लघुकथा

याचक

भरी दुपहरी में, ज्येष्ठ के महीने में, जब रोहिणी नक्षत्र में सूर्य अपनी पूरी तपन वातावरण में प्रेषित कर रहा था, एक याचक नंगे पाँव द्वार-द्वार जाकर भिक्षा मांग रहा था.

कुछ ने उस याचक की याचनामयी आवाज़ों को गर्मी के भय से अनसुना कर दिया और अपने द्वारों के पट नहीं खोले. कुछ ने उसे लाखों लानतें भी भेजीं, क्योंकि उसने अपनी द्रवित आवाज़ों से लोगों के आराम में खलल पैदा कर दिया था.

कुछ को उसकी याचनामयी आवाज और उसकी बीमार, कृशकाय काया असर कर गई और उसे कुछ-कुछ कहीं से मिल भी गया. एक को उसका दोपहर की तपती धूप में नंगे पाँव याचनारत रहना जरा ज्यादा ही द्रवित कर गया और उसने अपना फटा पुराना जूता जो कचरे के डब्बे में डालने के लिए अलग रख दिया था, निकाला और याचक को दे दिया, ताकि उसके पाँव को तपती धरती से थोड़ी राहत तो मिले.

याचक ने हजारों धन्यवाद देते हुए उस जूते को कृतज्ञता से तत्काल पहन लिया, परन्तु दो द्वारों के आगे जाने के उपरांत उसने उन जूतों को अपने पैर से उतारा और अपने थैले में रख लिया.

वह दानवीर जिसने अपना जूता दिया था, अपने सत्कर्म से गदगद उस याचक को थोड़ा सा आगे जाकर भी देख रहा था कि उसका पुराना जूता भी किस प्रकार एक अच्छे प्रयोजन के लिए काम आ रहा है. परन्तु जब उसने याचक को जूता उतार कर अपने थैले में रखते देखा तो वह पश्चाताप से बुदबुदाया – साला अब उसे कबाड़ी में जाकर बेच देगा.

उधर याचक के मन में विचार दूसरे थे. वह गंभीर था, और सोच रहा था कि अगर वह जूते पहन कर याचना करेगा तो फिर लोगों के मन में दया और करूणा कैसे उपजेगी?

(रविवारीय नव भारत में पूर्व प्रकाशित)

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