टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

April 2005

परिवर्तन का दूसरा नाम जिंदगी है...
*-*-*
ब्लॉगर के इस ब्लॉग को नया होस्ट भाई ईस्वामी की महती कृपा से मिला है, जो थोड़ा सा तेज़ तो है ही, ज्यादा सुविधाओं युक्त वर्ड प्रेस पर भी आधारित है. वहाँ यह नए रूप-रंग और नाम से अवतरित हुआ है. पर मूल स्वरूप लगभग यही रहेगा. आपको थोड़ी सी असुविधा तो होगी, जिसके लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ, परंतु गुज़ारिश है कि आप अपने पसंदीदा / बुकमार्क / पुस्तचिह्न को इस नई कड़ी पर बदल लें. हालाकि यह वर्तमान ब्लॉग एक अभिलेखागार के रूप में तो मौज़ूद रहेगा ही, और महीने के अंत में यत्र-तत्र छपी मेरी समस्त रचनाएँ यहाँ अवतरित होंगीं.

कोशिश रहेगी नियमित लेखन की, महीने में कम से कम 20-25 चिट्ठे, इस साल –(2005) के पूरे होते तक.

तो, प्रतिदिन पढ़ते रहिए : छींटे और बौछारें – टेढ़ी दुनिया पर तिरछी नज़र

धन्यवाद.

ये देश मलाईदार!

*-*-*
सदियों पहले भारत, सोने की चिड़िया कहलाता था. जब वास्को डि गामा, भारत के लिए समुद्री रास्ता ढूंढ कर वापस पुर्तगाल पहुँचा था तो पुर्तगाल में महीनों तक राष्ट्रीय जश्न मनाया गया था- सिर्फ इसलिए कि अमीर-सोने की चिड़िया – भारत - से व्यापार-व्यवसाय का एक नया, आसान रास्ता खुला जिससे पुर्तगालियों का जीवन स्तर ऊँचा उठ जाएगा.

तब से, लगता है, यह जश्न जारी है. पुर्तगालियों के बाद अंग्रेजों ने जश्न मनाए और उसके बाद से मलाईदार विभाग वाले नेता-अफ़सरों द्वारा जश्न मनाए जाने का दौर निरंतर जारी है.

सोने की यह चिड़िया आज लुट-पिट कर भंगार हो चुकी है, परंतु उसमें से भी मलाई चाटने का होड़ जारी है.
*-*-*-*
व्यंज़ल
*/*/*
सभी को चाहिए अनुभाग मलाईदार
कुर्सी टूटी फूटी हो पर हो मलाईदार

अब तो जीवन के बदल गए सब फंडे
कपड़ा चाहे फटा हो खाइए मलाईदार

अपना खाना भले हज़म नहीं होता हो
दूसरी थाली सब को लगती मलाईदार

जारी है सात पुश्तों के मोक्ष का प्रयास
कभी तो मिलेगा कोई विभाग मलाईदार

जब संत बना रवि तो चीज़ें हुईं उलटी
भूखे को भगाते अब स्वागत मलाईदार

*-*-*
एक माइक्रॉन मुस्कान:
एक बच्चा अपनी माँ को सफ़ाई देता हुआ- “उस लड़के को पलटकर पत्थर मारने के सिवा मेरे पास कोई रास्ता नहीं था माँ, क्योंकि वह भाग रहा था और मुझे अच्छी तरह पता था कि तुम्हें बताने से कोई फ़ायदा नहीं होता क्योंकि तुम्हारा निशाना तो एकदम कच्चा है...”

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