सोमवार, 14 मार्च 2005

यादें बचपन की...

अनुगूंज: बचपन के यादों की गूँज...
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मेरी पहली खरीदारी
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उस समय मैं दूसरी कक्षा में पढ़ता था. माँ कोई सब्जी बना रही थी और घर में खड़ी लाल मिर्च खत्म हो गई थी. सब्जी में बघार लगाने के लिए मिर्च जरूरी थी. माँ दूसरे कामों में भी उलझी हुई थी, अत: यह कार्य उसने अपने लाड़ले को डरते डरते सौंपा. हाथ में चार आने का सिक्का दिया और कहा बेटा गली के आगे जो दूकान है वहाँ से चार आने की खड़ी मिर्ची ले आ. ले आएगा ना?

मैं उत्तेजित हुआ, हिरणों की तरह कुलाँचे लगाता दुकान तक पहुँच गया. मेरी निकर जरा ढीली हो रही थी, उसे संभालता हुआ दुकानदार को, जो एक दूसरे ग्राहक से उलझा हुआ था कम से कम दस बार एक ही सांस में बोल गया कि मुझे चार आने की मिर्ची चाहिए.

उस ग्राहक से निपटकर, आखिरकार दुकानदार ने अख़बार के एक टुकड़े में करारे लाल मिर्च को तौलकर पतले से धागे से पुड़िया बांधा और मुझे थमाया. जिस तेजी से मैं आया था, उसी तेजी से कूदता फांदता, एक हाथ में मिर्ची की पुड़िया और एक हाथ में निकर संभाले वापस घर लौटा और सगर्व पुड़िया माँ के हाथ में थमाया. दौड़ते भागते आने के कारण पुड़िया खुल गई थी और उसका धागा लटक रहा था.

माँ को थोड़ा शक हुआ. उसने पुड़िया हाथ में लेते हुए मुझसे पूछा कि मैं कितने पैसे की मिर्ची लाया था, चूँकि पुड़िया में उसे सिर्फ दो मिर्च ही मिली. मैंने कहा – मैं तो पूरे चार आने की मिर्ची लाया हूँ.

इससे पहले कि माँ कुछ और पूछती, वह मुझे लेकर बाहर आई. घर के दरवाजे से आगे गली में लाल मिर्च कतार में गिरे हुए बिखरे पड़े थे. जाहिर है, अपनी पहली खरीदारी की खुशी में मुझे यह भी भान नहीं था कि पुड़िया खुल गई है और मेरी हर कुलाँच में दो-चार मिर्च नीचे गिर रहे हैं.
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