टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

November 2006

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हमें भी चाहिए जीरो बेस्ड सिस्टम...

लालू की रेल देश भर में एक दिसम्बर से जीरो बेस्ड समय सारिणी लागू कर रही है. ये जीरो बेस्ड क्या होता है? दरअसल, भारत की सभी ट्रेनों को शून्य यानी रात के बारह बजे पर प्रारंभ होता मान लिया जाता है और फिर कम्प्यूटर सिमुलेशन के जरिए रेल पटरी की उपलब्धता, स्टेशन पर रुकने का समय, गति, कॉशन आर्डर, इत्यादि को ध्यान में रखते हुए नई समय सारिणी बनाई गई है. यही शून्य आधारित समय सारिणी है. बताते हैं कि इसे लागू करने से ट्रेनों की गति में इजाफ़ा होगा और जो ट्रेन 500 किमी की दूरी 8 से 10 घंटे में तय करती थी अब वह 1 दिसम्बर से 5 से 7 घंटे में तय करेगी.

अगर सचमुच ऐसा है तब तो यह जीरो बेस्ड सिस्टम बहुत अच्छा है. भारत में सरकार के हर विभाग में इसे लागू करना चाहिए. हर विभाग की गति इधर बहुत धीमी हो गई है. कोई फ़ाइल, सरकारी नियम के अनुसार 5 से 7 दिन में एक सेक्शन से दूसरे में खिसक जाना चाहिए, पर वह बिना वज़न के एक तो खिसकती ही नहीं और बहुत से कॉशन ऑर्डरों के साथ ले देकर 50 से 70 दिन में खिसक पाती है. जीरो बेस्ड सिस्टम से निश्चित ही इसमें कमी आएगी.

भारतीय संसद में भी जीरो बेस्ड सिस्टम लागू किया जाना फलदायी रहेगा. घंटेभर का शून्यकाल तो है ही वहां - हंगामा करने के लिए. शून्य आधारित संसद काल बन जाएगा तो सारे समय ही हंगामा होता रहेगा. संसद सदस्यों के फायदे ही फायदे रहेंगे. हंगामा करो और खबरों में बने रहो. दुनिया को दिखाओ, अपने संसदीय क्षेत्र में दिखाओ कि देखो हम कैसा इंटेंस काम करते हैं. और अब तो संसद से सीधा प्रसारण के दो-दो चैनल हैं - चौबीसों घंटे चलने वाले. वैसे भी संसद कौन सा चल पाता है. जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह दिखावा करती है कि संसद चलाना है. और जो पार्टी विपक्ष में होती है वह दिखावा करती है कि संसद नहीं चलाना है. और, जाहिर है संसद तो है कि चलने पर नहीं चले जब तक कि उसमें जीरो बेस्ड सिस्टम लागू नहीं हो.

भारत में जीरो बेस्ड सिस्टम का नया संविधान लागू कर दिया जाना चाहिए. सबकी जाति और सबका धर्म जीरो मानकर नया संविधान बनाया जाए. कोटा-आरक्षण का लफड़ा इस जीरो बेस्ड सिस्टम से तो खतम ही हो जाएगा. इस जीरो बेस्ड सिस्टम में या तो हंड्रेड परसेंट आरक्षण हो जाएगा, या आरक्षण जड़ से ही मिट जाएगा तब कौन हल्ला करेगा. परंतु इसे कोई लागू नहीं करेगा. इससे राजनीतिक पार्टियों के बेस जीरो हो जाने का खतरा जो है.

जीरो बेस्ड सिस्टम के नए नए प्रयोग किये जा सकते हैं. मसलन किसी विभाग में घूस और परसेंटेज की वर्तमान दर को जीरो बेस्ड मानकर आगे के वर्षों के लिए दर तय किए जा सकते हैं. भई, चहुँ ओर मंहगाई जो बढ़ रही है - ऐसे में यह जीरो बेस्ड तंत्र बहुत काम का होगा.

मुझे और अजीब खयालात आ रहे हैं. मैं अपनी इस चिट्ठा प्रविष्टि को जीरो बेस्ड मानकर यहीं से शुरूआत मानूं तो हो सकता है कि मेरे लेखन में और तेज़ी आएगी. दिन में दो-दो पोस्टें करने लगूं. परंतु फिर पाठकों के खोने का खतरा है. पाठक भी जीरो बेस्ड सोचने लगेंगे - क्या सुबह शाम रोज रोज लिखता है ! इतना कोई कैसे पढ़ेगा! इसको जीरो करो.

जीरो बेस्ड तंत्र के और अधिक अनुसंधान में मैं अभी भी लगा हुआ हूँ...

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जस्ट एनॉदर रीव्यू...

गाहे बगाहे, मैडपंच की याद दिलाती पत्रिका - जैम का मैं नियमित ग्राहक हूं. यह पत्रिका भारतीय डाक विभाग के भरोसे घर पर आती है चूंकि इसके मुरीद रतलाम में और नहीं हैं (यह यहाँ के न्यूज़ स्टैंड पर नहीं मिलती). परंतु सिर्फ आठ रुपल्ली (मैंने इसके बारे में पहले भी लिखा है) में मिलने वाली पत्रिका से पैसे कई गुना वसूल हो जाते हैं. और इसी वजह से बहुत बार डाक विभाग वाले मुझ पर अनुग्रह कर देते हैं - पैसा वसूलने ही नहीं देते.

इस बार (15-29 नवंबर 06) का अंक और ज्यादा पैसा वसूलने वाला लगा. पिछला दो अंक तो डाक विभाग में गायब ही हो गया था. पता नहीं क्यों इस बार डाक विभाग वालों ने इस अंक को छोड़ दिया. बहरहाल, उनका बहुत-बहुत धन्यवाद. इस अंक में रोमन हिन्दी में (अक्षय बकाया जी बहुत खुश होंगे) ग़ज़ल नुमा एक कविता छपी है, जो मुझे मेरे कॉलेज जीवन की याद दिला गई. आप भी याद कर सकते हैं-

इंजीनियरिंग शायरी

मैं स्टूडेंट नंबर 786

जब कॉलेज की सलाखों से बाहर देखता हूँ

दिन हफ़्ते महीनों को सेमेस्टर में बदलते देखता हूँ

इस कैंटीन से किसी सस्ते ढाबे की खुशबू आती है

ये बिल्डिंग मुझे सेंट्रल जेल की याद दिलाती है

ये प्रोफ़ेसर जो शक्ल से ही कैसे लगते हैं

और ये चार साल की डिग्री एक टॉर्चर है जिसे पढ़ाई कहते हैं

वो कहते हैं कि ये कॉलेज है

फिर कैसे मुझे ये जहन्नुम से बढ़कर लगता है

वो कहते हैं कि ये पढ़ाई है

फिर क्यूं मुझे ये टॉर्चर लगती है

मैं स्टूडेंट नंबर 786

- विनय टीएसईसी

(साभार, जैम पत्रिका)

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इसी पत्रिका में यू-ट्यूब के कुछ मनोरंजक वीडियो की कड़ियाँ भी दी गई हैं. एक खास आपके लिए - अपनी बीड़ी आप यहाँ जला सकते हैं अगर आप पीते हैं :)

http://www.youtube.com/watch?v=buf13ZiDAZY

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महा आनंद के साथ महा निर्वाण...

अगर आपको ओशो-नुमा, महा-आनंद के साथ-साथ महा-निर्वाण प्राप्त करना है तो आप आमंत्रित हैं रतलाम. यहाँ एक ऐसा ही स्थल है जहाँ आपके लिए यह सुविधा एक ही स्थल पर, एक साथ उपलब्ध है. मसीही कब्रस्तान के ठीक सामने महाकाल छोले टिकिया और महाकाल पानी पताशे!

सचमुच, नायाब जोड़ है कि नहीं?

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मंड्रिवा लिनक्स 2007 : बहुभाषी लिनक्स हेतु एक शानदार विकल्प.

मंड्रिवा लिनक्स 2007 में 65 से अधिक भाषाओं का समर्थन है. हिन्दी, गुजराती, पंजाबी, तमिल इत्यादि समेत कई अन्य भारतीय भाषाओं का भी इसमें समर्थन है. मंड्रिवा संस्थापक का हिन्दी अनुवाद धनञ्जय शर्मा का है. मंड्रिवा को अपने कम्प्यूटर पर हिन्दी में संस्थापित करने के लिए निम्न, आसान चरण अपनाएँ-

मंड्रिवा लिनक्स 2007 संस्थापना के सबसे पहले चरण में भाषा चयन संवाद में जाने के लिए (जैसा कि नीचे दिए गए चित्र में दिया गया है) F2 कुंजी को दबाएँ.

अगले स्क्रीन पर आपको मंड्रिवा 2007 में उपलब्ध समर्थित भाषाओं की सूची दिखाई देगी. उस भाषा को चुनें जिसे आप डिफ़ॉल्ट अंग्रेज़ी के अतिरिक्त संस्थापित करना चाहते हैं. यदि आप एक से अधिक भाषा संस्थापित करना चाहते हैं तो Multi Languages टैब पर क्लिक करें. फिर उसमें उपलब्घ जितनी भाषाओं को संस्थापित करना चाहते हैं, उसे चुनें.

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परंतु यह ध्यान रखें कि कुंजीपट भाषा खाका को अंग्रेज़ी में ही रखें, चूंकि टर्मिनल पर आपको हिन्दी में कमांड देने की सुविधा अभी नहीं है, और हो सकता है कि संस्थापना के दौरान कमांड देने की आवश्यकता पड़ जाए - जैसे कि उपयोक्ता नाम और पासवर्ड सेट करने या बूट पार्टीशन को पारिभाषित करने - इत्यादि.

मंड्रिवा का डिस्क पार्टीशन औजार बहुत ही अच्छा, इस्तेमाल में आसान और सरल सा है. यदि मंड्रिवा संस्थापक आपकी भाषा में उपलब्ध है जैसे कि हिन्दी तो यह डिस्क पार्टीशनर भी उस भाषा में उपलब्ध होता है.

मंड्रिवा 2007 के हिन्दी वातावरण में एक बग है - संस्थापना के चरणों में तो आपको हिन्दी बढ़िया दिखाई देती है, परंतु जब आप संस्थापना के पश्चात् हिन्दी वातावरण में बूट करते हैं तो गनोम में आपको हिन्दी खंडित दिखाई देती है और केडीई में हिन्दी की जगह डब्बे. जाहिर है, हिन्दी का फ़ॉन्ट सही प्रकार से संस्थापित होना रह जाता है. इसे सही करना आसान है. किसी एक यूनिकोड हिन्दी फ़ॉन्ट की प्रतिलिपि डिरेक्ट्री /usr/share/fonts/TTF में डालें और फिर chkfontpath कमांड चलाएँ. बस, हिन्दी फ़ॉन्ट सही संस्थापित हो जाता है और आपका मंड्रिवा बढ़िया, हिन्दी-मय कुछ यूं हो जाता है-.


आदमी आतंकित है बंदर से

दिल्ली में बंदर का आतंक इतना ज्यादा हो गया कि एक राष्ट्रीय दैनिक के संपादकीय पृष्ठों में इस आतंक को जगह मिल गई. लगता है कि संपादक का व्यक्तिगत आतंक का अनुभव रहा होगा. कोई बंदर उनके दफ़्तर में घुस आया होगा और बोला होगा कि अरे! संपादक, तुम्हारे बंधु-बांधवों ने हमारे रहने के ठौर ठिकाने - जंगलों को काट लिया है और उस पर यह दफ़्तर बना दिया है तो अब हम कहाँ रहने जाएँ. दफ़्तर खाली करो. और यह कह कर बत्तीसी निकाल कर चिढ़ाया होगा. ऐसे में आतंक का संपादकीय निकलना ही है. और इससे पहले कि बंदर मुझे आकर आतंकित करे, बंदर के आतंक को समर्पित है यह व्यंज़ल -

व्यंज़ल

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आदमी आतंकित है बंदर से

कितना कमजोर है अंदर से


वो गए जमाने की बातें थीं

अब सब मिलता है नंबर से


प्यार की परिभाषाएं बहुत हैं

सोच मिलता नहीं चंदर से


कुछ नहीं होगा यकीन करो

जिंदा है अब तक लंगर से


कम या ज्यादा का है फर्क?

पराजय तो हुआ है अंतर से


रवि मानता है कि व्यवस्था

अनुकूल हो जाता है जंतर से

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चंदर = धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों का देवता' का एक पात्र

जंतर = रिश्वत

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सप्ताह के कुछ कार्टून :-











इंडीब्लॉगीज़ चिट्ठा पुरस्कारों 2006 के लिए आपने अपनी कमर कस ली है कि नहीं...

दोस्तों, प्रतिष्ठित चिट्ठा पुरस्कार इंडीब्लॉगीज़ 2006 के लिए सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है. आप बहुत से मामलों में मदद कर सकते हैं, और इस पुरस्कार से सम्बद्ध हो सकते हैं, जैसे-

इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कार की प्रतिष्ठा इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि पिछले वर्ष माइक्रोसॉफ़्ट ने इंडिक-ब्लॉगर पुरस्कार बांटे. इनमें हिन्दी पुरस्कारों में ही बड़ी भ्रांतियाँ रहीं, और आमतौर पर यह माना गया कि पुरस्कार देने में कुछ अहम बातों का ध्यान नहीं रखा गया. पुरस्कार के साथ दिए जा रहे गुडीज़ भी माइक्रोसॉफ़्ट के आकार और इंडीब्लॉगीज़ के आकार के अनुरूप सम्मानजनक नहीं थे.

और, आपको विश्वास हो या न हो, इनाम मिलना तो दूर की बात, आज तक माइक्रोसॉफ़्ट की तरफ से किसी तरह की आधिकारिक सूचना इनके विजेताओं को नहीं मिली है. जबकि माइक्रोसॉफ़्ट के जाल स्थल पर विजेताओं की सूची टंगी हुई, मेरे जैसे विजेताओं (?) को मुँह चिढ़ा रही है! उनके फ़ोरम पर मैंने कुछ बात करने की कोशिश की दोएक दफ़ा, परंतु माइक्रोसॉफ़्ट-भाषा-इंडिया के फ़ोरम मॉडरेटर में दिल गुर्दा नहीं है कि वे हमारी बात को वहाँ रखें!

ऐसे में, भले ही इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों के पीछे किसी बड़ी संस्था का हाथ न हो, इस पुरस्कार की प्रक्रिया के पेशेवराना अंदाज इसकी प्रतिष्ठा को माइक्रोसॉफ़्ट-भाषा-इंडिया पुरस्कारों की तुलना में हजारों-लाखों गुना ज्यादा बढ़ाते हैं.

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तो, फिर, देर किस बात की? आइए, हो जाएँ इंडीब्लॉगीज़....

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हर चिट्ठाकार व्यावसायिक है...

चिट्ठाकारिता पर व्यावसायिकता की बातें होने लगे तो मेरे कान खड़े होना स्वाभाविक है. और इससे पहले कि देबाशीष की लिखी रीव्यू-मी की समीक्षा मैं पूरा पढ़ पाता, मैंने अपने आप को रीव्यू-मी की साइट पर पंजीकृत पाया.

रीव्यू-मी पर पंजीकरण का सारा सिलसिला अत्यंत आसान है. बस अपना नाम पता और अपने चिट्ठे का नाम भरें, वैध ई-मेल भरें और बस हो गया. हाँ, आपको यहां पंजीकृत होने के लिए, पहली और अंतिम आवश्यकता, अपने जीवन के कम से कम 14 वसंत देख चुके होने चाहिएँ.

पंजीकरण के बाद बारी आती है अपने ब्लॉग को रीव्यू-मी पर समीक्षा लिखने हेतु जमा करने व उसे स्वीकृत करवाने की. आपके ब्लॉग को स्वीकृत करने के लिए रीव्यू-मी की कुछ शर्तें हैं. मैंने अपना हिन्दी चिट्ठा जमा किया तो पता चला कि यह तो पहले ही स्वीकृत है! फिर अंग्रेज़ी चिट्ठे को जमा करना चाहा तो पता चला कि यह भी पहले से ही स्वीकृत है! मेरे दो-दो चिट्ठों को रीव्यू-मी के लिए समीक्षा लिखने लायक पहले से ही मान लेने के पीछे क्या राज है यह सही-सही तो नहीं पता, परंतु लगता है कि इसमें पहले से लगे गूगल एडसेंस का बड़ा योगदान है. जो हो, मुझे तो अपने चिट्ठे के रीव्यू-मी के लिए लिखने की स्वीकृति से मतलब था, न कि उसके तौर तरीकों से. बहरहाल, और जानकारियाँ बारंबार पूछे जाने वाले प्रश्नों में दी गई हैं, ऐसा कहा गया है, परंतु मेरी जिज्ञासा का समाधान नहीं हो पाया है.

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मेरी स्वीकृति के तत्काल बाद दन्न से एक समीक्षा लिखने के लिए प्रस्ताव आया. वह भी मानदेय युक्त! परंतु, अरे! यह क्या? इस तरह की, इस उत्पाद की समीक्षा नुमा नुक्ताचीनी तो देबू दा पहले ही कर चुके हैं. परंतु फिर पता चला कि रीव्यू-मी की समीक्षा कम से कम सवा-हजार चिट्ठाकारों से करवाया जाना है. मैंने तत्काल हामी भरी. मुझे 48 घंटों का समय मिला रीव्यू-मी की समीक्षा लिखने को. इतना समय किसने देखा है? यूं तो हर चिट्ठाकार अपने चिट्ठे के प्रति पेशेवराना दृष्टिकोण रखता है, परंतु मेरे जैसे, चिट्ठों में व्यावसायिकता की बातें करने वाले को गंभीर पेशेवराना रवैया अख्तियार करना ही चाहिए, लिहाजा सोमवारी चिट्ठाचर्चा भले ही बाद में हो, या न हो, यह समीक्षा जरूर होनी चाहिए, और पहले होना चाहिए. दोपहर का भोजन एक तरफ गोल कर यह समीक्षा लिखी जा रही है, अतः इस समीक्षा में दर्द, वज़न और बात आनी ही है. समीक्षा लिखने में वैसे भी कम से कम दो सौ शब्दों की सीमा है, अतः इधर-उधर की, मसलन मौसम के मिज़ाज और सब्जी में नमक के मात्रा की भी बातें तो करनी ही होंगी.

बहरहाल, जैसे तैसे मैंने रीव्यू-मी की यह समीक्षा लिख ही ली है. अब इसे अपने चिट्ठे पर प्रकाशित करना है. रीव्यू-मी की यही खासियत है. आपको अपनी समीक्षा पहले से स्वीकृत, आपके अपने चिट्ठे पर ही प्रकाशित करना है, और उसे वहां प्रकाशित रहने देना है. विचार नायाब है, नया है. परंतु क्या यह चल पाएगा?

मुझे तो नहीं लगता. कुछ माने हुए चिट्ठाकारों, मसलन अमित अग्रवाल जैसे सफल , अंग्रेजी के चिट्ठाकारों को भले ही दिन में दर्जनों समीक्षाएँ लिखने को मिल जाएँ, परंतु सर्वाधिक सफल हिन्दी चिट्ठाकारों, जिनके पाठक आज भी, दिन भर में सौ की संख्या में भी नहीं पहुँच पाते, उन्हें अपने उत्पाद की समीक्षा करने कौन देगा? रीव्यू-मी के जरिए कोई भी अपने उत्पाद की समीक्षा उसमें पंजीकृत चिट्ठाकारों से लिखवा सकता है. और जाहिर है, समीक्षा के लिए चिट्ठाकारों के चुनाव में अहम बात चिट्ठे के पाठक वर्ग और उसके दायरे की होगी.

और, इसी लिए जाने क्यों, मुझे तो यही लगता है कि रीव्यू-मी के लिए यह मेरी पहली व अंतिम समीक्षा है. पर, आगे किसने देखा है? बिल गेट्स ने कभी कहा था कि किस बेवकूफ़ को 640KB से ज्यादा मेमोरी की आवश्यकता होगी?

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ब्लॉगर की परम क्षमा?


ब्लॉगर की लोकप्रियता के कारण और इसके विशाल उपयोक्ता, डाटाबेस और स्पैमरों की मार के चलते यह हमेशा ही भार से दबा चलता है. इसी वजह से इसमें हमेशा कुछ न कुछ तकनीकी समस्याएँ होते रहती हैं जिससे औसतन, ब्लॉगर दिन में दो बार डाउन होता ही है.

पिछले दिनों भी बहुत समस्याएँ हुईं. ऐसे में सभी ब्लॉगर उपयोक्ताओं को ब्लॉगर स्टेटस की ताजा जानकारी रखना उचित होगा. अपने न्यूज रीडर पर ब्लॉगर स्टेटस फ़ीड का ग्राहक बनना ज्यादा उचित होगा. फ़ीड का यूआरएल यह है-

http://blogger-status.blogspot.com/atom.xml

ब्लॉगर भी शराफ़त दिखाता है. जब भी समस्या होती है, अपने उपयोक्ताओं से क्षमा मांगता है. जब ज्यादा समस्या होती है तो ज्यादा क्षमा मांगता है.

और जब परम (सुपर) समस्या होती है तो?

वह परम (सुपर) क्षमा मांगता है!


अद्यतन: ब्लॉगर की तरफ से ब्लॉगर बज़ में भी क्षमा प्रार्थना की गई है, और विस्तार से पिछले सप्ताह की लगातार हो रही समस्या के बारे में बताया गया है. यह भी बताया गया है कि ब्लॉगर के सर्विस इंजीनियर, विश्वास कीजिए, ब्लॉगरों से ज्यादा परेशान रहे!

हाँ, सुकून की खबर यह है कि अब ब्लॉगर बीटा इस्तेमाल के लिए पूरा तैयार है, और शीघ्र ही हमें वहाँ जाने का निमंत्रण मिल जाएगा (नए ब्लॉगर बीटा पिछले स्प्ताह की समस्या से मुक्त रहा था) :)

तो, अबकी अगर मेरे ब्लॉगर ब्लॉग को पढ़ने में आपको कुछ समस्या होगी , तो आपसे पहले से ही परम क्षमा मांगते हैं, ब्लॉगर की तरफ से भी और अपनी तरफ से भी!
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इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए - गौरवशाली 150 वां अंक

विज्ञान और सूचना तकनीक का ज्ञान बांटने वाली पत्रिका - ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए' भोपाल (मध्यप्रदेश) से पिछले 19 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही है. 7 नवंबर को इसके 150 वें अंक के लोकार्पण के अवसर पर मेरा भी एक प्रस्तुतिकरण था. विषय था - ‘हिन्दी कम्प्यूटिंग - भूत, वर्तमान और भविष्य'. रवीन्द्र भवन के खचाखच भरे हाल में जब हिन्दी की गाथा सुनाई गई, तो सुई-टपक सन्नाटा छाया रहा. लोग कम्प्यूटरों का इस्तेमाल करते तो हैं, परंतु कम्प्यूटरों में हिन्दी भी छा चुकी है, यह उन्हें पता ही नहीं है!

प्रस्तुतीकरण में विंडोज, लिनक्स तथा गूगल (खोज व मेल) के साथ साथ हिन्दी चिट्ठा जगत के कुछ स्क्रीनशॉट दिखाए गए तो सभागार प्रफुल्लित हो उठा. और देर तक तालियाँ बजती रहीं.

‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए' पत्रिका का प्रकाशन भोपाल की संस्था आईसेक्ट (आल इंडिया सोसाइटी फ़ॉर इलेक्ट्रॉनिक्स एण्ड कम्प्यूटर टेक्नॉलाज़ी) करती है. आईसेक्ट की परिकल्पना आज से बीस वर्ष पूर्व संतोष चौबे ने की थी. वे अभियांत्रिकी में स्नातक थे और आईएएस के जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा में थे. उन्होंने जब देखा कि सरकारी कार्यों में हाथ बंधे होते हैं तो उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी और कम्प्यूटर सिखाने की इस संस्था आईसेक्ट की नींव डाली. आज यह संस्था और इस संस्था के कम्प्यूटर शिक्षा के मॉडल इतनी प्रगति पर हैं कि भारत सरकार आईसेक्ट मॉडल की तर्ज पर गांवों में एक लाख कम्प्यूटर शिक्षा केंद्र खोल रही है. आईटी क्षेत्र में इनके योगदान के फलस्वरूप संतोष चौबे को वर्ष 2005 का भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदत्त इंडियन इनोवेशन पुरस्कार प्राप्त हो चुका है.

कार्यक्रम के दौरान ही डॉ. वि. वि. गर्दे जी से मुलाकात हुई. बीएचईएल भोपाल में पहले पहल कम्प्यूटरों को लाने का श्रेय उन्हें ही जाता है. सत्तर वर्ष से अधिक की उम्र हो चुकी है, और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से वर्तमान में वे पैरों से चलने से लाचार हैं, फिर भी कई नामी कंपनियों के सलाहकार मंडल में अभी भी हैं. आप 1964 से कम्प्यूटरों का प्रयोग करते आ रहे हैं और उस जमाने से बीएचईएल जैसी सरकारी संस्था में पूर्ण कम्प्यूटरीकरण का ख्वाब देखा करते थे.

गर्दे जी ने कम्प्यूटरों के इस्तेमाल के बारे में कुछ मनोरंजक बातें भी बताईं. वे केड-केम के लिए कुछ कम्प्यूटरों का आयात करना चाहते थे. तब रीफ़ॉर्म नहीं थे, और भारत सरकार से आयात की अनुमति लेना होती थी. जाहिर है, उन्हें आयात की अनुमति नहीं मिली. तब उन्होंने दूसरा रास्ता निकाला - उन्होंने सेवा का करार किया, और कम्प्यूटर किराए पर लाए. इसमें सरकार को कोई आपत्ति नहीं थी, भले ही किराया साल भर में खरीद कीमत से भी ज्यादा हो रहा था.

बहरहाल, काम जारी रहा, और कुछ साल भर बाद बीएचईएल के वित्त विभाग के अफ़सरों का फरमान आ गया कि आप जो कम्प्यूटरों पर खर्च कर रहे हैं उसके एवज में आपका परिणाम क्या रहा और कम्प्यूटरों के एवज में क्यों न कुछ कर्मचारी कम कर दिए जाएं? गर्दे जी ने परिणाम दिखाने के लिए एक साल की मोहलत मांगी. उस एक साल में उन्होंने चतुराई भरा पहला काम यह किया कि वित्त विभाग का सारा कार्य कम्प्यूटरों पर स्थानांतरित कर दिया. तब सारा कार्य कोबोल में होता था और प्रायः हर चीज की इन-हाउस प्रोग्रामिंग करनी पड़ती थी.

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साल भर के भीतर ही वित्त विभाग पूरी तरह से कम्प्यूटरों पर निर्भर हो गया. लंबे लंबे आंकड़ों की गणना कैल्कुलेटरों से करने में और रपट बनाने में वित्त विभाग को पसीना आता रहता था, जिसे कम्प्यूटरों के इस्तेमाल ने दूर कर दिया था. साल भर बाद जब वित्त विभाग से फिर पूछा गया कि परिणामों को गिनाएँ तो गर्दे जी ने उत्तर दिया कि परिणाम भौतिक रूप में तो गिनाए नहीं जा सकते हैं, इनका प्रभाव लंबे समय बाद देखा जा सकेगा, परंतु अगर वित्त विभाग समझता है कि यह निवेश अ-वित्तीय है तो हम कम्प्यूटरीकरण का काम खुशी खुशी बंद कर सकते हैं.

वित्त विभाग में हड़कंप मच गया. कम्प्यूटरों पर पूरी तरह निर्भर हो चुके वित्त विभाग ने अपनी स्वीकृति दे दी. फिर इसके बाद तो बीएचईएल भोपाल पूरे देश में केड-केम का अग्रणी केंद्र बन गया और करोड़ों रुपयों का लाभ भी होने लगा.

कम्प्यूटरों के इस्तेमाल से संबंधित एक और मनोरंजक बात उन्होंने बताई. जब बीएचईएल भोपाल में नए नए कम्प्यूटर आए तो उनको चलाना सिखाने के लिए अधिकारियों/अभियंताओं की टोलियाँ बनाई गई. गर्दे जी ने शीघ्र ही अनुभव किया कि वरिष्ठ अधिकारी इनमें कोई रूचि नहीं ले रहे हैं. मामले की तह पर जाने से पता चला कि कम्प्यूटरों के भय के चलते व परफ़ॉर्मेंस एंक्जाइटी के कारण वरिष्ठ अफ़सर अपने कनिष्ठ अफ़सरों के साथ कम्प्यूटर कक्षा में जाना ही नहीं चाहते थे. लिहाजा एक जैसे स्तर के अधिकारियों को ही एक बैच में लिया गया, और फिर मामला बढ़िया चला.

कार्यक्रम में पत्रिका ने अपने लेखकों का भी सम्मान किया. विज्ञान व तकनीकी लेखकों से अनौपचारिक चर्चा में पता चला कि - कुछ पाठ्य पुस्तकों में ‘ज्ञानी अनुवादकों' ने बढ़िया, नायाब अनुवाद कर दिए हैं. कुछ उदाहरणार्थ नमूने प्रस्तुत हैं-

Organic manure - लैंगिक खाद

Animal Husbandry - पशुपतित्व

Villium Hunter - विलियम शिकारी

इत्यादि.

बहरहाल, केडीई में (*निक्स का विंडो वातावरण) एक अनुप्रयोग है जिसका नाम है - KColorChooser. इसका अनुवाद क्या होगा? याद रखें यह एक ‘नाम' है. के-कलर-चूसर? , के-रंग-चयनक या कुछ और?

मरफ़ी के नए नियमों का जन्म...

पिछले सप्ताह एक कार्यशाला के सिलसिले में मैं प्रवास पर था. सोचा था कि समय चुराकर कुछ कार्यों तो इस बीच निपटा ही लिया जाएगा - मसलन साप्ताहिक, सोमवारी चिट्ठाचर्चा लेखन - चूंकि अब जालस्थल पर बहुत से औजार उपलब्ध हैं जिनसे ऐसे कम्प्यूटरों पर भी हिन्दी में काम किया जा सकता है जिनमें हिन्दी की सुविधा नहीं भी हो. परंतु कार्यक्रम बहुत ही कसा हुआ था, और अंतिम क्षणों में अनूप जी से निवेदन करना पडा.

कितना सही है मरफ़ी का यह नियम:

जब आप सोचते हैं कि कोई कार्य आप जैसे भी हो कर ही लेंगे, तो किसी न किसी बहाने, हर हाल में वह कार्य नहीं ही हो पाता है!

कार्यशाला के आयोजकों ने हमें इंटरनेशनल हॉस्टल पर ठहराया था, जहाँ सुविधाएँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर की थीं. इसका स्नानागार ही मेरे मकान के लिविंग रूम जितना बड़ा था, जिसका फर्श इटालियन मार्बल का था, और डिजाइनर शॉवर लगा हुआ था - यानी सब कुछ भव्य, क्लास था.

भले ही मैं अपने घर में पत्नी द्वारा स्नान के लिए स्नानागार में अकसर धकिया कर भेजा जाता हूँ, परंतु इस भव्य स्नानागार को देखते ही लगा कि अरे! मैं तो सदियों से नहीं नहाया हूँ, और रात्रि का समय होने के बावजूद स्नान के लिए मन मचल उठा.

विटामिन युक्त गार्निए शॅम्पू की खुशबू उस विशालकाय, भव्य स्नानागार में जरा ज्यादा ही आनंदित कर रही थी.

मरफ़ी का यह नियम भी सत्य है-

मुफ़्त के साबुन को ज्यादा मात्रा में और ज्यादा देर तक मलने में ज्यादा आनंद आता है, भले ही उसमें ज्यादा मैल निकालने की ज्यादा क्षमता न हो!

और, इससे पहले कि मैं अपने मुँह पर फैले साबुन के झाग को धो पाता, अचानक ही शॉवर में पानी आना बंद हो गया. शायद मैं स्नानागार में अधिक देर रह चुका था और शायद इंटरनेशनल हॉस्टल का सारा पानी इस्तेमाल कर चुका था. परंतु, अरे नहीं! मैंने तो बस, अभी शैम्पू लगाया ही था.

पानी कहीं नहीं आ रहा था. बेसिन में भी नहीं, और फ़्लश के टैंक में भी नहीं. थोड़ी देर पहले ही तो मैंने फ़्लश चलाया था.

जैसे तैसे मैंने अपने चेहरे का साबुन थोड़ा सा पोंछा और स्वागत कक्ष को फोन लगाया. मुझे बताया गया कि ऊपर टंकी में पानी चढ़ाने वाले पम्प में कुछ खराबी आ गई है, और लोग लगे हुए हैं उसे दुरूस्त करने में और कोई पाँचेक मिनट में पानी आ जाएगा.

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पाँच के बदले पच्चीस मिनट बीत गए. पानी नहीं आया. स्वागत कक्ष को फिर फोन किया. पता चला कि कुछ कह नहीं सकते कि पम्प कब ठीक होगा. चार आदमी ठीक करने में लगे हुए हैं. गोया कि एक खराब पम्प को ठीक करने में जितने ज्यादा आदमी लगेंगे वह उतनी ही जल्दी ठीक होगा! मगर मैं विद्युत पम्पों के बारे में पहले से जानता था और इसीलिए इस बात से मुझे खुशी नहीं मिली. ऐसे उत्तर तो मैं अपने उच्चाधिकारियों और जनता को अपनी नौकरी के दौरान दिया करता था - ट्रांसफ़ार्मर ठीक करने में दो-गुने, तीन गुने आदमी लगे हुए हैं - जल्दी से जल्दी बिजली सप्लाई चालू कर दी जाएगी. मुझे समस्या का अहसास हो गया. मैंने असहज होते हुए कहा कि भाई, मैं नहा रहा था और बीच में ही पानी चला गया. मेरे बदन पर तो पूरा साबुन लगा हुआ है. मैं ऐसे कब तक रहूँगा? रात बीत रही है.

स्वागत कक्ष को मेरी विकट स्थिति का भान हुआ होगा लिहाजा वहाँ से कोई दर्जन भर मिनरल वॉटर की बोतलें भिजवा दी गईं. जैसे तैसे मैंने अपने बदन से साबुन छुड़ाया. भव्य स्नानागार मुँह चिढ़ा रहा था. मरफ़ी के कुछ बढ़िया नियमों का जन्म हो चुका था -

- भव्य स्नानागार के बारे में जब आप सोचते हैं कि सब कुछ भव्य है तो पता चलता है कि उसके शॉवर में तो पानी ही नहीं है!

- साबुन लगाने के बाद ही पता चलता है कि शॉवर में पानी आना बंद हो गया है.

- स्नानागार में साबुन लगाने से पहले अपने लिए पानी की एक बाल्टी भर रखें - और भव्य स्नानागार में दो बाल्टी.

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अपने चिट्ठे पर पुस्तचिह्नक लगाएँ

देबाशीष से उनके इस पोस्ट पर पुस्तचिह्नकों की सुंदर सी लड़ी के बारे में पूछा तो पता चला कि यह कार्य वर्डप्रेस के एक प्लगइन के जरिए उन्होंने किया है. ब्लॉगर के लिए प्लगइन की आवश्यकता तो नहीं है, हाँ, अगर आप गूगल पर खोजें तो आपको पता चलेगा कि पुस्तचिह्नकों की लड़ियों के लिए ब्लॉगर टैम्प्लेट डालने हेतु बहुत से जाल स्थलों पर ढेरों तैयार स्क्रिप्ट तथा कोड उपलब्ध तो हैं ही, आपके मनपसंद पुस्तचिह्नकों की लड़ियों के लिए स्वचालित रूप से स्क्रिप्ट तैयार करने की बहुत सी साइटें भी हैं. अगर आप इस चिट्ठे पर तथा रचनाकार पर लगे पुस्तचिह्नकों का जैसा का तैसा इस्तेमाल करना चाहते हैं तो नीचे दिए गए कोड को नकल कर अपने ब्लॉगर टैम्प्लेट में चिपकाएँ.

अब सवाल है किस स्थान पर. पुस्तचिह्नकों का इस्तेमाल चिट्ठा प्रविष्टि या संपूर्ण चिट्ठा के लिए किया जा सकता है. यह कोड चिट्ठा प्रविष्टि के लिए है. अतः बेहतर होगा कि इसे चिट्ठा प्रविष्टि के अंत में जहाँ टिप्पणियां खत्म होती हैं, वहां इसे चिपकाएं (वैसे आप चिट्ठे के आरंभ में भी, शीर्षक के ठीक बाद इसे चिपका सकते हैं, या बाजू पट्टी में भी - चुनाव आपका है जो कि चिट्ठा टैम्प्लेट की साजसज्जा पर निर्भर करता है). चिट्ठा प्रविष्टि के अंत में चिपकाने हेतु टैम्प्लेट में </Blogger> टैग पर जाएँ. यह कुछ कुछ ऐसा दिखाई देगा:

<!-- End #comments -->

</Blogger>

अब नीचे दिए गए कोड को इन दोनों के बीच में, </Blogger> टैक के ठीक ऊपर, नकल कर वहां चिपका दें-

<p><a href="http://blogmarks.net/my/new.php?mini=1&title=<$BlogItemTitle$>&url=<$BlogItemPermalinkURL$>" title="इसे ब्लॉगमार्क पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/84282833.png" alt="blogmarks" height="16" width="16" /></a> <a href="http://del.icio.us/post?url=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>" title="इसे डेलिशियस पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/80727937.png" alt="delicious" height="16" width="16" /></a> <a href="http://digg.com/submit?phase=2&url=<$BlogItemPermalinkURL$>" title="इसे डिग पर पुस्तचिह्नित करें!"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/89072042.png" alt="digg" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.furl.net/storeIt.jsp?u=<$BlogItemPermalinkURL$>&t=<$BlogItemTitle$>" title="इसे फ़र्ल पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/47600014.png" alt="furl" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.google.com/bookmarks/mark?op=add&bkmk=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>" title="इसे गूगल पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/10847106.png" alt="google" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.netvouz.com/action/submitBookmark?url=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>&popup=no" title="इसे नेटवाअज़ पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/47445448.png" alt="netvouz" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.newsvine.com/_tools/seed&save?u=<$BlogItemPermalinkURL$>&h=<$BlogItemTitle$>" title="इसे न्यूज़वेइन पर पुस्तचिह्नित करें" ><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/27563199.png" alt="newsvine" height="16" width="16" /></a> <a href="http://reddit.com/submit?url=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>" title="इसे रेडिट पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/10796749.png" alt="reddit" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.spurl.net/spurl.php?url=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>" title="इसे स्पर्ल पर पुस्तचिह्नित करें!"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/67105361.png" alt="spurl" height="16" width="16" /></a> <a href="http://technorati.com/faves?add=<$BlogItemPermalinkURL$>" title="इसे टेक्नोराती पर पुस्तचिह्नित करें" ><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/81723336.png" alt="Technorati" height="16" width="16" /></a></p>

आपके टैम्प्लेट का नया हिस्सा कुछ ऐसे दिखेगा:

<!-- End #comments -->

<p><a href="http://blogmarks.net/my/new.php?mini=1&title=<$BlogItemTitle$>&url=<$BlogItemPermalinkURL$>" title="इसे ब्लॉगमार्क पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/84282833.png" alt="blogmarks" height="16" width="16" /></a> <a href="http://del.icio.us/post?url=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>" title="इसे डेलिशियस पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/80727937.png" alt="delicious" height="16" width="16" /></a> <a href="http://digg.com/submit?phase=2&url=<$BlogItemPermalinkURL$>" title="इसे डिग पर पुस्तचिह्नित करें!"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/89072042.png" alt="digg" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.furl.net/storeIt.jsp?u=<$BlogItemPermalinkURL$>&t=<$BlogItemTitle$>" title="इसे फ़र्ल पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/47600014.png" alt="furl" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.google.com/bookmarks/mark?op=add&bkmk=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>" title="इसे गूगल पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/10847106.png" alt="google" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.netvouz.com/action/submitBookmark?url=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>&popup=no" title="इसे नेटवाअज़ पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/47445448.png" alt="netvouz" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.newsvine.com/_tools/seed&save?u=<$BlogItemPermalinkURL$>&h=<$BlogItemTitle$>" title="इसे न्यूज़वेइन पर पुस्तचिह्नित करें" ><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/27563199.png" alt="newsvine" height="16" width="16" /></a> <a href="http://reddit.com/submit?url=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>" title="इसे रेडिट पर पुस्तचिह्नित करें"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/10796749.png" alt="reddit" height="16" width="16" /></a> <a href="http://www.spurl.net/spurl.php?url=<$BlogItemPermalinkURL$>&title=<$BlogItemTitle$>" title="इसे स्पर्ल पर पुस्तचिह्नित करें!"><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/67105361.png" alt="spurl" height="16" width="16" /></a> <a href="http://technorati.com/faves?add=<$BlogItemPermalinkURL$>" title="इसे टेक्नोराती पर पुस्तचिह्नित करें" ><img src="http://img2.imagepile.net/images/ycc2106/81723336.png" alt="Technorati" height="16" width="16" /></a></p>

</Blogger>

अब टैम्प्लेट को सहेजें, संपूर्ण चिट्ठे को फिर से प्रकाशित करें. बस आपका काम हो गया!

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वैसे, यदि आपको इस रेडीमेड कोड में मजा नहीं आया तो निम्न कड़ियों में जा देखें - पुस्तचिह्नकों के लिए आपको ढेरों औजार मिलेंगे.

3स्पॉट्स

प्रो-सीओ

ब्लॉगफ्रेश

ई-लैम्ब

बुकमार्क्ज

वर्डप्रेस के लिए तैयारशुदा पुस्तचिह्नक प्लगइन यहाँ से लें:

डबल्यूपी नोटेबल

और, अंत में, चेतावनी: वैसे तो ये कोड किसी भी ब्लॉग टैम्प्लेट में काम करेंगे, परंतु लेखक की ओर से कोई गारंटी नहीं. और, इस गंभीर चेतावनी पर जरूर ध्यान दें- टैम्प्लेट में किसी भी परिवर्तन से पहले उसका बैकअप बना लें. ब्लॉगर वैसे भी बहुत पंगा करता है- कल की ही बात लें, जगदीप डांगी का इंटरव्यू कोई दर्जन बार पुनः प्रकाशित करना पडा तब कहीं समस्या खत्म हुई!

आपके चिट्ठे को शुभ पुस्तचिह्नक कामनाएँ.

ग्रामीण परिवेश में कार्यरत हिन्दी भाषा के लिए समर्पित सॉफ़्टवेयर इंजीनियर जगदीप डांगी का एक खास साक्षात्कार

(जगदीप डांगी मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे गंजबासौदा में रहकर हिन्दी सॉफ़्टवेयर विकास में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं. अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें)

1) क्या आप पाठकों को अपने बारे में कुछ बता सकते हैं? ग्रामीण पृष्ठभूमि से होते हुए भी कम्प्यूटर के प्रति आपके अनुराग और उत्साह के पीछे कौन से कारण रहे?

मैं म.प्र. के विदिशा जिला के एक छोटे से शहर गंजबासौदा का निवासी हूँ। पांच भाइयों में मैं सबसे छोटा व अपने माता-पिता का सबसे लाड़ला बेटा हूँ। मैंने सन् 2001 में एस.ए.टी.आई. विदिशा से बी.ई. स्नातक सी.एस.ई. शाखा के तहत उत्तीर्ण की। मेरी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा हिंदी माध्यम से हुई। हायर सैकेण्डरी शिक्षा गणित-विज्ञान विषयों के साथ की और प्रथम श्रेणी में 84 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की और जिला प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान व म.प्र. प्रावीण्य सूची में तीसवाँ स्थान प्राप्त किया। इसके उपरान्त घर पर ही पी.ई.टी. परीक्षा की तैयारी की और इसे उत्तीर्ण किया जिससे मेरा बी.ई., सी.एस.ई. शाखा के तहत एस.ए.टी.आई. विदिशा में चयन हो गया।

ग्रामीण व साधारण पृष्ठभूमि से होने के कारण कम्प्यूटर लाइन में मेरा एकाएक प्रवेश मेरे लिये सहज नहीं था, क्योंकि मेरे पिताजी एक साधारण किसान हैं जो कि गंजबासौदा के समीप एक बहुत ही छोटे से गाँव ग्राम भुँआरा में कृषि कार्य करते हैं, अत: मैं एक ग्रामीण परिवेश से होकर किसान परिवार से हूँ। गाँव में स्कूल न होने की वजह से पिताजी ने मुझे और भाईयों को पढ़ाने के लिये गंजबासौदा में ठहरा दिया। क्योंकि जब मैं लगभग सात वर्ष की उम्र का था तब मुझे पोलिओ हो गया और इसी के इलाज के दौरान एक इंजेक्शन का रिएक्शन हो गया और एक पैर के साथ-साथ एक आंख भी खराब हो गई। इस पूरे घटना क्रम के बाद लम्बे इलाज के दौरान मेरा जीवित बचना मेरे माता-पिता के लिए बहुत ही सुखद रहा। माता-पिता और भाईयों के समर्थन और हिम्मत ने अच्छी शिक्षा के लिये प्रेरित किया और ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद से और अपने कठोर परिश्रम से अच्छी शिक्षा प्राप्त की और अंतत: बी.ई., सी.एस.ई. स्नातक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। कम्प्यूटर लाइन एक टेबिल वर्क थी न कि फील्ड वर्क जो कि मुझे उपयुक्त थी और इसी उपयुक्तता के लिहाज से मेरे परिवार वालों ने मुझे इस लाइन में प्रवेश दिलाया था।

बी.ई. करने के बाद मैं अपने स्वयं के प्रोजेक्ट 'भाषा-सेतु' पर कार्य करने में जुट गया और लगभग चार वर्षों के अथक परिश्रम से इसे पूर्ण करने में काफी हद तक सफलता भी प्राप्त की। 'भाषा-सेतु' प्रोजेक्ट एक बहुभाषी प्रोजेक्ट है इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य विभिन्न भाषाओं को कम्प्यूटर पर एक दूसरे से जोड़ना है, यह प्रोजेक्ट हमारे देश में सॉफ़्टवेयर के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान देने के साथ साथ हमारे देश का काफी रुपया भी बचा सकता है जो कि हमारी सरकार दूसरे देशों से सॉफ़्टवेयर/तकनीकी खरीदने में खर्च करती है। यह प्रोजेक्ट ग्रामीण भारत में कम्प्यूटर व इंटरनेट के इस्तेमाल व सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कार्य साबित हो सकता है जहाँ पर लोग कम्प्यूटर का उपयोग अपनी स्वयं की ही भाषा में सहजता से करना चाहते हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत निम्नलिखित हिंदी सॉफ़्टवेयर हैं:-
1- हिंदी एक्सप्लोरर :: आई-ब्राउज़र++
2- अंग्रेज़ी से हिंदी व हिंदी से अंग्रेज़ी :: शब्दकोश
3- ग्लोबल वर्ड ट्राँसलेटर ( अंग्रेज़ी से हिंदी ) :: अनुवादक

2) वह कौन सी प्रेरणा थी जिसने आपको अंग्रेज़ी के जाल पृष्ठों को हिन्दी में अनुवाद के लिए सॉफ़्टवेयर औजार बनाने हेतु संबल प्रदान किया?

आज के दौर में इंटरनेट पर सभी तरह की महत्वपूर्ण जानकारियाँ व सूचनाएँ उपलब्ध हैं जैसे परीक्षाओं के परिणाम, समाचार, ई-मेल, विभिन्न प्रकार की पत्र-पत्रिकाएँ, साहित्य, अति महत्वपूर्ण जानकारी युक्त डिजिटल पुस्तकालय आदि। परन्तु ये प्राय: सभी अंग्रेज़ी भाषा में हैं। भारतीय परिवेश में अधिकतर लोग अंग्रेज़ी भाषा में निपुण नहीं हैं। अत: कई हिंदी भाषी लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करने में भाषाई कठिनाई महसूस करते हैं और कम्प्यूटर के उपलब्ध होते हुए भी वह कम्प्यूटर व इंटरनेट का उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं। यदि इंटरनेट एक्सप्लोरर का संपूर्ण इंटरफेस हिंदी (देवनागरी लिपि) में होने के साथ-साथ इसमें वेबपृष्ठ के अंग्रेज़ी पाठ को माउस क्लिक के माध्यम से हिंदी में अनुवाद करने की सुविधा सहित हो तो अंग्रेज़ी भाषा की बाधा हिंदी भाषी कम्प्यूटर उपयोक्ताओं के काम में बाधा नहीं रहेगी! इसी सोच ने मुझे इस दिशा में काम करने की प्रेरणा दी। वेबपृष्ठ पर अनुवाद सुविधा कम्प्यूटर उपयोक्ताओं के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध सूचना को उनकी अपनी ही भाषा में समझने में सहायक होगी। अनुवाद सुविधा युक्त हिंदी एक्सप्लोरर न केवल अंग्रेज़ी भाषा की समस्या का हल है बल्कि सरकार द्वारा चलाए जा रहे तमाम ग्रामीण आई.टी. शिक्षा कार्यक्रम की सफलता की गारन्टी भी बन सकता है।

3) किसान पुत्र से लेकर इंडिक कम्प्यूटिंग के लिए समर्पित सॉफ़्टवेयर इंजीनियर बनने का रास्ता निश्चित रूप से आसान तो नहीं रहा होगा. अपनी अंतःप्रेरणाओं तथा कम्प्यूटर तकनॉलाज़ी पर अपनी रूचि के बारे में कुछ बताएँ.


चूँकि मैंने 12वीं कक्षा तक हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ाई की थी और जब कम्प्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एस.ए.टी.आई. में दाखिला लिया तब मुझे अंग्रेज़ी भाषा की बाधा सामने आई। तब मुझे एहसास हुआ के एकाएक भाषाई माध्यम तबदील होता है तो तमाम तरह की कठिनाईयाँ सामने आती हैं। मैं अंग्रेज़ी भाषा में खास तौर से इसके वार्तालाप में निपुण नहीं था, इसलिये मुझे व्याख्याताओं के अंग्रेज़ी व्याख्यानों को समझने में काफी कठिनाई आती थी। पर हाँ मेरा गणित विषयक ज्ञान और तर्क क्षमता काफी अच्छी थी और उसी के बल पर मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर सका। इसी तरह की भाषाई कठिनाइयाँ मुझे कम्प्यूटर पर खास तौर से इंटरनेट पर कार्य करते समय भी आती। मुझ जैसे करोड़ो हिंदी भाषी कम्प्यूटर उपयोक्ताओं को कम्प्यूटर के उपयोग में कई समस्याएँ सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा में अपनी कमजोरी होने की वजह से आती हैं न कि इसकी तकनीकी की वजह से। अपने कैरियर में अंग्रेज़ी की तमाम परेशानियाँ झेलने व महसूस करने के बाद मैं कम्प्यूटर पर भाषाओं के बीच एक पुल बनाने के लिये प्रेरित हुआ और इस काम को अंजाम देने में जुट गया और 'भाषा-सेतु' प्रोजेक्ट के तहत एक हिंदी सॉफ़्टवेयर पैकेज तैयार किया। इसके लिए तमाम पुस्तकें और विभिन्न आई.टी. पत्रिकाएँ पढ़ीं तथा प्रोग्रामिंग लैंग्वेज आदि पर अपनी पकड़ को मजबूत किया और अपने आइडियास को कोड्स में तबदील करने के लिए पीसी पर दिन-रात जुटा रहा, की-बोर्ड की कुंजिंयों में दिन का उजाला तथा रात का अंधेरा भूल जाने के बाद इस कार्य को लगभग पूरा करने में सफलता प्राप्त की।

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4) हिन्दी में इंटरनेट ब्राउज़र बनाने का विचार कैसे उभरा? इस कार्य में आपको किस तरह की, कैसी कठिनाइयाँ हुईं?

मैं आई.टी. पत्रिकाओं का नियमित पाठक था और प्रत्येक माह एक या दो पत्रिकाएँ खरीदता था, इन पत्रिकाओं के साथ प्राय: सीडी आती थी जिसमें कई महत्वपूर्ण जानकारी युक्त आर्टिकल्स और कई तरह के सूचनाप्रद मैटर होते थे, ये आर्टिकल्स मात्र अंग्रेज़ी भाषा में ही होते थे और यह प्राय: एचटीएमएल फार्मेट में होने के कारण इंटरनेट एक्सप्लोरर में ही चलते थे जब भी मैं इन आर्टिकल्स को कम्प्यूटर स्क्रीन पर पढ़ता तो अंग्रेज़ी भाषा को समझने के लिये एक डिक्शनरी-पुस्तिका की सहायता लेनी पड़ती थी। और जब भी किसी अंग्रेज़ी शब्द का अर्थ नहीं आता तो उसे डिक्शनरी में से बार-बार देखना पड़ता था इससे काफी समय अर्थ ढूँढने में खर्च हो जाता था और तभी मेरे दिमाग में एक आइडिया आया कि यदि इंटरनेट एक्सप्लोरर हिंदी इंटरफेस में हो तथा इसमें वेबपृष्ठ पर हिंदी में अनुवाद की सुविधा भी हो तो यह अंग्रेज़ी भाषा की समस्या का समाधान हो जायेगा। तब मैंने मनन किया यदि इस कार्य को मैं कर पाता हूँ तो यह मेरी स्वयं की समस्या हल होने के साथ-साथ करोड़ों हिंदी भाषी लोगों की समस्या का निदान हो जायेगा और यह कार्य कम्प्यूटर उपयोग के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी साबित होगा। यही सोचकर मैंने हिंदी एक्सप्लोरर आई-ब्राउज़र++ को विकसित किया। इसके निर्माण में मुझे कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, तमाम तरह की कठिनाइयों के बावजूद ही ईश्वर की कृपा से और अपने कठिन परिश्रम से इस हिंदी एक्सप्लोरर को बनाने में सफल रहा।
हिंदी एक्सप्लोरर आई-ब्राउज़र++ :: (आईब्राउज़र के बारे में विस्तृत जानकारी यहाँ पढ़ें) यह विंडोज आपरेटिंग सिस्टम पर आधारित सॉफ़्टवेयर प्रोग्राम है, जो कि विंडोज एक्सप्लोरर एवं इंटरनेट एक्सप्लोरर का संयुक्त रूप है। ''हिंदी एक्सप्लोरर'' की विशेषता यह है कि इसका संपूर्ण इंटरफेस हिंदी भाषा में होकर देवनागरी लिपि में है। इसकी सहायता से कोई भी साक्षर हिंदी भाषी व्यक्ति इसका उपयोग बखूबी अपनी भाषा में बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के कम्प्यूटर पर विशेष तौर से इंटरनेट पर कार्य कर सकता है।''हिंदी एक्सप्लोरर'' में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सुविधा है और वह है शब्द रूपांतरण (अनुवाद) की, इस बावत् इसमें तीन तरह के ट्रांसलेटर दिए गए हैं: लोकल वर्ड ट्रांसलेटर: यह एक ऐसा प्रोग्राम है जिसकी मदद से वेब-पेज पर उपस्थित अंग्रेज़ी शब्द पर माउस द्वारा क्लिक करने पर उस शब्द का न केवल हिंदी में अर्थ एवं उच्चारण बतला देता है, बल्कि उच्चारण सहित लगभग सभी समानार्थी शब्द भी देवनागरी लिपि में माउस पॉइन्टर के समीप दर्शा देता है। ग्लोबल वर्ड ट्रांसलेटर: यह एक ऐसा प्रोग्राम है जो कि ''हिंदी एक्सप्लोरर'' के अलावा विंडोज के किसी भी सॉफ़्टवेयर के अंदर कार्य करने में सक्षम है, तथा संबंधित अंग्रेज़ी शब्द पर माउस द्वारा क्लिक करते ही हिंदी अनुवाद कर देता है। वेब पृष्ठ पर स्थाई शब्दानुवाद: यह बहुत ही महत्वपूर्ण शब्दानुवाद सुविधा है इस का उपयोग यूजर वेब पृष्ठ पर उपस्थित अंग्रेज़ी के जटिल शब्दों का अनुवाद कर उस पृष्ठ का प्रिन्ट आउट ले सकता है। इस फलन के तहत और भी कई नवीन सुविधाएँ हैं। जो कि एक यूजर के लिए बहुत ही उपयोगी रहेंगी। इसके अलावा ''हिंदी एक्सप्लोरर'' में और भी अन्य खूबियाँ हैं, जैसे कि एक साथ कई फाइल खोलने की (उसी विंडो एवं अन्य विंडो में), एक साथ कई फाइल को सुरक्षित करने की, एक साथ कई फाइल सर्च कर स्वत: एक के बाद एक फाइल खोलने की, ऑटो हिस्ट्री व्यूअर, पॉप-अप ब्लोकिंग, एडिट मोड ऑन ऑफ, 'इंगलिश टू हिंदी' डिजिटल डिक्शनरी, वेब पृष्ठ पर उपस्थित शब्दों को हाइलाइट करने की, हिन्दी यूनिकोड आधारित पाठ लिखने उसे इंटरनेट से सर्च करने हिन्दी ई-मेल लिखने व भेजने आदि की सुविधाएँ प्रमुख हैं। इस सॉफ़्टवेयर में उपयोक्ता को हिंदी शब्द रूपांतरण की सुविधा तो मिलती ही है, लगभग 38,500 शब्दों का शब्दकोश भी इसमें अंतर्निर्मित है, जिसकी सहायता से उपयोक्ता को अंग्रेज़ी भाषा के जालपृष्ठों (वेब-पेजेस्) को हिंदी में समझने में सहायता मिलती है। यही नहीं इसका शब्दकोश परिवर्तनीय, परिवर्धनीय भी है जिसे उपयोक्ता अपने अतिरिक्त शब्दों को सम्मिलित कर और भी समृध्द बना सकता है। इस बाबत यदि उपयोक्ता को हिंदी टाइप करने में दिक्कत आती है तो इसमें ऑन स्क्रीन हिंदी कुंजीपटल की सुविधा भी दी गई है जिसे माउस द्वारा चलाया जा सकता है।

5) 36000 शब्दों युक्त अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश! क्या यह परियोजना भी हिन्दी ब्राउज़र के साथ ही शुरू हुई थी? या आपको इसकी महत्ता बाद में समझ में आई?

'शब्दकोश' सॉफ़्टवेयर का निर्माण हिंदी एक्सप्लोरर सॉफ़्टवेयर के निर्माण के दौरान ही किया। हिंदी एक्सप्लोरर के अंतर्गत 'इंगलिश टू हिंदी' डिक्शनरी है जो कि सिर्फ अंग्रेज़ी के शब्द के विभिन्न अर्थ हिंदी में उच्चारण सहित बतलाने में सक्षम थी। परन्तु वह हिंदी के शब्द का अंग्रेज़ी अनुवाद करने में सक्षम नहीं थी। तभी मन में एक विचार आया की क्यों न दोनो अवस्थाओं अर्थात् 'हिंदी से अंग्रेज़ी, अंग्रेज़ी से हिंदी' में कार्य करने वाला एक डिक्शनरी सॉफ़्टवेयर बनाया जाये, और इस तरह से विचार आते ही इसको बनाने में जुट गया और 'शब्दकोश' सॉफ़्टवेयर का निर्माण किया।
'शब्दकोश' :: यह विंडोज आपरेटिंग सिस्टम पर आधारित सॉफ़्टवेयर प्रोग्राम है। इसकी विशेषता यह है कि ये दोनों अवस्थाओं (हिंदी से अंग्रेज़ी, अंग्रेज़ी से हिंदी) में कार्य करने में सक्षम है तथा खोजे जा रहे अंग्रेज़ी या हिंदी शब्द के अर्थ के अलावा अन्य समानार्थी शब्द भी उच्चारण सहित तुरन्त दिखाता है व एक समान्तर कोश यानी 'थिसारस' की तरह भी उपयोगी है। इसमें शब्दों के अर्थ के साथ-साथ मुहावरे व वाक्य-खण्डों का भी संग्रह है। इस सॉफ़्टवेयर से उपयोक्ता अपने किसी भी शब्द के कई पर्यायवाची शब्दों को खोज सकता है इस बाबत इस में कई प्रकार से शब्दों को फिल्टर करने के लिये विशेष फलन दिये गये हैं। इन फलनों की सहायता से उपसर्ग या प्रत्यय के आधार पर भी शब्दों को अपने अनुसार खोज निकालने की सुविधा है। यह सॉफ़्टवेयर हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी भाषा को सीखने में बहुत ही उपयोगी है। इस सॉफ़्टवेयर में एक द्वि-भाषी ऑन स्क्रीन कुंजीपटल की विशेष सुविधा भी दी गई है, जिसे माउस द्वारा कमांड किया जा सकता है। वर्तमान में लगभग 38,500 शब्दों का शब्दकोश इसमें अंतर्निर्मित है और इसका शब्दकोश परिवर्तनीय, परिवर्धनीय भी है जिसे उपयोक्ता अपने अतिरिक्त शब्दों को सम्मिलित कर और भी समृद्ध बना सकता है।


6) आपके विचार में आज के दौर में क्षेत्रीय भाषाई कम्प्यूटिंग तथा अनुवादों का क्या कोई भविष्य है?

भारतीय ग्रामीण परिवेश में कम्प्यूटर पर कार्य अंग्रेज़ी भाषा में होने की वजह से कई हिंदी भाषी लोग इसके उपयोग से वंचित रह जाते हैं। हमारे देश में हजारों लाखों नागरिक हैं जो सफल व्यापारी, दुकानदार, किसान, कारीगर, शिक्षक आदि हैं। यह सब अपने-अपने क्षेत्र में कुशल एवं विद्वान हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि यह सब अंग्रेज़ी भाषा के जानकार हों। ग्रामीण परिवेश में रहने वाले कृषक जो कि इस देश की उन्नति का आधार हैं, यदि इन्हें और अच्छी तकनीकी की जनकारी अपनी भाषा में ही मिले तो सोने पे सुहागा होगा। कई लोग कम्प्यूटर का उपयोग अपनी स्वयं की भाषा जैसे हिंदी, उर्दू, बंगाली, तेलुगु, तमिल आदि में कर सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में करना चाहते हैं। इस स्थिति में कम्प्यूटर का क्षेत्रीय भाषाओं के सॉफ़्टवेयर के विकास के साथ-साथ अंग्रेज़ी भाषा का क्षेत्रीय भाषा मैं अनुवाद परम आवश्यक है। आजकल हमारे देश के कई लोग कम्प्यूटर की शिक्षा व इंटरनेट के उपयोग की ओर अग्रसर हैं क्योंकि यह उनके लिए कई महत्वपूर्ण जानकारियों का अथाह सागर है। पर यह सब अधिकांशतः अंग्रेज़ी भाषा न आने के कारण कई लोग इसको अपने व्यवहार में लाने से हिचकिचाते हैं। और इस तरह की भाषाई समस्या के समाधान के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर का विकास व अनुवाद होना बहुत ही जरूरी है। जब तक हमारे देश में क्षेत्रीय भाषाओं में कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर का विकास नहीं होगा तब तक इस भाषाई समस्या की बाधा सूचना प्रौद्योगिकी के विकास में रोड़ा बनी रहेगी।

7) अपने ग्लोबल वर्ड ट्रांसलेटर औजार - ‘अनुवादक' के बारे में हमें कुछ और बताइए. अन्य उपलब्ध अनुवादक औजारों की तुलना में इसकी क्या खास विशेषताएँ हैं?


अनुवादक या 'ग्लोबल वर्ड ट्राँसलेटर' एक बहुत ही प्रबल अनुवादक औजार है। उपयोक्ता इसका उपयोग ऑनलाइन व ऑफ़लाइन दोनों ही अवस्था में कर सकता है इसके संचालन के लिये इंटरनेट कनेक्शन की कतई जरूरत नहीं है। यह एक ऐसा सॉफ़्टवेयर है जो कि विंडोज के किसी भी सॉफ़्टवेयर के अंदर कार्य करने में सक्षम है, तथा संबंधित अंग्रेज़ी शब्द पर माउस द्वारा क्लिक करते ही उसका हिंदी अनुवाद विभिन्न समानार्थी शब्दों के साथ-साथ उच्चारण सहित कर देता है। इस सॉफ़्टवेयर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है की यह विंडोज के किसी एक विशेष अनुप्रयोग पर निर्भर नहीं है बल्कि इसको विंडोज के किसी भी एप्लीकेशन सॉफ़्टवेयर जैसे कि एमएस वर्ड, वर्डपैड, नोटपैड, एमएसआइई, फायरफोक्स ब्राउज़र आदि के अन्दर संयोजन कर अनुवाद की सुविधा का उपयोग किया जा सकता है। विंडोज के अंतर्गत इसका किसी भी सॉफ़्टवेयर के अन्दर कार्य कर सकने की क्षमता के कारण ही इसका नाम 'ग्लोबल' वर्ड ट्राँसलेटर रखा। यह विंडोज की मेमोरी में एक घोस्ट एप्लीकेशन की तरह संचालित रहता है और जैसे कि उपयोक्ता को किसी भी अंग्रेज़ी शब्द के अनुवाद की जरूरत होने पर उस शब्द पर माउस क्लिक करते ही माउस पांटर के समीप एवं विंडोज के टाइटल बार के समीप उपस्थित पट्टी पर उच्चारण सहित अनुवाद पलक झपकते ही प्राप्त कर सकता है। वर्तमान में लगभग 38,500 शब्दों का शब्दकोश इसमें अंतर्निर्मित है और इसका शब्दकोश परिवर्तनीय, परिवर्धनीय भी है जिसे उपयोक्ता अपने अतिरिक्त शब्दों को सम्मिलित कर और भी समृद्ध बना सकता है।

8) इस अच्छे खासे, 4 वर्षीय लंबी परियोजना के लिए आपने किसी से किसी तरह की कोई मदद ली? इस परियोजना को पूरा करने में आपको कैसी मुश्किलें आईं?

इस प्रोजेक्ट के तहत उपरोक्त हिंदी सॉफ़्टवेयर के निर्माण कार्य के दौरान मैंने किसी से भी मदद नहीं ली क्योंकि इस छोटे से कस्बे गंजबासौदा में इस सॉफ़्टवेयर क्षेत्र से संबंधित मेरा कोई भी परिचित व्यक्ति यहाँ नहीं था। किताबें ही मेरी परम मित्र थीं और ईश्वर ही सही मायनों में मेरे गुरु थे। मैं कम्प्यूटर पर भाषाओं को एक दूसरे से जोड़ कर भाषाई पुल बनाना चाहता था इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए मैंने तमाम तरह की पुस्तकों व पत्रिकाओं व इंटरनेट पर कार्य करने संबंधित प्रोग्रामिंग भाषाओं का गहराई से अध्ययन कर अपने आइडियास को उपयुक्त कोड्स में बदला। इस प्रोजेक्ट के निर्माण में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जैसे कि पुस्तकालयों की कमी का खलना, कार्य करने के दौरान कई बार घंटों तक बिजली का गुल रहना, और टेलीफोन व्यवस्था की स्थिति सही न होने की वजह से इंटरनेट का एक्सेस बहुत ही धीमी गति से होना आदि प्रमुख थीं। ये सभी समस्याएँ मात्र इस शहर के ग्रामीण अंचल में होने की वजह से थीं। कार्य के दौरान जब कभी भी कोई पुस्तक, सीडी या फ्लॉपी आदि की जरूरत पड़ती तो अपने बड़े भाई साहब के साथ भोपाल जाना पड़ता क्योंकि अपनी शारीरिक समस्या के कारण मैं अकेला सफर करने में असमर्थ था। मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों भाईयों और मित्रों की सहायता का सदैव आभारी रहूँगा जिन्होंने मुझे इस कार्य को करने में हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते हुए हौसले बढ़ाते रहे।

9) किसी एक भाषाई सॉफ़्टवेयर के आधार पर क्या हम अन्य इंडिक भाषाओं में ऐसे सॉफ़्टवेयरों की कल्पना कर सकते हैं?

जी हाँ, विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं का कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर के माध्यम से एक दूसरे में बेहतरीन तालमेल बिठाया जा सकता है। 'भाषा-सेतु' प्रोजेक्ट विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं को एक दूसरे से जोड़ने में नये आयाम प्रदान करेगा। मेरे इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य ही विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं को एक ही प्लेटफार्म पर लाकर एक दूसरे से जोड़ना है। और ग्रामीण भारत में कम्प्यूटर का उपयोग व सूचना प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा देना है।

10) आपने अपने सपने का कितना हिस्सा आज तक पा लिया है और आपके लिए मंजिल कितनी दूर है?

'भाषा-सेतु' प्रोजेक्ट के तहत हिंदी सॉफ़्टवेयर का निर्माण कार्य लगभग पूरा किया जा चुका है। अब मैं इन हिंदी सॉफ़्टवेयर को लॉन्च करने हेतु एक उचित प्लेटफार्म की तलाश में हूँ। जहाँ से यह हमारे देश के प्रत्येक हिंदी प्रेमी कम्प्यूटर उपयोक्ता तक पहुँच सके। इसी सिलसिले में पिछले साल अपने हिंदी सॉफ़्टवेयर का प्रदर्शन भारत सरकार के सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय नई दिल्ली में किया था। वहाँ पर मौजूद विभिन्न वैज्ञानिकों व इंजीनियरों ने मेरे कार्य की प्रशंसा करते हुए इन सॉफ़्टवेयर के परीक्षण संस्करणों को टीडीआइएल वेबसाइट पर जारी किये। इससे मुझे देश व विदेश से कई लोगों से अच्छी प्रतिक्रियाएँ व सुझाव मिले और आगे अपने कार्य को जारी रखते हुए और आगे बढ़ाया। और अब यह लॉन्च होने के इंतजार में है। आज हमारा देश दुनिया की सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र व सॉफ़्टवेयर के विकास में अग्रणी भूमिका में है। मेरी अपनी पूरी कोशिश यही है कि यह हिंदी सॉफ़्टवेयर जल्द से जल्द हमारे देश के ग्रामीण लोगों तक पहुँच कर उन्हें इस सूचना प्रौद्योगिकी के क्रांतिकारी दौर में इसका लाभ पहुँचा सके। वर्तमान में 'भाषा-सेतु' प्रोजेक्ट के तहत फिलहाल संपूर्ण पृष्ठ अनुवाद हेतु प्रोग्राम को बनाने में लगा हुआ हूँ। और इस कार्य में कुछ हद तक सफल भी हुआ हूँ। बस अंग्रेज़ी व्याकरण दृष्टि से जटिल वाक्यों का अनुवाद करने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। पर उम्मीद है इसे आने वाले समय में पूरा करने में सफल रहूँगा। आगे मैं अपने उक्त हिंदी सॉफ़्टवेयर को अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित करने की योजना में हूँ। पर इसके लिए मुझे उक्त क्षेत्रीय भाषाओं के जानकार व्यक्तियों की आवश्यकता है, अगर इस सिलसिले में कोई भी व्यक्ति मेरी सहायता करना चाहें तो मैं उनका आभारी रहूँगा।
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धन्यवाद

संपर्कः
जगदीप डांगी
वार्ड नं. 2,
को-ऑपरेटिव बैंक के पीछे,
स्टेशन क्षेत्र, गंज बसौदा,
जिला विदिशा (मध्यप्रदेश) भारत.
पिन- 464221
दूरभाष: घर. (07594) 222457 मोबाइल. 09826343498
ई-मेल: dangijs@yahoo.com,gjagdeep@sancharnet.in


(माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया में प्रकाशित मूल अंग्रेज़ी साक्षात्कार का हिन्दी रूपांतर. हिन्दी रूपांतर - सौजन्य जगदीप डांगी)

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