टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

मैं खुश नहीं हूँ...

कृत्रिम खुशी ¿

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आउटलुक पत्रिका के ताज़ा अंक में एक सर्वेक्षण प्रकाशित किया गया है जिसमें बताया गया है कि आम भारतीयों में से 75% खुश हैं. आश्चर्य. घोर आश्चर्य.

लगता है सर्वेक्षण के ये नतीजे भी पिछले लोकसभा चुनावों के एक्ज़िट पोल के नतीज़ों की तरह सिरे से ग़लत हैं.

कारण, मैं कतई खुश नहीं हूँ. कतई नहीं. मैं खुश भी कैसे हो सकता हूँ ? मैं तो इस ग्रह का महादुःखी प्राणी हूँ, और मेरे जैसों का प्रतिशत कम कतई नहीं हो सकता. मेरे दुःखी, महादुःखी होने के कारण कई हैं. कुछ आपके सामने पेश करता हूँ:

• मेरे शहर में दिन में छ: घंटे (जी हाँ, दिन में, काम के समय) घोषित बिजली कटौती होती है और अघोषित दो-तीन घंटे अतिरिक्त. अंधेरे में काम करिए और खुश रहिए... पूरे भारत में (कुछ क्षेत्र को छोड़कर) यही हाल है. मैं खुश नहीं हो सकता.
• मेरे देश में मुम्बई-पूना हाइवे जैसा सिर्फ एकमात्र सड़क है. जबकि बाकी जगह सड़कें गड्ढों, भारी ट्रैफ़िक और सिंगल लेन के कारण बेहाल हैं. मैं रतलाम से इंदौर के बीच की 100 कि.मी. की दूरी (तथा कथित राष्ट्रीय राजमार्ग से) छ: घंटे में भी पूरी नहीं कर पाता हूँ. मैं खुश नहीं हो सकता...
• आउटलुक पत्रिका के उसी अंक में भीतर के पृष्ठों पर लिखा गया है कि भारत की 40 प्रतिशत जनता घोर गरीबी में जूझ रही है, जिसके पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ बमुश्किल हो पाता है. फिर 75 प्रतिशत लोग जिनमें, जाहिर है, भूखे भी शामिल हैं, अगर खुश हैं, तो आश्चर्य है. पर मैं भूखा खुश नहीं हो सकता.
• जापान चालीसवें दशक में युद्ध से नेस्तनाबूद हो चुका था. भारत के हालात तो बेहतर ही थे. अब साठ साल बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने में जापान तरक्की कर बुलेट ट्रेनें दौड़ाता है, (जबकि वहाँ नेचुरल रिसोर्सेस की खासी कमी है) जहाँ पिछले चालीस सालों में कोई ट्रेनें आपस में नहीं भिड़ीं. भारत में पुरानी, सिंगल पटरी पर मरियल चाल से दौड़ती ट्रेनें भी आपस में भिड़ती रहती हैं. ऐसी ट्रेनों में डरते-डरते यात्रा करते हुए मैं खुश नहीं हो सकता.
• ऐसे उदाहरण सैकड़ों हैं जिनका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. मैं खुश नहीं हो सकता.
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ग़ज़ल
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सितम की इंतिहा में भी खुश हैं
दर्द तो है दिल में मगर खुश हैं

कर आए हैं बोफ़ोर्स सी नई डील
इसीलिए आज वो बहुत खुश हैं

यारी न दुश्मनी पर जाने क्यों
दर्द मेरा देख के वो अब खुश हैं

वो तो ख़ालिस दर्द की चीखें थीं
गुमान ये था हो रहे सब खुश हैं

भूखी बस्ती में उत्सव कर रवि
चिल्लाए है वो कि हम खुश हैं

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विषय:

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खुश तो हम भी नहीं…

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