फरवरी 2006 में छींटें और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ...

जब टीवी चैनलों के धुँआधार प्रोमो देख-देखकर अंततः मेरे मुहल्ले का धोबी और नुक्कड़ का चाय वाला भी एक के बाद एक मोबाइल हो गए तो मेरे भी ज्ञान चक्षु कुछ खुले. मित्रों-परिचितों-रिश्तेदारों की नज़रों में तो मैं पिछड़ा हो ही चला था जो अब तक मोबाइल नहीं हो पाया था. इस बीच हफ़्तों यह खबर छाई रही कि दिसम्बर-जनवरी के दो महीनों के दौरान ही कुल 45 लाख लोगों ने देश में मोबाइल फोन अपनाया. अब जब धोबी और चाय वाले भी मोबाइल हो गए, और देश की अधिसंख्य आबादी मोबाइल होने में जुट गई प्रतीत होने लगी तो मुझे भी अंततः शर्म सी आने लगी और मैंने सोचा कि चलो अपन भी मोबाइल हो ही जाएँ...

झिझकते हुए, मैंने मोबाइल फ़ोनों की एक बड़ी-सी दुकान में कदम रखा. सेल्समेन ने प्रश्न वाचक दृष्टि से मुझे देखते हुए मेरी ओर मुसकराहट फेंकी – “हाँ सर, अपने पुराने मोबाइल को नए, ताज़ा-तरीन बेहतरीन तकनॉलाज़ी युक्त ब्यूटी पीस से बदलने का सही वक्त आ गया है. आज ही एक नया मॉडल आया है. वह आपको इसी दुकान पर मिलेगा – अन्यत्र आपको कहीं नहीं मिलेगा.”

“माफ कीजिएगा, मुझे नया मोबाइल लेना है.”

“ओह, तो आप एक अतिरिक्त मोबाइल अपने घर या दफ़्तर के लिए लेना चाहते हैं – बहुत अच्छे. अब तो यह निहायत ही जरूरी हो गया है- एक अतिरिक्त पर्सनल मोबाइल फ़ोन व्यक्तिगत ज़रूरतों के लिए.”

मैंने उसे बीच में टोका - “नहीं नहीं – यह बात नहीं है, मेरे पास मोबाइल नहीं है, मैं अपना पहला मोबाइल फोन ही खरीदने की सोच रहा हूँ.”

उस सेल्समेन के चेहरे पर कई रंग आए और उतर गए. जैसे कि वह सोच रहा था – यह किस धरती का जीव है जो अब तक मोबाइल नहीं हो पाया? अब तक तो लोग दो-चार मोबाइल फोन खरीदकर फेंक-बदल चुके हैं और यह अजीब प्राणी अपना पहला मोबाइल खरीदने आया है. लगता तो खाते पीते घर का है – मगर मोबाइल होने में इतनी कंजूसी! सेल्समेन के चेहरे पर खिंच आई प्रसन्नता ग़ायब हो चुकी थी.

“ओह, तो आप मोबाइल किसलिए लेना चाहते हैं?” सेल्समेन ने तनिक अप्रसन्नता से पूछा. उसे लगा कि मैं शायद उसका टाइम खराब करने वाला हूँ.

मैं सोचने लगा कि मोबाइल मैं किसलिए लेना चाहता हूँ. मैंने उससे पूछा कि मोबाइल लोग किसलिए लेते हैं – क्या फोन करने के अलावा भी कोई कारण होता है मोबाइल लेने के लिए?

सेल्समेन को मेरा प्रतिप्रश्न अति छुद्र क़िस्म का लगा, लिहाजा उसने मुझे एक प्रशिक्षु सेल्समेन के सुपुर्द कर दिया. प्रशिक्षु सेल्समेन को अपना पद पक्का करवाना लगता था अतएव वह अपने सीनियर से भी ज्यादा चौड़ी मुस्कान मेरी तरफ फेंक कर मुखातिब हुआ. उसने मुझसे फिर पूछा कि मोबाइल फोन का मैं क्या करने वाला हूँ.

मैंने उसे बताया कि मेरे मुहल्ले का धोबी और नुक्कड़ का चाय वाला मोबाइल हो गया है. जो वे अपने मोबाइल से करते हैं उसी तरह का कुछ मैं भी करूंगा – शायद बात-चीत जैसा कुछ. प्रशिक्षु ने मुझे प्रशिक्षित करना चाहा – “देखिए सर, मोबाइल फोन की बेसिक फंक्शनलिटी तो ठीक है, एक ही है- बात करना. परंतु आप नए-आधुनिक मोबाइल फोनों से बहुत सारे काम कर सकते हैं.”

मेरे ज्ञान में वृद्धि हो रही थी. जिज्ञासा वश पूछा, “जैसे?”

“जैसे कि गेम खेलना, मोबाइल फोन के अंतर्निर्मित एफ़एम रेडियो से रेडियो सुनना, अंतर्निर्मित कैमरे से फोटो खींचना, एमपी3 प्लेयर फोन से संगीत सुनना, वीडियो-मल्टीमीडिया इनेबल्ड फोनों से मूवी बनाना व प्ले करना, डबल्यूएपी – जीपीआरएस या सीडीएमए इनेबल्ड फोनों से इंटरनेट की सैर करना, ई-मेल व एसएमएस-एमएमएस संदेश भेजना-पाना इत्यादि...” वह एमएमएस पर जरा ज्यादा ही, अर्थपूर्ण जोर डाल रहा था.

आश्चर्य से मेरा मुँह खुला रह गया. “यानी मोबाइल फोन से इतने काम लिए जा सकते हैं?”

“ये तो फिर भी कम हैं” प्रशिक्षु अर्थपूर्ण शब्दों में समझाने लगा – “वीडियो इनेबल्ड कलर मोबाइल फोनों से आप वे फ़िल्में भी देख सकते हैं... और न जाने क्या क्या कर सकते हैं... ऊपर से रोज नई चीजें जुड़ती जा रही हैं... और, आजकल तो हाई एण्ड के मोबाइल फ़ोन तो स्टेटस सिंबल के प्रतीक हो चले हैं- अब आपकी शख्सियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाने लगा है कि आपके हाथ में किस क़िस्म का-कितने का मोबाइल फ़ोन है...”

मुझे लगा कि नुक्कड़ का चाय वाला कलर वीडियो वाला मोबाइल लिया है तो जरूर वो इसी तरह की फ़िल्म देखने के लिए लिया होगा, और जो पड़ोस का करप्ट ऑफ़ीसर पचास हजार वाला मोबाइल लटकाए घूमता है तो वह अपना स्टेटस झाड़ने के लिए ही ऐसे घूमता होगा.

मैंने शर्माते झिझकते हुए उससे कहा कि भइया मुझे मोबाइल सिर्फ बात करने के लिए चाहिए.

उसने जवाब दिया कि ऐसा कोई फोन तो अब सेकण्ड्स में, कोई पुराना पीस ही कहीं मिल सकता है- हो सकता है कबाड़ी बाजार में. जमाना अब मल्टीफंक्शन डिवाइसों का आ गया है. मोबाइल में अब बतियाइए भी गपियाइए भी और बखत पड़े तो पिक्चर भी देखिए, गाना भी सुनिए, स्टेटस भी बनाइए.

मुझे मोबाइल होना ही था अतएव ले देकर बहुत हील हुज्जत से कि जीएसएम का लेना चाहिए या सीडीएमए, रंगीन लेना चाहिए या ब्लैक एण्ड व्हाइट, कैमरा युक्त या एमपी3 प्लेयर युक्त, नोकिया का लेना चाहिए कि एलजी-सेमसंग-मोटोरोला-बेनक्यू-और-पता-नहीं-क्या-क्या का लेना चाहिए – मैंने एक मोबाइल फोन अंततः पसंद कर ही लिया.

“इसमें कौन सा प्लान डलवा दें सर?” प्रशिक्षु अपनी सफलता पर कि वह मुझ जैसे मोबाइल गंवार को भी एक मोबाइल बेचने में सफल हो गया था – गद् गद होता हुआ पूछ रहा था.

“प्लान माने?” मैं फिर शंकित हुआ.

“सर, दो तरह के प्लान हैं. एक तो पोस्टपेड दूसरा प्रीपेड. अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप कौन सा प्लान लेना चाहते हैं. जैसे कि प्रीपेड का बेसिक प्लान दो सौ रुपए का जिसमें आपको टाक टाइम आधा मिलेगा – वेलिडिटी हफ़्ते दिन की रहेगी. इसमें पल्स रेट रहेगा दो रुपए प्रति मिनट. इसी का फ्रीडम प्लान लेंगे पाँच सौ रुपए का तो इसकी वैधता एक महीने की होगी, टाकटाइम फुल मिलेगा – अपने नेटवर्क में बात करने पर पल्स रेट पचास पैसे दूसरे के नेटवर्क पर पिचहत्तर पैसे, लैंड लाइन पर एक रूपया बीस पैसे...”

“रुको भाई – ये प्रीपेड गणित मुझे समझ नहीं आया. पोस्टपेड प्लान समझाओ”

“इसमें भी बेसिक प्लान दो सौ रुपए का है जिसमें होम नेटवर्क पर एक रुपये प्रतिमिनट, लैंडलाइन फोन पर दो रुपए, एसटीडी तीन रुपए प्रति पल्स है. इसके एडवांस रेंटल में आपको प्रतिमाह छः सौ रुपए देना होगा, बदले में आपको तीन सौ रुपए का टाकटाइम मुफ़्त मिलेगा, पल्स रेट आधे हो जाएंगे... अगर आप ज्यादा बात करते हैं तो इसका फ्रीडम प्लान ठीक रहेगा और अगर आप इनकमिंग के लिए चाहते हैं तो इसका लाइफ़लांग इनकमिंग फ्री वाला प्लान...”

मैं इन प्लानों के चक्रव्यूह में फंस चुका था और अनिर्णय की स्थिति आ चुकी थी. प्रशिक्षु के बर्खास्त किए जाने की संभावना के बीच डूबता उतराता बाद में देखूंगा कह कर बगैर मोबाइल लिए ही मैं दुकान से बाहर आ गया.

मेरे मोबाइल होने में लगता है, कुछ देरी है. आप के क्या हाल हैं? आप मोबाइल हुए कि नहीं? **-**

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अगर लिनक्स (या विंडोज़) के डिफ़ॉल्ट हिन्दी की मैप (इनस्क्रिप्ट) पर थोड़ी सी भी गहरी ज्ञान-चक्षु डालें तो हमें मजेदार बात पता चलेगी, जो कि इस हिन्दी कुंजी पट को बिना किसी परेशानी के इस्तेमाल में, तथा इसे सीखने में न सिर्फ सहायक होगी बल्कि टच-टाइपिंग के रुप में महारत हासिल करने में भी हमें आसानी होगी. और इसी वजह से इसे डिफ़ॉल्ट रुप में रखा गया है (इनस्क्रिप्ट की एक और खासियत है कि यदि यह आपको याद हो जाए तो इस कुंजी पट से भारत की अन्य भाषाओं में भी आँख मूंदकर टाइप कर सकेंगे).

इनस्क्रिप्ट की मजेदार बात क्या है?

नीचे दिए चित्र को ध्यान से देखिए.

इनस्क्रिप्ट कुंजीपट सामान्य

शिफ़्ट सहित

शिफ़्ट+ऑल्ट सहित

शिफ़्ट + कंट्रोल + ऑल्ट सहित

आपको हिन्दी के स्वर-व्यंजन याद हैं? आपको बारहखड़ी याद है? यदि याद है तब तो इनस्क्रिप्ट कुंजी पट सीखना अत्यंत आसान है. बल्कि इसे सीखने की तो जरूरत ही नहीं. आपको तो इनस्क्रिप्ट कुंजी पट पहले से ही याद है!

जी हाँ, आप देखेंगे कि सामान्य मोड में बाएँ हाथ की कुंजियों के लिए मात्राएँ दी हुई हैं. अआ इई उऊ एऐ ओऔ की मात्राएँ क्रमशः बीच तथा ऊपर की कुंजियों पर हैं तथा शिफ़्ट मोड में अआ इई उऊ एऐ ओऔ हैं. इसे याद रखने की जरूरत है भी? यह तो हमें पहले से ही याद है!

अब आप अपने दाएँ हाथ की कुंजियों को देखें. अगर आपने हिन्दी व्यंजन पढ़ा है तो कख गघ पफ बभ तथ दध चछ जझ टठ डढ के समूह बनाकर बहुत ही खूबसूरत तरीके से जमाया गया है. अगर आपको हिन्दी व्यंजन का कखग याद है तो इसे भी याद रखने की जरूरत नहीं. अब आपको कुछ विशेष अक्षर याद करने होंगे. ज्ञ के लिए ज् + ञ, क्ष के लिए क् + ष, श्र के लिए श् + र, त्र के लिए त् + र याद रखना होगा, र, क के सामने है, य सबसे नीचे, और क्रमशः म, न, व, ल, स सबसे नीचे हैं. ञ ठ के ऊपर है, तथा ह,श,ष को उनकी उपयोगिता के आधार पर स्थान दिया गया है, जैसे कि ह बारंबार इस्तेमाल में आता है अतः उसे ऊपर की पंक्ति में जगह दी गई है.

तो, अगर आप अपने कुंजीपट रँगना भी नहीं चाहते हैं तो इस कुंजी पट के इन चित्रों को प्रिंट कर अपने सामने रख लीजिए. एक बारगी ही सरसरी तौर पर देखने और थोड़ा सा लॉज़िक लगाने पर कुंजीपट के अक्षर स्वयमेव याद होते चले जाएंगे.

अब भी इनस्क्रिप्ट आपको अपील नहीं करता? ठीक है, तो इसके लिए विंडोज़ में आईएमई है, जिसमें आपको तमाम तरह के पाँच-सात हिन्दी के कुंजीपट मिलेंगे जिसमें फ़ोनेटिक भी शामिल है, और अगर उसमें भी मजा नहीं है तो विंडोज का ही कुंजीपट परिवर्धक प्रोग्राम से अपने हिन्दी कुंजीपट को नया रूप दीजिए. लिनक्स के लिए भी विकल्प है – इसका बोलनागरी कुंजीपट फ़ोनेटिक आधारित है तथा इसे इस प्रकार डिज़ाइन किया गया है कि इसमें प्रोग्रामिंग के लिए आवश्यक अंग्रेज़ी के आम अक्षरों को भी खूबसूरती से शामिल किया गया है. इसमें भी आपको मजा नहीं आता तो लिनक्स के लिए हिन्दी कुंजीपट परिवर्धक प्रोग्राम भी है जिसका इस्तेमाल कर आप अपना स्वयं का हिन्दी कुंजीपट तैयार कर सकते हैं.

और, अब तो तमाम तरह के ऑनलाइन औज़ारों जैसे हग , यूनिनागरी , (जिनमें से कुछ एक को आप ऑफ़लाइन भी इस्तेमाल कर सकते हैं) इत्यादि फ़ोनेटिक हिन्दी कुंजीपटों के जरिए आप ब्राउज़रों के जरिए किसी भी प्लेटफ़ॉर्म पर (चाहे विंडोज हो, लिनक्स हो, मॅक हो या बीएसडी) बिंदास हिन्दी लिख सकते हैं – हाँ, काटने-चिपकाने का झमेला जरूर थोड़ा सा रहेगा. यहाँ तक कि आप सिर्फ माउस-क्लिक से भी हिन्दी टाइप कर सकते हैं!

उम्मीद है कि अब आपको हिन्दी लिखने में घंटों नहीं लगा करेंगे.

इस विषय पर पहले भी बहुत कुछ लिखा जा चुका है. काम की कुछ कड़ियाँ –

http://www.akshargram.com/sar vagya/index.php/हिन्दी_यूनिकोड_कुंजीपट_विकल्प http://www.akshargram.com/sarvagya/index.p hp/IndicIME http://hindini.com/ravi/?p=77 http://hindini.com/ravi/?p=24 http://raviratlami.blogspot.com/2005/01/blog-post_ 11.html http:/ /www.akshargram.com/2005/01/16/149/ http://www.bhashaind ia.com/Developers/IndianLang/TypingDnagari/dnpages. aspx http://www.iitk.ac.in/kangal/papers/k2003004.pdf http://pratibhaas.blogspot.com/2006/01/blog-post _25.html

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वीर जवान! तेरा धर्म क्या है?

एक सैनिक का धर्म क्या हो सकता है? देश की रक्षा करना? अपना जीवन देश के लिए बलिदान देना?

नहीं.

अपनी सरकार ऐसा नहीं सोचती. वह सैनिकों में हिन्दू-मुसलिम-सिख-ईसाई जैसे धर्म को ढूंढने में लगी है. जाहिर है सरकार सैनिकों के मुख्य धर्म – देश की रक्षा, देश की सुख-शान्ति बहाल करने के धर्म को - धर्म ही नहीं मानती!

सरकार का धर्म – जनता की सेवा, लगता है कहीं खो गया है. अब तो सरकार का धर्म सियासत हो गया है – वोटों का गणित हो गया है – तुष्टिकरण की राजनीति हो गई है. हिन्दू-मुसलिम-दलितों के वोटों का विभाजन-गुणा-भाग हो गया है.

और, उधर हर सेंसिबल व्यक्ति बेधर्मी होता जा रहा है. उसे अपने धर्म पर शर्म आ रही है...

***-***.

व्यंज़ल **-**

गर पूछा था धर्म क्या है किया कोई अधर्म क्या है

उस बस्ती में धार्मिकों को पता नहीं है शर्म क्या है

पूजा प्रार्थना इबादतों में कहीं लिखा है कर्म क्या है

जो बहता है तेरी रगों में लहू नहीं तो गर्म क्या है

दीवानी हरकतों का रवि क्या बताए मर्म क्या है

*-**-*

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आदिविद्रोही : स्पार्टकस - ग़ुलामी की करुण दास्ताँ

पिछले कुछ समय से अपने अनूप भाई की कृपा सेउपन्यास आदिविद्रोही पढ़ रहा था जो कि हावर्ड फ़ास्ट के मूल अंग्रेजी उपन्यास स्पार्टकस का हिन्दी तर्जुमा (अनुवादक – प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतराय) है.

शुरुआती कुछ पन्नों में उपन्यास बोझिल सा लगता है – एक तो उपन्यास अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवादित है, और प्रायः ठेठ-सा अनुवाद है. ऊपर से उपन्यास में, रोमन की प्राचीन इतिहास गाथा दी गई है जिसमें पात्रों-स्थलों के नाम ऊटपटांग से हैं जिन्हें स्मरण रखना कठिन-सा प्रतीत होता है. परंतु जैसे ही आप उपन्यास के पचासेक पृष्ठ पढ़ डालते हैं तो एक रोचकता, एक उत्सुकता आपको जकड़ लेती है और फिर आप कोशिश करते हैं कि चार सौ पृष्ठों का उपन्यास जल्द से जल्द कैसे पूरा हो.

उपन्यास पढ़ लेने के उपरांत (अगर इसमें दी गई ऐतिहासिक बातें सही हैं, और, जो कि संभवतः सही ही प्रतीत होती हैं) मुझे लगा कि मैं खुदा का शुक्रिया अदा करूं कि मैं उस बर्बर युग में पैदा नहीं हुआ – न गुलाम के तौर पर और न मालिक के तौर पर. इस बात की धारणा उपन्यास की चंद लाइनों में ही व्यक्त हो जाती है-

“... शुरू में सब लोग बराबर थे और शान्ति से रहते थे और जो कुछ उनके पास था उसे आपस में बांट लेते थे. मगर अब दो तरह के लोग हैं, एक मालिक और एक गुलाम. मगर हमारी (गुलाम) तरह के लोग तुम्हारी (मालिक) तरह के लोगों से ज्यादा हैं, बहुत ज्यादा. और हम तुमसे मजबूत हैं, तुमसे अच्छे हैं, तुमसे नेक हैं. इन्सानियत के पास जो कुछ अच्छा है वह हमारा है. हम अपनी औरतों की इज्जत करते हैं और संग-संग दुश्मन से लड़ते हैं. मगर तुम अपनी औरतों को वेश्या बना देते हो और हमारी औरतों को मवेशी. हमारे बच्चे जब हमसे छिनते हैं तो हम रोते हैं और हम अपने बच्चों को पेड़ों के बीच छिपा देते हैं ताकि हम उन्हें कुछ और दिन अपने पास रख सकें, मगर तुम तो बच्चों को उसी तरह पैदा करते हो जिस तरह मवेशी पैदा किये जाते हैं. तुम हमारी औरतों से अपने बच्चे पैदा करते हो और उन्हें ले जाकर सबसे ऊँची बोली बोलने वाले के हाथ गुलामों के हाट में बेच देते हो. तुम आदमियों को कुत्तों में बदल देते हो और उन्हें अखाड़े में भेजते हो ताकि वे तुम्हारी तफ़रीह के लिए एक दूसरे के टुकड़े-टुकड़े कर डालें. तुम्हारी वे श्रेष्ठ रोमन महिलाएँ हमको एक दूसरे की हत्या करते देखती हैं और अपनी गोद के कुत्तों को प्यार से सहलाती जाती हैं और उन्हें एक से एक नफ़ीस चीजें खाने को देती हैं. कितने जलील लोग हो तुम और जिन्दगी को तुमने कितना गन्दा बना दिया है. इनसान जो भी सपने देखता है उन सबका तुम मखौल उड़ाते हो....”

इसी बीच हंस (फरवरी 2006)में एक संस्मरण भी पढ़ने में आया. संस्मरण इसी युग की, वर्तमान काल की, भोगी हुई, सत्य घटना है. आदिविद्रोही के गुलाम स्पार्टकस जैसे लोगों ने जो भोगा और भुगता - वह आज भी, लोग भुगतने को अभिशप्त हैं – ठेठ हमारे देश में. मुझे ईश्वर से शिकायत है कि उसने हर दौर और हर काल में क्यों दो पैर का आदमी, दो तरह का बनाया जो दिखने में तो एक जैसे तो लगते हैं, मगर उनमें से एक मनुष्य होता है तो दूसरा राक्षस – उनमें से कोई तो मालिक होते हैं तो कोई गुलाम. क्यों ? क्यों ??

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