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मोबाइल भी चला हिन्दी में...

ना फिसल पकड़

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भारतीय भाषाओं के दिन निश्चित ही वापस गए हैं. पहले पहल नोकिया के मोबाइल में हिन्दी आया और अब सेमसंग ने अपने नए मोबाइल में तीन अन्य भारतीय भाषाओं क्रमश: हिन्दी, मराठी तथा तमिल को भी शामिल किया है. अगर हम अपने मोबाइल से अपनी मातृभाषा में बात करते हैं, तो इसका मेन्यू और मैसेंजिंग सेवाएँ अँग्रेज़ी में क्योंकर अनिवार्य होना चाहिए?

इसी तरह भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम में भी हिन्दी और पंजाबी (उत्तर भारत में) के विकल्प उपलब्ध हैं, और उपयोग में बड़े ही आसान हैं. इनमें भी नई भाषाएँ जुड़ती जा रही हैं.

मगर, कुछ सीधे अनुवाद, जैसे कि नोकिया का ‘ना फिसल पकड़’ जो कि ‘एन्टी स्लिप ग्रिप’ का अनुवाद है, बड़ा ही ऊटपटाँग सा है. इसके बजाए हिन्दी की खूबसूरती को बरकरार रखते हुए अनुवाद किए जाने चाहिएँ, यथा- ‘पकड़ ऐसी जो छूटे नहीं’ अन्यथा लोग हिन्दी (या अन्य कोई भी भारतीय भाषा) को हिकारत और अनुपयोगी नजरों से ही देखते रहेंगे. फिर भी, शुरूआत तो हुई ही है, और इसके सुधरने में ज्यादा कुछ लगेगा नहीं...

टिप्पणियाँ

  1. रवि जी, ये बात सही है कि मो्बाइल कंपनियां हिन्दी में मोबाइल ला रही हैं, खासतौर पर नोकिया और सैमसुंग, हो सकता है कि ये कंपनियां अपने देश में अपनी ही भाषा में बेचती हैं इसलिये इन्होंने भारत में भी उसी तरह से लाने की कोशिश की है। लेकिन हिन्दी में कुञ्जीपटल इत्यादि आने के बावजूद भी लोग अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करते हैं। मेरी पहचान के कई लोग ऐसे हैं कि जिनके मोबाइल में हिन्दी का विकल्प है पर प्रयोग वो अंग्रेजी का ही करते हैं। कारण: हिन्दी पढ़ना और समझना बहुत मुश्किल है, ये बात अलग है कि लोगों के लिये अंग्रेजी जितनी कठिन होती जाती है उतनी ही सुंदर होती जाती है और हिन्दी हो जाती है क्लिष्ठ।

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  2. आशिष जी का अन्तिम वाक्य तो गजब है…सच है। जो जितने कठिन या असाधारण शब्द अंग्रेजी के बोल ले ताकि सामने वाला न समझ सके और उससे पूछे ताकि उसे लगे कि वह कुछ है, वह उतना ही महान है। उसे हमारे यहाँ अच्छी अंग्रेजी, अच्छी भाषा, अच्छी पकड़ कहते हैं।

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