टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

नवंबर 05 में छींटे और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ

यह टॉलरेंस पुरस्कार तो मुझे ही मिलना चाहिए था...


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ब्रिटेन में निर्वासित जीवन जी रही पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को टॉलरेंस पुरस्कार प्रदान किया गया है. पर, असल में अगर कोई टॉलरेंस पुरस्कार का सही दावेदार अगर कोई है, तो वह मैं हूँ. वह पुरस्कार तो मुझे मिलना चाहिए था. भला क्यों? अरे, अपने जीवन में मेरे द्वारा दिखाए गए टॉलरेंस कोई कम हैं क्या? मैंने तो हर पल, हर क्षेत्र में भयानक मात्रा में टॉलरेंस रखा है. फिर यह पुरस्कार तो मुझे मिलना ही चाहिए. है कि नहीं? आप अभी भी कन्विंस नहीं हैं? आइए, आपको मैं जरा विस्तार से अपने टॉलरेंसों को गिनाऊँ...
।। सड़क पानी और बिजली, जिसे ईशू बना कर मध्य प्रदेश में बीजेपी ने कांग्रेस को पटखनी देकर अपनी सरकार बनाई थी, के प्रति मेरा एक्सट्रीम टॉलरेंस था, है और रहेगा. गड्ढेदार, भीड़ भरी, भयंकर एनक्रोचमेंट की हुई, आवारा पशुओं से संक्रमित, पतली सड़कों पर रेलमपेल ठेलपेल कर चलकर नित्य, शांत भाव से अपने शरीर का कचूमर निकलवाना क्या टॉलरेंस की श्रेणी में नहीं आता है? दो दिन में एक बार आने वाले नल के कम प्रेशर के पानी को टुल्लू पंप से कभी आती कभी जाती बिजली की सहायता से खींचने की रोज-दर-रोज असफल कोशिश करते रहना क्या कोई कम टॉलरेंस है?
।। मनमोहन सिंह और अब्दुल कलाम जैसे उच्च शिक्षित और उच्च जीवन मूल्यों के रखवाले व्यक्तियों के देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन होने के बावजूद पप्पूयादव, राजा भैया और शहाबुद्दीन जैसे नेताओं के द्वारा भारतीय राजनीति को अपनी रखैल जैसे इस्तेमाल करते हुए देखना किसी लिहाज से कोई कम टॉलरेंस है?
।। सर्वप्रभुत्व सम्पन्न प्रजातांत्रिक गणराज्य को छुद्र राजनीतिक स्वार्थ के चलते धर्म, जाति, पंथ, और क्षेत्र में टूटते बिखरते देखना भला क्या कोई कम टॉलरेंस है?
।। बहुसंख्य सरकारी अमले, जो कि जनता की सेवा के लिए ही बने हैं, उलटे उनकी ही घूँस नुमा सेवा कर-कर अपना काम करवाना टॉलरेंस नहीं है?
।। भोंगों से निकलते पाँच वक्त की नमाज़, सुबह शाम आरती, अखंड रामायण-भागवतकथा इत्यादि के शोर; वाहनों की घर्राहटों-पोंपों, केरोसीन चालित ऑटो-टेम्पो के उगलते धुँए, बढ़ती महंगाई और बेकारी के बीच शान्ति पूर्वक जीना, मेरे भाई क्या यह टॉलरेंस नहीं है?
है ना? तो फिर मुझे यह पुरस्कार क्यों नहीं मिला? इस टॉलरेंस पुरस्कार का असली हकदार तो मैं हूँ!
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ऋण लो और घी पियो !

जबरिया ऋण !
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इंडियन एक्सप्रेस के एक साप्ताहिक कॉलम में एक
मज़ेदार खबर छपी थी. पहले स्टैंडर्ड चार्टर्ड तथा बाद में एचडीएफ़सी बैंक ने अपने
नियमित खाता ग्राहकों को बिन मांगे ही ऋण मुहैया कराए थे
!

बिन मांगे ऋण मिले
मांगे मिले न भीख
बिजनेस का नया फंडा
सीख सके तो सीख

वाह भाई क्या बात है. मुझे याद है - दस साल पहले, मुझे एक फ्लैट पसंद आया था तो उसके लिए गृह ऋण लेने के लिए तमाम बैंकों के चक्कर मैंने काटे थे और एकाध प्रबंधक से व्यक्तिगत जान पहचान होने के बाद भी उस फ्लैट के लिए मुझे लोन नहीं मिल पाया था. आज स्थिति बदल गई है. बैंकें बुला-बुला कर ऋण दे रही हैं. तत्काल ऋण, गृह ऋण, कार ऋण, व्यक्तिगत ऋण, त्यौहार ऋण इत्यादि-इत्यादि और न जाने क्या क्या. कई दफा तो आपसे किसी तरह की कोई प्रक्रिया भी पूरी नहीं कराई जाती और ऋण दे दिया जाता है.

इन दोनों बैंकों ने अपने नियमित खाता धारकों को ऋण के चेक बिन माँगे जारी कर दिए. प्रबंधन ने यह नायाब तरीका सोचा कि अगर खाता धारक इन चेकों को भुना लेंगे तो इनके खातों में से ईएमआई चालू कर देंगे और इस तरह से अधिक ब्याज दर पर ऋण की किस्तें वसूल ली जाएँगी. इस तरह न सिर्फ बैंक का बिजनेस बढ़ेगा बल्कि फ़ायदा भी. और, हो सकता है कि बैंक उपभोक्ताओं को यह बिन मांगे ऋण का नया फंडा रास आ जाए और मेरी तरह हमेशा ऋण पाने के लिए लालायित लोग उनके बैंकों के ग्राहक बनने लग जाएँ...

यहाँ तक तो ठीक था, परंतु समस्या तब आ गई जब बैंकों ने गलती से बिन-मांगे-ऋण की अग्रिम रकम की वसूली ग्राहकों द्वारा चैक इनकैश किए जाने से पहले ही शुरू कर दी ! जबरिया ऋण दिया तो दिया, जबरिया वसूली भी प्रारंभ कर दी कि हमने ऋण तो दे दिया अब आप उसका इस्तेमाल नहीं किए हो तो इसमें हमारा क्या कसूर ?  फिर, कुछ स्वाभिमानी किस्म के ग्राहकों को यह भी खासा नागवार गुजरा होगा कि बैंक की यह हिम्मत कि वह उन्हें ऋणी करार दे! बल्कि हम तो बैंक को ही ऋण देने की कूवत रखते हैं.  लिहाजा खासा हो-हल्ला मचने लगा और अफसोस कि अंततः इन बैंकों को ये नायाब कदम वापस लेने पड़े.

अफ़सोस? जी हां, मैं, बेवकूफ़, अभी तक स्टेट बैंक जैसे पुरातन-पंथी-प्रबंधन-विचारधारा का ग्राहक था सोच रहा था एचडीएफ़सी - स्टैंडर्ड चार्टर्ड का ग्राहक बनने ... परंतु अफसोस की बात कि यह योजना ही रद्द कर दी गई !
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अंततः माइक्रोसॉफ़्ट पूरी तरह जीवंत हो ही गया...

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लिनक्स, गूगल और ओपन ऑफ़िस के द्वारा अपने जीवन के लिए आ रहे खतरों के भय के बीच माइक्रोसॉफ़्ट ने अंततः अपने आपको जीवंत बना ही लिया. टैक पंडितों का कहना है कि माइक्रोसॉफ़्ट का यह कदम उसके मौज़ूदा बिजनेस मॉडल के लिए खतरा सिद्ध हो सकता है. जो भी हो, माइक्रोसॉफ़्ट को वेब सेवाओं के बढ़ते चरण और वेब उपयोक्ताओं के द्वारा वेब अनुप्रयोगों के बढ़ते एडाप्शन के बीच यह तो करना ही था. और, लोगों को यह भी लग रहा था कि इस मामले में माइक्रोसॉफ़्ट गूगल से पिछड़ता जा रहा है... परंतु अंततः माइक्रोसॉफ़्ट ने और इसके मुख्य सॉफ़्टवेयर वास्तुकार बिल गेट्स ने यह सिद्ध कर दिया कि वे कतई कहीं पीछे नहीं हैं... फ़ॉर्मूला वन रेस में आगे पीछे होते रहना तो आम बात है. जरूरी है कि अपने आप को क्रैश होने से कैसे बचाकर रखा जाए....

माइक्रोसॉफ़्ट विंडोज़ तथा ऑफ़िस जीवंत कैसे काम करेंगे ?

यह तो माना जा चुका है कि कम्प्यूटिंग का दूसरा नाम नेटवर्किंग और अंततः इंटरनेट हो चुका है. गूगल याहू और एओएल जैसी वेब सेवाएँ ऑपरेटिंग सिस्टम तथा अन्य अनुप्रयोगों जैसे कि ऑफ़िस उत्पादों की महत्ता को खत्म करने लगे थे. आप किसी भी ऑपरेटिंग सिस्टम से, बिना किसी (एम एस ऑफ़िस की तरह) अतिरिक्त अनुप्रयोग की सहायता से, सिर्फ ब्राउज़र के भरोसे लगभग एक छोटे से ऑफ़िस तथा घरेलू कम्प्यूटिंग के लिए आवश्यक सारा कार्य निपटा लेने में सक्षम हो पा रहे थे और जिन क्षेत्रों में यह संभव नहीं हो पा रहा था उसके लिए नित्य नए उत्पाद चले आ रहे थे. मज़े की बात यह थी कि इनमें प्रायः बहुत से या तो मुक्त और मुफ़्त थे या फिर उनके इस्तेमाल के लिए अत्यंत क्षुद्र किस्म के भुगतान की आवश्यकता थी. और अगर यह ट्रेंड जारी रहता तो अंततः एक दिन ऑपरेटिंग सिस्टम (जैसे कि विंडोज़) तथा विश्व का सर्वाधिक बिकने तथा इस्तेमाल में आने वाला सॉफ़्टवेयर उत्पाद एम एस ऑफ़िस को कोई पूछने वाला नहीं रहता. विंडोज लाइव तथा ऑफ़िस लाइव को लाकर माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने इस भय को खत्म करने की कोशिश की है. अब यह समय बताएगा कि उनकी कोशिश कितनी सफल रहती है.

जीवंत सॉफ़्टवेयरों की जीवंत दुनिया

विंडोज़ लाइव आपको वह तमाम सुविधाएँ देगा जो आप अपने विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम आधारित कम्प्यूटर में प्राप्त करते हैं. इनमें शामिल हैं- फ़ाइलों-सूचनाओं-आंकड़ों के भंडारण की सुविधा, संचार, पहचान, सम्बन्ध, विज्ञापन, बिल तथा भुगतान हेतु समस्त औज़ार सभी एक ही स्थल पर, एक रूप में और नित्य नए अद्यतन रूप में आपको मिलेंगे जिसमें आपको अपने सॉफ़्टवेयर को अद्यतन करने के झंझटों से भी मुक्ति मिलेगी. सबसे बड़ी बात पूरी तरह पोर्टेबिलिटी की रहेगी आप रेवाड़ी जैसे गांव में रहें या रेडमंड जैसे महानगर में, ब्राउज़र और इंटरनेट के जरिए यहाँ तक कि कुछ मामलों में ऑफ़लाइन स्थिति में भी आपको एक जैसा कार्य माहौल मिलेगा. इसी तरह ऑफ़िस लाइव में 22 अनुप्रयोग हैं जिनका ब्राउज़रों के जरिए इस्तेमाल किया जा सकता है और इसके लिए आपके कम्प्यूटर में एमएस ऑफ़िस स्थापित होना आवश्यक नहीं है. अनुप्रयोगों की यह संख्या बढ़नी ही है, यह तय है. अब अगर आपको फ़ीचर युक्त एमएस वर्ड में कोई दस्तावेज़ लिखना है, तो अपना ब्राउज़र खोलिए, ऑफ़िस लाइव में जाइए, वर्ड का विकल्प चुनिए और लीजिए, आपका ब्राउज़र एक पूर्ण वर्ड अनुप्रयोग में तबदील हो गया. आपने अपना दस्तावेज़ बनाया, उसे वेब पर ही सुरक्षित किया और लॉग ऑफ हो गए. अगली बार जब आप उस दस्तावेज़ को खोलना चाहें तो किसी भी अन्य स्थल से किसी भी अन्य कम्प्यूटर और अन्य ब्राउज़र और अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम से उस दस्तावेज़ को इंटरनेट पर वापस जाकर खोल सकते हैं, उस पर काम कर सकते हैं, उसमें रद्दोबदल कर सकते हैं और अन्यों के इस्तेमाल के लिए भी जारी कर सकते हैं. है न जादुई बात !

विषय से संबंधित कुछ कड़ियाँ (अंग्रेज़ी में) :
आधिकारिक माइक्रोसॉफ़्ट स्थल *********.

कुछ दहशतगर्द मेरे शहर में भी...

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ईद-दीपावली के मौक़े पर बम धमाके कर मासूमों की जान लेने वाले दहशतगर्दों के तार रतलाम से भी जुड़े रहे हैं – ऐसा पुलिस की प्राथमिक जाँच में पता चला है.
दहशतगर्दों की क्या पहचान हो सकती है? हो सकता है कि आपका मासूम सा दिखने वाला पड़ोसी भी किसी बम धमाके में मुख्य रूप से शामिल रहा हो ! और आपको कोई अंदाजा भी न हो !
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ग़ज़ल
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दहशत
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भोग ली हैं जिंदगी की दहशत
क्या बिगाडेंगी मौत की दहशत
दर्द का उनसे पूछिए जिन्होंने
जी लिए हैं इनकार की दहशत
कोई आशिक ही बता पाएगा
अनुराग के इजहार की दहशत
ता उम्र दौड़े एक रोटी के लिए
संभालें कैसे आराम की दहशत
स्वर्णिम समय है रवि का पर
मिटती नहीं यादों की दहशत
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कम्प्यूटिंग कहावतें – 2

कम्प्यूटिंग कहावतें - 2
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1. एक प्रोग्रामर की आत्मा उसके पीसी के केबिनेट के भीतर होती है
2. जीवन में सबको कभी न कभी भारी शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ता है जैसे- कभी
आपका कोई दोस्त आपको यह बताए कि जो नया गेम आप ट्राई कर रहे थे, वह आपके सिस्टम के
ऑब्सलीट हो जाने के कारण नहीं चल सकता।
3. एक प्रोग्रामर जो समय अपने प्रोग्राम लिखने में लगाता है, वह समय उस प्रोग्राम
के उपयोग कर्ता के समझने में जुड़ जाता है।
4. आपका पुराना पीसी और प्रोग्राम उतना बुरा कतई नहीं है, अगर आप अन्य बातों के बारे
में भी सोचें।
5. जो भी ताजातरीन सिस्टम हमारे पास होता है, वह हमारी आवश्यकता पूर्ति करने में
असक्षम होता है तथा जो सिस्टम हमारी आवश्यकता पूर्ति करने में सक्षम होता है, वह
प्राय: औरों के पास होता है।
6. आप चाहें तो इस बात का इंतजार कर सकते हैं कि आपके लिए उपयुक्त और उच्च गुणवत्ता
का पीसी एक दिन बाजार में आ ही जाएगा, मगर इसका मतलब यह नहीं कि आपके भाग्य में कोई
ऑब्सलीट सिस्टम नहीं होगा।
7. अपने सिस्टम को अपग्रेड करने की खुशी अपने पुराने पेरीफेरल को ठिकाने लगाने में
काफूर हो जाती है।
8. लालच वह आग है जो हमें बेकार पेरीफेरल खरीदने को मजबूर कर देती है।
9. कोई प्रोग्राम या सिस्टम परिपूर्ण नहीं हो सकता। थोड़ी सी आकुलता तो होती ही है।
10. कोई भी नया पीसी लेने के पश्चात् के प्रथम तीन महीने रोमांच के होते हैं, अगले
तीन महीने मजेदार होते हैं, उससे अगले तीन महीने बोझिल होते हैं, और बाद के समय में
कहीं कुछ भी नहीं होता है।
11. जब बत्ती बंद होती है, तो सभी कंप्यूटर एक जैसे होते हैं।
12. बुरे उपयोग कर्ता अपने सिस्टम को रिलीज होने के दिन से पहले ही अपग्रेड करने की
सोचते हैं।
13. प्रोग्रामर बुरे नहीं होते- आलसी हो सकते हैं।
14. किसी नर्ड से पूछें कि सौंदर्य क्या है? ... एक सिस्टम जिसमें खूब मेमोरी हो,
बड़ी स्टोरेज कैपेसिटी हो, टनों प्रोग्राम लोड हों और खूब सारे पेरीफेरल लगे हों।
15. किसी व्यक्ति की पहचान उसके हार्डडिस्क में लोडेड प्रोग्रामों से होती है।
16. जब आदम और हव्वा ने बुध्दि का फल चखा तो वे पत्तियों की ओर दौड़े। जब कोई नर्ड
सोचने की शुरूआत करता है तो वह निकटतम टर्मिनल की ओर दौड़ता है।
17. किसी प्रोग्राम को खुजाओ तो बग मिलेगा ही।
18. एक उपयोगकर्ता अपने सिस्टम के प्रथम अपग्रेड को छीनता है, द्वितीय के लिए
निवेदन करता है, तृतीय के लिए आदेश देता है, चतुर्थ को ले दे स्वीकारता है और फिर
बाद के सभी को भुगतता है।
19. एक बेवकूफ का पैसा बार बार के अपग्रेड में चला जाता है।
20. एक अच्छे प्रोग्राम को लिखने के लिए बिना सोचे शुरूआत करें कि क्या लिखना है,
और जो लिख लिया है, वहीं खत्म कर देना है।
21. यह हास्यास्पद है कि आप अपना सारा साल एक ही पीसी पर निकाल दें। तीन सही नम्बर
होगा। जी हाँ, दो हार्डवेयर और एक सॉफ्टवेयर अपग्रेड उचित होगा।
22. आपका विंडो, सिस्टम क्रेश के भय के बगैर नहीं चल सकता।
23. किसी प्रोग्रामर की सत्य निष्ठा तभी मानी जाएगी, जब वह एक समय में एक से ज्यादा
प्रोग्राम पर कार्य न करता हो।
24. मन चंगा तो 486 में गंगा।
25. प्रोसेसर से गिरे तो रैम में अटके।
26. उजाड़ गांव में विंडोज राजा।
27. एक आना हार्डवेयर नौ आना सॉफ्टवेयर।
28. एक पीसी इक्यावन पेरीफेरल।
29. एक पीसी में दो आपरेटिंग सिस्टम।
30. बंदर क्या जाने प्रोग्रामिंग का मजा।
31. काशी माउस बनारस की बोर्ड।
32. कोई पीसी में मरे कोई पीसी बिन मरे।
33. प्रोसेसर बिन पीसी कैसे बनी।
34. पीसी न सर्वर कहे कंप्यूटर।
35. चट रिलीज पट अपग्रेड।
36. चार दिन की चांदनी फिर अपग्रेड की रात।
37. आई मेक के भीतर इंटेल प्रोसेसर।
38. जन्म भर की कमाई चार अपग्रेड में गंवाई।
39. जस केले के पात में पात पात में पात,
तस नर्ड की बात में बात बात में बात।
40. जाके पीसी न वायरस आई,
वो क्या जाने पीर पराई।
41. पीसी है तो जहान है।
42. डाटा बचा तो लाखों पाए।
43. एपल खाया इंटेल बजाया।
44. हेकर जाने हेकर की भाषा।
45. पीसी न टर्मिनल करे पुनुआ प्रोग्रामिंग।
46. थोड़ा सोर्सकोड, बहुत समझना।
47. दान की पीसी के कान्फिगुरेशन नहीं देखे जाते।
48. अपग्रेड के लड्डू खाए पछताए, न खाए पछताए।
49. प्रोग्रामिंग करें और कम्पाइलिंग से परहेज।
50. दूर के पीसी सुहावने।
51. नर्ड का पीसी न धर का धाट का।
52. नर्ड के बारात में हैकर ही हैकर।
53. पढ़ा न लिखा, नाम नर्ड।
54. सबसे बड़ा सुख निरोगी पीसी।
55. बन्दर के हाथ में माउस।

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आर यू सेक्सुअली लिट्रेट ?

क्या आप अपने आपको सेक्स शिक्षित मानते हैं ?
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(यह पोस्ट आलोक को समर्पित चिट्ठाकार पर अपने बिंदास, सही विचारों को रखने के लिए...)


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यूँ तो प्राचीन काल से भारत सेक्स शिक्षा के नाम से शिक्षित-सा ही रहा है. खजुराहो की मिथुन मूर्तियाँ (इस तरह की मूर्तियाँ छत्तीसगढ़ - कवर्धा के भोरमदेव जैसे अत्यंत छोटे, अनजाने स्थल के मंदिरों में भी हैं) , वात्स्यायन के कामसूत्र तथा कोकशास्त्र इसके अप्रतिम उदाहरण हैं. कालांतर में तथाकथित भारतीय सांस्कृतिक संरक्षकों ने सेक्स को तथा सेक्स की बातों को घटिया और वर्जनीय बना दिया. अब तो सेक्स की बात करते ही हमें शर्म आने लगती है. तो फिर हमें इसकी शिक्षा कहाँ से मिल सकती है – और शिक्षा ऐसी जो प्रायोगिक, व्यावहारिक तौर पर लाभकारी हो न कि निरोगधाम जैसी पत्रिकाओं में लिखी गई घटिया, फूहड़, बेकार की टेबल राइटिंग...

वात्स्यायन के कामसूत्र के बाद से तो विश्व में ग्लेसियरों और आर्कटिक-अंटार्कटिक का बहुत सा बर्फ पिघल चुका है. भले ही प्राचीन समय पर उपलब्ध ज्ञान के लिहाज से कामसूत्र का अपना स्थान रहा हो, परंतु आज के वैज्ञानिक और तथ्यपरक संदर्भ में देखें तो वात्स्यायन का कामसूत्र बहुत ही वाहियात किस्म की किताब है. और मेरी इस बात से सहमत खुशवन्त सिंह भी हैं या शायद मैं उनके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ.

सेक्स से संबंधित वैज्ञानिक रूप से तथ्यपरक, महत्वपूर्ण शोघों को सामने लाने का आरंभिक कार्य डबल्यू एच मास्टर और वी ई जानसन ने अपनी पुस्तक ह्यूमन सेक्सुअल रेस्पांस के द्वारा किया. उसके बाद से तो कई सैकड़ा किताबें इस विषय पर लिखी जा चुकी हैं. और अब तो कॉस्मोपोलिटन, फेमिना से लेकर गृहशोभा और वनिता जैसी पत्रिकाओं में भी नियमित स्तंभ सेक्स को लेकर आने लगे हैं. इंडिया टुडे आउटलुक के वार्षिक सेक्स सर्वे वाले विशेषांक उनके सेल बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं यह बात तो आउटलुक के संपादक विनोद मेहता भी मानते हैं.

मैंने भी अब तक करीब दो-तीन दर्जन पुस्तकें इस विषय में पढ़ डाली होंगी. बहुतों का तो याद नहीं, पर कुछ पुस्तकें अवश्य उपयोगी हैं और मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति को इन्हें पढ़ना चाहिए. दुःख की बात यह है कि ये सभी अंग्रेजी में हैं और इनके हिन्दी संस्करणों के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है. इन किताबों के विवरण निम्न हैं-

1 सेक्स एण्ड यू लेखक : डॉ. प्रकाश कोठारी , प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, आईएसबीएन नं. 81-267-0925-1

इस पुस्तक में सेक्स संबंधी तमाम प्रश्नों का बड़े ही वैज्ञानिक और प्रायोगिक तरीके से उत्तर देने का प्रयास भारत के नामी सेक्सोलॉजिस्ट, पद्मश्री डॉ. प्रकाश कोठारी ने किया है.

2 सेक्स: ए यूज़र्स मेन्यूअल प्रबंध संपादक रुथ मिगले, प्रकाशक डायग्राम ग्रुप, आईएसबीएन नं 0-340-33101-1
इस पुस्तक में तमाम शोघ ग्रंथों में से उपयोगी व्यवहारिक जानकारियों को एकत्र कर पिरोया गया है जहाँ आपको बर्थ कंट्रोल से लेकर अनकन्वेंशनल सेक्स तथा सेक्स क्राइम तक के बारे में पुख्ता और शोघपरक जानकारियाँ मिलेंगीं.

3 सेक्स पॉवर लेखक डॉ. दस्तूर (पुस्तक की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं) इस पुस्तक की खास बात यह है कि अगर इसमें दिए गए अंगुष्ठ और शिश्न के बीच के संवाद को विश्व की प्रसिद्ध एकांकी वेजिना मोनोलॉगस की तरह लोगों के सामने लाया जाता तो न सिर्फ यह उससे भी ज्यादा लोकप्रिय होता, बल्कि कईयों की सेक्स-जिंदगियाँ भी अत्यंत सफल कर देता. इस पुस्तक में डॉ. प्रकाश कोठारी की इस बात को संबल दिया गया है सेक्स लाइस बिटवीन ईयर्स एण्ड नाट बिटवीन लेग्स, देयरफोर, यू मस्ट नो व्हेयर एक्चुअल पॉवर लाइस.

4 व्हाई मेन डोंट लिसन एण्ड वीमेन कान्ट रीड मैप्स लेखक द्वय बारबरा व एलन पीस प्रकाशक मंजुल पब्लिकेशन भोपाल, आईएसबीएन नं. 81-86775-08-0
यह तथ्यपरक पुस्तक सेक्स शिक्षा से संबंधित भले ही न हो, परंतु अपोज़िट सेक्स यानी पुरूष और नारी को एक दूसरे के आचार-विचार, समानता-असमानता को समझने में खासा योगदान देती है.

5 ऑर्गेज़्म : न्यू डायमेंशन्स - लेखक डॉ. प्रकाश कोठारी (विवरण अनुपलब्ध)
शीर्षक से ही पता चलता है कि ज्ञान के लिए सीखने के लिए न कोई समय सीमा की दरकार है न उम्र के किसी बंधन की... देयर मस्ट बी नो डायमेंशन फ़ॉर योर लर्निंग...


हो सकता है आपके विचार में भी कुछ उम्दा पुस्तकें हों जिनके विवरण (लेखक, प्रकाशक, आईएसबीएन नं सहित) आपके पास हों तो हमें बताएँ ताकि हमारे ज्ञान में कुछ और वृद्धि हो सके...
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गौहत्या पर प्रतिबंध...

प्रतिबंध ! ? बाँ.. @ # & ^ $
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कुछ समय पूर्व भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात सरकार के गो-वध पर प्रतिबंध लगाए जाने के आदेश को बहाल कर दिया जिसे गुजरात उच्च न्यायालय ने गलत ठहरा दिया था. अब यह जुदा बात है कि न्यायाधीशों के जिस पैनल ने 6-1 के बहुमत से निर्णय दिया, उसमें 1 सामिष और 6 निरामिष थे. यहाँ सवाल इस निर्णय के सही या गलत होने का नहीं है. भारत देश के लिए शायद इस निर्णय के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं था. और अगर दुर्भाग्य से कुछ दूसरा निर्णय हो जाता तो पता नहीं क्या हो जाता...
गो-वध पर प्रतिबंध के कारण ही तो हमारी सड़कों पर, गलियों में पूज्यनीय गो-माता, नंदी भगवान, महिष देव के दर्शन हर समय सुगम हैं. भगवान की बलिहारी, भगवान के साक्षात् दर्शन से बड़ा पुण्य भला कोई हो सकता है ? और भगवान् के हरवक्त, आसान दर्शन से बड़ा और क्या हो सकता है. चलते चलते ही उनको हाथ जोड़ कर शीश झुकाकर नमन कर लो, और बन पड़े तो पास ही खड़े घसियारे से दो रुपए का घास खरीदकर गो-माता या नंदी देव को डाल दो. चार तीर्थों का पुण्य पक्का. जरा सोचिए, गो-वध पर प्रतिबंध हटता तो ये ईश्वर कहाँ जाते? इन ईश्वरों को हम कहाँ ढूंढते ?
सड़कों पर गो-माताओं के विचरण करते रहने से आम जनता में ट्रेफिक सेंस पैदा होता है अन्यथा वे तो ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर 80-90 की रफ़्तार से अपनी एटर्नो, सेंट्रो चलाकर अपना सिर तुड़ा सकते हैं – अपना भेजा फोड़ सकते हैं. बीचों-बीच सड़कों पर बैठे गो-माताओं से सरकार को सड़कों पर फोकट में स्पीड ब्रेकर का बना बनाया साधन मिल जाता है. जरा सोचिए, गो-वध पर प्रतिबंध हटता तो क्या होता – सड़कों पर से गो-माताएँ ग़ायब हो जातीं – सड़कों पर बदहवासी फैल जाती....
जग सुरैया ने इस खबर पर अपनी टिप्पणी में लिखा है कि बांग्ला देश में गो-वध पर प्रतिबंध नहीं होने से वहाँ गो-महिष वंश का समूल नाश हो गया. मानव ने उनका समूचा भक्षण कर लिया और अब वहां के बच्चों के लिए दूध भी पश्चिमी देशों से पाउडर फ़ार्म में आयात किया जाता है. हम भी बांग्लादेशी जैसे ही हो जाते यदि यह प्रतिबंध नहीं होता. पश्चिमी देशों में भी यूँ तो गो-वध पर प्रतिबंध नहीं है, परंतु वहाँ बड़े बड़े डेयरी फ़ॉर्म भी तो हैं. हमारे यहाँ जनसंख्या के दबाव के चलते फ़ॉर्म ही नहीं हैं तो डेयरी फ़ॉर्म कहाँ से आएंगे.


यह जो चित्र देख रहे हैं, वह मेरे मुहल्ले की सड़क का है. लोग बाग़ मकान बनाते हैं तो समूचे प्लाट में कमरे-ही-कमरे निकाल लेते हैं. एक बबलू के लिए, एक बेबी के लिए, एक दादाजी के लिए, और अगर बचता हो तो डाइनिंग-ड्राइंग. ऐसे में कार पार्किंग के लिए जगह कहाँ बचती है. सड़क ही सबसे सस्ता टिकाऊ साधन है. और उसी सड़क पर गो-वंश भी पलता है. कार और गाय एक साथ. पर, ये गौ-माताएँ इस मुहल्ले की नहीं हैं. हमारे तथाकथित अभिजात मोहल्ले में कोई गाय नहीं पालता. गाएँ तो राबड़ी देवी पालती हैं – अपने शासकीय क्वार्टर में - 56 गाएँ, 37 बछड़े, जिनकी कीमत 9 लाख 88 हजार है! अपना मुहल्ला श्वान या यदा कदा खरगोश और फिश पांड से आगे नहीं निकल पाया है. दूसरे मुहल्ले के लोग गाएँ पालते हैं, ऑक्सीटॉसिन का इंजेक्शन लगाकर दूध दुहने के लिए सुबह शाम उन्हें हांक ले जाते हैं, और बाकी समय छोड़ जाते हैं. ये गाएँ ऐसे ही किसी और मुहल्ले की हैं, जो अपने अर्ध्य की तलाश में विचरती रहती हैं. जरा सा गाय-गाय आवाज लगाइए, तवे की पहली रोटी इन्हें खिलाइए, पुण्य पाइए. दिन भर का सारा पाप ऐसे उतार लीजिए.
बाँ...
लीजिए किसी गौ-माता ने मेरे दरवाजे पर आवाज दी है. अपने हिस्से के पुण्य की खातिर गाय को कल की बासी रोटी और हरी सब्जियों का छीलन डालने का आदेश श्रीमती जी ने दे रखा है. मेरे हिस्से का पुण्य भी मुझे कमाना है. जरा गाय को ये डाल आऊँ...
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व्यंग्य : क्यों? आपके ग्रहयोग कैसे हैं ?

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अगर आपको यह पता चले कि आपकी कुंडली में राजयोग है और इसके कारण निकट भविष्य में आपके नेता-मंत्री बनने के खासे चांसेस हैं, तो क्या आप प्रसन्न नहीं होंगे ? अवश्य होंगे और क्यों नहीं होंगे? आखिर, सत्ता-शक्ति का स्वाद जो चखने को मिलेगा, परन्तु जरा ठहरिए, थोड़ी गंभीरता से विचार कीजिए. हो सकता है मामला पूरी तरह से प्रसन्नता का न हो. आइए जरा गंभीरता से गौर फरमाएं.
मान लीजिए कि आपका राजयोग वास्तव में प्रबल है. ठीक है, परन्तु मंत्री पद आपको ऐसे ही नहीं मिलने वाला. इसके लिए आपको चुनाव लड़ना होगा. अब अगर आपका भाग्य वास्तव में प्रबल होगा, तो आप ईमानदारी से चुनाव जीत सकते हैं. वरना आज के माहौल में तो जब तक आप बेईमानी से जाति-धर्म के गणित नहीं लगाएंगे, चुनाव किसी सूरत जीत नहीं सकते. मान लीजिए, यह भी हो गया. परन्तु खाली चुनाव जीतने से भी कुछ हासिल नहीं होने वाला. आप बने रहेंगे दो टके के एमएलए और एमपी. असली, रौबदार मंत्री पद पाने के लिए आपको तमाम जोड़तोड़ करना होगी. गोटियाँ बिठाना होंगी. राजयोग का यहाँ क्या काम? चलिए, मान लीजिए कि यहाँ भी भाग्य ने साथ दे दिया, मगर फिर ऐसा हो सकता है कि आप महत्वहीन या बिना विभाग के ही मंत्री बन जाएँ और लोग-बाग आपका मजाक उड़ाने लगें. जाहिर है, महत्वपूर्ण और भारी भरकम बजट वाले मलाईदार विभाग को पाने के लिए आपको खींचातानी करनी होगी, लाबिंग करनी होगी, प्रेशर टैक्टिक्स अपनानी होगी. मुफ़्त में कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है. इसके लिए अलग से मेहनत मशक्कत करनी होगी. अलग से, नायाब, केलकुलेटेड पांसे चलने होंगे.
जैसे-तैसे, मान लिया कि आप मंत्री बन ही गए. धन्यवाद राजयोग. परन्तु आपकी आगे की राह भी कोई आसान नहीं होगी. हो सकता है कि आपका या अपके संबंधियों का अतीत रंगा-पुता हो. तब आपके विरोधी या बहुत संभव है आपके नेता-संगी-साथी जो मंत्री पद से महरूम हैं – खोद-खोद कर आपके अतीत को उघाड़ेंगे और इस तरह आपके मंत्री पद पर हमेशा तलवार लटकती रहेगी. अब यह मान लें कि कांच की तरह आपका अतीत स्वच्छ है और वर्तमान पारदर्शी है– जो कि भारतीय राजनीति में - सूर्य के उलटी दिशा में उगने के समान ही सत्य है, तो भी भविष्य के बारे में क्या कहा जा सकता है. आपके विरोधी जो मात्र आपके सत्ता में आने की वजह से पैदा हुए होंगे या दूसरे सत्ता कामी आपको यूँ ही चैन से नहीं रहने देंगे. वे आपकी हर बात को, हर कार्य को देश और जनता के विरुद्ध बतला कर आपके विरुद्ध झूठे कांड-किस्से फ्रेम करेंगे और उसमें आपको टांगने की हरचंद कोशिश करेंगे. यह भी हो सकता है कि आप अपने विरोधियों को समाप्त करने की ऐसी ही किसी कोशिश में खुद ही फंस जाएँ.
फिर, सत्ता मिलते ही आपकी पर्सनल लाइफ का बेड़ा गर्क हो जाएगा. आप चाटुकारों से घिर जाएंगे. आपके चारों और सुरक्षा का अर्थहीन घेरा खड़ा कर दिया जाएगा और आपको आपके परिचितों से भी मिलने नहीं दिया जाएगा.
यह स्थिति किसी कैदी से जुदा नहीं होगी. यहाँ फर्क सिर्फ यह होगा कि कैदी किसी जेल में सशस्त्र पहरे में रहता है और मंत्री खुले में सशस्त्र पहरे में रहने को अभिशप्त होता है. अब यह बात जुदा है कि हो सकता है कि पहरे दारी में रहने के आप आदी हो जाएँ और इसका मजा लेने लगें. हालाकि, यह भी शास्वत सत्य है कि जिसने भी सत्ता का स्वाद चखा, चाहे वह भगवान् ही क्यों न हो, सर्वदा सुखी कभी नहीं रहा. वह भी सत्ता प्राप्ति के लिए या सत्ता शक्ति के कारण या सत्ता पर आसन्न खतरों के कारण दुखों से घिरा रहा.
फिर सत्ता का सुख आपको अनंत काल तक तो मिलेगा नहीं. समय का चक्र आपसे एक न एक दिन मुँह फेरेगा या फिर आने वाली शनि की कोई महादशा आपके लिए कोई समस्या खड़ी करेगी या फिर आपके किसी विरोधी-सहयोगी का राजयोग ज्यादा जोर मारेगा और आप उड़न खटोले से सीधे धरती पर आ गिरेंगे. तब, सत्ता शक्ति की यादें आपको जीने नहीं देंगीं और आपके विरोधी आपको फिर कभी न उठने लायक बनाने में आपका पुलिन्दा बांधने में कुछ भी कसर नहीं रखेंगे. तब, यह सब और भी असहनीय हो जाएगा.
क्या आप अब भी प्रसन्न हो रहे हैं अपने राजयोग पर? नहीं न? तो फिर उठिए और दौड़ लगाइए उस पंडित की ओर जो आपके इस राजयोग को खत्म करने के लिए आपको ग्रहशांति का कोई ठोस आनुष्ठानिक उपाय बता दे.
*********.

खुशबुओं की है किसे दरकार ?

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अगर आप गंदगी में, अशिक्षा में, अंधकार में और बदबू में जीने के आदी हो चुके हैं तो आपको स्वच्छता, रौशनी और खुशबू कभी रास नहीं आएगी. और, यह पक्की बात है.
ठीक यही तो दर्शा रहे हैं तमिलनाडु के कुछ तथाकथित नैतिकता वादी जो कि एक तरह से नैतिकता-के-ठग हैं. दक्षिण की प्रसिद्ध अभिनेत्री खुशबू ने कहीं बयान दे दिया था कि भारत में एड्स के बढ़ते प्रकोप तथा महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं के मद्देनजर ध्यान सुरक्षित यौन संबंध बनाए जाने पर दिया जाना चाहिए न कि शादी से पहले या शादी के बाद इत्यादि पारंपरिक ढकोसलों पर.
बस, इस बात को लेकर कुछ तथाकथित नैतिक-ठगों की अगुवाई में खुशबू पर हल्ला बोल दिया गया और खुशबू के प्रत्यक्ष समर्थन में उतरी सुहासिनी मणीरत्नम को भी नहीं बख्शा गया. यहाँ तक कि खुशबू के बयान पर न्यायालय में तमिल-महिलाओं की मान हानि का दावा भी ठोंका गया जिसके चलते खुशबू को अपनी गिरफ़्तारी भी देनी पड़ी. खुशबू वही अभिनेत्री हैं जिनका एक मंदिर उनके प्रशंसकों ने बनाया था जहाँ उसकी मूर्ति की पूजा अर्चना भी होती रही है! और, तमिलनाडु में आने वाले कुछ महीनों में होने वाले चुनाव के मद्देनज़र इसमें राजनीतिक स्वार्थ देखने वाले इसमें राजनीति का गंदा रंग भी घोलने लगे हैं!
परंपरावादी-नैतिकतावादी, ढकोसलों के पुजारियों को शिक्षित करना कोई आसान काम है भला!
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व्यंज़ल
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अब अँधेरा भाने लगा है
क्यों दीप जलाने लगा है
छोकरा इठलाने लगा है
शायद वो कमाने लगा है
बोलते रहे थे अब तक
अब लाज आने लगा है
मेरे आने का देख कर
वो उठ के जाने लगा है
तमाशाइयों को देख रवि
तमाशा दिखाने लगा है
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आओ मंदिर-मंदिर खेलें...

**-**

हाल ही में दिल्ली में यमुना किनारे एक अत्यंत भव्य मंदिर अक्षरधाम का उतना ही भव्य उद् घाटन हुआ. बताते हैं कि उस मंदिर के निर्माण में 200 करोड़ रुपयों से अधिक खर्च हुए. अब एक और मंदिर कांग्रेस के सहयोग से हरिद्वार में बनने जा रहा है. अनुमानित खर्च है 125 करोड़ रुपए.
ईश्वर बहुत खुश हो रहा होगा कि उसके भक्त जन उसका कितना खयाल रख रहे हैं. करोड़ों की लागत से भव्य मंदिर बना रहे हैं. अब ईश्वर को भव्य मंदिरों में रहने में सचमुच बड़ा मजा आएगा. वरना तो होता यह था कि भाई लोग ईश्वर को कहीँ भी स्थापित कर देते थे. सड़क किनारे, किसी पेड़ के नीचे, चार ईंट की बनी घटिया पिरामिड-गुंबज नुमा अंधेरे कमरों में जिसे मंदिर नाम देकर जहाँ तहाँ ईश्वर को बिठाया जाता था. वह तो सरासर उसका अपमान था. अब ईश्वर का सीना भी गर्व से ऊँचा उठ गया है कि उसके भक्त भले ही खुद भूखे नंगे रह लें, वे अपने ईश्वर को 200 करोड़ रुपयों के भव्य और आलीशान मंदिर में स्थापित कर रहे हैं.
कई लोगों को इसमें बुराइयाँ दिख सकती हैं. उन्हें लग सकता है कि अक्षरधाम के निर्माण में खर्च हुए 200 करोड़ रुपयों या हरिद्वार के राम मंदिर के निर्माण में खर्च होने वाले 125 करोड़ रुपयों से भारत के गांवों-शहरों के खस्ताहाल कुछ सड़कों का कायाकल्प हो सकता था या भारत के करोड़ों गरीबों में से कुछ एक को रोजगार के साधन उपलब्ध कराए जा सकते थे या भारत की उन्नति के लिए किसी औद्योगिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में काम लिया जा सकता था. परंतु ऐसे लोगों को यह नहीं मालूम कि यह कितनी वाहियात और बेवकूफ़ाना बात है. सर्वशक्तिमान ईश्वर से बड़ा कोई हुआ है? अगर उसके लिए करोड़ों रुपए का भव्य मंदिर बना है तो इसमें क्या बुराई है. मन चंगा तो कठौती में गंगा की बात करने वाले तो निरे मूर्ख हैं. कलियुगी गंगा वहीं बसती है और वहीं मिलती है जहाँ करोड़ों का मंदिर हो. रोड साइड, सड़क छाप मंदिर भी भला कोई मंदिर है? वहाँ न तो ईश्वर ही बसता है और न ईश्वर के भक्त. ईश्वर और खुदा अब किसी के मन में कहीं बसता है भला ? वह या तो करोड़ों के मंदिर में बसता है या फिर बाबरी मस्जिद – राम मंदिर जैसे विवादित स्थलों में ही.
आइए, हम भी मंदिर-मंदिर खेलें. अपने आसपास हम भी कोई भव्य मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर बनाएँ. और अगर वह स्थल विवादित हो तो क्या कहने. ऐसी जगह में तो शायद ईश्वर को रहने में भी बड़ा मजा आएगा.
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व्यंज़ल
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कहाँ कहाँ न ढूंढा तुझे या खुदा
झांका नहीं गरेबान में या खुदा
जो मुहब्बतों की बात करते हैं
खंजर क्यों रखते हैं या खुदा
कल मैं भी गया था सजदे में
भीड़ में संभलता रहा या खुदा
बहुतेरे बनाए मंदिर मस्जिद
न बना एक मकान या खुदा
उस कल्पित जहाँ की खातिर
रवि सब भूला हुआ है या खुदा
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यह तो सचमुच, लगता है कि रहेगा हमेशा...

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भारतीय विज्ञापन जगत में अंग्रेज़ी का बोलबाला किसी जमाने में रहा होगा. अब तो ख़ालिस अंग्रेज़ी की पत्रिकाओं में भी रोमन हिन्दी में विज्ञापन धड़ाधड़ निकल रहे हैं. संभवतः इसकी शुरूआत पेप्सी के ‘ये दिल मांगे मोर’ वाले विज्ञापन से हुई थी, जो अब अपनी पूरी रफ़्तार पर है. अब, ज्यादा नहीं, तो अंग्रेज़ी का हर छठवां विज्ञापन किसी न किसी रूप में क्षेत्रीय भाषा, और ख़ासकर हिन्दी का इस्तेमाल करता ही है.
यह विज्ञापन मॉज़रबेयर के ऑप्टिकल मीडिया के लिए है, जो भारत की एक लीडिंग तकनॉलाज़ी पत्रिका में प्रकाशित हुई है. अंग्रेज़ी का यह विज्ञापन न सिर्फ रोमन हिन्दी के बेहतर, प्रभावी प्रयोग के लिए, बल्कि इन्फ़ॉर्मेशन तकनॉलाज़ी को भारतीय परिदृश्य में अनूठे तुलनात्मक अंदाज में प्रस्तुत करने के लिए भी जाना जाएगा.
भारतीय घरों में कोई भी तीज त्यौहार बगैर मेहँदी के सम्पन्न नहीं होता. मेहँदी के गहरे और पक्के रंग से अकसर प्रेम-प्यार की प्रगाढ़ता के कयास लगाए जाते रहे हैं. नायिका के खूबसूरत हाथों पर मेहँदी का गहरे रंग में रचना इस बात का द्योतक होता है कि उसका प्यार उतना ही गहरा, सदासर्वदा अमर रहेगा...
मॉज़रबेयर इन्हीं प्रतिमानों का इस्तेमाल अपनी ऑप्टिकल मीडिया की ख़ासियत बताने में कर रहा है. क्या बात है! तकनॉलाज़ी जैसे नीरस विषय को इस सरसता के साथ प्रस्तुत करने के लिए, इस विज्ञापन के कॉपीराइटर और इसे स्वीकार करने के लिए, मॉज़रबेयर, सचमुच बधाई के पात्र हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि इसे विज्ञापन जगत् का कोई बड़ा पुरस्कार मिल जाए.
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मूरख ही जाने है मूरख की भासा...

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अपने नायाब, सुदर्शनी विचारों के लिए प्रसिद्ध, रा.स्व.संघ के सर संघ चालक के. एस. सुदर्शन ने अपने विचार फिर से प्रकट किए हैं. अब उनका कहना है कि हिन्दुओं को कम से कम तीन संतान पैदा करना चाहिए, और बन पड़े तो सत्रह भी. याने कि हिन्दुओं को ढोरों जानवरों की तरह सिर्फ बच्चा पैदा करने का काम ही करते रहना चाहिए. तमाम दूसरे काम धाम छोड़कर! वाह! क्या सनातनी विचार हैं! परंतु, शुक्र है कि भारत की अधिकांश जनता मूर्ख नहीं है, और, जाहिर है, उनके इस सुदर्शनी विचार को जनता सिरे से नकार देगी. भारत की जनता को अपना, अपने बच्चों का, अपने वंश का खयाल रखना बख़ूबी आता है. सुदर्शन के ये नायाब विचार घोर अशिक्षितों के उस विचार से जुदा कैसे हो सकते हैं जिसमें कन्या शिशु को या तो गर्भ में, या पैदा होते ही मार दिया जाता है – यह सोचकर कि वंश कैसे चलेगा!
मगर, आरएसएस से प्रभावित मप्र की सरकार इस बयान के संभवतः तात्कालिक स्वीकृति स्वरूप अपने उस आदेश को पलटने जा रही है जिसमें दो से अधिक बच्चों के पालकों को पंचायत चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था.
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व्यंज़ल
..--..
आया था मासूम मूरख बन कर रह गया
सभा में सही बात कहते कहते रह गया
बातें तो तुमने की थीं दूर बहुत जाने की
क्या हुआ दोस्त जो कदम उठाता रह गया
अब यह बात तो तुम्हें वक्त ही बतलाएगा
क्या ले आए थे और क्या पीछे रह गया
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विकिकेल्क – ब्राउज़र आधारित एक नया-नवेला, नायाब - स्प्रेडशीट प्रोग्राम

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पर्सनल कम्प्यूटरों को एक आम व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करवाने वाले किसी एक आरंभिक प्रोग्राम के बारे में लोगों से पूछा जाए, तो आमतौर पर लोग स्प्रेडशीट प्रोग्राम के बारे में ही बोलेंगे. पर्सनल कम्प्यूटर के आरंभिक दिनों में यही एकमात्र सबसे सफल और सर्वाधिक प्रचलित प्रोग्राम था जिसमें आप अपने जमा-खातों का हिसाब तो रख ही सकते थे, मौक़ा पड़ने पर चिट्ठी-पत्री भी लिख सकते थे.
विकिकेल्क – स्प्रेडशीट प्रोग्राम को एक कदम और आगे ले जा सकने की संभावना दिखाता है. विकि अपने बहुत से स्वरूपों में सर्वाधिक प्रचलित ऑनलाइन संपादन औज़ार तो बन ही चुका है, अब विकिकेल्क ऑनलाइन स्प्रेडशीट के रूप में आपके खाता बही से लेकर आयकर और खर्चों तथा वैज्ञानिक गणितीय गणनाओं का हिसाब किताब भी करने में सक्षम हो सकेगा ऐसी उम्मीदें हैं. और, जैसा कि चित्र से स्पष्ट है, यह यूनिकोड हिन्दी समर्थित है.
इसका आरंभिक संस्करण सेटअप कर चलाने में अत्यंत आसान है. सारा कुछ ब्राउज़र पर सामने स्क्रीन पर आता है. किसी भी ब्राउज़र के जरिए इसे चलाया जा सकता है. हालाकि स्प्रेडशीट पर काम करने में गति अत्यंत धीमी प्रतीत होती है. मगर, मात्र 1.5 मेगाबाइट का यह डाउनलोड अपने नए संस्करणों में बहुत सी संभावनाएँ लेकर आएगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है
**********.

मेहँदी का रंग तो सचमुच चढ़ने लगा है...

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मॉज़रबेयर पर मेहँदी का रंग हमेशा के लिए चढ़ा हो या नहीं यह तो पता नहीं, परंतु ऑटोमोबाइल कंपनी होण्डा पर इसका रंग चकाचक चढ़ने वाला है.
ख़ूबसूरत हाथों पर मेहँदी की उतनी ही ख़ूबसूरत डिज़ाइन को देखकर तो, ऐसा ही लगता है.
लगता है, विज्ञापन एजेंसियों और कॉपी राइटरों को मेहँदी में नया, पक्का रंग दिखाई देने लगा है. देखते हैं कि और किन किन उत्पादों में मेहँदी नज़र आती है...
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अ-साहित्यिक चोरी बनाम मेहँदी का रंग


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यह जो मेहँदी का रंग है, वह भारतीय प्रिंट मीडिया में जरा ज्यादा ही सिर चढ़ कर बोल रहा है लगता है. होण्डा को इसमें जीवन के रंग दिखाई दिए, तो मॉज़रबेयर को स्थाइत्व. दैनिक भास्कर के साप्ताहिक परिशिष्ट मधुरिमा में यह रंग इतना चढ़ा कि इसने अपने मुख पृष्ठ पर मॉज़रबेयर के विज्ञापन में से मेहँदी को ही टीप लिया.
प्रसंगवश, अभी अभी टाइम्स ऑफ इंडिया समूह पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा ही था कि उसने जून 2005 में प्रकाशित कॉस्मोपॉलिटन की सामग्री ज्यों की त्यों उतार दी, इसी बीच इंडियन एक्सप्रेस पर भी यही आरोप लग गया कि मंजुनाथ की हत्या की रपट में उसने रश्मि के चिट्ठे से पाठकों के पत्र के रुप में कमेंट ज्यों के त्यों उतार दिए. टाइम्स का तो पता नहीं, लेकिन एक्सप्रेस ने जरूर दूसरे दिन इसका खुलासा जरूर कर दिया.
हिन्दी समाचार पत्रों में हालात तो और भी बुरे हैं. वे तो सीधे-सीधे सामग्रियाँ मार लेते हैं और उनके पास तो अंग्रेज़ी से अनुवाद का साधन भी होता है. अगर किसी ने देख लिया और पूछ ताछ भी की तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता. दैनिक भास्कर, जिसे भारत के सबसे बड़े हिन्दी अख़बारों में गिना जाता है, इस मामले में कतई पीछे नहीं है. इसके आईटी सेक्शन में प्रकाशित होने वाले आलेख अंग्रेजी लेखों के अनुवाद होते हैं. कुछेक मामलों में तो मेरे आईटी पत्रिका में प्रकाशित लेखों को ज्यों का त्यों अनुवाद कर प्रकाशित कर दिया गया था. और जब मैंने उनके संपादक श्रवण गर्ग से बात की तो उनका कहना था कि हिन्दी में तकनॉलाज़ी में लिखने वाले हैं ही कहाँ. उन्होंने मुझसे मौलिक सामग्री मांगी. परंतु वे मेहनताने पर बात रुक गई. हिन्दी में लिखने वालों को पैसा तो भीख की तरह ही मिलता है! मॉज़रबेयर के विज्ञापन में से चित्र को उतारना ऐसा ही एक और उदाहरण है. (इस संदर्भ में भास्कर मधुरिमा से ईमेल के द्वारा स्पष्टीकरण मांगा गया, पर किसी तरह का कोई जवाब नहीं आया)
भारत के तथाकथित बड़े समाचार पत्रों में इस तरह की साहित्यिक चोरियाँ क्या बर्दाश्त की जानी चाहिए?
********.

वाह ! क्या संतुलन है !


**---**
वात्स्यायन और खजुराहो के देश में, बाल विवाह जहाँ आम प्रचलित है, आप को संतुलन से बात करने की सलाह दी जाती है! वाह ! क्या खूब संतुलन है !
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व्यंज़ल

गजब दिखाए जमाना ये संतुलन
अंदर आंदोलित बाहर है संतुलन
किसी ने तो चाहा नहीं फिर क्यों
बनाए रखने में लगे हैं संतुलन
आज के दौर में सीख ये नई बात
रखनी तो पड़ेगी जुबां पे संतुलन
कोई अपनी बात कहता नहीं है
दिखाते फिरते नक़ली हैं संतुलन
एक शख्स है अजीब रवि भी
नाचे नंगा चाहे औरों से संतुलन
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