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गंगा भी ज़हरीली हो गई...

गंगा तेरा पानी ज़हरीला...
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मेरे जैसे करोड़ों धर्म-भीरुओं ने गंगा मैया के जल में अपने पापों और दुष्कर्मों को धोने की मंशा में शवों, अस्थियों, फूल-पत्रों, मूर्तियों, सिक्कों और न जाने क्या-क्या सदियों से विसर्जित किए हैं. फ़ैक्टरियों/शहरों के गटरों के विसर्जनों को गंगा में बहाए जाने की बात तो जुदा ही है. नतीजतन गंगा मैया के आँचल का पानी जहरीला तो होना ही था... हमारे इन कर्मों से हमारे पाप धुले नहीं वरन् बढ़े ही हैं. पर क्या हमें कभी इसका भान होगा भी?
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व्यंज़ल
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क्या कुछ नहीं ज़हरीली हो गई
अब ये गंगा भी ज़हरीली हो गई

आखिर कैसे हो क़ौम का इलाज
अब औषध भी ज़हरीली हो गई

अमृत अब से बुझती नहीं प्यास
अपनी लतें ही ज़हरीली हो गई

अंतत: शस्त्रागार बन गई दुनिया
दोस्ती की बातें ज़हरीली हो गई

प्रेमशास्त्र पढ़ जवाँ हुआ था रवि
मेरी चाल कैसे ज़हरीली हो गई
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