रविवार, 12 नवंबर 2006

आइए चिट्ठों में कुछ व्यावसायिकता की बातें करें...

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हर चिट्ठाकार व्यावसायिक है...

चिट्ठाकारिता पर व्यावसायिकता की बातें होने लगे तो मेरे कान खड़े होना स्वाभाविक है. और इससे पहले कि देबाशीष की लिखी रीव्यू-मी की समीक्षा मैं पूरा पढ़ पाता, मैंने अपने आप को रीव्यू-मी की साइट पर पंजीकृत पाया.

रीव्यू-मी पर पंजीकरण का सारा सिलसिला अत्यंत आसान है. बस अपना नाम पता और अपने चिट्ठे का नाम भरें, वैध ई-मेल भरें और बस हो गया. हाँ, आपको यहां पंजीकृत होने के लिए, पहली और अंतिम आवश्यकता, अपने जीवन के कम से कम 14 वसंत देख चुके होने चाहिएँ.

पंजीकरण के बाद बारी आती है अपने ब्लॉग को रीव्यू-मी पर समीक्षा लिखने हेतु जमा करने व उसे स्वीकृत करवाने की. आपके ब्लॉग को स्वीकृत करने के लिए रीव्यू-मी की कुछ शर्तें हैं. मैंने अपना हिन्दी चिट्ठा जमा किया तो पता चला कि यह तो पहले ही स्वीकृत है! फिर अंग्रेज़ी चिट्ठे को जमा करना चाहा तो पता चला कि यह भी पहले से ही स्वीकृत है! मेरे दो-दो चिट्ठों को रीव्यू-मी के लिए समीक्षा लिखने लायक पहले से ही मान लेने के पीछे क्या राज है यह सही-सही तो नहीं पता, परंतु लगता है कि इसमें पहले से लगे गूगल एडसेंस का बड़ा योगदान है. जो हो, मुझे तो अपने चिट्ठे के रीव्यू-मी के लिए लिखने की स्वीकृति से मतलब था, न कि उसके तौर तरीकों से. बहरहाल, और जानकारियाँ बारंबार पूछे जाने वाले प्रश्नों में दी गई हैं, ऐसा कहा गया है, परंतु मेरी जिज्ञासा का समाधान नहीं हो पाया है.

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मेरी स्वीकृति के तत्काल बाद दन्न से एक समीक्षा लिखने के लिए प्रस्ताव आया. वह भी मानदेय युक्त! परंतु, अरे! यह क्या? इस तरह की, इस उत्पाद की समीक्षा नुमा नुक्ताचीनी तो देबू दा पहले ही कर चुके हैं. परंतु फिर पता चला कि रीव्यू-मी की समीक्षा कम से कम सवा-हजार चिट्ठाकारों से करवाया जाना है. मैंने तत्काल हामी भरी. मुझे 48 घंटों का समय मिला रीव्यू-मी की समीक्षा लिखने को. इतना समय किसने देखा है? यूं तो हर चिट्ठाकार अपने चिट्ठे के प्रति पेशेवराना दृष्टिकोण रखता है, परंतु मेरे जैसे, चिट्ठों में व्यावसायिकता की बातें करने वाले को गंभीर पेशेवराना रवैया अख्तियार करना ही चाहिए, लिहाजा सोमवारी चिट्ठाचर्चा भले ही बाद में हो, या न हो, यह समीक्षा जरूर होनी चाहिए, और पहले होना चाहिए. दोपहर का भोजन एक तरफ गोल कर यह समीक्षा लिखी जा रही है, अतः इस समीक्षा में दर्द, वज़न और बात आनी ही है. समीक्षा लिखने में वैसे भी कम से कम दो सौ शब्दों की सीमा है, अतः इधर-उधर की, मसलन मौसम के मिज़ाज और सब्जी में नमक के मात्रा की भी बातें तो करनी ही होंगी.

बहरहाल, जैसे तैसे मैंने रीव्यू-मी की यह समीक्षा लिख ही ली है. अब इसे अपने चिट्ठे पर प्रकाशित करना है. रीव्यू-मी की यही खासियत है. आपको अपनी समीक्षा पहले से स्वीकृत, आपके अपने चिट्ठे पर ही प्रकाशित करना है, और उसे वहां प्रकाशित रहने देना है. विचार नायाब है, नया है. परंतु क्या यह चल पाएगा?

मुझे तो नहीं लगता. कुछ माने हुए चिट्ठाकारों, मसलन अमित अग्रवाल जैसे सफल , अंग्रेजी के चिट्ठाकारों को भले ही दिन में दर्जनों समीक्षाएँ लिखने को मिल जाएँ, परंतु सर्वाधिक सफल हिन्दी चिट्ठाकारों, जिनके पाठक आज भी, दिन भर में सौ की संख्या में भी नहीं पहुँच पाते, उन्हें अपने उत्पाद की समीक्षा करने कौन देगा? रीव्यू-मी के जरिए कोई भी अपने उत्पाद की समीक्षा उसमें पंजीकृत चिट्ठाकारों से लिखवा सकता है. और जाहिर है, समीक्षा के लिए चिट्ठाकारों के चुनाव में अहम बात चिट्ठे के पाठक वर्ग और उसके दायरे की होगी.

और, इसी लिए जाने क्यों, मुझे तो यही लगता है कि रीव्यू-मी के लिए यह मेरी पहली व अंतिम समीक्षा है. पर, आगे किसने देखा है? बिल गेट्स ने कभी कहा था कि किस बेवकूफ़ को 640KB से ज्यादा मेमोरी की आवश्यकता होगी?

4 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. इस समीक्षा को रीव्यू-मी में जमा करने के उपरांत यह पता चला कि इस समीक्षा को रीव्यू-मी के स्टाफ द्वारा जाँचा परखा जाएगा. फिर आपको स्वीकृत मानदेय के भुगतान की क्रेडिट दी जाएगी.

    मतलब साफ है, आपको उन्हें संतुष्ट करना होगा. समीक्षा में आप भले ही प्रशंसा के पुल न खड़े करें, धुर्रे भी नहीं उधेड़ सकते!

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  2. बेनामी2:28 pm

    रवि भइया,

    नतीजा चाहें कुछ भी निकले पर लख है दमदार और पाठकों के लिए चिंतन-मनन करने योग्य ।

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  3. मेरी जिज्ञासा तो यह है कि हिन्दी समीक्षा का "रिव्यू" कौन कर पायेगा, हो सकता है गैर अंग्रेज़ी समीक्षाओं को वे फिलहाल स्वीकार ही न करें। देखते हैं!

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  4. रीव्यू-मी द्वारा यह खबर दी गई है कि मेरी समीक्षा उन्होंने स्वीकार कर ली है!

    शायद उनकी टोली में कोई हिन्दी समीक्षा-जांचक भी है. तब तो यह वाकई बढ़िया है.

    मुझे इंतजार है और ढेरों समीक्षाएँ लिखने हेतु ढेरों आमंत्रणों का :)

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