शुक्रवार, 11 मार्च 2005

सब धोखेबाज़ हैं यहाँ...

संविधान के साथ धोखाधड़ी...
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झारखंड में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किए जाने से नाराज अर्जुन मुंडा की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए राज्यपाल के फैसले को संविधान के साथ धोखाधड़ी करार दिया है.

इसके साथ ही नेताओं में विधायिका – न्यायपालिका में कौन बड़ा – किसका अधिकार कहां तक का सवाल एक बार फिर खड़ा हो गया है. जहाँ बीजेपी स्वागत कर रही है (चूँकि यहाँ उसके फायदे की बात हो रही है) वहीं तमाम अन्य दल तिलमिलाए हुए हैं कि न्यायालय ओवरएक्टिविज्म दिखा रही है. परंतु न्यायालय को न्याय की परिभाषा फिर से बताने और यह बताने के लिए कि संविधान के साथ धोखाधड़ी राज्यपाल जैसे संविधान प्रमुखों द्वारा किया जा रहा है, किस ने मजबूर किया है? आज की स्तरहीन राजनीति ने, जहाँ सत्ता और कुर्सी की खातिर संविधान तो क्या, लोग अपने आप से भी धोखाधड़ी कर रहे हैं.

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व्यंज़ल
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ये मेरी मासूमियत है धोखाधड़ी नहीं
खुद की सेवा है कोई धोखाधड़ी नहीं

तमाम उम्र रहे हैं तंगहाल तो क्या
तसल्ली तो है किया धोखाधड़ी नहीं

गुजर गया दौर ईमान की बातों का
जीना असंभव जहाँ धोखाधड़ी नहीं

कोई फर्क बचा नहीं पहचानोगे कैसे
क्या छल और क्या धोखाधड़ी नहीं

अमीरों में नाम लिखवाने चला रवि
तारीफ़ है कि आती धोखाधड़ी नहीं
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2 blogger-facebook:

  1. रवि भाई इतना निराश भी क्या होना कि सबको धोखेबाज कह दिया । भारत का राजनीतिक तन्त्र भ्रष्ट है , धोखेबाज है । भारत की ब्यूरोक्रैसी भ्रष्ट है , पर यहाँ की आम जनता भ्रष्ट नही है । भ्रष्ट नेता और बाबू ऐसे भ्रमित करने वाले वक्तव्य देते रहते हैं । यह एक जानीमानी प्रोपेगैन्डा टेक्निक है ।
    ऐसे समान्यीकरण से लोगों का विश्वास डगमगाने का प्रयास किया जता है ।

    लगता है अब राजनीतिक दुराचार अपने चरम पर पहुँच गया है । पाप के ये घडा अब फूटकर रहेगा । उच्चतम न्यायालय का निर्णय एक आशा की ज्योति लेकर आया है । भगवान करे और कुछ सुसुप्त संस्थायें जाग उठें , इस ज्योति के आलोक में ।

    अनुनाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाई अनुनाद,
    ये निराशा में लिखी गई निराश पंक्तियाँ कतई नहीं हैं, बल्कि अपने अंदर झांकने को मजबूर करती, झकझोरती पंक्तियाँ हैं.

    उत्तर देंहटाएं

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