मंगलवार, 22 फ़रवरी 2005

मुझे शर्म आती नहीं...

आइए, शर्म से जरा सिर झुकाएँ...
*-*-*


हमारे भारत में एक ईनामी डाकू ददुआ सरेआम एक गांव में एक मंदिर बनवाता है, आसपास ऐलान करता है कि अमुक दिन मंदिर में भगवान की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी. वह गांव वालों समेत सबको निमंत्रण भेजता है और इस आयोजन में पहले से ऐलान कर खुद भी भेष बदलकर पूजा अर्चना में शामिल होता है. और यह सब जानते हुए भी, वोटों की गणित के पीछे विधायक-सांसद (जिनमें उ.प्र. के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह का सांसद भतीजा भी शामिल है) भी उस आयोजन में शामिल होते हैं जिसमें दो लाख (जी हाँ, दो लाख) लोगों की उपस्थिति होती है.

और, हमारे असहाय भगवान अपनी प्राण प्रतिष्ठा का यह नाटक बुत बन कर देखते रहे. अगर भगवान में जान होती, तो वे भी शर्म से डूब मरते.

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व्यंज़ल
*-/-*
राजा नए हुए हैं गूजर हो या ददुआ
मानव या तो मरा पड़ा या है बंधुवा

जाति-धर्म के समीकरणों में उलझा
मेरे देश का नेता हो गया है भड़ुआ

उस एक पागल की सच्ची बातों को
पीना तो होगा लगे भले ही कड़ुआ

अवाम का तो होना था ये हाल, पर
ये क़ौम किस लिए हो गई है रंडुवा

एक अकेला रवि भी क्या कर लेगा
इसीलिए वो भी खाता बैठा है लड़ुवा

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