लगने वाले प्रत्याशित समय को ध्यान में रख कर समय दिया जाता है – परंतु हमारा नंबर लगा 2.30 बजे.

ऐसा नहीं था कि इस तरह की स्थिति हर जगह पाई गई हो. कैट स्कैन पर तथा ऑडियो टेस्ट लैब में स्थिति ठीक-ठाक थी. तकनीशियन, जो समय दिया गया था, उस पर ध्यान दे रहे थे, और बाकायदा उसके बाद लगने वाले संभावित समय के बारे में बताकर आपसे इंतजार करने का आग्रह कर रहे थे. मिसाल के तौर पर ऑडियो टैस्ट लैब में तकनीशियन ने मुझसे कहा कि आप दोपहर का खाना खाकर ठीक 1.30 बजे आइए. और जब मैं ठीक 1.30 पर वहाँ पहुंचा तो वो फिर पूछी – खाना खा लिया? मेरे हाँ कहने पर उसने कहा कि सिर्फ 5 मिनट और इंतजार करिए, आपको बुलाते हैं – और फिर पाँच मिनट में ही मेरा नाम पुकारा गया.

परंतु स्थिति कहीं पर ज्यादा ही दारुण थी. जब मेरा इको टेस्ट लिया जा रहा था तो कोई सीनियर डॉक्टर, जिसके जिम्मे संभवत: प्रबंधन भी था – वह आया. थोड़ी देर उसने स्क्रीन पर डॉ. मुखर्जी को इको करते देखा जो कि इन सीनियर डॉक्टर के आने पर इज्जत से एक पल के लिए खड़े भी हुए थे, और कहा – गुड लेफ़्ट वेंट्रिकुलर फंक्शन. और फिर बाजू में खड़े एक सीनियर तकनीशियन को बड़े रूआब और रूखे तरीके से डांटने लगे – यू सीनियर्स आर नाट डूइंग योर ड्यूटीज़. और जब मैं इको लैब से बाहर आया तो पाया कि ये सीनियर तकनीशियन महोदय ‘उतारा’ कर रहे थे – वे मरीजों को चमका-चमका कर लाइन से लगा रहे थे, परिजनों को डांटकर वहाँ से भगा रहे थे...

वेल्लोर में चिकित्सकीय परीक्षणों में मेरे हृदय व पेसमेकर की स्थिति अच्छी पाई गई. ये बात अलग है कि डॉक्टर  ने रिपोर्ट लेने के लिए जो पर्ची दी थी उसे मैंने वहीं फाड़ दिया - क्योंकि उसके लिए अलग से 50 रुपए जमा करवाने थे - और जी हाँ, लाइन में लगकर! इस बात के लिए रेखा बहुत देर तक मुझसे नाराज रही - उसने कहा कि रिपोर्ट की तुम्हें न सही, मुझे जरूरत है - कल को इसकी आवश्यकता पड़ सकती है.  कान की समस्या एलर्जी के कारण हो रहे राइनाइटिस की संभावना के कारण बताई गई – जो कि जाहिरा तौर पर सही ही लगती है – रतलाम की धूल-धुँआ भरी सड़कों पर यदि मैं दस-पंद्रह मिनट भी ड्राइव करता हूँ तो मुझे खांसी आने लगती है, और सांस रुकने लग जाती है.

फिर भी, मैं, एक मरीज, वेल्लोर से एक 'बड़ा मरीज' बन कर लौटा. नामी संस्थान की मेरे मन में बैठी छवि ध्वस्त हो गई. मैं यह कसम खाकर वहाँ से लौटा – यदि मैं मरता भी होऊँ तो उस संस्थान में दुबारा नहीं जाऊंगा. चार दिनों में मैंने वहाँ चार करोड़ मौतें देख जो लीं – इंतजार का एक एक पल हजार मौतों के बराबर होता है भिड़ू, तुझे मालूम नईं क्या?

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10 blogger-facebook:

  1. इतनी विकट और भीषण स्थितियाँ होंगी, इसका कतई अंदाजा न था. आभार अवगत कराने के लिये.

    अच्छा लगा जानकर कि आपका स्वास्थय ठीक ठाक है. शुभकामनायें.

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  2. लगता है कि सब ही बडे-२ मेटिकल इन्सटीयूट की हालत एक जैसी है । मैने यहाँ लखनऊ मे SGPGI मे भी इसी हाल को देखा है । एक रोगी के लिये तो यह पल बिताने बहुत ही कठिन होते है , कम से कम इन संस्थानों को तो कुछ positively सोचना चाहिये ।

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  3. दारुण..
    अपना ख्याल रखें.. रेखाजी की बात सुनें..

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  4. रतलाम में डस्ट एलर्जी के चलते मेरा एक चेला मुझे एक डस्ट फ़िल्टर का मास्क दे गया था जिसे मैने असहजता के चलते नहीं पहना. आप तो पहन लें और मस्त रहें.
    वेल्लोर का अनुभव सोचने पर बाध्य करता है.

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  5. आप स्वस्थ हैं सुन कर प्रसन्नता हुई।

    अच्छे अस्पतालों का अभाव हो तो अच्छे अस्पताल भी मरीजों की तादात तले दब कुचलकर गये गुजरे हो जाते हैं। अपोलो जैसे अस्पताल पहले भारी फीस के ज़रिये कम आमदनी वाली भीड़ से बचे रहते थे पर अब तो लोगों की आमदनी भी बढ़ी है और महंगे अस्पतालों में मरीजों की तादात भी।

    बंगालियों के सिस्टम के रोना रोने को खास गंभीरता से न लें, निंदा और नुक्ताचीनी बंगालियों का खास शगल है :)

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  6. इन्ही ड्रामो के चलते मै अपने पिता को खो चुका हू..
    ना देखने वालो के पास वक्त था,और ना ही दिखाने वाले ने इंतजार किया..इनको जब तक देखने के लिये वक्त मिला,वो अपने नये सफ़र पर जा चुके थे.
    भगवान आपको स्वास्थय प्रदान करे

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  7. गुरुजी,

    आपकी दोनों पोस्‍ट ध्‍यान से पढी । यह जानकर बिलकुल भी अच्‍छा नहीं लगा कि आपने इतने-इतने 'राज-रोग' पाल रखे हैं । आपके व्‍यवहार से क्षणांश को भी आपकी इस गम्‍भीर अस्‍वस्‍थता का 'अन्‍देशा' भी नहीं होता । या तो आप श्रेष्‍ठ अभिनेता हैं या फिर विकट जीवट वाले व्‍यक्ति हैं । तसल्‍ली की बात यही है कि आप कुलमिलाकर स्‍वस्‍थ हैं ।
    दोनो पोस्‍ट पढते-पढते कई बार धैर्य छूटा लेकिन जी कडा कर, अन्‍‍तत: पढ ही ली । पढने में जब मेरा यह हाल हुआ है तो पता नहीं आपने यह सब कैसे भोगा होगा और कैसे सहन किया होगा ।
    ईश्‍वर आपको सदैव पूर्ण स्‍वस्‍थ बनाए रखे ।

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  8. मैं तो पढ़ते पढ़ते थक गया, आपने वो समय कैसे गुजारे होंगे, सोच के घबराहट होती है. आशा है आप जल्दी स्वास्थ्य लाभ करेंगे. हमरी दुआएं आपके साथ हैं.

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  9. Nitesh S1:35 pm

    रवि जी, आपका दर्द मैं समझ सकता हूँ. जो आपने cmc के बारे मे बताया वही हाल aiims का भी है.
    सरकार द्वारा चंद रुपये बचाने के चक्कर मे हमारे यहाँ भी मरीजों को ये सब झेलना पड़ता है.
    अव्यवस्थित रहना हम हिन्दुस्तानियो के खून मे है.
    कुछ बाबुओ की खिद्किया बढाने से काफ़ी समय बच सकता था.
    या फिर छोटी छोटी चीजों लिए भी अगर ये खिड़की सिस्टम हटा दिया जाए तो भी कुछ आराम हो. परन्तु यहाँ जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं .

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