टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

संदर्भ नारद : इंटरनेट कभी नहीं भूलता - कभी भी नहीं.



कल अपने चिट्ठे पर मैंने लिखा था - नारद के आगे जहाँ और भी हैं. मैं गलत था. मैंने गलत लिखा था. आज स्थिति यह है कि हर तरफ नारद ही नारद नजर आ रहा है. मैं अपना बयान वापस लेता हूँ. मेरे खुद का पैर मेरे मुँह में है. मैं शर्मिंदा हूँ. वाकई शर्मिंदा.

तो, मित्रों, भले ही आमने सामने रह कर जी भर कर बोल-गरिया लो, इंटरनेट पर ऐसा कुछ न लिखो कि मेरी तरह आपको भी अपना पैर मुँह में डालना पड़े. क्यों? क्योंकि इंटरनेट कभी नहीं भूलता.

इंटरनेट कभी नहीं भूलता. अफ़लातून जी नारद के प्रति आज निर्मम दिख रहे हैं, परंतु शायद वे 4 फ़रवरी 2007 को अपनी कही गई बात भूल गए. नारद ने पहले भी भाषा की अभद्रता के चलते एक ब्लॉग को प्रतिबंधित किया था. उस ब्लॉग को मेरे द्वारा सूचित करने पर नारद में जोड़ा गया था. तब नारद पर पंजीकरण इत्यादि की प्रथा ही नहीं थी. पंजीकरण की प्रथा इस अप्रिय प्रकरण के बाद ही बनी थी, और ब्लॉग प्रतिबंध की भी. ब्लॉग पर एक कहानी थी, जिसकी भाषा तथाकथित तौर पर अप्रिय थी. किसी पर कोई व्यक्तिगत आक्षेप भी नहीं था और न ही व्यक्तिगत गाली गलौच भी थी. मगर फिर भी, चूंकि जनता चाहती थी, अफ़लातून जी भी उसमें शामिल थे - उनकी ही पहल थी, इसीलिए उसे प्रतिबंधित किया गया था. हल्ला तो ख़ैर उस वक्त भी मचा था. जिसकी लड़ी चिट्ठाकार पर आप यहाँ देख सकते हैं.

उक्त प्रतिबंधित चिट्ठे पर अफ़लातून जी की टिप्पणी थी -

Aflatoon कहा था...

साँढ़ नाहि बरधा ।
अन्तर त पता होई?
अस्सी क होली वाला कवि सम्मेलन काहे बन्द हो गयल?अब तोहरे मुँहवा में उही रहsला त का करबा?चुभलावा?
एक्खे चिर्किन रहलन,उर्दू क शायर।ओन्पे एक मिला सोध करत रहल त लिखलेस-'उर्दू के बेनज़ीर चमन में,मियाँ चिर्किन के शेर खाद का काम करते हैं'
चरखा वालन के ऊ पन्नवा भेजीं?तब तो सच्चो सुवाद मिले लगी,चुभलावत क?मनेजर औ कासी तब करिहें पैरब्बी?
रविजी के अनुरोध पर तोहार चिट्ठवा 'नारद' पर चढ़ल हमरे कहले पर हटल हौ।
कासी क किताब से भविस्य में लैकन के परीक्षा में पूछल जाई'गया सिंहवा क चरित्र चित्रन करा?'
जीतेन्द्र चौधरी क इन्टर्नेट पर हिन्दी के बढ़ावे मे जौन योगदान हव ओके लौण्डा-लपाड़ी न समझ पइहें!सुअरी के न्यौता कब नहि देवल जाला,पता हौ?
विनोद सिंह ऊ पन्नवा ले ले हउन!
अब तोहार पारी हव?हई लिखलका त बचा लेले हई?

5 फ़रवरी, 2007 1:16 पूर्वाह्न

इस दफ़ा भी बाजार... पर प्रतिबंध, भाषा की अभद्रता और व्यक्तिगत आक्षेप को लेकर ही थी - और जिसके लिए अनावश्यक, व्यर्थ हल्ला मचाया जा रहा है और जरा ज्यादा ही मचाया जा रहा है - सांप्रदायिक रूप दिया जा रहा है - दोनों ही पक्षों से.

और हाँ, नारद प्रकरण पर चाहे जिसने पढ़ा हो या न पढ़ा हो या नहीं पढ़ने की कसम खाई हो या पहले पढ़ लिया हो - समर का लिखा चौखंभा पर यह पोस्ट अवश्य पढ़ें और हो सके तो दुबारा पढ़ें -

माफ़ करें ये धर्मयुद्ध नहीं है.

और, सचमुच, चिट्ठाकार बंधु, आइए हम सब आपस में एक दूसरे को माफ़ करें और कुछ सार्थक लेखन करें. नारद-नारद का खेल अब हास्यास्पद हो गया है और लाफ़्टर चैलेंज के प्रतिभागियों की तरह एक से बढ़कर एक आइटम पेश किए जा रहे हैं जिन पर हँसने के लिए सिद्धू होना भी अब कतई जरूरी नहीं रह गया है.

वैसे, मेरा ये आइटम भी अभी चल रहे नारद-लाफ़्टर चैलेंज में से एक था :) अब आपको हँसी नहीं आई हो तो अब इसमें मेरा कतई दोष नहीं है :)

Tag ,,,

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वाह रवि जी, खूब पकड़ा है आपने(hats off to you)। आशा तो नहीं है लेकिन फिर भी hopelessly hope कर सकते हैं कि "हिन्दु संघियों द्वारा चलित", "चन्दा देने वालों के हाथों बिक चुके" जैसे विक्षिप्त प्रलाप रूकेंगे। :)

हाँ आपने सही कहा इंटरनैट कभी नहीं भूलता, आज आप बैन के पक्ष में नहीं/प्रभावी नहीं मानते लेकिन तब आपने चिट्ठाकार समूह में संबंधित सूत्र पर कहा था:

"जीतू भाई, मेरे विचार में भी इस तरह का नियंत्रण आवश्यक है. अपने चिट्ठे पर लोग चाहे जो
लिखें, नारद जैसे सार्वजनिक मंच की शुद्धता तो बरकरार रखनी चाहिए."

"हाँ, लगता है अब संतुष्टि भी छानबीन कर करनी पड़ेगी! वैसे, नारद जैसे सार्वजनिक मंच पर
आने वाले चिट्ठों की भाषा और सामग्री स्वच्छ तो होनी ही चाहिए."


खैर तब अफलातून जी ने भाषा के मामले में उस चिट्ठाकार को निकालने की संस्तुति की थी आज वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गाना गा रहे हैं। उस पोस्ट की भाषा तो हालिया विवादित पोस्टों के मुकाबले बहुत संयत थी।

अच्छा पकड़ा आपने अफलू भैया को। :)

बहुत सही । आपकी समझ की हमेशा से दाद दी है ।

धन्यवाद रविजी,


बहुत मजेदार चीज लाए हैं.. शायद कुछ दोमुहें लोगों की आँखे खुले इससे.

मैं टिप्पणी नहीं करना चाह्ता, व्यथित हूँ, नारद की तकनीकी खामी पर मेरे लिखे पर जिस प्रकार समझदार लोग नारद पर आरोप लगा रहे है, मुझे नारद चलाने वालो पर दया आ रही है. क्यों चलाते हो नारद?

वा वा!!! क्या बात है, खूब तलाशा आपने इस पुराने मामले को!!

श्रीश जी,
नहीं, बैन को भले ही मैं प्रभावी नहीं मानता हूँ, मगर मेरा स्टैण्ड साफ है कि नारद या उस जैसे सार्वजनिक मंच के किसी भी प्रकल्प को अपने हिसाब से सामग्री में कांट छांट पूरा अधिकार है - लोग चाहे जितना हल्ला मचाएँ. और मैंने इसका समर्थन किया है, पहले की ही तरह:)

लोग तो फिर बाद में पॉर्न सामग्री रखने की मांग करेंगे व उसको हटाने पर हो हल्ला करेंगे - तब?

बहुत खूब।

ये किस्सा मुझे पता ही नहीं था, भला हो इन विवादों का जो यह गड़ा मुर्दा भी उखड़ कर सामने आ गया। अब इस मुर्दे के गुनाहगारों का क्या कहना है?

क्या आपके द्वारा प्रस्तुत चित्र-पृष्ठ का कोई URL भी है? कृपया उसे भी दें । मेरे पास वह पृष्ट बचा कर रखा हुआ है और छपा हुआ भी है।आप को मूल पोस्ट पसन्द आई थी।बनारस के लड़के को बनारसी शैली में लिखे गए पत्र को आपने प्रस्तुत किया,लेकिन मूल पोस्ट और अपनी प्रशंसा को भी आप को देना चाहिए था ।चिट्ठे पर मेरी टिप्पणी यह है साँढ़ नाहि बरधा ।
अन्तर त पता होई?
अस्सी क होली वाला कवि सम्मेलन काहे बन्द हो गयल?अब तोहरे मुँहवा में उही रहsला त का करबा?चुभलावा?
एक्खे चिर्किन रहलन,उर्दू क शायर।ओन्पे एक मिला सोध करत रहल त लिखलेस-'उर्दू के बेनज़ीर चमन में,मियाँ चिर्किन के शेर खाद का काम करते हैं'
चरखा वालन के ऊ पन्नवा भेजीं?तब तो सच्चो सुवाद मिले लगी,चुभलावत क?मनेजर औ कासी तब करिहें पैरब्बी?
रविजी के अनुरोध पर तोहार चिट्ठवा 'नारद' पर चढ़ल हमरे कहले पर हटल हौ।
कासी क किताब से भविस्य में लैकन के परीक्षा में पूछल जाई'गया सिंहवा क चरित्र चित्रन करा?'
जीतेन्द्र चौधरी क इन्टर्नेट पर हिन्दी के बढ़ावे मे जौन योगदान हव ओके लौण्डा-लपाड़ी न समझ पइहें!सुअरी के न्यौता कब नहि देवल जाला,पता हौ?
विनोद सिंह ऊ पन्नवा ले ले हउन!
अब तोहार पारी हव?हई लिखलका त बचा लेले हई?

5 फ़रवरी, 2007 1:16 पूर्वाह्न

आपने जो पृष्ट छापा है बतौर मेरी टिप्पणी वह न खुले इन्टरनेट पर था,न है।
हाँ ,मैंने उस लड़के से यह जरूर कहा था कि रविजी ने नारद से जुड़वाया था,मैं हटवा रहा हूँ।अब कृपया मेरी कथित टिप्पणी का URL दें अन्यथा खेद प्रकट कर हटा लें ।

'आपने जो चित्र छापा है बतौर मेरी टिप्पणी, उसकी मूल पोस्ट भी दे दें'-कृपया ऊपर ऐसे पढ़ें।जीतेन्द्र जी के कहने पर मैंने उसे बचा लिया है और छपे रूप में भी है। तब बहस हो।आज इस पोस्ट पर उत्साहित हो कर टिप्पणी करने वालों ने भी उसे वहाँ समझाया है।

अफ़लातून जी,
इस पोस्ट में जो 7 फरवरी 2007 लिखा हुआ है वह उस पृष्ठ का लिंक है, और इस छपे चित्र को ही वहीं से उठाया गया है - यानी स्क्रीनशॉट लिया गया है.

आपकी सुविधा के लिए यूआरएल एक बार और यहाँ छाप देता हूँ -
आपकी टिप्पणी
तथा

पोस्ट का यूआरएल 

अब भी आप कहेंगे तो खेद प्रकट कर दूंगा :)

और हाँ, मेरी प्रसंशा भी वहीं पर है :)

रविजी ,पोस्ट का यू. आर . एल यह नहीँ है |मेरा आशय हटा दी गई पोस्ट, जिस पर टिप्पणियाँ हैँ - उससे था | आप अपने तकनीकी हूनर से उसे पेश करेँगे तब न बहस हो पायेगी | या उसका स्क्रीन शाट ही सही | कुछ दिन पहले ही आप निरँतर खोजने के लिये तरीके बता रहे थे |

रवि जी जो आप यह गढे मुर्दे उखाड कर निकाल रहे इस से आप आग ओर हवा नही दे रहे है क्या । यह तो कुछ एसा लग रहा है कि आग मे घी डालो ओर फिर दूर खडे हो कर हाथ सेको । वैसे ये पोस्ट लकीर के दूसरी तरफ वालो पर मारक है।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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