मंगलवार, 1 मार्च 2005

सरकार से डरो भाई...

डरावनी सरकार!

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दैनिक भास्कर के 28 फरवरी के अंक में प्रीतीश नंदी ग्राफ़िक डिटेल में लिखते हैं कि सरकार और उसके नुमाइंदे आम जनता को डराने और तंग करने के अलावा और कुछ खास नहीं करते. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आमतौर पर यह बात सही है. मुझे एक हृदयविदारक घटना याद आती है. पिछली छुट्टियों में रेल सफर के दौरान गांव के एक गरीब परिवार की दास्तान सुनने को मिली. वह अपना गांव छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में शहर को जा रहा था. उस गरीब से रास्ते में कुछ पुलिस वालों ने पैसे उगाह लिए. इस लिए नहीं कि उसके पास टिकट नहीं था. वह भला आदमी तो सही टिकट के साथ यात्रा कर रहा था. उसे इस लिए तंग किया गया चूंकि सरकारी क़ायदे के अनुसार उसे अपना गांव छोड़ने के लिए गांव के सरपंच से लिखवा कर लाना था (क्योंकि शासन ने गांवों से पलायन रोकने के लिए यह क़ानून बनाया है) जो वह नहीं लाया है!

सच है, सरकार डराती और तंग करती है. भले ही वह गांव का ग़रीब हो या प्रीतीश नंदी जैसा शख्स.
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व्यंज़ल
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लोगों को डराती और तंग करती है सरकार
लूली लंगड़ी क़ौम किस तरह से दे ललकार

जनता की सरकार है या सरकार की जनता
सरकार के लिए भी कोई सरकार है दरकार

यह नमूना नहीं था आजादी के दीवानों का
क्या नक़्शे नए होंगे, नए होंगे कभी परकार

मेरा ये मुल्क दौड़ के वहाँ जा पहुँचा है जहाँ
निर्दोषों को करनी होती है दुष्टों की जयकार

एक अकेला तू चला था ईमान के रस्ते रवि
मिलना तो था सारे जमाने का तुझे बदकार
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