टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

May 2007



विकास कुमार ने जब अपने चिट्ठे पर लेटेन्ट स्पेस की कड़ी दी तो मीनाक्षी से उनके पोस्ट पर टिप्पणी कर यही पूछा -

विकास कुमार said...

I've given a link to your blog from mine. I hope you dont mind.

http://vikashkablog.blogspot.com/2007/05/iit-jee.html

अगर विकास ये बात मीनाक्षी से नहीं पूछते तो?

हम लोग सभी एक दूसरे के चिट्ठों की कड़ियाँ अंधाधुंध अपने चिट्ठे पर देते हैं. किसी दिन कोई बंदा बुरा मान गया तो?

बुरा मान गया तो क्या होगा? वह कोर्ट चला जाएगा जहाँ कोई जयपुरिया या बनारसी या कनाडाई किस्म का कोई जज उस चिट्ठाकार को गिरफ़्तारी के समन्स भेज देगा जिसने अपने चिट्ठे में फरियादी के चिट्ठे की कड़ी दी है.

आप कहेंगे कि मैं क्या घाल-मेल बात कर रहा हूँ और ये कनाडाई जज वाली बात कहां से आ गई? क्या भारत के किसी कस्बे का नाम कनाडा है?

दरअसल पिछले कुछ समय से यह खबर कहीं कहीं चल रही थी कि ब्रिटिश कोलम्बिया, कनाडा में किन्हीं मिस्टर वायन क्रुक्स ने इंटरनेट पर मानहानि का मुकदमा दायर किया हुआ है. आप कहेंगे इंटरनेट? जी हाँ, उन्होंने इंटरनेट पर मुकदमा दायर किया है जिसमें प्रतिवादी याहू!, विकिपीडिया, माइस्पेस, पी2पीनेटवर्क और, अपनी सांस थामिए, गूगल इत्यादि... सम्मिलित हैं.

कोढ़ में खाज यह कि इन्हीं क्रुक्स महोदय ने ताजा ताजा ही विधि विज्ञान के प्रोफ़ेसर माइकल गीस्ट पर भी उसी तरह का मान हानि का मुकदमा दायर किया है. माइकल गीस्ट पर क्रुक्स का आरोप है कि माइकल ने अपने ब्लॉग में किसी तीसरे व्यक्ति के ब्लॉग का लिंक दिया था जिसमें क्रुक्स पर ऐसी बातें लिखीं गई थीं, जिसमें क्रुक्स को आपत्ति है. यानी आप अन्य ब्लॉगों के लिंक अपने ब्लॉग पर मासूमियत से - जाने-अनजाने देते हैं तो भी लिंक देने के कारण आप अपराध के भागीदार हैं.

जयपुर, बनारस और ब्रिटिश कोलम्बिया में सचमुच बहुत समानता है - ट्रू-ग्लोबलाइजेशन जैसा!

ऊपर से उधर प्रमोद - अजदक बने पूछ रहे हैं - आप लिंक्ड हैं या नहीं? क्वाइट फ़नी, इज़न्ट इट?

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टंबलर - एक नया, नई-नई ख़ूबियों वाला चिट्ठा स्थल

चिट्ठाचर्चा में मैंने अपने टंबलर का जिक्र किया था. उसी टंबलर से मैंने एक विजेट भी बनाया है जिसे आप इस चिट्ठे के बाजू पट्टी में दाहिनी ओर देख सकते हैं.

टंबलर क्या है? टंबलर एक नया, नई-नई ख़ूबियों वाला चिट्ठा स्थल है जो आपके ब्लॉग प्रकाशन को और भी सरल बनाता है. और, यह मुफ़्त है - व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए बिलकुल मुफ़्त.

सरसरी निगाह में यह वर्डप्रेस और ब्लॉगर - दोनों की ही सम्मिलित ख़ूबियों को अपने में समेटा हुआ प्रतीत होता है.

इसकी कुछ ख़ूबियाँ मुझे पसन्द आईं जैसे कि आप इसमें आरएसएस फ़ीड के जरिए पोस्ट कर सकते हैं. और चाहे जितनी फ़ीड डाल सकते हैं.

उदाहरण के लिए, यदि मैं नारद की फ़ीड इसमें डाल दूं तो यह स्वयंमेव नारद की प्रविष्टियों को ब्लॉग पोस्ट के रूप में सम्मिलित करता रहेगा.

इसकी इसी ख़ूबी को जांचने परखने के लिए मैंने गूगल ब्लॉग सर्च की फ़ीड इसमें डाल दी.

नतीजा आपके सामने है. गूगल नए नए ब्लॉगों को ढूंढता है और उसकी फ़ीड टंबलर का मेरा यह चिट्ठा खींच लेता है, व स्वयंमेव प्रकाशित करता रहता है.

यही नहीं, इसमें आप फ़्लिकर, यू-ट्यूब, पॉडकास्ट इत्यादि जैसी सेवाओं को इंटीग्रेट कर सकते हैं - उदाहरण के लिए, जब भी आप फ़्लिकर में कुछ फोटो अपलोड करेंगे तो वह फ़ोटो आपके टंबलर में एक ब्लॉग प्रविष्टि के रूप में दर्ज हो जाएगी.

टंबलर का इस्तेमाल और पंजीकरण दोनों ही बेहद आसान है. 30 सेकण्ड से कम में! - सचमुच! स्पैमरों की नज़र शायद अभी लगी नहीं है टंबलर पर!

वैसे, टंबलर - टंबललॉग को इनके प्रस्तुतकर्ताओं ने स्क्रैपबुक के रूप में प्रस्तुत करने बातें की हैं जिसमें आप तमाम चीजों को भर रख सकते हैं और जिसका इस्तेमाल आप आसानी से, चलते फिरते कर सकते हैं. जैसा कि उनका कहना है -

"ब्लॉग तो बढ़िया हैं ही, परंतु उन्हें लिखने और प्रकाशित करने में बहुत सारे श्रम की आवश्यकता होती है. और उन्हें लंबे लंबे आलेखों के लिहाज से बनाया गया है. इसके विपरीत टंबललॉग को इस तरह से बनाया गया है कि जो कुछ कहीं आप पाते हैं या कुछ बनाते हैं उसे आप आसानी से व तीव्रता से पोस्ट कर सकते हैं."

मगर फिर भी इसका प्रमुख इस्तेमाल मल्टीमीडिया युक्त ब्लॉग लेखन के रूप में ही होगा, और शायद धुँआधार होगा.

तो फिर देर किस बात की? जाइए, एक टंबलर अपना भी बना लीजिए.

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दि लास्ट लाफ़

इस चित्र को ध्यान से देखिए. ये इनके जीवन की अंतिम, उन्मुक्त हँसी है.

फिर इनके जीवन में दुनियादारी, रिश्तेदारी और न-जाने-क्या-क्या-दारी प्रवेश कर जाएगी और आगे की जो भी हँसी आएगी, वो, यकीन मानिए, नक़ली-सी और बनावटी-सी हँसी होगी. और, बहुत होगी तो विद्रूप की हँसी होगी - दुनियादारी पर ठहाके लगाते हुए...

मैं इतने विश्वास के साथ कैसे कह रहा हूँ?

भुक्तभोगी जो हूँ!

चित्र में ये दो जीव एक जान हैं कौन? देखते हैं कौन सबसे पहले अंदाज़ा लगाता है :) , और सही अंदाज़ा लगाता है!

अद्यतन # 1

जब यह पोस्ट प्रकाशित किया गया था तो नारद जी को एक ब्लॉग के गुम हो जाने से अजीर्ण हो गया और वे उसी को ढूंढते रह गए. लिहाजा यह पोस्ट नारद के पिछले पेजों में बरीड हो गया और इसे मैं फिर से पोस्ट कर रहा हूँ, थोड़ा सा संपादित कर और अब तक पाठकों के आए टिप्पणियों पर प्रतिटिप्पणियाँ कर.

जैसा कि समीर जी, अतुल जी, धुरविरोधी जी ने बख़ूबी अंदाज़ा लगा लिया था - यह चित्र मेरी भांजी निवेदिता और हिन्दी ग्राम के चिट्ठाकार - आशीष का है. और उन्मुक्त जी, यह चित्र 20 अप्रैल को हुई सगाई के अवसर का है, पर हाँ, सगाई को आधी शादी तो मानी ही जाती है. और, अपना नाम नहीं बता रहे भाई साहब, अगर हम आपकी भाषा को पहचाने में कामयाब हुए हैं तो आप अमित जी - इट्ज़-मी हैं! और अंकुर जी, अब तो आपको पता चल गया होगा कि चित्र किनका है.

सगाई के अवसर पर मैं अपरिहार्य कारणों से पहुंच नहीं पाया था - आरक्षित रेल टिकटों को ऐन मौके पर निरस्त करवाना पड़ गया था. मेरे पास ये चित्र और सगाई का वीडियो अभी हाल ही में पहुँचे जिसे देख कर लगा कि मुझे तो वहाँ हर हाल में होना ही चाहिए था - ये तो बहुत बड़ा नुकसान हो गया - सगाई के समय खूब मजे किए इन सभी ने! और, आशीष का बरमूडा अभी भी मोहल्ले का चर्चित विषय बना हुआ है! ख़ैर, अब शादी का बेसब्री से इंतजार है.

और, आप पाठकों को यदि ध्यान न हो तो फिर से बता दूं कि यह रिश्ता हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रतिफल के रूप में ही सामने आया है जिसमें प्रेरक - उत्प्रेरक स्वरूप फुरसतिया जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

पुनश्च: हँसी चाहे जैसी भी हो, आइए, हम सभी इन्हें शुभकामनाएँ दें - आशीष-निवेदिता ऐसे ही तमाम उम्र हँसते रहें - इनकी शादी सफल, खुशनुमा और हँसी-खुशी से भरपूर हो.

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यदि आप अपने व्यक्तिगत पैशन के लिए किसी सॉफ़्टवेयर का विकास कर रहे हैं या मन में ऐसा कोई विचार है और उसे आम जन के लिए ओपन-सोर्स के रूप में जारी करना चाहेंगे तो आपकी उस परियोजना को थोड़ा सा अवलम्बन और थोड़ी सी पहचान सराय फ्लॉस फ़ेलोशिप के जरिए मिल सकती है.

राजीव गांधी फ़ाउंडेशन द्वारा समर्थित इस फ़ेलोशिप के तहत स्वीकृत परियोजना को छः महीनों में पूरा करना होगा और इसके लिए 70 हजार रुपयों का अनुदान स्वीकृत किया जाता है.

ज्ञातव्य हो कि लिनक्स तंत्रों में गनोम, केडीई व ओपनऑफ़िस के हिन्दी अनुवादों समेत बहुत से अन्य उपयोगी सॉफ़्टवेयर जैसे कि न्यूज़रैक, हिन्दवी इत्यादि को सराय फ्लॉस फ़ेलोशिप का पोषण मिला था.

प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तारीख 25 जून 2007 है.

विस्तृत विवरण यहाँ देखें.

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या फिर, ब्लॉग कितने प्रकार के हो सकते हैं?

अब ये तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर कुछ क़िस्में मुझे मिली हैं -

  • ब्लागरि, ब्लागोतं, ब्लहसनं, ब्लास्यं, ब्लाक्कवित, ब्लाक्कथ
  • ब्लागुडु, ब्लागुडुगाय, ब्लागु संदडि, ब्लागु शोधन
  • ब्लाग्पटिम, ब्लाग्शूरुडु, ब्लाग्दानं, ब्लाग्धोरणि, ब्लागुमाय
  • ब्लाजकीयालु, ब्लाश, ब्लूतु, सिनी ब्लागु, ब्लोटो (ब्लागु फोटो)

कहाँ?

आप इस कड़ी को क्लिक कर इस ब्लॉग के बाजू पट्टी में, सबसे निचले, दाएँ कोने में स्वयं देखें :)

वैसे, मुझे भी इन शब्दों के अर्थ नहीं मालूम :)

आपके अपने हिसाब से ब्लॉग की अपनी क़िस्में भी होंगीं. क्या होंगी वे क़िस्में भला?

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कोई दो साल पहले मैंने एक पोस्ट लिखा था - ब्लॉग? क्या इतिहास की बातें करते हो, अब तो पॉडकास्ट करो - तब मैंने नहीं सोचा था कि हिन्दी में पॉडकास्टिंग को अपनी पूरी रफ़्तार में आने में इतना समय लग जाएगा.

बहरहाल, देर आयद दुरूस्त आयद. उन्मुक्त अपने ऑग फ़ॉर्मेट में विविध विषयों में हिन्दी पॉडकास्टिंग की अलख जगाए हुए थे कि तरकश पर खुशी के पॉडकास्ट से सिलसिला आगे बढ़ा. फिर पॉडभारती का पदार्पण हुआ जो अपने बेहद पेशेवराना अंदाज के कारण बहुत जल्द सफ़लता की सीढ़ियों पर चढ़ेगा ऐसी उम्मीदें हैं.

और, अभी हाल ही में प्रगति रथ ने भी अपना पॉडकास्ट ब्लॉग - राग रंग प्रारंभ किया है जो माईपॉडकास्ट.कॉम नामक मुफ़्त पॉडकास्ट सेवा प्रदाता पर स्थित है. प्रगति - श्री जयप्रकाश मानस जी की सुपुत्री हैं.

राग रंग के आरंभिक अंकों में जहाँ कुछ बेहद लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी गीतों को पिरोया गया है तो वहीं कुछ हिन्दी फ़िल्मी गाने भी हैं.

माईपॉडकास्ट.कॉम के जरिए अपना स्वयं का पॉडकास्ट प्रारंभ करना बहुत आसान है. या तो आप माइक्रोफ़ोन से अपनी स्वयं की बकबक रेकॉर्ड करें - जैसा कि उन्मुक्त करते हैं और उसकी एमपी3 (उन्मुक्त ऑग फ़ॉर्मेट इस्तेमाल करते हैं जो ज्यादा लोकप्रिय नहीं है, परंतु मुक्त स्रोत है) फ़ाइल तैयार करें. या पहले से तैयार एमपी 3 फ़ाइल जैसे कि गानों की फ़ाइल लें. माईपॉडकास्ट.कॉम में पॉडकास्ट खाता खोलें, अपनी एमपी3 फ़ाइल लोड करें, फ़ाइल के बारे में कुछ लिखें, और बस हो गया.

दुनिया को आपके पॉडकास्ट की दीवानी होते देर नहीं लगेगी.

जब तक कि आप अपना स्वयं का पॉडकास्ट प्रारंभ करें, राग रंग के पॉडकास्ट सुनें व उन्हें दें अपनी शुभकामनाएं.


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कैक्टस के फूलों का स्लाइडशो अपने इस चिट्ठा पर मैंने लगाया था. यह फ़्लैश आधारित स्लाइड शो है जो ब्राउज़र में तीव्रता से लोड होता है. कुछ पाठकों ने पूछा कि यह कैसे लगाया गया है.

हाल ही में पिकासा, ऑनलाइन चित्र भंडार (पिकासावेब) में यह सुविधा जोड़ी गई है कि आप अपने अपलोड किए चित्रों को एक एलबम के रूप में फ्लैश आधारित स्लाइड शो के रूप में अपने जाल पृष्ठ पर प्रकाशित कर सकते हैं. और बड़ी आसानी से कर सकते हैं.

यदि पहले से कोई खाता नहीं है तो आपको पिकासावेब में एक खाता खोलना होगा (यदि आप ब्लॉगर इस्तेमाल करते हैं तो आपके ब्लॉग के सारे चित्र एलबम के रूप में पिकासा में पहले से ही उपलब्ध होते हैं- पिकासा और ब्लॉगर का एकीकरण किया जा चुका है). फिर पिकासावेब में अपने चित्रों को एक एलबम का नाम देकर उसमें अपलोड करें.

अपने चित्रों को पिकासावेब में अपलोड करने के लिए आप चाहें तो पिकासा औजार का भी इस्तेमाल कर सकते हैं जो कि यहाँ से डाउनलोड किया जा सकता है. पिकासा औजार अब हिन्दी में भी उपलब्ध है.

अपलोड किए चित्रों के एलबम को चुनकर आप निचले दाहिने कोने में Embed Slideshow कड़ी को क्लिक करें. एक नए पॉपअप विंडो में चित्रों के स्लाइड शो को एम्बेड करने का कोड मिलेगा. उसे नक़ल कर अपने चिट्ठा पोस्ट में उचित स्थल पर चिपकाएं. आप स्लाइड शो का आकार बहुत छोटा (144px) से लेकर (800px) तक चुन सकते हैं. मैंने यहाँ पर 400px इस्तेमाल किया है.

तो फिर अब देर किस बात की? पिकासावेब के जरिए अपने ब्लॉग (वर्डप्रेस ब्लॉग में भी यह लगाया जा सकता है) को स्लाइड शो के जरिए रंगीन, चित्रमय बना दीजिए. हम आतुर हैं आपके द्वारा खींचे गए चित्रों को देखने को.

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गरमी की छुट्टियाँ हो गई हैं और सभी कहीं न कहीं सैर का प्रोग्राम बना रहे हैं. घर में भी इस दफ़ा बाल-बच्चों ने उत्पात मचाया कि चलो कहीं सैर को चलें.

अब समस्या ये आई कि कहाँ चलें? किसी ने सुझाया कोवलम् के बैकवाटर पर चलें तो किसी ने टेहरी की पहाड़ियों की बात की. किसी ने मलेशिया-सिंगापुर या फिर दुबई का सुझाव दिया तो किसी ने मॉट्रियल का.

हर सुझाव पर कुछ न कुछ समस्या आती रही और मामला खारिज होता रहा. अचानक दिमाग की बत्ती जली. एक सुझाव मैंने फेंका - सुनकर किसी को मजा नहीं आया. मगर, फिर कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था किसी के पास. जाहिर है, सब सफर की तैयारी में जुट गए.

जब हम मंजिल पर पहुँचे तो दोपहर के दो बज रहे थे. धूप तेज थी और हवा कहीं ठहर-सी गई थी. हर तरफ़ कांटे ही कांटे नज़र आ रहे थे. मगर यह क्या? कांटों के बीच कहीं-कहीं संसार की तमाम ख़ूबसूरती सिमट कर झलकने की, फ़ूट पड़ने की कोशिश-सी कर रही थी.

हम सैलाना के कैक्टस गार्डन में थे. कोई बीसेक साल पहले धर्मयुग के किसी अंक में इस पर एक विस्तृत फ़ोटो-फ़ीचर भी छपा था. यहां के भूतपूर्व महाराजा ने अपने महल के बाग़ीचे में सिर्फ कैक्टस के ही पौधे रोप रखे थे. कैक्टस के सैकड़ों क़िस्म. हर पौधा अपने आप में दर्शनीय और नायाब. कैक्टस भी इतने ख़ूबसूरत हो सकते हैं यह किसी को भी गुमान नहीं हो सकेगा जब तक कि वह इन पौधों को निकट से देख न ले.

हालांकि आज की तारीख में इस बग़ीचे का रखरखाव ठीक नहीं है और कैक्टस की बहुत सी क़िस्में अब वहां नहीं हैं, मगर फिर भी है यह अत्यंत दर्शनीय.

मई का महीना कैक्टस के लिए खास होता है. इस महीने कैक्टस में फूल आते हैं. और कहा जाता है कि संसार के कुछ सबसे ख़ूबसूरत फूल कैक्टस के ही होते हैं. इसीलिए किसी भी कैक्टस के बाग़ीचे में सैर करने जाना हो तो मई के अंतिम सप्ताह में जाना चाहिए. सैलाना कैक्टस गार्डन में भी फूलों की बहार आई हुई थी. हर कैक्टस पल्लवित हो रहा था. अलग-अलग क़िस्म के कैक्टस में अलग-अलग क़िस्म के लुभावने फूल. कंटीले कैक्टस में रेशम से कोमल फूल. धूसर कैक्टस में रंगों की छटा बिखेरते फूल.

मेरे यात्रा प्रोग्राम को सुनकर बाल-बच्चों के जिनके मुँह उतर गए थे, उन्होंने भी माना कि वाकई बहुत शानदार, मजेदार, ज्ञानवर्धक यात्रा रही. कैक्टस गार्डन के माली से यह जानकारी भी मिली की कोई दसेक दिन बाद यानी मई के आखिरी दिनों में कैक्टस पर फूलों की बहार अपने उच्चतम ऊँचाई पर रहेगी. उस दौरान एक बार फिर वहां तक दौड़ लगाने की योजना तो बन ही गई.

(इस एलबम को बड़े आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें)

क्या आप अब भी कहेंगे - नागफनी में सिर्फ कांटे ही कांटे होते हैं? नहीं ना?

और, हाँ, आपको बता दूं - ताऊ, विशेष रूप से आपको - सैलाना रतलाम से सिर्फ पच्चीस किलोमीटर दूर है! और, आप अब भी अपनी भोपाल यात्रा में इसे शामिल कर सकते हैं, जाहिर है - वाया रतलाम. और, भोपाल से देबाशीष को साथ पकड़ लाओ तो फिर बात ही क्या है!

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कुछ समय पहले तक यह जुमला अमूमन और आमतौर पर हर हिन्दी चिट्ठे के ऊपरी कोनों में दिख ही जाता था. और उसमें हिन्दी कैसे देखें, कम्प्यूटर को कैसे सेट करें इत्यादि के लिंक होते थे.

आजकल बहुत से चिट्ठों में यह दिखाई नहीं देता (मेरे चिट्ठों में से भी यह ग़ायब हो चुका था), परंतु अभी भी लोगों को जिनके पास पुराने विंडोज़ 98 तरह के या नए लिनक्स तंत्र जिनमें इंडिक-हिन्दी समर्थन पहले से संस्थापित नहीं होता है उसमें हमारे ब्लॉग के यूनिकोड हिन्दी दिखाई ही नहीं देते. और, यकीन मानिए, ऐसे प्रयोगकर्ताओं की संख्या हमारे ब्लॉग पाठकों की वर्तमान संख्या से लाखों गुना - जी हाँ, लाखों गुना ज्यादा है!

अब आपकी इस समस्या का समाधान पीयूष भट्ट लेकर आए हैं. पीयूष ने पहले ही भोमियो नाम का एक भारतीय भाषाई ऑनलाइन ट्रांसलिट्रेशन औजार बनाया है. जिसके जरिए आप किसी भी हिन्दी चिट्ठे को रोमन लिपि में पढ़ सकते हैं और काट-चिपका कर उसका अन्य इस्तेमाल - जैसे कि मैंने रचनाकार के चुटकुलों के संग्रह व अपने व्यंग्य रचनाओं का किया है - कर सकते हैं. अब उसमें उन्होंने अतिरिक्त ख़ूबियाँ जोड़ी हैं और उसमें आपके लिए अब प्रॉक्सी सुविधा का समावेश भी किया गया है. उसके जरिए आप अपने हिन्दी चिट्ठे को अंग्रेज़ी लिपि में पढ़ने की कड़ी दे सकते हैं. जैसे कि यह कड़ी - इस कड़ी को क्लिक कर आप मेरे इस चिट्ठे को अंग्रेज़ी लिपि में पढ़ सकते हैं.

आप स्वयं अपने चिट्ठों के अंग्रेज़ी समेत भारत की अन्य भाषाओं में पढ़े जाने के लिए कड़ियाँ बना सकते हैं और जैसा कि मैंने अपने इस चिट्ठे के बाजूपट्टी में ऊपरी दाँए किनारे पर अंग्रेज़ी में कड़ी दी है. अब मेरे चिट्ठों को वे सभी पाठक जिनके पास यूनिकोड हिन्दी दिखाने का समर्थन नहीं है आराम से और आसानी से रोमन लिपि में पढ़ सकते हैं. कड़ियां कैसे बनाएँ इसका विवरण यहाँ दिया गया है.

हाँ, इसमें वर्तमान में अभी एक खामी है कि यह यूनिकोड अक्षरों युक्त यूआरएल को समर्थित नहीं करता है (वर्डप्रेस के बहुत से चिट्ठों में यूनिकोड यूआरएल होते हैं), परंतु उम्मीद है कि इस खामी को शीघ्र ही दूर कर लिया जाएगा.

मेरे लिए बहुत से, ढेर से पाठकों को मेरे हिन्दी चिट्ठों तक खींच लाने हेतु पीयूष, आपका हार्दिक धन्यवाद. आपको शायद अंदाज़ा नहीं होगा कि आपने मेरे और मेरे जैसे अन्य भारतीय भाषाओं के जाल स्थलों के लिए कितना बड़ा काम कर दिया है!

कान्ट सी हिन्दी? लुकिंग एट टोटल गार्बेज?

नॉट एनीमोर, सेन्योर!

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अब तक तो हम जी-मेल का इस्तेमाल इंटरनेट पर अ-खंडित हिन्दी के लिए प्रमुख तौर पर और साथ ही साथ इसकी कुछ और अन्य ख़ूबियों - जैसे कि बेहतर स्पैम हैंडलिंग के लिए करते थे. अब इसके इस्तेमाल के कुछ और पुख़्ता कारण सामने आए हैं.

क्या हैं ये सॉलिड - पुख़्ता कारण?

अब ये आप स्वयं पढ़ें. :)

# अद्यतन 1 - इसी तेवर की एक और ख़बर

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मदर्स डे पर यह ईमेल फ़ॉरवर्ड अंग्रेज़ी में, पश्चिमी ग्राफ़िक के साथ आया. लगा कि इसे हिन्दी में भी होना चाहिए. पृष्ठभूमि चित्र रेखा के स्केच-स्क्रैप बुक से लिया है.

(चित्र को पढ़ने लायक बड़े आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें)

इसका पीडीएफ़ फ़ाइल यहाँ है. तथा मूल आकार का चित्र (1.2 मेबा) यहां है.

यूनिकोड रंगीन पाठ को इस चित्र के ऊपर चस्पा करने में बहुत समय जाया हो गया. पर, अंतिम परिणाम एक अच्छे हिन्दी ईमेल फ़ॉरवर्ड के लायक तो लगता है बन ही गया.

‘मां' के लिए, जिनके लिए मैं अभी भी 50 वर्षीय ‘बाबा' ही हूं!

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1 - हिन्दी का एक और ख़ूबसूरत जाल स्थल. हिन्दी मीडिया चैनल डॉट कॉम - हिन्दी प्रेमियों को समर्पित. इस चैनल में टेलिविजन और फ़िल्म मीडिया की चटपटी खबरें आमतौर पर दिखाई दे रही हैं जिनकी जनता दीवानी होती है. यदि इसमें स्टारडस्ट के पूर्व स्तम्भकार शोभा डे की नीता की नटर जैसा चटपटा कॉलम आ जाए तो यकीन मानिए इसके रातों रात लोकप्रिय होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. साथ ही, यह यूनिकोड हिन्दी इंटरनेट को जन-जन तक पहुँचाने में एक अहम् हिस्सा भी बन जाएगी. नेहा धूपिया से मुलाकात इस सिलसिले की आरंभिक कड़ी है. हिन्दी मीडिया चैनल को छवि मीडिया ग्रुप ने बनाया है - जैसा कि इसके नीचे दाएँ कोने पर दिखाई दे रहा है.

2 - सब तरफ आई - यानी की आईपॉड, आईट्यून और हर चीज़ आई के बाद गूगल क्यों न पीछे रहे? आईगूगल सुना-देखा है? नहीं तो अभी ही, तत्काल देखें. यह भी विजेट से भरा पूरा आपका अपना गूगल खोज पृष्ठ है जिसे आप अपने मनचाहे रूपआकार दे सकते हैं. इसके हेडर में थीम चयन कर चित्र डाल सकते हैं और बहुत से उपलब्ध विजेटों को चुनकर इसके पन्नों में जोड़ सकते हैं.

3 - एक ब्लॉगर की, ब्लॉग के जरिए दिन भर की कितनी कमाई हो सकती है - 1000 डॉलर? 5000 डॉलर? या 10000 डॉलर?

यदि आप पाउला की बात मानते हैं तो मार्क्स फ्रिंड की प्रतिदिन की आय है दस हजार डॉलर - वह भी उनके ब्लॉगों के जरिए. भारत के अमित अग्रवाल का नाम सूची में दर्ज नहीं है, शायद ग़लती से -वे भी उस सूची में आने लायक बन चुके हैं.

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पिछले दिनों एक चिट्ठे पर अधिकतम टिप्पणीप्राप्त हिन्दी चिट्ठा पोस्ट कौन है इस पर उत्तर-प्रत्युत्तर हुए थे.

नारद की टिप्पणी फ़ीड हमें हर दूसरे दिन उत्तरांचल के बबली तेरो मोबाइल पर किसी न किसी पाठक की टिप्पणी दिखाती ही है. आज की स्थिति में उस पोस्ट को 84 टिप्पणियां प्राप्त हो चुकी हैं और ... स्टिल काउंटिंग.

आखिर वो क्या चीज है जो पाठकों को बबली तेरो मोबाइल नामक वह पोस्ट आकर्षित कर रही है. वह है लोक गीत. लोक संगीत. मनुष्य हर हमेशा अपनी जड़ों से, अपनी संस्कृति से जुड़ा हुआ ही रहता है. उसे अपना बचपना, बचपन के दिन, बचपन में बिताए लम्हे हमेशा पुकारते रहते हैं. वह अपनी संस्कृति से जुड़कर एक अजीब तरह की खुशी महसूस करता है.

छत्तीसगढ़ी भी एक अलग बोली, बानी और संस्कृति है. मेरा बचपना भी वहीं, छत्तीसगढ़ में गुजरा है. अब भी छत्तीसगढ़ से संबंधित कोई भी वस्तु आकर्षित करती है.

आइए, आपको छत्तीसगढ़ी संस्कृति की कुछ झलक दिखलाएँ.

यू ट्यूब पर छत्तीसगढ़ी के कुछ वीडियो हैं. आमतौर पर इन वीडियो को झारखंड.ऑर्ग ने अपलोड किया है. इनमें से कुछेक में ही आपको छत्तीसगढ़ी संस्कृति की कुछ झलक मिलेगी. बाकी वीडियो में तो फूहड़ता और आधुनिकता का गंदा घालमेल है.

एक वीडियो ये देखें. गीत छत्तीसगढ़ी में है - ए पवन... उड़ा के ले आ चुनरिया. सुंदर गीत है और उतना ही सुंदर छायांकन.

यू-ट्यूब की कड़ी ये रही

http://www.youtube.com/watch?v=zBMMYSgsruE

और वीडियो यहीं देखना चाहें तो नीचे प्ले बटन को क्लिक करें

एक और छत्तीसगढ़ी गीत है - उड़ जा रे मैना छोरी ला संदेसा दे के आ – इस वीडियो पर की प्राकृतिक सुंदरता का छायांकन किसी भी बॉलीवुड फ़िल्म को मात देती है, और यकीन मानिए, फ़िल्म में छत्तीसगढ़ स्विटज़रलैंड से भी ज्यादा खूबसूरत नजर आया है. –

यू ट्यूब की कड़ी

http://www.youtube.com/watch?v=1A14L3upAcM

वीडियो यहाँ देखेः

भाई नीरज दीवान (?) द्वारा यू-ट्यूब पर पोस्ट किया इस छत्तीसगढ़ी वीडियो का इन्ट्रो अवश्य देखें, और ध्यान से सुनें :) यह एक विशेष छत्तीसगढ़ी गीत ददरिया है

यू-ट्यूब की कड़ी –

http://www.youtube.com/watch?v=oRJ-y7ZrszU

वीडियो यहाँ देखें -

ऐसा ही एक और खूबसूरत छत्तीसगढ़ी गीत के यू-ट्यूब की कड़ी

http://www.youtube.com/watch?v=-CgNnrpjRZQ

वीडियो -

एक और छत्तीसगढ़ी वीडियो जिसमें आपको किसी टिपिकल छत्तीसगढ़ी गांव के घर-चौबारे गलियों झोपड़ों और रहन सहन का आइडिया मिलता है, हालाकि गीत फ़िल्मांकन में तथा नृत्य में आधुनिकता फूहड़ता की हद तक घुस आई है-

यू-ट्यूब की कड़ी

http://www.youtube.com/watch?v=o6e0RJodVkY

वीडियो-

और, अंत में, छत्तीसगढ़ी सुवा गीत. सुवागीत दीपावली पर्व के अवसर पर घरों-घरों में गाया जाता है. एक विशेष शैली में गाया जाने वाला नृत्य-गीत दर्शनीय है-

यू-ट्यूब कड़ी

http://www.youtube.com/watch?v=2Y00GsDvSVY

वीडियो -

छत्तीसगढ़ी वीडियो की और अधिक कड़ियां आप –

http://www.youtube.com/results?search_query=chhattisgarhi

तथा http://www.youtube.com/results?search_query=Chhattisgarh

पर देख सकते हैं. कुछ और छत्तीसगढ़ी गीत वीडियो आप झारखंडी.ऑर्ग में देख सकते हैं. झारखंडी.ऑर्ग में उड़िया, भोजपुरी तथा झारखंडी गीत के वीडियो भी हैं.

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और, यह नया नारद तो ज्यादा ही चपल चतुर और व्यावसायिक दीखता है!

इंडिया स्फ़ीयर - पल्स ऑन द इंडियन ब्लॉगस्फ़ीयर में एक खंड है हिन्दी ब्लॉग का. यह लगभग नारद जैसे रूप में दिखता है, बस स्टेटकाउंटर का मुँह चिढ़ाता प्रश्न वाचक चिह्न भर नहीं है इसमें. परंतु यह नारद से ज्यादा साफ़ सुथरा, सुघड़ और अच्छा है. उदाहरण के लिए, काल चिंतन की प्रविष्टि - कविता आह्वान को नारद में आप अपठनीय पाते हैं क्योंकि यह कविता को गद्य रूप में बदल देता है जबकि इंडिया स्फ़ीयर में यह अपने पूरे फ़ॉर्मेटिंग के साथ उपलब्ध है. मूलतः भारतीय अंग्रेजी ब्लॉगमंडल को प्रस्तुत करने वाले इस स्थल में हिन्दी ब्लॉगों के इस खण्ड से हिन्दी ब्लॉगों के नए मुरीद पैदा होंगे इसमें कोई शक नहीं.

काल चिंतन - नारद पर


काल चिंतन इंडिया स्फ़ीयर पर


हाँ, इसमें कुछ अतिरिक्त, शातिराना खूबियाँ जोड़ी गई हैं जो इसके एडसेंस युक्त बिजनेस मॉडल के लिए जरूरी भी लगती हैं - जैसे कि चिट्ठा पोस्टों के आगे रीड मोर की कड़ी जिसमें आपको पोस्ट का सारांश या पोस्ट का अच्छा खासा हिस्सा नए पेजलोड के उपरांत वहीं पर पढ़ने को मिल जाता है. जिस पोस्ट की फ़ीड उपलब्ध नहीं होती वहां पर मूल आलेख पढ़ें की कड़ी भी उपलब्ध की गई है.

इंडिया स्फ़ीयर पर उपलब्ध चिट्ठों की कड़ियों पर सारांश या पोस्ट का कुछ हिस्सा पढ़कर आप अपनी टिप्पणियाँ भी दर्ज कर सकते हैं. आपको अलग से चिट्ठे के पोस्ट पर जाने की आवश्यकता नहीं. आरंभिक जांच पड़ताल में यह धीमा ही प्रतीत हुआ - संभवतः यह अपने सर्वर पर चिट्ठों के कैश एकत्र कर नहीं रखता - यदि आप किसी चिट्ठे की प्रविष्टि पर रीड मोर कड़ी को क्लिक करते हैं तो यह ब्लॉग पोस्ट से ही सामग्री डाउनलोड कर दिखाता है - यानी एक अतिरिक्त चरण बीच में आ जाने के कारण अनुभव धीमा प्रतीत होता है. फिर भी, चिट्ठों को नारद की तरह एकत्र कर उन्हें नए, नायाब रूप में प्रस्तुत किया गया है और संभवतः भविष्य में और भी दूसरी खूबियाँ जोड़ी जा सकें.

हाल-फिलहाल यह नारद का विकल्प तो नहीं नजर आता, मगर विकल्प बनने की संभावना तो इसमें बख़ूबी नज़र आती है - और इसके चिट्ठा प्रविष्टि के अनुक्रम को देखकर लगता है कि कहीं यह नारद की फ़ीड ही इस्तेमाल तो नहीं कर रहा?

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देसी चिट्ठों को कमाई करने का एक और साधन हाल ही में सुलभ हुआ है. अमित ने अपने चिट्ठे में खबर दी है कि नौटंकी टीवी नाम का एक नया ऑनलाइन वीडियो प्लेयर जारी किया गया है जो चिट्ठों व जाल-स्थलों को छोटे छोटे विज्ञापन युक्त मनोरंजक वीडियो फ़िल्में दिखाने के एवज में भुगतान करेगा. यह कुछ कुछ यू-ट्यूब जैसा है, परंतु इसका विजेट नुमा कोड लगाने के बाद इसमें जो विज्ञापन युक्त वीडियो क्लिपें दिखाई जाएंगी, उसमें शायद आपका नियंत्रण न रहे. वैसे, नौटंकी टीवी वालों का कहना है कि वे संदर्भित (कांटेक्स्चुअल) सामग्री ही दिखाएंगे. नौटंकी टीवी के वीडियो विज्ञापन अपने चिट्ठे में दिखाने हेतु आपको नौटंकी टीवी में पंजीकृत होना होगा और वे पहले आपके साइट को स्वीकृत करेंगे उसके पश्चात् ही आप अपने चिट्ठे पर वे विज्ञापन दिखा सकेंगे.

विज्ञापन युक्त चिट्ठा कैसा होगा और विज्ञापन कैसा होगा? और, क्या सचमुच लोग इन विज्ञापनों को देखेंगे? और सचमुच इनसे कमाई हो सकेगी?

ये बात तो भविष्य ही बताएगा.

अभी तो नौटंकी टीवी के विज्ञापन युक्त चिट्ठा यहाँ देखें.


नौटंकी टीवी का ऑफ़ीशियल ब्लॉग यहाँ देखें


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यूनिकोड हिन्दी टाइपिंग समस्या का निदान अंततः अब संभव

कैफ़े हिन्दी ने एक नया, यूनिकोड हिन्दी टाइपिंग औजार बीटा संस्करण के रूप में प्रस्तुत किया है.

यह औजार अंततः अब आपकी यूनिकोड हिन्दी टाइपिंग की समस्या का निदान एक हद तक करने में सक्षम प्रतीत होता है.

यह औजार करीब 400 किबा डाउनलोड है तथा संस्थापना में कोई 1 मेबा जगह घेरता है. इसकी संस्थापना बहुत आसान है, सिर्फ दो-तीन क्लिक से संस्थापित हो जाता है और फिर आप इसे प्रोग्राम मेन्यू में जाकर सक्रिय कर सकते हैं.

एक बार सक्रिय हो जाने के उपरांत यह आपके सिस्टम ट्रे में जमा रहता है जिसे आप F11 कुंजी या माउस क्लिक के जरिए इसे सक्रिय-अक्रिय करने हेतु टॉगल कर सकते हैं. आपको अपने विंडोज तंत्र में अन्य किसी भी तरह की भाषा संबंधी सेटिंग को बदलने की आवश्यकता ही नहीं होती.

इसमें अंतर्निर्मित इनस्क्रिप्ट, रेमिंगटन (कृतिदेव तथा डेवलिस श्रेणी) तथा फ़ोनेटिक कुंजी पट हैं तथा भविष्य में शुषा तथा अन्य हिन्दी कुंजीपटों के समावेश की योजना है.

इस औजार के जरिए आप यूनिकोड कम्पायलेंट समस्त अनुप्रयोगों यथा - नोटपैड, वर्ड तथा ब्राउज़रों के इनपुट बक्सों यथा ब्लॉग तथा टिप्पणियों में और ई-मेल क्लाएंट जैसे कि आउटलुक एक्सप्रेस इत्यादि सभी में आसानी से लिख सकते हैं. अंग्रेजी अक्षरों के लिए बस आपको कैफ़े हिन्दी टाइपिंग औजार के सिस्टम ट्रे को माउस क्लिक करना होता है या F11 कुंजी दबाना होता है. वैसे, इस्तेमाल में यह कुछ कुछ बारहा आईएमई जैसा है, परंतु इसके निर्माण में डॉट नेट का इस्तेमाल होने से यह कुछ आधुनिक है और इसमें बारहा जैसा इनपुट बग आरंभिक जांच-परख में नहीं दिखा. साथ ही, यह बारहा से ज्यादा आसान और बढ़िया है. डॉट नेट आर्किटेक्चर में होने से भविष्य में संभवतः मोनो जैसे आईडीई के जरिए इसके कोड को लिनक्स तंत्रों के लिए भी पोर्ट किया जा सकता है. वैसे, कैफ़े हिन्दी यूनिकोड टाइपिंग औजार अभी तो सिर्फ विंडोज प्लेटफ़ॉर्म के लिए ही जारी किया गया है.

इसकी संस्थापना के लिए आवश्यक है कि आपके कम्प्यूटर में माइक्रोसॉफ़्ट डॉट नेट 2 संस्थापित हो. यह मुफ़्त में उपलब्ध है (22 मेबा) जिसे आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं.

कैफ़े हिन्दी यूनिकोड टाइपिंग औजार आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. यह जिप फ़ाइल है जिसे आप किसी फ़ोल्डर में एक्सट्रैक्ट करें फिर इसकी संस्थापना प्रोग्राम चलाएं. कैफ़े हिन्दी यूनिकोड टाइपिंग औजार भी मुफ़्त प्रोग्राम (फ्रीवेयर) के रूप में जारी किया गया है.

आम प्रचलित हिन्दी कुंजीपटों के समावेश के कारण, और इस्तेमाल में आसानी के चलते इसके शीघ्र लोकप्रिय होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

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अप्रैल फूल तो बहुत से लोगों ने बनाया.

चलिए, मैं आपको मई फूल बनाता हूँ :)

25 अप्रैल 2007


27 अप्रैल 2007


29 अप्रैल 2007


30 अप्रैल 2007


1 मई 2007

बन गए न, मई फूल!

संबंधित चिट्ठा - आसमां से टपका एक हीरा मेरे अंगने!

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शेष के संपादक हसन जमाल ने ऐसा आखिर क्या कह दिया था कि उसकी गूंज तहलका तक में सुनाई पड़ गई. इससे पहले अनूप ने अक्षरग्राम पर तथा मसिजीवी ने अपने चिट्ठे पर भी इसकी चर्चा की है. हसन जमाल ने नया ज्ञानोदय के फरवरी 07 के अंक में मनीषा कुलश्रेष्ठ के इंटरनेट पर आलेख के सम्बन्ध में अपने पत्र में कुछ मुद्दों को उठाया था. हसन जमाल के उस पत्र के जवाब में अप्रैल 07 के अंक में कटघरे में हसन जमाल शीर्षक से तीन पत्र प्रकाशित हुए, जिनमें हसन जमाल के विचारों को सिरे से खारिज कर दिया गया. संभवतः ऐसे और भी पत्र नया ज्ञानोदय को मिले होंगे, परंतु स्थान की सीमितता स्थानाभाव के कारण इन तीन पत्रों को ही प्रकाशित किया गया. हसन जमाल के प्रकाशित पत्र की स्कैन की गई छवि निम्न है -

(चित्र को बड़े आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें)


प्रत्युत्तर में मैंने नया ज्ञानोदय को एक पत्र प्रेषित किया था जो कि निम्न है -

हसन जमाल की अंतर्जालीय कूप मंडूकता

मनीषा कुलश्रेष्ठ के आलेख - ‘इंटरनेट और हिन्दी साहित्य' पर हसन जमाल की प्रतिक्रिया (नया ज्ञानोदय, फ़रवरी 2007, पृ. 108) उनकी अंतर्जालीय कूप मंडूकता को गहरे में बिम्बित करती है.

जिस तरह के तर्क हसन जमाल ने दिए हैं वे बेहद हास्यास्पद, बचकाना और इंटरनेट के प्रति उनकी नासमझी और अज्ञानता को ही दर्शाते हैं.

शायद उन्हें यह नहीं पता कि प्रोजेक्ट गुटेन बर्ग क्या है? शेष पत्रिका में कभी छपा उनका संपादकीय इस्लाम नहीं, मुसलमान ख़तरे में (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_11.html ) छपे किताब के शक्ल में न्यूयॉर्क में या बस्तर के किसी अनजाने गांव में कोई ढूंढ सकता है? शायद नहीं, परंतु यह रचनाकार में इंटरनेट पर मौजूद है, सालों साल वहाँ रहेगा और मात्र दो क्लिक के जरिए (सिर्फ हसन जमाल लिख कर ढूंढ देखिए जनाब!) संपूर्ण विश्व में, कहीँ भी, किसी भी कम्प्यूटर पर और अब तो मोबाइल उपकरणों पर तत्क्षण अवतरित हो जाता है. उन्हें यह भी नहीं पता कि रवींद्र कालिया के बेहद लोकप्रिय आत्मकथ्य - गालिब छुटी शराब को पढ़ने के लिए किसी पाठक को उस पुस्तक को खोजकर, ढूंढकर, खरीदकर नहीं पढ़ना पड़ेगा. अब पाठक इंटरनेट पर निरंतर (http://www.nirantar.org ) के जरिए मुफ़्त में, विश्व के किसी भी कोने में पढ़ सकता है. और यह बात असगर वजाहत और संजय विद्रोही के कहानी संग्रह क्रमशः मैं हिन्दू हूँ तथा कभी यूँ भी तो हो के साथ भी लागू होती है जो रचनाकार में प्रकाशित हुए हैं - और ये तो मात्र उदाहरण हैं! संभावनाएँ अनंत हैं!

उन्हें शायद यह भी नहीं पता कि इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्य या सामग्री को कहीं पर भी छाप कर पढ़ा जा सकता है - इंटरनेट तो माध्यम है सामग्री की उपलब्धता का, सर्व सुलभता का. और अब तो वाचक जैसे अनुप्रयोगों के जरिए अंधे पाठक भी आपकी हिन्दी रचना को कम्प्यूटरों के जरिए सुन कर आनंद ले सकते हैं. इंटरनेट मात्र चैटिंग और चीटिंग का साधन नहीं है - जैसा कि जमाल का मानना है. अगर इंटरनेट ऐसा होता तो यह इतना लोकप्रिय माध्यम कदापि नहीं होता.

साथ ही, मनीषा ने भी इंटरनेट के हिन्दी ब्लॉगों के बारे में भी सरसरी और उथली बातें कहीं हैं. अंग्रेज़ी के ब्लॉगों में उनकी प्रचुरता, अधिकता और विविधता के कारण समग्रता में उनकी बातें भले ही ठीक होंगी, परंतु हाल फिलहाल जितने भी हिन्दी के ज्ञात-अज्ञात ब्लॉग हैं, उनमें भले ही भाषागत शुद्धता का अभाव दिखाई दे जाए, मगर स्तरहीनता तो कतई नहीं दीखती. उनकी बात अंग्रेज़ी ब्लॉगों के अर्थ में तो भले ही ठीक बैठती होगी, हिन्दी ब्लॉगों के संदर्भ में, माफ़ कीजिएगा, मनीषा, आपके विचार पूरे ग़लत हैं. इंटरनेट पर हिन्दी अभी शैशवावस्था में है और जैसे जैसे यह लोकप्रियता के पायदान चढ़ेगा, हिन्दी में गलीज सामग्री भरने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, परंतु अभी तो ऐसी स्थिति नहीं के बराबर ही है!

हसन जमाल के पत्र के प्रत्युत्तर में नया ज्ञानोदय में उपर्युक्त पत्र (जिसका कुछ हिस्सा संपादित कर दिया गया) सहित दो और अन्य पत्र प्रकाशित हुए हैं जिनकी स्कैन की गई छवि निम्न है -

(चित्र को बड़े आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें)

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