टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

अच्छाइयों की होली...

होली... बुराइयों की या अच्छाइयों की?

*-*-*
कल रात पूरे देश में होलिका दहन का त्यौहार मनाया गया. बुराइयों को जलाने, खत्म करने के प्रतीक स्वरूप यह त्यौहार मनाया जाता है.

हमारे मुहल्ले में भी होलिका दहन का कार्यक्रम कुछ उत्साही बच्चों-बूढ़ों के सहयोग से साल-दर-साल मनाया जाता है. इस दफ़ा जो लकड़ियाँ एकत्र की गई थीं, वे किसी सूरत जलने दहकने का नाम नहीं ले रही थीं. किसी ने चुटकी ली कि बुराइयाँ आसानी से जलती खत्म नहीं होती हैं. अंतत: होलिका पर ढेर सारा घासलेट उंडेला गया तब वह धू-धू कर जली. मगर, ऐसा लगा कि बुराइयों को जलाने नष्ट करने के प्रतीक स्वरूप इस त्यौहार के जरिए हम अपनी बची खुची अच्छाइयों को भी नष्ट करने पर तुले हुए हैं.

हर साल होलिका के फलस्वरुप टनों लकड़ियाँ बिना किसी प्रयोजन के जला दी जाती हैं. धुआँ, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग तो सेकेण्डरी इफ़ेक्ट हैं. रास्तों – चौराहों पर खुले आम बड़े बड़े लट्ठे जला दिए जाते हैं जो सप्ताहों तक सुलगते रहते हैं, जिससे आम जनता को खासी परेशानी होती है. होलिका दहन पर इस साल भी सारा शहर धुँआमय हो गया था. स्थिति यह थी कि सांस लेने में दिक्कतें आ रही थी.

आस्था पर बुराइयाँ जड़ जमाती जा रही हैं, और हम अपनी अच्छाइयों का होलिका दहन करते जा रहे हैं... साल-दर-साल...
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