शनिवार, 12 अगस्त 2006

हाय ये मेरी खटमली खटिया...

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खटमली खटिया









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इस अजीबोग़रीब समाचार को अगर सही मानें, तो मात्र दो रुपया प्रति खाट के हिसाब से कमाने हेतु गरीब लोग अपने आप को खटमली खटिया के हवाले कर देते हैं.


यह समाचार एक तरफ से तो रोचक हो सकता है कि खटमलों को यूँ इस तरह से भरपेट खाना दिया जा रहा है. परंतु दूसरी ओर हृदयहीन समाज का यथार्थ व्यंग्य दिखाई देता है.

सच है. ख़ून ग़रीबों का ही चूसा जाता है. ग़रीबों के खून में ही तो सच्चाई और ईमानदारी का शानदार ज़ायक़ा होता है.

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व्यंज़ल
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किसी को नसीब है खटिया खटमली
तो किसी के पास बिछौना मखमली

मेरे खुदा मुझे बता कि क्यूं नहीं है
मुझे मयस्सर रोटियाँ भली अधजली

तमाम उपाय आजमाए जा चुके हैं
मचती नहीं नसों में क्यों खलबली

अपनी वेदनाओं का पता है हमें ही
जमाना समझे है किस्सा झिलमिली

कैसे बताए रवि कि उसके देश में
हो चुकी तमाम व्यवस्था पिलपिली

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1 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. रवि भाई
    बहुत द्रवित करने वाला समाचार है.गरीबी की मार क्या क्या नही कराती.व्यंजल बहुत अच्छा लिखा है.सुंदर कटाक्ष है आज की व्यवस्था पर.
    समीर लाल

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