मंगलवार, 4 जनवरी 2005

नक़ली इबादतें...

दिखावटी प्रार्थना
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पिछले दिनों बीजेपी के बड़े, नामी-गिरामी नेता, जिनमें आडवाणी तथा संघ और जागरण मंच के गोविंदाचार्य भी शामिल थे, कामाक्षी मंदिर में एकत्र हुए और शंकराचार्य की जल्द रिहाई के लिए पूजा अर्चना की.

हे भगवान! यह कैसा घोर कलियुग आ गया है. जो शंकराचार्य उठते बैठते भगवत् भजन में लगे रहते थे और जिनके साथ हमेशा भगवत् रूपी दंडिका साथ रहती है, उनकी रिहाई के लिए उसके भक्त जन माँ कामाक्षी से प्रार्थना कर रहे हैं. कैसा उल्टा पुल्टा कार्य हो रहा है ईश्वर. प्रलय आने में, लगता है देर नहीं है.

अगर माँ कामाक्षी अपनी पूजा अर्चना से प्रसन्न होतीं तो शंकराचार्य कभी भी जेल के सींखचों के पीछे नहीं होते. बीजेपी को भी यह बात मालूम है. परंतु वोटों के गणित में वे अपने समीकरण लगाने में लगे हैं. जनता भी जानती है, परंतु आप कब तक भोली, मासूम जनता को मूर्ख बना सकते हैं? जब पेट में दाना नहीं होगा तो राम का मंदिर कैसे याद आएगा.

हे माँ कामाक्षी, तू सबकी प्रार्थनाओं में छिपी भावनाओं को बखूबी जानती है. मेरी तुझसे प्रार्थना है कि इस सुंदर धरा को पंडित-मौलवी जैसे पैरासाइटों से तथा जनता को मूर्ख बनाने वाले राजनेताओं से शीघ्र छुटकारा दिला.

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ग़ज़ल
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सच कब की खो चुकी है प्रार्थनाएँ
जनता देखे है आपकी आराधनाएँ

अब बन्द भी कर दो आँसू बहाना
बहुत देख चुके नक़ली सम्वेदनाएँ

हर किसी ने राह है अपनी बनाई
कुछ असर है नहीं डालती वर्जनाएँ

मिलना है सबको इस मिट्टी में
आओ बैठें खिली धूप में गुनगुनाएँ

ये भूलता क्यों है रवि जिंदगी के
दिन हैं चार क्या वह भी गिनाएँ

2 blogger-facebook:

  1. प्रलय भाजपा में तो आ ही चुकी है| चेहरा , चाल और चरित्र का ढोंग तो ईन लोगो के शासन में उतर गया जब यह नपुंसक नेता न तो कश्मीर को विशेष दर्जे पर कुछ कर पाये नही इनकी उँगली अवैध बाँगलादेशीयों पर हिली| जब हमारे जवान जानवरों की तरह बाँगलादेश से टाँग कर लाये गये तो इनकी घिग्घी बंद गयी| जब काँधार में जहाज गया तो ये वहाँ जाकर सौदेबाजी कर रहे थे| यह सिर्फ घर के मुसलमानों पर दहाड़ना जानते हैं, पाकिस्तान और बांगलादेश के सामने इनकी पैंट ढीली हो जाती है| जब सरकार चली गयी तो सारे मुद्दे फिर याद आ गये| एक वाक्या मैं भी लगे हाथ सुना देता हूँ जो भाजपा के विकासपुरूष का मुखौटा उतार फेंकने के लिए काफी है| उत्तर भारत के मैनचेस्टर रहे कानपुर में एक के बाद एक मिले और फैक्ट्रियाँ बँद हो गई| कारण जो भी हों, पर मजदूरों के भूखे परिवारों ने किसी का क्या बिगाड़ा है जो अर्थशास्त्री उनके पुनर्वास का ईंतजाम किये बिना उन्हें सड़क पर लाने पर अमादा हैं| हमारे कविराज विकासपुरूष कानपुर के फूलबाग में 1998 लोकसभा चुनाव में वादा कर रहे थे कि हम बंद मिले की चिमनियों और मजदूरों के बुझे चूल्हे से धुँआ फिर से निकलवायेंगे| विकासपुरूष तो प्रधानमंत्री बन गये और उड़ाते रहे दावतें मुशरर्फ के साथ, पर न बंद मिले की चिमनियों से धुआँ निकला न मजदूरों के बुझे चूल्हों से| एक प्रतिनिधिमंडल गया था उन्हे वादा याद दिलाने दिल्ली | किसी ने कहा "बाजपेयी जी, आपने तो फूलबाग में वादा किया था|" तो यह विकासपुरूष बोला "अच्छा , तो अगली बार से मैं सोचसमझ कर वायदे करूँगा|" खैर हम उत्तर प्रदेश वाले वायदा निभा रहे हैं और इन नालायकों को ७० सीटों से ३५ और अब १० सीटों पर ले आये हैं|

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  2. सँपकटी का इलाज करने वाले को काटा साँप…

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