इज दिस संडे इंडियन सर्वोच्च?

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डेयर टू थिंक बियांड? मेक ‘द संडे इंडियन' सर्वोच्च!

‘डेयर टू थिंक बियांड' प्रश्न पूछने वाले आईआईपीएम - अरिंदम चौधरी (की कंपनी) ने हाल ही में एक नई पत्रिका - ‘द संडे इंडियन' - हिन्दी समेत पाँच भारतीय भाषाओं में प्रकाशित करना शुरू किया है. हिन्दी पत्रिका मात्र दस रुपयों की है, और यह पुराने जमाने की चित्रमय पत्रिका ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया' की याद दिलाती है.

हिन्दी पत्रिका का टैग लाइन है - ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक'.

अब तक तो देश का सर्वाधिक प्रसारित, सर्वाधिक पाठक संख्या वाला, सर्वाधिक लोकप्रिय, सर्वोत्कृष्ट, सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक इत्यादि --- इत्यादि तो पढ़ा था और मालूम था, परंतु ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक' न तो पता था न थिंक करने का डेयर किया था. अभी भी नहीं मालूम कि यह क्या होता है.

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लगता है - ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक' का अर्थ समझने के लिए ‘आई मस्ट डेयर टू थिंक बियांड' !

‘विल यू डेयर टू एक्सप्लेन मी मीनिंग ऑफ द ‘देश का सर्वोच्च समाचार साप्ताहिक', मिस्टर अरिंदम आईआईपीएम चौधरी?'

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अब क्या किया जाए इसमें, अरिन्दम चौधरी की हिन्दी कुछ ऐसी ही है :-)

अंग्रेजी में सोचकर हिंदी में लिखेंगे तो यही होगा।

अरिंदम चौधरी कह रहे हैं तो मानना तो पङेगा ही

अच्छा है, इससे घिसी-पिटी चीजें ही परोसने वालों को कुछ चुनौती तो मिलेही ही।

इससे देसी पत्रिकाओं की सामग्री सुधरने की गुंजाइश बनी है।

द संडे इंडियन का अंग्रेज़ी अंक मेरे सामने पड़ा है. लिखा है - "The Nation's greatest news weekly" हिन्दी में इसका मतलब सर्वोच्च तो होता नहीं. जिस तरह यह तड़का लगाकर ख़बरें छाप रही है उससे लग रहा है कि यह पत्रिका निश्चित तौर पर स्थापित पत्रिकाओं के लिए ख़तरा हो सकती है. मुख पृष्ठ की बानगी देखिए-
Preity Zinta: The pretty woman's crusade against the media.
Special Feature: Is Chappell destroying Team India?
TSI Exclusive: Pakistani Dictator Pervez Musharraf launches a new war of words.
Cover Story: RAHUL GANDHI- Majority of Indians seem to believe that Rahul Gandhi is sure to be the Prime Minister one day..Does he have a vision?
कवर स्टोरी देखकर तो लगा होगा कि पत्रिका किसके इशारे पर नाचेगी? हा हा

अरिंदम भैया का ऐसा है कि खुद के बिना मान्यता वाले कॉलेज को वो आईआईएम से भी श्रेष्ठ बताते हैं। ये तो मानना पड़ेगा कि उनकी 4 एक अच्छी पत्रिका है। लेकिन उसमें पत्रकारिता कम और टिप्पणियाँ ज़्यादा नज़र आती हैं। लेखों का स्तर ऐसा है जो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी, खासतौर से समूह-चर्चा, के लिये ज़्यादा उपयोगी है। अब एक बार अरिंदम भैया ने एक फ़िल्म भी बनाई थी "रोक सको तो रोक लो" उसे पिटने से कोइ नहीं रोक सका। तो देख्ते हैं कि इस पत्रिका को कौन रोक पाता है (पिटने से या फ़िर उभरने से)।

अंत में ऊपर नीरज भैया की टिप्पणी ये तो बताती है कि अभी जो पत्रिकाएँ हैं उससे खुश नहीं है वो। तो ऐसे में हम तो प्रार्थना करेंगे कि द संडे इंडियन सचमुच आउट्लुक और इंडिया टुडे की गिरती गुणवत्ता वाली खबरों से निजात दिलाये और आगे बढ़े।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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