शनिवार, 22 जनवरी 2005

व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई...

कितना अंतर है, प्रिय, तुझमें और मुझमें...
प्रिये, मैं और तुम आज कंघे से कंघा मिलाकर बिना किसी जेंडर बायस के हर क्षेत्र में हम साथ साथ हैं और हमारे बीच की भिन्नता प्रायः खत्म हो रही है. परंतु सदियों से चले आ रहे इवाल्यूशन सिद्धांतों पर थोड़ा गौर करें, तो पाते हैं कि अंतर तो है बहुत... और यदि इसे जानें - समझें - स्वीकारें तो हमारा और हमारे समाज का थोड़ा होगा भला...
विभिन्न शोघों से यह सिद्ध हो चुका है कि आदतन*...
• पुरूष टीवी के अलग अलग चैनल बदल कर खुश होते हैं. महिलाएँ एक ही चैनल शांतिपूर्वक देखना पसंद करती हैं
• पुरूष शराब जैसी तीख़ी चीजें पसंद करते हैं, युद्ध करने में उन्हें आनंद आता है (इसी लिए डबल्यूडबल्यूएफ़ बहुत चलता है). इसके विपरीत महिलाएँ मीठे पदार्थ पसंद करती हैं एवं खरीदारी में उन्हें आनंद आता है.
• महिलाएँ जानती हैं कि वे कितने समझदार हैं, जबकि पुरूष सिर्फ सोचते हैं कि वे बहुत समझदार हैं.
• पुरूषों के मस्तिष्क की सुप्तावस्था में 70 प्रतिशत विद्युतीय गतिविधियाँ बन्द रहती हैं. जबकि महिलाओं के मामले में सिर्फ 10 प्रतिशित विद्युतीय गतिविधियाँ बन्द रहती हैं.
• महिलाओं में दाएँ बाएँ ऊपर नीचे देखने की क्षमता पुरूषों की तुलना में ज्यादा होती है. महिलाओं में कुछ मामलों में तो यह 180 अंश के कोण तक होती है. पुरूष सिर्फ सीधे दूरबीन की तरह देख पाते हैं. यही वजह है कि पुरूष महिलाओं को घूरते प्रतीत होते हैं, जबकि महिलाएँ देखती भी हैं तो पता नहीं चलता कि देख भी रही हैं या नहीं.
• महिलाओं की दृष्टि अंधेरे में भी देश पाने में सक्षम होती है. पुरूष अधिक दूर की चीजें देख पाने में सक्षम होते हैं.
• कम समय में ही महिलाएँ किसी नए स्थान पर भी कमरे में मौजूद स्त्री पुरूषों के आपसी संबंधों के बारे में अपनी छठी इन्द्रिय से भांप लेती हैं.
• पुरूष लाख कोशिश कर लें, उन्हें महिलाओं के सामने झूठ बोलने में कठिनाई होती है, तथा वे आदतन, बिना किसी कारण के अक्सर झूठ बोलते हैं.
• महिलाओं की सुनने की क्षमता पुरूषों से अधिक होती है. वे एक ही समय में फोन भी सुन सकती हैं, किसी को कुछ बता भी सकती हैं, और अपने हाथों से कढ़ाई का काम भी जारी रख सकती हैं. वाकई मल्टीटास्किंग, मल्टीथ्रेडिंग मशीन हैं महिलाएँ. जबकि पुरुष फोन उठाते ही यह चाहता है कि सभी खामोश हो जाएँ. पुरुष का दिमाग सिंगल टास्किंग के लिए बना है.
• चेतावनी: महिलाओं में यह क्षमता होती है कि वे सामने वाले व्यक्ति के अंतर्मन की बातें बगैर कहे सुने जान लेती हैं
• पुरुष पशुओं की भाषा समझने में चतुर होते हैं
• पुरुषों का मस्तिष्क किसी वस्तु के बारे में सुनकर विवरण जानने में सक्षम नहीं होता है.
• महिलाएँ अपनी समस्याओं से छुटकारा लगातार बोलकर करती हैं तो पुरूष समस्या आने पर गूढ़ चिंतन में डूब कर चुप रहना पसंद करते हैं.
• महिलाएँ वस्तुओं का चुनाव करते समय पुरुषों की सलाह नहीं चाहती हैं, वे बस उसकी सहमति चाहती हैं.
• महिलाओं को दिनभर में सम्प्रेषण के लिए बोलने के लिए करीब 20,000 शब्द चाहिए जबकि पुरुषों को केवल 7,000 शब्द. दिन के अन्त में महिलाएँ अपने कोटे के शब्दों को बोलकर पूरा करने पर ही संतुष्ट हो पाती हैं. इस समय उन्हें चर्चा या राय नहीं चाहिए होता है. वे बस चाहती हैं कि उन्हें बोलने दिया जाए. किसी घटना को वे ग्राफिक डिटेल में बताती हैं जबकि पुरूष एकाध वाक्य में घटना का विवरण बता देते हैं.
• क्रोध आने पर महिलाएँ बस बोलने लगती हैं और पुरूष भविष्य की चिंता किए बगैर आक्रमण कर देते हैं. परिणाम स्वरुप 90 प्रतिशत अपराधी पुरुष होते हैं.
• पुरुष अपनी दृष्टि से गोलाकार आकार, उभार व उत्तेजक चित्रों से प्रभावित होते हैं, जबकि महिलाओं को मीठे शब्द, प्रशंसा आदि प्रभावित करती हैं.
• महिलाओं में प्रेम के आवेग प्राकृतिक पुनरुत्पादन के आधार पर चक्रीय रुप से आते हैं, जबकि पुरुषों में स्थायी होते हैं.
• महिलाओं में प्रेम के आवेगों को पहचानने की क्षमता होती है, वे प्रेम के उतार चढ़ाव को पहचान लेती हैं. उनमें यौन व प्रेम मस्तिष्क से सम्बन्धित होता है, जबकि पुरुषों में शरीर से.
• महिला व पुरुषों में यदि समान स्वभाव हो तो ऐसे सम्बन्ध नीरस हो सकते हैं, जबकि विपरीत स्वभाव सम्बन्धों को एडवेंचरस, रोचक तथा स्थाई बनाता है.
• हमारी सारी भावनाएँ – प्रेम, दुःख, प्रसन्नता इत्यादि सभी हमारे स्नायु तंत्र के बायोकेमिकल व्यवहार पर आधारित होते हैं, जिन्हें केमिकल/औषधियों द्वारा बदला जा सकता है.
देखा ना प्रिये... कितना अंतर है... यही नहीं इनके अलावा और भी ढेरों भिन्नताएं हैं मुझमें और तुझमें .... तो अबकी, टीवी के सामने बैठकर, तुम्हारी गपशप को सुना-अनसुना, हॉ-हूं करता हुआ मैं अगर चैनल सर्फिंग करूं और तुम्हारी सास बहू की सोप ऑपेरा और मेरी फैशन टीवी में व्यवधान आए तो उचित यही है यह समझ लेना कि हम बने ही ऐसे हैं... भिन्नताएं लिए हुए.

• संदर्भः एलन और बारबरा पीस की पुस्तक ‘व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई’
• हिन्दी में निचोड़: राजेन्द्र कुमार पाण्डेय
• कुछ अंश मासिक पत्रिका वनिता में पूर्व-प्रकाशित

3 blogger-facebook:

  1. रविजी,

    सर्वप्रथम, इस अति संवेदनशील विषय पर अपने चिठ्ठे में लिखने के लिए आपकी वीरता के लिए आपका साधुवाद । मैने इस पुस्तक को इंटरनेट पर से खरीदने के लिए, कुछ एक वेब-स्थलों पर खोजा । फ़िलहाल यह फ़ैबमाल.कॉम (http://www.fabmall.com) पर उपलब्ध है, जहाँ इसका मूल्य रू० १९५ दिया है ।

    साथ ही, "कुछ बतकही हिन्दी में" नामक अपने चिठ्ठे में आपका स्वागत करना चाहूँगा । आपके चिठ्ठे को नियमित पढ़ते हुए, मैने भी
    कुछ लिखने का प्रयास किया है । इसे और अधिक परिष्कृत करने के लिए, आपके सुझाव आग्रहित है ।

    धन्यवाद ।

    धनञ्जय शर्मा
    जामनगर, भारत ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. dhanyabad aab is kitab ko padne ke kya jaroorat hai aapne hi pura nichod bata diya. kya hai kitaben padhne main alali jo aati hai.

    उत्तर देंहटाएं

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