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जुलाई 05 में छींटे और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ.

भीड़ में गुम सड़कें


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अब अगर अमरीका जैसे देशों के ये हाल हैं तो फिर भारत के तो कहने ही क्या, जहाँ पर सड़कों का वज़ूद ही नहीं है. ले देकर गोल्डन क्वाड्रेंगल जैसी योजनाएँ बनीं भी हैं तो वे भ्रष्टाचार के कारण पाँच साल के बजाए पन्द्रह सालों में पूरी होगी लगती है, और जब तक वह पूरी होगी, तब तक वह भी भीड़ में गुम हो चलेगी.

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व्यंज़ल
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जाने कब से मैं गुम हो गया भीड़ में
राह मैं कैसे पहचानूँ इस क़दर भीड़ में

दौड़ना चाहा था मैंने भी एक मैराथन
सपने मेरे टूट गए फंस कर भीड़ में

जला दिए आस्थाओं के मस्जिद मंदिर
मैं करता भी क्या धर्मान्धों की भीड़ में

सोचा था चहुँ ओर मिलेंगे यार दोस्त
खूब अकेलापन पाया बे मुद्दत भीड़ में

उठा लिए हैं पत्थर रवि ने भी अंतत:
कौन पहचानेगा उन्मादियों की भीड़ में

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अफ़सर भारी या बाबू ?





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तमाम सरकारी महकमे आमतौर पर अपनी लाल-फ़ीता-शाही और भ्रष्टाचार के लिए जाने जाते हैं. सरकारी महकमों में (कभी मैं भी इसका एक हिस्सा हुआ करता था) चपरासी-बाबू-अफ़सर का कार्टेल इतना मजबूत हुआ करता है कि कोई भी – एक बार फिर से – कोई भी उसे भेद नहीं सकता. आमतौर पर वे हॉर्मनी और टैण्डम में काम करते हैं, परंतु कभी ऐसा भी होता है कि स्वार्थवश एक दूसरे का हिस्सा हड़पने की कोशिश में उनमें भयंकर फूट भी पड़ जाती है.
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व्यंज़ल
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फ़र्क़ क्या कौन भारी अफ़सर या बाबू
जनता को पीसे या अफ़सर या बाबू

प्रजातंत्र की चाहे जो दो परिभाषा पर
असली राजा तो हैं अफ़सर या बाबू

और होगा दौर डॉक्टर इंजीनियर का
अब एक ही सपना अफ़सर या बाबू

महलों वाली गली का नया नजारा
बाशिंदे सब वहाँ के अफ़सर या बाबू

पागल बन के लौटा है जलसे से रवि
जहाँ किस्सागो सब अफ़सर या बाबू

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अब तो कम्प्यूटर भी भ्रष्ट !


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हम भारतीयों ने कम्प्यूटर को भी बेईमानी का पाठ पढ़ा दिया लगता है. शायद यही कारण है कि 1.77 लाख आवेदनों में से कम्प्यूटर ने जब रेण्डम तरीके से 625 आवेदनों को चुन कर लकी ड्रॉ निकाला तो पता है उस निगोड़े भ्रष्ट कम्प्यूटर ने क्या किया ? उसने ऐसे लोगों को चुना, जो पहले से ही खासे लकी थे – जैसे कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (कलेक्टर), एसपी, एमएलए, एमपी, इत्यादि, इत्यादि...
अब भले ही, लोगों के हल्ला मचाने के बाद उस लकी ड्रॉ को रद्द कर दिया गया और उस कम्प्यूटर अनुप्रयोग की जाँच का ऐलान किया गया हो, मगर दुनिया भर के कम्प्यूटरों में वायरसों की तरह, भारत के कम्प्यूटरों में बेईमानी और भ्रष्टाचार घुस आया लगता है. अतः जरा संभल के.

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व्यंज़ल


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ईमान की बातें करते हो
बड़ी अजूबी बातें करते हो

किसी काम का है ईमान
सहेजने की बातें करते हो

कर दो ईमान को तिरस्कृत
सद्‍गुण की बातें करते हो

आज की राजनीति में ईमान
बेकार की बातें करते हो

ईमान ओढ़ के रवि तुम
सफलता की बातें करते हो
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हम कितने भ्रष्ट ?


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ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा वर्ष 2005 के लिए जारी किए गए अध्ययन रपट के अनुसार, इस साल हम भारतीयों ने करीब 21068 करोड़ रुपयों की रिश्वत विभिन्न सार्वजनिक-सरकारी सेवाओं के कर्मचारियों को दी. अध्ययन में सर्वाधिक भ्रष्ट भारतीय पुलिस को बताया गया है, जिसके बाद लोअर कोर्ट, भूमि प्रशासन का नम्बर आता है.

ऐसी स्थिति में, जाहिर है- जब रिश्वत के बगैर यहाँ जीना मुश्किल हो, तो फिर क्यों न इसे अपना लें ? और, मानें या न मानें, कहीं कहीं रिश्वत तो मूलभूत आवश्यकता बन गई है.

मैं भी खुले आम आपको तमाम तरह के रिश्वत देने का वादा करता हूँ बशर्ते आपको मेरा एक काम करना पड़ेगा. इस खबर को अधिक से अधिक लोगों को पढ़ने के लिए कहें. इस तरह रिश्वत देने लेने से हम सबका फ़ायदा होगा. लोग तेज़ी से रिश्वतखोरी को अपने दैनिक जीवन में अपना सकेंगे. साथ ही जो क्षेत्र कम भ्रष्ट हैं उन्हें ज्यादा भ्रष्ट किया जा सकेगा और जहाँ भ्रष्टताई पहुँची नहीं है, वहाँ भी इसे पहुँचाने का महती कार्य किया जा सकेगा.

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व्यंज़ल
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बुनियादी जरूरत हो गई है रिश्वत
सम्बन्ध का सेतु बन गई है रिश्वत

फरियादी को कर दिया है अंदर
अपराधी द्वारा दे दी गई है रिश्वत

समय जल्दी बदलेगा सोचा न था
मुहब्बतों द्वारा मांगी गई है रिश्वत

देश को वसूलने में लगा हर कोई
मुफ़्त में तो नहीं दी गई है रिश्वत

ताक़त का बड़ा घमंड है रवि को
हर तरफ जो चल गई है रिश्वत

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तिरंगे का अपमान 2


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मैंने पहले भी लिखा था कि तिरंगे के मान अपमान के बारे में निकृष्ट सोच के लोग निकृष्ट ही सोचेंगे. ले-देकर अब तिरंगे छपे कपड़े पहनने की सरकारी छूट आंशिक रूप से दी गई है. परंतु कुछ बेमतलब शर्तें लाद दी गई हैं. उदाहरण के लिए, कमर से नीचे आप तिरंगा नहीं पहन सकेंगे. यानी कमर से नीचे का आपके शरीर का हिस्सा अपवित्र है! यह बात तो वही सोच सकता है जिसने अपने कमर के नीचे का हिस्सा कभी धोया नहीं हो और उसमें सड़ांध मार रहा हो.

जरा सोचिए, अगर आज लंगोट धारी बापू जिंदा होते तो? उन्होंने तो सिर्फ कमर के नीचे ही वस्त्र पहने – वह भी लंगोट नुमा धोती. आज भी उनके बुतों में वही लंगोट रहता है. यह आंशिक छूट और बेवकूफ़ाना बंदिश महात्मा गांधी का सरासर अपमान है. और उससे बड़ा तो तिरंगे का अपमान यह घटिया निर्णय है!

ऐसे निर्णय करने वालों को ज़रूरत है कि वे अपने कमर के नीचे का हिस्सा जरा साफ़ करें, अपने समस्त शरीर और सोच को शुद्ध करें.

आइए दुआ करें कि इन्हें कुछ अक्ल आए. आमीन.

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जिंदा रहने के लिए आपको चाहिए 3डी माइंड-सेट...


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अजीत निनन को टाइम्स ऑफ इंडिया में अंदर के पृष्ठों में गुमनाम सी जगह मिलती है. परंतु वे भी यदा कदा चौवा छक्का लगाने की कूवत रखते हैं. इनका यह कार्टून तो मास्ट हेड में आना चाहिए :)


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देवपहरी की दुपहरी


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कोरबा (जहाँ भारत का सर्वाधिक ताप विद्युत पैदा होता है) से सत्तर किलोमीटर दूर देवपहरी नामक पर्यटन स्थल है. यहाँ पहाड़ के शीर्ष से प्राकृतिक झरना बहता है जो पर्यटकों के आकर्षण का खास कारण है. जब मई जून की तपा देने वाली गरमी हो, कोरबा के ताप विद्युत संयंत्रों में प्रतिदिन जल रहे अस्सी लाख टन कोयले और उसकी राख से माहौल और भी असहनीय हो रहा हो, तो देव पहरी के झरने में स्नान के आनंद का वर्णन कोरबा वासी ही सही तरीके से कर सकते हैं. यहाँ की चट्टानें इतनी चिकनी हैं कि हममें से हर कोई झरने में भीगने के दौरान, तमाम सावधानियों के बावजूद एक न एक बार तो गिरा फिसला ही.

कोरबा-देवपहरी के बीच रास्ते में टाइगर स्पॉट है जहाँ से धरती में फैले जंगल का विशाल-विहंगम दृष्य दिखाई देता है. इन जंगलों में सरगुजा जिले से सटे क्षेत्रों के कोरकू और कोरवा जाति के आदिवासी रहते हैं. ये अभी भी अपने जीवन-यापन के लिए जंगलों पर पूर्णत: निर्भर हैं. इनकी जरूरतें भी निम्नतम हैं. पुरुष अभी भी सिर्फ लंगोट पहनते हैं और स्त्रियाँ बिना सिला, टॉवेल नुमा वस्त्र पहनती हैं जिसे वे अपने शरीर के चारों ओर जैसे तैसे लपेटे रहती हैं.

जंगल में हमारी मुलाकात दो कोरवा-आदिवासी बच्चों से हुई. इनमें से एक सिर्फ नेकर पहना हुआ था. दूसरा थोड़ा फैशनेबुल लग रहा था और प्लास्टिक का चश्मा भी पहने हुए था. दोनों कंधों में धनुष लटकाए हुए थे. पर उनके पास तीर नहीं थे. पता चला कि वे धनुष की प्रत्यंचा में पत्थर के टुकड़े फंसाकर निशाना लगाते हैं और छोटे छोटे पक्षी, चूहे, गिलहरी, खरगोश आदि का जीव-जंतुओं का शिकार करते हैं. उनमें से एक ने तीस फुट दूरी से निशाना लगाया जो बराबर निशाने पर बैठा. बांस की लकड़ी में तार, साइकल के बेकार ट्यूब के रबर और चमड़े की सहायता से बनाए गए रद्दी-से धनुष से लगाया गया निशाना लाजवाब था. पर, इस एकलव्य के पास प्रगति के सोपान पर जाने का कोई जरिया नहीं था. मुश्किल से फोटो खिंचवाने को वह तैयार हुआ. अचानक उसे जंगल में किसी शिकार की आहट मिली और वह तेजी से जंगल में गुम हो गया.



(मूल आकार में चित्र यहाँ देखें)

रास्ते में ही एक गांव पड़ता है अरेतरा. वहाँ पर एक पहाड़ी नदी बहती है. वर्षा का पानी ढाल युक्त नदी पर तीक्ष्ण प्रवाह से चट्टानों पर बहता है. नदी अपने भीषण प्रवाह से चट्टानों को काटती हुई जाती है. नदी के निरंतर प्रवाह से चट्टानों में अनगिनत, असंख्य रूपाकार चट्टानों की नायाब प्राकृतिक कलाकृतियाँ बन गई हैं, जो अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलेंगी. कुछ कटाव तो अत्यंत अकल्पनीय और अत्यंत दर्शनीय हैं.

आगे जाने पर गोविंद झुंझ जलप्रपात मिलता है. तीन तरफ से बहते पहाड़ी झरनों का दृष्य आकर्षक है. एक झरने को पहाड़ी चट्टानों के जरिए जोड़ कर छोटा सा बाँध नुमा बनाया गया है जहाँ से एक मोटा पाइप निकल रहा था. वह पाइप नीचे जाकर एक टरबाइन से जुड़ा था जिसमें से 50 किलोवाट बिजली पैदा होती है. दृश्य ठीक वैसा ही था जैसा कि शाहरूख की फ़िल्म स्वदेश में दिखाया गया था.

इस झरने से थोड़ी ही दूरी पर धार्मिक तीर्थ और पर्यटन स्थल देवपहरी है. यहाँ के मंदिर के पास एक युगल वृक्ष है – बड़ और पीपल का जो आपस में गुत्थमगुत्था तो हो ही चुके हैं, जब किसी तेज आंधी ने इनको जड़ से उखाड़ दिया तो वे अपने तने के सहारे आड़े लेटे हुए अपनी विशाल, दर्शनीय शाखाएँ फैला रहे हैं. मानो वायुदेव को चिढ़ा रहे हों कि तुमने मुझे अपने तेज बहाव से गिरा तो दिया, परंतु जीवन की दौड़ में मुझे हरा नहीं सके – और अब तो तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते – मैंने अपनी शाखाएँ भी जमीन में गाड़ ली हैं... यहीं पर गौरी कुंड है. इस कुंड से, भूगर्भ जल स्वत: ही, निरंतर बहता रहता है.

देवपहरी से वापसी की यात्रा दुखद रही. जंगल में आग लग चुकी थी. चारों ओर तमाम छोटे-छोटे और मझोले वृक्ष जंगल की भयानक आग में जल-झुलस रहे थे. पता चला कि आग सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में पिछले चौबीस घंटों से फैला हुआ इधर बढ़ता चला आ रहा है. तमाम रास्ते वन विभाग की तरफ से आग बुझाने के कोई प्रयास नहीं दिखाई दिए. बाद में स्थानीय अखबारों में यह भी चर्चा रही कि वनोपज (तेंदू पत्ते इत्यादि) और करोड़ों की लकड़ी हेराफेरी करने के चक्कर में वन विभाग का इस आग में हाथ था. मामले की जाँच के आदेश, जाहिर है – हमेशा की तरह शासन ने दिए, मगर पर्यावरण का नुकसान तो हो चुका था, और हमेशा की तरह, इस जाँच से भी कोई हल नहीं निकलने वाला था.

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लालू के तस्वीर को दूध अर्पित...


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जिन्हें चारा खाने को मिलेगा, वो तो आरती गाएंगे ही, पूजा-पाठ, यज्ञ भी करेंगे और दूध-घी भी अर्पित करेंगे.



इस बीच लालू का एक खिलौना जारी किया गया है.




लालू का ही क्यों - मायावती, ठाकरे, शहाबुद्दीन, तोगड़िया, इत्यादि.. इत्यादि के खिलौने भी जारी किए जाने चाहिएँ ताकि जनता को इस बात के मौके तो मिलें कि कम से कम वे उनके राजनीतिक कुकर्मों की सजा उन खिलौनों को देकर अपने मन की भड़ास तो निकाल सकें...

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व्यंग्य
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आपका बिजनेस क्या है?


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जब दो अपरिचित, समझदार औरतें आपस में पहली-पहली बार मिलती हैं, तो एक-दूसरे के कुर्ती-सलवार-साड़ी का रंग, अंगूठी की डिज़ाइन और नेकलेस के वज़न के बारे में बात करने से भी पहले वे यह जानने के लिए उतावली रहती हैं कि उनके पतिदेव क्या करते हैं. कुछ इधर उधर की महत्वहीन बातें करने के तत्काल बाद जैसे ही उन्हें समय मिलता है, वे सवाल दाग देती हैं- ‘आपके मिस्टर का बिजनेस क्या है?’ यह सवाल लाख टके का होता है कि किसी के मिस्टर का बिजनेस क्या होता है.

अब अगर उन दोनों के मिस्टरों के बिजनेस में जमीन-आसमान जितना फ़र्क़ नहीं है तब तो ठीक है. दूसरे शब्दों में, जब एक का मिस्टर चपरासी स्तर का और दूसरे का मिस्टर अफसर स्तर का नहीं होता है, तो फिर बहुत शीघ्र वे एक दूसरे के बिजनेस यानी साड़ी और सूट के कपड़ों में, उनको बेचने वाले दुकानदारों और सिलने वाले दर्जियों में भी दिलचस्पी लेने लगती हैं और बातों का सिलसिला चल निकलता है. ऐसे में, एक दूसरे की साड़ी के रंग, अंगूठी की डिज़ाइन और नेकलेस के वज़न इत्यादि-इत्यादि पर चर्चा हो जाने के उपरांत भी चर्चा के विषय खत्म नहीं होते. वे गंभीरतम रूप से, अंतरंगता से, बातचीत में बिजी हो जाती हैं और समय चक्र के बंधन से भी परे हो जाती हैं. उनका देश काल का बोध बातचीत के दौरान खत्म हो जाता है.

इसके ठीक विपरीत अगर दोनों के मिस्टरों के बिजनेस में जमीन-आसमान का अंतर होता है तब तो मामला बेकार हो जाता है. दूसरे शब्दों में, अगर एक का मिस्टर मोहल्ले के दर्जी स्तर का और दूसरे का मिस्टर नामी फैशन डिज़ाइनर स्तर का है तो फिर उनकी बातचीत शुरुआती दौर से आगे नहीं बढ़ती. फिर वे अपनी साड़ी के रंग, अंगूठी के डिज़ाइन नेकलेस के वज़न में आपस में तुलना करने लायक तत्व ढूंढ ही नहीं पातीं. और, ऐसे में अकसर वे एक दूसरे की पसंद को मन ही मन फूहड़ करार देते हुए अपनी बातचीत में ब्रेक लगा लेते हैं. वैसे भी हाई-क्लास के लोग लो-क्लास के लोगों के मुँह लगते हैं क्या? हाई-क्लास के लोग तो बस, रैगिंग लेते फिरते हैं. यह सिद्धांत, बदले हालातों में, यहाँ तक कि तब भी लागू होगा जब दुनिया में सिर्फ और सिर्फ दो ही महिलाएँ बची हों आपस में बोलने बतियाने को.

वैसे, बिजनेस के मामले में पुरुषों के रंग जुदा नहीं हैं. दो अपरिचित पुरूष जब एक दूसरे के ‘नाम’ से परिचित हो जाते हैं तो फिर वे सर्वप्रथम एक दूसरे के ‘काम’ यानी बिजनेस के बारे में जानने-बूझने को बेताब रहते हैं. बेताबी के ये कारण सामने वाले के जूते का ब्रांड, सूट का कपड़ा, और कलाई घड़ी-सेलफोन के मॉडल नहीं होते हैं. बल्कि बहुत से अन्य कारण होते हैं. सबसे पहला महत्वपूर्ण कारण तो यह होता है कि आदमी यह जानना चाहता है कि सामने वाला महीने-साल में कितना कमाता खाता है. कमाई के आधार पर उसकी कितनी पॉवर-पोज़ीशन है. वैसे भी, किसी आदमी की कमाई-धमाई से उसके लिबास – उसके जूते के ब्रांड, सूट का कपड़ा और कलाई घड़ी के मॉडल से कोई लेना देना नहीं होता. कोई धन्ना सेठ करोड़पति व्यापारी – चमरौंधे जूते, तेलिया चीकट धोती , मैला बॉस्केट और चाभी वाली पुरानी हाथ घड़ी पहन कर महफ़िलों में अपनी ठसक चाल का सम्मोहन बिखेर सकता है तो किसी ऑफ़िस बॉय को अपने चमकदार रीबॉक जूते, अरमानी सूट और ऑमेगा घड़ी पहनने के बाद भी थोड़ी शर्म और झिझक महसूस हो सकती है – कि उसने और भी मंहगे मॉडल के जूते या और भी लेटेस्ट फैशन के कपड़े क्यों नहीं पहने?

दूसरा खास कारण यह होता है कि हर दूसरा व्यक्ति, पहले व्यक्ति के बारे में यह जान लेना चाहता है कि वह कहीं किसी ऐसी ‘पोजीशन’ या ‘पॉवर’ में तो नहीं जिसकी जरूरत भविष्य में पड़ सकती है. फिर वह हर सूरत जान पहचान बढ़ाने में बिज़ी हो जाता है. जैसे कि आज के मिलावट-प्रदूषण युक्त हालातों के चलते नई-नई बीमारियाँ पैदा हो रही हैं और आदमी का स्वस्थ रहना नामुमकिन सा होता जा रहा है – ऊपर से इलाज मंहगा होता जा रहा है तो मेरे जैसा हर आदमी किसी ऐसे आदमी से जान पहचान बढ़ाना चाहेगा जिसका बिजनेस डॉक्टरी हो. यहाँ भी कुछ विशेष सोच वाले लोगों की कमी नहीं होगी जो हमेशा रसूख वाले नेताओं से जान पहचान की तलाश में रहते हैं. कारण स्पस्ट है – अगर आपकी किसी खांटी नेता से दूर से भी जान – पहचान हो जाए तो बस, फिर आपको किसी अन्य के बिजनेस की चिन्ता करने की कतई जरूरत नहीं. आपके सारे काम उस नेता के नाम से ही बिना किसी बाधा के हो सकते हैं. वैसे, विकल्प के तौर पर आप किसी माफ़िया ‘भाई’ से भी जान पहचान कर सकते हैं. इसीलिए, आरंभिक बातचीत के दौरान मुझे जैसे ही पता चलता है कि सामने वाले में कोई दम नहीं है, तो मैं तुरत-फुरत कन्नी काट जाता हूँ – वहाँ पर टाइम खराब करने का क्या फ़ायदा. और जब पता चलता है कि अरे, वह तो भारी-भरकम ‘बहुत कुछ’ है – तो उससे डामर की तरह चिपक जाता हूँ.

एक सदाबहार कारण है दूसरे के बिजनेस के बारे में जानने का. जब आप रेल, बस या हवाई जहाज में सफर कर रहे हों और आपका टाइम काटे नहीं कट रहा हो तो बस इतना कीजिए. सामने वाले से उसका बिजनेस पूछ लीजिए. वह अपने बिजनेस के महिमा मंडन में खुद को डुबो लेगा और आपको बिजी कर देगा. आपका टाइम देखते देखते कट जाएगा.

अब आप भी बता दीजिए कि आपका बिजनेस क्या है ?

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वेब के टॉप 10 उन्माद


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जगत जोड़ता जाल (www) के अब तक के सर्वकालिक “टॉप 10 उन्मादों” की सूची ‘सी।नेट’ में हाल ही में जारी किया गया है. एक जॉर्ज बुश से सम्बन्धित को छोड़ कर बाकी सभी मज़ेदार हैं – और डांसिंग बेबी, ब्लॉगर के दीवाने तो भाई, हम भी रहे हैं. सूची का संक्षिप्त विवरण यह है-

1 हेम्पस्टर डांस – सुरीले संगीत पर नाचते छोटे-छोटे प्यारे प्यारे कुत्ते, बिल्ली, चूहे, गिलहरियाँ – और न जाने क्या क्या.

2 महिर - (वेब पता ग़ायब कर दिया गया है) अगर आप अपने होम पेज में यह लिखें – यहाँ दिल से आपका स्वागत है!!!!! चुम्मा!!!!. (मैं कुँवारा हूँ!!!!) तो क्या लोग आपकी साइट पर लाइन लगा कर नहीं खड़े हो जाएंगे? महिर ने यही किया और उसकी साइट चल निकली...

3 आल योर बेस आर बिलांग टु अस – कम्प्यूटर खेल में इस्तेमाल किया जाने वाला वाक्यांश

4 डांसिंग बेबी - इसके डांस स्टेप्स, यकीन मानिए, बॉलीवुड के हर गाने के साथ मेल खाता है. माधुरी के धक-धक के साथ भी, और चोली के पीछे के साथ भी... :)

5 ठंडा या गर्म – अपनी फोटो इस साइट पर लगा दें और बस देखते रहें अपना मीटर. लोग आपको देखेंगे, देख कर अंदाज़ा लगाएंगे, और वोट करेंगे कि आप कितने गर्म हैं – या गर्म नहीं हैं. (ठंडे पन की बात नहीं की जा रही है)

6 फ्रेंडस्टर – आपका कोई मित्र नहीं है, या बहुत से हैं – हर मायने में फ्रेंडस्टर आपके मित्रवत् काम का है.

7 एलन फ़िस - एपल कम्प्यूटर का विज्ञापन जिसमें पीसी को ग़रीब उपयोक्ता का दस्तावेज़ खाते दिखाया गया था.

8 स्टार वार्स किड - स्टार वार्स की पूरी शृंखला किसी सनक से कम है क्या ?

9 ब्लॉगर - भई, ये सनक तो चलती रहेगी, चढ़ती रहेगी, बढ़ती रहेगी...

10 अरे, ये तो जॉर्ज बुश हैं. गाना गाते हुए. किसी को लालू का खयाल आया क्या ?

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तकदीर हो तो ऐसी...


*-*-*



भाई, तकदीर हो तो ऐसी. बाथरूम से लेकर लिविंग रूम – सब जगह रुपयों से भरी बोरी. कुछ साल पहले भारत के पूर्व संचार मंत्री, सुखराम के घर से भी सात करोड़ रुपए से भी अधिक नकदी बरामद की गई थी – उनके घर में भी जहाँ देखो वहाँ रुपयों से भरी बोरी मिली थी – बिस्तर में, गद्दों में, हर उस मुमकिन जगह पर जहाँ रुपए छिपाए जा सकते थे.

ऐसी तकदीर से किसे रश्क नहीं होगा? भगवान, मुझे अगले जन्म में ऐसी ही तकदीर वाला बनाना.

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व्यंज़ल
*-*-*
कर्म कुकर्म ढेरों उस धनवीर के
क्या मिला है भरोसे तकदीर के

महलों को देख देख ये सोचता हूँ
ये हैं गवाह कैसे-कैसे तदबीर के

इस दौर के जीवन उनके होंगे
जो काम करेंगे किसी रणवीर के

गुणा-भाग कर बताया साहूकार ने
हिसाब में हैं लाठियाँ श्रमवीर के

सब हँसते हैं तेरी नादानी पे रवि
जंग जीतने चला बिना करवीर के
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*करवीर=तलवार

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