द ग्रेट इंडियन बाबूडम भाग - 2

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भारतीय बाबू बाहुबली...

भारत के सरकारी बाबुओं द्वारा भारत के स्वतंत्रता दिवस पर कार्य करने पर दंडनीय अपराध हेतु कार्यवाही की धमकी देने की कहानी मेरे पिछले पोस्ट पर आपने पढ़ी.

ऐसी ही, मिलती जुलती एक और कहानी अभी मीडिया के कुछ खास हिस्सों में चल रही है.

आपने आह्लादित करने वाली खबर पढ़ी होगी - भारतीय मूल की इंदिरा नूई, अमरीकन पेप्सी कंपनी की पहली महिला सीईओ चुनी गई हैं, और वे अपना पद भार 1 अक्तूबर 06 से ग्रहण करेंगीं.





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पर साथ में यह भी खबर थी - भारत की नैना लाल किदवई बहुराष्ट्रीय बैंक एचएसबीसी इंडिया के सीईओ पद के लिए चुन ली गई थीं. परंतु उनके पद को भारतीय रिजर्व बैंक ने स्वीकृति देने से मना कर दिया क्योंकि वे नेस्ले कंपनी के बोर्ड पर भी विराजमान हैं, और नेस्ले कंपनी एचएसबीसी की ग्राहक है.

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एचएसबीसी का कहना है कि वैश्विक कार्पोरेट गवर्नेंस के मानकों तथा प्रैक्टिस के अनुसार नैना लाल किदवई की नियुक्ति में कुछ भी गलत नहीं है.

पर, भारतीय कानून की किसी धारा में कहीं पर यह लिखा होगा, और लकीर के फ़क़ीर बाबुओं ने अपनी टाँग अड़ा दी.
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व्यंज़ल
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नहीं तब्दीली अपनी लकीर
बैठे रहे यूँ बन कर फ़क़ीर

जमाना कहाँ से कहाँ चला
और हम पीटते रहे लकीर

सबने बढ़ाए थे हाथ अपने
हमने ही खींची नहीं लकीर

अपनी खिंच नहीं पाई तो
मिटा दी दूसरों की लकीर

अपनी बढ़ाई नहीं रवि ने
देखा किए औरों की लकीर

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विषय:

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सही कह रहे हैं, कब उबरेंगे हम लकीरी की फकीरी से.

-समीर लाल

रतलामी बाबू, लकीरी और फ़कीरी की बातें करना आसान है। ये कोर्पोरेट के चक्कर बडे घुमावदार होते हैं। भूल गये क्या अमरीका के एनरोन, वर्ल्डकॉम जैसी महा घोटालों को। भारत का कोर्पोरेट शरीस अभी काफ़ी कमज़ोर है। अभी फ़ूंक-फ़ूंक कर कदम रखना ही समझदारी है।

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