सोमवार, 31 जनवरी 2005

मेरी तीसरी आँख...

त्रिनेत्र
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अगर यह खबर सच है, कुछेक साल पहले के हर्बल पेट्रोल की तरह गलत खबर नहीं है, तो फिर निश्चित रूप से यह हमारे बहुत काम का है. जिनकी आँखें नहीं हैं, उनके लिए तो ख़ैर यह खोज वरदान है ही, मेरे जैसे लोग जिनकी दो-दो अच्छी-भली आँखें हैं, उनके लिए भी यह वरदान से कम नहीं है.

मैं भी चाहूँगा कि त्रिनेत्र धारी भगवान शिव की तरह मेरे भी तीन नेत्र हों. परंतु वे माथे पर, बीचों-बीच नहीं हों. मैं चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र मेरे सिर के पीछे की तरफ हो, जिससे कि मैं अपने पीठ पीछे बातें करने वालों को देख सकूँ. पीठ-पीछे वार करने वालों से बच सकूँ. और यह देख सकूँ कि मेरे पीठ पीछे क्या-क्या होते रहता है.

कभी मैं यह भी चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र पैरों में ठेठ अँगूठे के पास हो. ताकि मैं देख सकूँ कि देश दुनिया में टेबल के नीचे लेन-देन का व्यापार किस तरह चलते रहता है.

मैं यह भी चाहूँगा कि भोले भंडारी की तरह मेरे तीसरे नेत्र में वह शक्ति प्राप्त हो जिससे समाज की बुराइयों का अंत देखते ही हो जाए, और मेरा वह तीसरा नेत्र हमेशा खुला रहे...
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व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल यानी हज़ल के तर्ज पर)
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समाज को बुरा हमने बनाया दोस्तों
आईना दूसरों को ही दिखाया दोस्तों

जाना था मंजिल-ए-राह में मुद्दतों से
खुद बैठे सबको साथ बिठाया दोस्तों

अपने ही जिले से होकर जिला-बदर
हमने है बहुत नाम कमाया दोस्तों

कल की खबर नहीं किसी को यहाँ
शतरंजी चालें क्यों है जमाया दोस्तों


हममें तो न दिल है न ही जान रवि
अपनी लाश तो कबसे जलाया दोस्तों

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1 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. त्रिनेत्रधारी क्यों…अन्तर्जाल पर बहुनेत्रधारी, शतनेत्रधारी हैं आप…

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