टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

2005

परिवर्तन का दूसरा नाम जिंदगी है...
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ब्लॉगर के इस ब्लॉग को नया होस्ट भाई ईस्वामी की महती कृपा से मिला है, जो थोड़ा सा तेज़ तो है ही, ज्यादा सुविधाओं युक्त वर्ड प्रेस पर भी आधारित है. वहाँ यह नए रूप-रंग और नाम से अवतरित हुआ है. पर मूल स्वरूप लगभग यही रहेगा. आपको थोड़ी सी असुविधा तो होगी, जिसके लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ, परंतु गुज़ारिश है कि आप अपने पसंदीदा / बुकमार्क / पुस्तचिह्न को इस नई कड़ी पर बदल लें. हालाकि यह वर्तमान ब्लॉग एक अभिलेखागार के रूप में तो मौज़ूद रहेगा ही, और महीने के अंत में यत्र-तत्र छपी मेरी समस्त रचनाएँ यहाँ अवतरित होंगीं.

कोशिश रहेगी नियमित लेखन की, महीने में कम से कम 20-25 चिट्ठे, इस साल –(2005) के पूरे होते तक.

तो, प्रतिदिन पढ़ते रहिए : छींटे और बौछारें – टेढ़ी दुनिया पर तिरछी नज़र

धन्यवाद.

ये देश मलाईदार!

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सदियों पहले भारत, सोने की चिड़िया कहलाता था. जब वास्को डि गामा, भारत के लिए समुद्री रास्ता ढूंढ कर वापस पुर्तगाल पहुँचा था तो पुर्तगाल में महीनों तक राष्ट्रीय जश्न मनाया गया था- सिर्फ इसलिए कि अमीर-सोने की चिड़िया – भारत - से व्यापार-व्यवसाय का एक नया, आसान रास्ता खुला जिससे पुर्तगालियों का जीवन स्तर ऊँचा उठ जाएगा.

तब से, लगता है, यह जश्न जारी है. पुर्तगालियों के बाद अंग्रेजों ने जश्न मनाए और उसके बाद से मलाईदार विभाग वाले नेता-अफ़सरों द्वारा जश्न मनाए जाने का दौर निरंतर जारी है.

सोने की यह चिड़िया आज लुट-पिट कर भंगार हो चुकी है, परंतु उसमें से भी मलाई चाटने का होड़ जारी है.
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व्यंज़ल
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सभी को चाहिए अनुभाग मलाईदार
कुर्सी टूटी फूटी हो पर हो मलाईदार

अब तो जीवन के बदल गए सब फंडे
कपड़ा चाहे फटा हो खाइए मलाईदार

अपना खाना भले हज़म नहीं होता हो
दूसरी थाली सब को लगती मलाईदार

जारी है सात पुश्तों के मोक्ष का प्रयास
कभी तो मिलेगा कोई विभाग मलाईदार

जब संत बना रवि तो चीज़ें हुईं उलटी
भूखे को भगाते अब स्वागत मलाईदार

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एक माइक्रॉन मुस्कान:
एक बच्चा अपनी माँ को सफ़ाई देता हुआ- “उस लड़के को पलटकर पत्थर मारने के सिवा मेरे पास कोई रास्ता नहीं था माँ, क्योंकि वह भाग रहा था और मुझे अच्छी तरह पता था कि तुम्हें बताने से कोई फ़ायदा नहीं होता क्योंकि तुम्हारा निशाना तो एकदम कच्चा है...”

प्रकृति की होली (2)
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रंगों के त्यौहार होली पर मालवा अंचल – इन्दौर के आसपास का इलाक़ा जरा ज्यादा ही रंगीन हो जाता है. होली के पाँच दिन बाद रंगपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है जिसमें फिर से एक बार रंगों से एक दूसरे को डुबोया जाता है. कहीं कहीं ‘गेर’ निकलती है जो एक प्रकार का बैंड-बाजों-नाच-गानों युक्त जुलूस होता है जिसमें नगर निगम के फ़ायर फ़ाइटरों में रंगीन पानी भर कर जुलूस के तमाम रास्ते भर लोगों पर रंग डाला जाता है. जुलूस में हर धर्म के, हर राजनीतिक पार्टी के लोग शामिल होते हैं, प्राय: महापौर (मेयर) ही जुलूस का नेतृत्व करता है.

प्रकृति भी इस समय जम कर होली मनाती है. मेरे घर आँगन के एक गमले में खिले ये पुष्प भी होली और रंग पंचमी की शुभकामनाएँ देते प्रतीत होते हैं....



इस चित्र को पूरे आकार में यहाँ देखें

होली... बुराइयों की या अच्छाइयों की?

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कल रात पूरे देश में होलिका दहन का त्यौहार मनाया गया. बुराइयों को जलाने, खत्म करने के प्रतीक स्वरूप यह त्यौहार मनाया जाता है.

हमारे मुहल्ले में भी होलिका दहन का कार्यक्रम कुछ उत्साही बच्चों-बूढ़ों के सहयोग से साल-दर-साल मनाया जाता है. इस दफ़ा जो लकड़ियाँ एकत्र की गई थीं, वे किसी सूरत जलने दहकने का नाम नहीं ले रही थीं. किसी ने चुटकी ली कि बुराइयाँ आसानी से जलती खत्म नहीं होती हैं. अंतत: होलिका पर ढेर सारा घासलेट उंडेला गया तब वह धू-धू कर जली. मगर, ऐसा लगा कि बुराइयों को जलाने नष्ट करने के प्रतीक स्वरूप इस त्यौहार के जरिए हम अपनी बची खुची अच्छाइयों को भी नष्ट करने पर तुले हुए हैं.

हर साल होलिका के फलस्वरुप टनों लकड़ियाँ बिना किसी प्रयोजन के जला दी जाती हैं. धुआँ, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग तो सेकेण्डरी इफ़ेक्ट हैं. रास्तों – चौराहों पर खुले आम बड़े बड़े लट्ठे जला दिए जाते हैं जो सप्ताहों तक सुलगते रहते हैं, जिससे आम जनता को खासी परेशानी होती है. होलिका दहन पर इस साल भी सारा शहर धुँआमय हो गया था. स्थिति यह थी कि सांस लेने में दिक्कतें आ रही थी.

आस्था पर बुराइयाँ जड़ जमाती जा रही हैं, और हम अपनी अच्छाइयों का होलिका दहन करते जा रहे हैं... साल-दर-साल...

सर्वाधिक भ्रष्ट?


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अब तक आदमी या तो ईमानदार होता था या भ्रष्ट होता था. परंतु आज के दौर में भ्रष्टता की भी कैटेगरी भाई लोगों ने बना ली है. यूपी के पूर्व प्रमुख सचिव अखंड प्रताप सिंह, जो अपने ही साथी अफ़सर बंधुओं के द्वारा “उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक भ्रष्ट अफसर” के शानदार खिताब से नवाज़े जा चुके थे, अंतत: सीबीआई की नज़रों में आ ही गए.

सवाल यह है कि सर्वाधिक भ्रष्ट का अर्थ क्या है? क्या इसके लिए कोई पोल - कोई वोटिंग हुई थी? सर्वाधिक भ्रष्ट के लिए कोई पैजेंट हुआ था? इस खिताब को पाने के क्या मापदंड थे? अगर यह अफसर सर्वाधिक भ्रष्ट था, तो उससे कम भ्रष्ट और न्यूनतम भ्रष्ट अफसर भी वहाँ होंगे. क्या सर्वाधिक भ्रष्ट उसे माना गया जो किसी काम के तय रेट से दस गुना या बीस गुना ज्यादा रिश्वत लेता था, या रिश्वत लेते समय वह अपने ख़ून के रिश्तों की भी परवाह नहीं करता था? या, किसी दिए गए वित्तीय कालखंड में उसने सबसे ज्यादा पैसे बनाए? अगर यह मापदंड जारी कर दिया जाता तो और दूसरे स्टेट के अफसरों का भी भला हो जाता.

जब मैं सरकारी सेवा में था, तो एक सीनियर इंजीनियर शर्माजी के बारे में लोग कहा करते थे कि बहुत भ्रष्ट है साला. कहा जाता था कि वे सीआर (गोपनीय चरित्रावली, सरकारी विभागों में ‘चरित्र’ गोपनीय ही होता है!) लिखने के भी पैसे लेते थे. उनके बारे में एक किस्सा प्रचलित था. एक बार उसका एक मातहत 3 अप्रैल को किसी अन्य विभाग में ट्रांसफर हो गया. उस मातहत ने सोचा कि 3 दिन का क्या सीआर और कैसे पैसे. परंतु शर्माजी ने पैसे के अभाव में 3 दिन के लिए एडवर्स रिमार्क लिख दिए. इसके विपरीत एक अन्य शर्माजी खासे ईमानदार माने जाते थे. उनका मोटो था पैसे के पीछे भागो नहीं, और अगर आता है तो छोड़ो नहीं.

अर्थ यह कि ईमानदारी कहीं गुम हो चुकी है. अब तो हमें भ्रष्ट, कम भ्रष्ट, ज्यादा भ्रष्ट या सर्वाधिक भ्रष्ट बन के रहना होगा.

ताजमहल पर मालिकाना हक?


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एक ख़बर के अनुसार, ताजमहल के निर्माण के 250 वर्षों के पश्चात्, आगरा के शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड में उस के मालिकाना हक को लेकर तलवारें खिंच गईं हैं. हर एक की दलील यह है कि ताजमहल वस्तुत: उनके पंथ के व्यक्तियों की कब्र है, अत: मालिकाना हक उन्हीं का है. बोर्डों ने अपने-अपने दावे सरकार को सौंप दिए हैं. चर्चे हैं कि ताजमहल की मोटी वार्षिक आय पर निगाहें हैं. शहंशाह शाहजहाँ ने जिस प्रेम की अभिव्यक्ति की ख़ातिर इस खूबसूरत स्मारक का निर्माण करवाया था, उन्हें सपने में भी यह भान नहीं रहा होगा कि ताजमहल, ताज कॉरीडोर और मालिकाना हक जैसे छुद्र, विवादों में फँसता रहेगा.

अब अगर ऐसे दावे करने का हक किसी का बनता है, तो शीघ्र ही लाल क़िला और कुतुब मीनार पर भी दावे-प्रतिदावे करने वाले चले आएँगे. ये स्मारक विश्वधरोहर हैं, और इनपर किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा मालिकाना हक जताया जाना हास्यास्पद है. दरअसल, ताजमहल जैसे स्मारकों पर तो विश्व की प्रत्येक जनता का मालिकाना हक है.
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व्यंज़ल
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खुद पर नहीं अपना मालिकाना हक है
जताने चले जग में मालिकाना हक है

लोग कहते हैं ये मुल्क है तेरा अपना
बेघर तेरा बेहतरीन मालिकाना हक है

यहाँ खूब झगड़ लिए राम रहीम ईसा
वहाँ नहीं किसी का मालिकाना हक है

दिलों में दूरियाँ तब से और बढ़ गईँ
जब से प्रकट किया मालिकाना हक है

ले फिरे है अपनी रूह बाज़ारों में रवि
मोटे असामी का ही मालिकाना हक है
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प्रकृति की होली
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फ़ाल्गुन के महीने में प्रकृति भी अपनी रंग-बिरंगी छटाएँ बिखेरती है. जहाँ देखें वहीं फूलों की बहार. टेसू तो हर ओर ऐसे दीखते हैं, जैसे जंगल में अग्निदेवता साक्षात् उतर आए हों. प्रकृति आपके तन-मन में रंगीनियाँ भरने को आतुर प्रतीत होती है.

पुष्पों के नियमित-अनियमित-सिमिट्रिकल रूप और रंग विन्यास दर्शकों के तन-मन को झंकृत-चमत्कृत तो करते ही हैं, अपनी भीनी-भीनी खुशबुओं की छटा से वे हमें मदमस्त भी करते हैं.

इस पुष्प को देखिए और मदमस्त होइए:



यह चित्र अपने पूरे आकार में यहाँ मौज़ूद है जिसे डाउनलोड कर आप अपना डेस्कटॉप वालपेपर बना सकते हैं.

व्यंग्य
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एवरीथिंग ऑफ़िशियल अबाउट क्रिकेट
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इससे पहले मैं क्रिकेट देखता सुनता नहीं था. खेलना तो खैर, दूर की बात है. परंतु जब सुना कि मियाँ मुशर्रफ़ क्रिकेट देखने भारत आ रहे हैं तो लगा कि क्रिकेट में कुछ तो होगा कि लोग दीवाने बने फिरते है. तो इस बार देखा. सुना था कि क्रिकेट इज़ ए फनी गेम. येप, इट इज़, जेंटलमेन. सचमुच दूसरे किसी भी खेल में मज़े का अंश उतना नहीं रहता जितना क्रिकेट में होता है. हॉकी, फ़ुटबाल से लेकर जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स – किसी भी खेल को लीजिए, उसमें खेल का मज़ा होता है. परन्तु क्रिकेट में तो मज़ा ही मज़ा होता है. मजे का खेल होता है.

क्रिकेट के बारे में मैंने पिछले कुछ दिनों में तमाम अध्ययन किए, काफ़ी कुछ देखा, सुना और बहसें कीं. राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, स्थानीय क्रिकेट पत्र-पत्रिकाओं तथा क्रिकेट विशेषांकों का अध्ययन किया, इंटरनेट की क्रिकेट से सम्बन्धित तमाम साइटों की खाक छान डाली, टीवी पर लाइव मैचेस देखे, और साथ ही साथ रेडियो पर आँखों देखा हाल भी सुना. यही नहीं, मैंने अपने मुहल्ले में गली क्रिकेट भी खेली. प्रत्येक मैच के प्रारम्भ होने से पहले, मैच के दौरान और मैच के बाद मैच के बारे में विशेषज्ञों द्वारा किए गए विश्लेषणों का गहन चिंतन-मनन और विश्लेषण किया. क्रिकेट मैच की तरह ये भी खासे मज़ेदार रहे. इस प्रकार मेरे पास क्रिकेट के बारे में ढेर सारी, अच्छी खासी ज़ानकारी एकत्र हो गई जिनमें मेरे अपने क्रिकेट के अनुभव भी शामिल हैं.

क्रिकेट के अपने अनुभवों का गहराई से विश्लेषण करने पर मैंने पाया कि मेरे पास भी क्रिकेट के बारे में बोलने बताने को काफी कुछ है. मैं इससे आपको वंचित नहीं करना चाहता, और चाहता हूँ कि आप भी मौक़े का कैच पकड़ें और जानें समथिंग ऑफ़ीशियल अबाउट क्रिकेट-

क्रिकेट एकमात्र ऐसा खेल है, जो किसी जमाने में बहुत पहले सिर्फ मैदानों में खेला जाता था. अब गली मोहल्लों – भीड़ भरी सड़कों से लेकर रेडियो, टीवी-प्रसारणों, पत्र-पत्रिकाओं के स्तम्भों-विशेषांकों, राजनीति और सट्टे – यानी यत्र-तत्र-सर्वत्र खेला जाने लगा है. अब तो क्रिकेट - खेल से भी आगे जाकर क्रिकेट डिप्लोमेसी तक पहुँच गया है, जहाँ एक देश के संबंध क्रिकेट के कारण एक दूसरे से बनते बिगड़ते रहते हैं. परंतु क्रिकेट को लेकर ये बातें विश्व के कुछ दर्जन-भर राष्ट्रों में ही लागू है, जिनमें भारत-पाकिस्तान प्रमुख हैं.

इस खेल में सिर्फ हार या सिर्फ जीत ही महत्वपूर्ण होती है, खेल नहीं. अगर किसी देश की टीम हार जाती है तो उस टीम के विरूद्ध उनके देश में धरना प्रदर्शन तो होते ही हैं, गाहे बगाहे धोखेबाज़ी, भ्रष्टाचार और मैच फ़िक्सिंग के आरोप भी लगाए जाते हैं. जाँच की मांग की जाती है. टीम का जो सदस्य हार का जिम्मेदार माना जाता है, उसका घर से निकलना दूभर हो जाता है, लोग उसके घर में पत्थरों की बौछारें तक करने लगते हैं. मैदानों में तो पत्थरबाजी आम बात है ही. अगर टीम जीत जाती है तो उसे इनामों से लाद दिया जाता है, प्रशंसा के पुल बाँध दिए जाते हैं. परंतु हर दूसरे मैच में हार-जीत की यह स्थिति टॉगल होती रहती है. यह एकमात्र ऐसा खेल है, जिसके खेलने वालों की संख्या सैकड़ों में है, लाखों इसे देखते हैं और इसके विशेषज्ञ करोड़ों में (यानी, लगभग हर कोई) हैं. कोई भी अपनी विशेषज्ञता पूर्ण राय दे सकता है कि टॉस का फैसला या पहले खेलने का फैसला कुछ दूसरा लिया गया होता तो मैच का परिणाम कुछ दूसरा होता. यानी खिलाड़ी की कैपेबिलिटी, टीम की कैपेबिलिटी ज्यादा मायने नहीं रखती. क्रिकेट में मायने रखता है – टॉस, अम्पायर, विकेट, मौसम और सट्टा.

क्रिकेट के बारे में कहा जाता है कि मैच की आखिरी गेंद फेंकी जाने तक भी मैच के भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. सत्य को डिफ़ाइन करने का इससे उचित वाक्य हो ही नहीं सकता. भले ही एक गेंद बची हो और मैच जीतने के लिए डेढ़ सौ रन बनाने हों, तब भी कयास लगाए जाते हैं, पूर्वानुमान लगाए जाते हैं और विश्लेषण किया जाता है कि अगर पानी गिर गया या अँधेरा हो गया तो मैच रूक जाएगा और यह टीम रन औसत के आधार पर जीत सकती है. यूं टीम में प्रत्येक पक्ष में ग्यारह खिलाड़ी होते हैं, परंतु कभी कभी अम्पायर और रेफरी भी किसी टीम की तरफ से खेलने लग गए प्रतीत होते हैं. क्रिकेट में कहा जाता है कि जिस टीम ने टॉस जीत लिया, समझो आधा मैच जीत लिया. पर अमूनन वह बाकी का आधा मैच हार ही जाता है.

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसे पाँच-पाँच दिनों तक या दिन-दिन भर खेलने के बजाए उसे देखने में ज्यादा आनंद आता है. हाथों में चिप्स का पैकेट हो और टीवी पर क्रिकेट का मैच तो फिर काउच पोटैटो के आनंद के क्या कहने. परंतु उससे भी ज्यादा मज़ा मैच की चर्चा, उस पर विचार, उसके विश्लेषणों और आँकड़ों पर अनवरत बहसों में आता है कि कौन सी टीम कैसा खेली, किस खिलाड़ी ने कितने-कैसे चव्वे मारे, किसने कितने कैच टपकाए इत्यादि – इत्यादि.

तो, ये था मेरा ‘समथिंग’. आपके पास भी तो क्रिकेट की जमापूँजी होगी इस बारे में. तो फिर शीघ्र बताइए ताकि उन्हें भी ‘एवरीथिंग ऑफ़िशियल अबाउट क्रिकेट’ में शामिल किया जा सके.

(संपादित अंश नईदुनिया अधबीच में 8 जुलाई 1996 को पूर्व-प्रकाशित)

लघुकथा
(विश्व की पहली ब्लॉगज़ीन निरंतर में पूर्व प्रकाशित)
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प्रशिक्षु : दृश्य एक
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डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने एक वृहदाकार, प्रसिद्ध, निजी अस्पताल में अपनी सेवा देना चाहा. पहले ही दिन उसकी रात्रिकालीन ड्यूटी के दौरान नगर के एक प्रतिष्ठित, सम्पन्न परिवार के मुखिया को आकस्मिकता में अस्पताल लाया गया. मरीज को दिल का भयंकर दौरा पड़ा था और मरीज के अस्पताल पहुँचने से पहले ही यमदूत अपना काम कर गए थे. उसने मरीज की नब्ज देखी जो महसूस नहीं हुई, दिल की धड़कनें सुनीं जो गायब थीं और घोषित कर दिया कि मरीज को अस्पताल में मृत अवस्था में लाया गया. मरीज के सम्पन्न परिवार जनों को यह खासा नागवार ग़ुजरा और उन्होंने हल्ला मचाया कि मरीज का इलाज उचित प्रकार नहीं हुआ और एक प्रशिक्षु के हाथों ग़लत इलाज से मरीज को बचाया नहीं जा सका.

अगले दिन अस्पताल के मालिक-सह-प्रबंधक ने उस प्रशिक्षु को फायर कर दिया.
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प्रशिक्षु: दृश्य दो
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डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने एक वृहदाकार, प्रसिद्ध, निजी अस्पताल में अपनी सेवा देना चाहा. पहले ही दिन उसकी रात्रिकालीन ड्यूटी के दौरान नगर के एक प्रतिष्ठित, सम्पन्न परिवार के मुखिया को अस्पताल लाया गया. मरीज को दिल का भयंकर दौरा पड़ा था और मरीज के अस्पताल पहुँचने से पहले ही यमदूत अपना काम कर गए थे. उसने मरीज की नब्ज देखी जो महसूस नहीं हुई, दिल की धड़कनें सुनीं जो नहीं थी. उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ा. मरीज का परिवार शहर का सम्पन्नतम परिवारों में से था. उसने तुरंत इमर्जेंसी घोषित की, मरीज के मुँह में ऑक्सीजन मॉस्क लगाया, दो-चार एक्सपर्ट्स को जगाकर बुलाया, मंहगे से मंहगे इंजेक्शन ठोंके, ईसीजी, ईईजी, स्कैन करवाया, इलेक्ट्रिक शॉक दिलवाया और अंतत: बारह घंटों के अथक परिश्रम के पश्चात् घोषित कर दिया कि भगवान की यही मर्जी थी.

मरीज के सम्पन्न परिवार जन सुकून में थे कि डाक्टर ने हर संभव बढ़िया इलाज किया, अमरीका से आयातित 75 हजार रुपए का जीवन-दायिनी इंजेक्शन भी लगाया, पर क्या करें भगवान की यही मर्जी थी.

अगले दिन अस्पताल के मालिक-सह-प्रबंधक ने मरीज के बिल की मोटी रकम पर प्रसन्नतापूर्वक निगाह डालते हुए उसे शाबासी दी- वेल डन माइ बॉय, यू विड डेफ़िनिटली गो प्लेसेस.
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कीमत पहचान की
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उत्तरप्रदेश के मंत्री आजम खान जब एक समारोह में बिना लाव लश्कर और पहचान पत्र के पहुँचे तो पुलिस के जवानों ने जो सुरक्षा के लिए वहाँ तैनात थे, उन्हें पहचाना नहीं और उनकी जाँच करने लगे. मंत्री महोदय को यह खासा नागवार गुज़रा और नतीजे में नौ पुलिस कर्मियों को निलंबन की सज़ा भुगतनी पड़ी.

ठीक इसके विपरीत, एक घटना मुझे याद आ रही है. मेरा एक मित्र पुलिस विभाग में वायरलेस में कार्यरत था. उसका एसपी नया-नया ट्रांसफर होकर आया था और अपने मातहत विभागों का निरीक्षण करता रहता था. एक दिन वह एसपी सिविल ड्रेस में वायरलेस विभाग में जा पहुँचा जहाँ मेरा मित्र मोर्स कोड की कुंजियों की ठकठकाहट के साथ गोपनीय संदेशों का आदान प्रदान कर रहा था. ऐसे में ही उस एसपी ने मित्र से कुछ पूछताछ करनी चाही. मित्र जो उसे पहचानता नहीं था, उस पर चिल्लाया और बोला – बास्टर्ड यू गेट आउट फ्रॉम हियर. डोंट यू सी आई एम बिज़ी इन इम्पॉर्टेंट इन्फ़ॉर्मेशन्स? और फिर अपने काम में जुट गया.

वह ऑफ़ीसर तत्काल बाहर चला गया. उसे अपनी ग़लती का न सिर्फ अहसास हुआ, बल्कि उसने मित्र को अपनी ड्यूटी में प्रतिबद्धता रखने के लिए शाबासी तो दी ही, साथ ही उससे माफ़ी भी मांगी.

फ़र्क़ साफ़ है. पहचान की क़ीमत. किसी को गुस्सा आता है, किसी को ग़लती का अहसास होता है. वैसे भी, भारत के किसी मंत्री को न पहचानना और ऊपर से उससे पहचान पत्र पूछना – यह तो बहुत ही गंभीर क़िस्म का अपराध है.

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व्यंज़ल
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बदल गई परिभाषाएँ बदल गए पहचान
मूरख मनुज तू क्यों बना रहा अनजान

जिसका नाम न हो न हो कोई पहचान
इस जग में बिरादर कतई नहीं धनवान

ले आओ मुद्रा या कहीं से जान पहचान
होगा काम तभी तो बगैर किसी अहसान

अंटी में रुपया नहीं न किसी से पहचान
यूँ तो मिलना ही है सभी जगह दरबान

नंगों में रवि ने भी ख़ूब बनाई पहचान
सिर में टोपी डाल के भूले है अपमान

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अनुगूंज: बचपन के यादों की गूँज...
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मेरी पहली खरीदारी
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उस समय मैं दूसरी कक्षा में पढ़ता था. माँ कोई सब्जी बना रही थी और घर में खड़ी लाल मिर्च खत्म हो गई थी. सब्जी में बघार लगाने के लिए मिर्च जरूरी थी. माँ दूसरे कामों में भी उलझी हुई थी, अत: यह कार्य उसने अपने लाड़ले को डरते डरते सौंपा. हाथ में चार आने का सिक्का दिया और कहा बेटा गली के आगे जो दूकान है वहाँ से चार आने की खड़ी मिर्ची ले आ. ले आएगा ना?

मैं उत्तेजित हुआ, हिरणों की तरह कुलाँचे लगाता दुकान तक पहुँच गया. मेरी निकर जरा ढीली हो रही थी, उसे संभालता हुआ दुकानदार को, जो एक दूसरे ग्राहक से उलझा हुआ था कम से कम दस बार एक ही सांस में बोल गया कि मुझे चार आने की मिर्ची चाहिए.

उस ग्राहक से निपटकर, आखिरकार दुकानदार ने अख़बार के एक टुकड़े में करारे लाल मिर्च को तौलकर पतले से धागे से पुड़िया बांधा और मुझे थमाया. जिस तेजी से मैं आया था, उसी तेजी से कूदता फांदता, एक हाथ में मिर्ची की पुड़िया और एक हाथ में निकर संभाले वापस घर लौटा और सगर्व पुड़िया माँ के हाथ में थमाया. दौड़ते भागते आने के कारण पुड़िया खुल गई थी और उसका धागा लटक रहा था.

माँ को थोड़ा शक हुआ. उसने पुड़िया हाथ में लेते हुए मुझसे पूछा कि मैं कितने पैसे की मिर्ची लाया था, चूँकि पुड़िया में उसे सिर्फ दो मिर्च ही मिली. मैंने कहा – मैं तो पूरे चार आने की मिर्ची लाया हूँ.

इससे पहले कि माँ कुछ और पूछती, वह मुझे लेकर बाहर आई. घर के दरवाजे से आगे गली में लाल मिर्च कतार में गिरे हुए बिखरे पड़े थे. जाहिर है, अपनी पहली खरीदारी की खुशी में मुझे यह भी भान नहीं था कि पुड़िया खुल गई है और मेरी हर कुलाँच में दो-चार मिर्च नीचे गिर रहे हैं.
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हिन्दी में ऑफ़िस सूट: ओपन-ऑफ़िस हिन्दी

(ऑन लाइन हिन्दी समाचार पत्रिका प्रभासाक्षी में दि. 13 मार्च 05 को पूर्व प्रकाशित )

माइक्रोसॉफ़्ट के ऑफ़िस सूट के हिन्दी संस्करण के पिछले साल जारी होने के साथ ही कम्प्यूटर अनुप्रयोगों के स्थानीय भाषाओं में स्थानीयकरण की होड़ मच गई है. जहाँ व्यवसायिक उत्पाद तो इस दौड़ में शामिल हो ही चुके हैं, मुक्त सॉफ़्टवेयर/ओपनसोर्स भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं. बहुत से स्तरों पर, बहुत से स्थानों पर बहुत से लोग भिड़े हुए हैं – लगे हुए हैं स्थानीय भाषाओं में कम्प्यूटर और उनके अनुप्रयोगों को लाने हेतु ताकि कम्प्यूटरों के उपयोग को स्थानीय लोगों तक पहुँचने-पहुँचाने में अँग्रेज़ी की अनिवार्यता को खत्म किया जा सके. माइक्रोसॉफ़्ट का तमिल और हिन्दी भाषा में ऑपरेटिंग सिस्टम तो है ही, ऑफिस सूट भी इन भाषाओं में है. ओपन सोर्स का लिनक्स इस मामले में थोड़ा सा धनवान है जहाँ इसके पास छ: भाषाओं में ऑपरेटिंग सिस्टम – हिन्दी, तमिल, गुजराती, पंजाबी, मराठी और बंगाली में है तथा ऑफ़िस सूट हिन्दी और तमिल में है. और ढेरों अन्य भारतीय भाषाओं में काम जोरों से जारी है – व्यवसायिक प्लेटफ़ॉर्म में भी और ओपनसोर्स में भी.

ओपनसोर्स प्लेटफ़ॉर्म में उपयोग तथा वितरण हेतु मुफ़्त उपलब्ध ओपनऑफ़िस.ऑर्ग का ऑफ़िस सूट तमिल में तो कुछ समय से उपलब्ध था ही, हिन्दी में भी उपलब्ध हो गया है. इसके हिन्दी अनुवाद का कार्य सीडैक की बैंगलोर टोली ने किया है. हिन्दी ओपनऑफ़िस को यहाँ से डाउनलोड किया जा सकता है:: http://trinetra.ncb.ernet.in/bharateeyaoo/ यहाँ से ओपन ऑफ़िस का तमिल, मराठी, गुजराती और कन्नड़ संस्करण भी डाउनलोड किया जा सकता है. और, तारीफ की बात यह है कि ओपनऑफ़िस ऑफ़िस सूट विंडोज़ तथा लिनक्स दोनों में ही बख़ूबी काम करता है. इस सूट में ऑफ़िस राइटर, स्प्रेडशीट, प्रेजेंटर, ड्राइंग, एचटीएमएल संपादक इत्यादि सब कुछ हैं, जो कि आपको व्यवसायिक उत्पाद माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस सूट में आपको मिलते हैं. यही नहीं, ओपनऑफ़िस के द्वारा आप माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस दस्तावेज़ों पर भी आसानी से काम कर सकते हैं. वैसे तो ओपनऑफ़िस हिन्दी में आप तमाम तरह के हिन्दी फ़ॉन्ट जैसे कि कृतिदेव से लेकर सुषा और नई-दुनिया तथा यूनिकोड सभी में काम कर सकते हैं, परंतु ओपनऑफ़िस हिन्दी स्प्रेडशीट में अगर आप हिन्दी यूनिकोड में काम करते हैं तो हिन्दी में इंडेक्सिंग / छंटाई इत्यादि भी आपके लिए बहुत आसान होगा. साथ ही इसका शब्दों का ऑटोकम्प्लीशन जो कि जैसे जैसे आप टाइप करते जाते हैं, यह स्वयं सीखते हुए चलता है, अत्यंत उपयोगी है जो आपकी उंगलियों को काफ़ी राहत पहुँचाता है.

संस्थापना से लेकर मेन्यू – सभी हिन्दी में:
जब आप ओपनऑफ़िस हिन्दी को अपने कम्प्यूटर में संस्थापित करते हैं तो यह देखकर बड़ी प्रसन्नता होती है कि आपका स्वागत प्रारंभिक संस्थापना मेन्यू में भी हिन्दी से होता है, चूँकि इसके इंस्टालर को भी हिन्दी में अनूदित किया जा चुका है. अन्य सभी संस्थापना निर्देश, सिर्फ लाइसेंस एग्रीमेंट को छोड़कर, हिन्दी में ही हैं.
संस्थापना के पश्चात् जब आप ओपनऑफ़िस हिन्दी प्रारंभ करते हैं तो आप पाते हैं कि प्राय: इसके सभी मेन्यू हिन्दी भाषा में ही हैं. कहीं-कहीं कुछ अनुवाद की ग़लतियाँ मिलती हैं, जिन्हें उम्मीद है कि इसके अगले संस्करणों में सुधार लिया जाएगा. इसमें ख़ूबी यह भी है कि कुंजीपट शॉर्टकट को हिन्दी अक्षरों से ही जोड़ा गया है जिससे कि हिन्दी वातावरण में कार्य करते समय शॉर्टकट कुंजियों के लिए अंग्रेजी वातावरण में जाने की आवश्यकता नहीं होती. हालाकि, तब फिर पुराना ट्रेडिशनल फ़ाइल सहेजने का शॉर्टकट कंट्रोल एस की बजाए कोई नया, हिन्दी का शॉर्टकट याद रखना होगा. कुंजीपट शॉर्टकट के लिए अलग-अलग माहौल में अलग-अलग व्यवस्थाएँ की गई हैं जिसके कारण हिन्दी में भिन्न-भिन्न माहौल में कार्य करने में हो सकता है कि हमें थोड़ी परेशानी आए. उदाहरण के लिए माइक्रोसॉफ़्ट ने कापी/कट/पेस्ट के लिए अँग्रेज़ी के पारंपरिक शॉर्टकट को बनाए रखा है. हिन्दी लिनक्स में अँग्रेज़ी के शॉर्टकट को ही रखा गया है जबकि ओपनऑफ़िस में सारे के सारे शॉर्टकट हिन्दी अक्षरों के हैं. नतीजतन कुछ शॉर्टकट काम नहीं करते तो कुछ असमंजस पैदा करते हैं. मगर, संपूर्ण अनुवाद तथा हिन्दी भाषा में संपूर्ण कम्प्यूटर माहौल के लिए यह प्रयास सराहनीय तो है ही, कालांतर में सभी अनुप्रयोगों/ऑपरेटिंग सिस्टम को इसे अपनाना ही होगा.

ओपनऑफ़िस की हिन्दी अलग?

ओपनऑफ़िस हिन्दी में माइक्रोसॉफ़्ट तथा लिनक्स के हिन्दी से बिलकुल अलग प्रयोग किया गया है. ओपनऑफ़िस में भाषा का सीधा, अनौपचारिक प्रयोग किया गया है जैसे कि काटो, चिपकाओ, खोलो इत्यादि. जबकि माइक्रोसॉफ़्ट तथा लिनक्स में औपचारिक, आदर सूचक तरीका इस्तेमाल किया गया है जैसे कि काटें, चिपकाएँ, खोलें इत्यादि, जो कि समृद्ध हिन्दी के लिए ज्यादा उपयुक्त है. संभवत: यह ऐसा इसलिए हुआ है कि हमारे पास हिन्दी फ़ॉन्ट की तरह कम्प्यूटर टर्मिनॉलॉज़ी तथा मेन्यू इत्यादि के लिए अभी भी कोई मानक शब्दावली नहीं है. जिसके कारण हर कोई अपनी सहूलियत के अनुसार हिन्दी के शब्दों का प्रयोग कर रहा है. इससे हिन्दी का भला होने के बजाए नुकसान होने की संभावना प्रबल है. उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में इस क्षेत्र में विशेष ध्यान दिया जाएगा.
अभी फिलहाल, ओपनऑफ़िस के जीयूआई तथा इसके बहुत सारे टिप्स और त्रुटि संदेश हिन्दी में उपलब्ध हैं. ओपनऑफ़िस में मदद अभी भी अँग्रेज़ी में ही है. मदद फ़ाइलों को हिन्दी में लाने में कुछ समय लग सकता है, चूँकि इनका अनुवाद करने में खासा वक्त और बहुत से कार्यघंटों की आवश्यकता होती है. ओपनऑफ़िस पर हिन्दी फ़ॉन्ट और इंटरफ़ेस चाहे वह विंडोज़ में हो या लिनक्स में, बहुत सुघड़ प्रतीत होता है और हिन्दी माहौल में ओपनऑफ़िस राइटर में हिन्दी का यह आलेख लिखने में आनन्द की अनुभूति होती है. हालाकि अभी इसमें माइक्रोसॉफ़्ट हिन्दी ऑफ़िस की तरह वर्तनी जाँचक तो नहीं है, जिसकी सख्त आवश्यकता है, और कहीं-कहीं मेन्यू और संदेशों में संस्कृत के कठिन शब्दों का उपयोग हताशा पैदा करता है.
कुल मिलाकर, अगर आपको अपनी हिन्दी भाषा में एक ऐसा आधुनिक ऑफ़िस अनुप्रयोग मुफ़्त में इस्तेमाल करने के लिए मिले जिससे आप कम्प्यूटर पर अपने दैनंदिनी के ढेरों काम निपटा सकते हैं, तो फिर छोटे मोटे गुणदोषों को तो माफ किया ही जा सकता है.

गंगा तेरा पानी ज़हरीला...
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मेरे जैसे करोड़ों धर्म-भीरुओं ने गंगा मैया के जल में अपने पापों और दुष्कर्मों को धोने की मंशा में शवों, अस्थियों, फूल-पत्रों, मूर्तियों, सिक्कों और न जाने क्या-क्या सदियों से विसर्जित किए हैं. फ़ैक्टरियों/शहरों के गटरों के विसर्जनों को गंगा में बहाए जाने की बात तो जुदा ही है. नतीजतन गंगा मैया के आँचल का पानी जहरीला तो होना ही था... हमारे इन कर्मों से हमारे पाप धुले नहीं वरन् बढ़े ही हैं. पर क्या हमें कभी इसका भान होगा भी?
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व्यंज़ल
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क्या कुछ नहीं ज़हरीली हो गई
अब ये गंगा भी ज़हरीली हो गई

आखिर कैसे हो क़ौम का इलाज
अब औषध भी ज़हरीली हो गई

अमृत अब से बुझती नहीं प्यास
अपनी लतें ही ज़हरीली हो गई

अंतत: शस्त्रागार बन गई दुनिया
दोस्ती की बातें ज़हरीली हो गई

प्रेमशास्त्र पढ़ जवाँ हुआ था रवि
मेरी चाल कैसे ज़हरीली हो गई
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संविधान के साथ धोखाधड़ी...
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झारखंड में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किए जाने से नाराज अर्जुन मुंडा की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए राज्यपाल के फैसले को संविधान के साथ धोखाधड़ी करार दिया है.

इसके साथ ही नेताओं में विधायिका – न्यायपालिका में कौन बड़ा – किसका अधिकार कहां तक का सवाल एक बार फिर खड़ा हो गया है. जहाँ बीजेपी स्वागत कर रही है (चूँकि यहाँ उसके फायदे की बात हो रही है) वहीं तमाम अन्य दल तिलमिलाए हुए हैं कि न्यायालय ओवरएक्टिविज्म दिखा रही है. परंतु न्यायालय को न्याय की परिभाषा फिर से बताने और यह बताने के लिए कि संविधान के साथ धोखाधड़ी राज्यपाल जैसे संविधान प्रमुखों द्वारा किया जा रहा है, किस ने मजबूर किया है? आज की स्तरहीन राजनीति ने, जहाँ सत्ता और कुर्सी की खातिर संविधान तो क्या, लोग अपने आप से भी धोखाधड़ी कर रहे हैं.

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व्यंज़ल
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ये मेरी मासूमियत है धोखाधड़ी नहीं
खुद की सेवा है कोई धोखाधड़ी नहीं

तमाम उम्र रहे हैं तंगहाल तो क्या
तसल्ली तो है किया धोखाधड़ी नहीं

गुजर गया दौर ईमान की बातों का
जीना असंभव जहाँ धोखाधड़ी नहीं

कोई फर्क बचा नहीं पहचानोगे कैसे
क्या छल और क्या धोखाधड़ी नहीं

अमीरों में नाम लिखवाने चला रवि
तारीफ़ है कि आती धोखाधड़ी नहीं
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शीर्षक ही काफ़ी है...

इस खबर का शीर्षक ही पूर्ण है पूरी कहानी कहने को, फिर क्या खबर और क्या खबरों की खबर... हे.. हे... हे.... हाय.. हाय... ऊँ.. ऊँ... (बहुत ज्यादा हँसने के बाद रोना आता ही है :)

व्यंग्य

इम्पोर्टेड रुपया?

इधर मैंने वह खबर पढ़ी, उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ. नतीजतन मेरी रातों की नींदें डिस्टर्ब हो गईं और अनिद्रा, अर्द्धनिद्रा में मुझे हॉरिबल, हॉटिंग सपने दिखाई पड़ने लगे. सपनों का यह सिलसिला जारी है. इससे पहले कि इन भयंकर सपनों को भुगतकर मैं और भी ज्यादा डिस्टर्ब हो जाऊँ, आपको भी थोड़ा डिस्टर्ब करूं अपने सपने सुनाकर.

रॉबर्ट के हाथ में भी वही अख़बार था. वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही अख़बार पढ़ रहा था. खबर पढ़ कर उसकी भी आंखें फटी रह गईं. वह भी घबरा गया. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में नए नोट नहीं छपवा सकने के कारण विदेशों से नए नोट छपवाकर मंगवाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. हम तो कहीं के न रहेंगे”

लॉयन हँसा. उसके चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाली कुटिलता और बढ़ गई थी. वह बोला – “बेवकूफ़ ! सरकार ने बहुत दिनों बाद यह एक अच्छा काम किया है. अभी तक हमारे पास सब कुछ इम्पोर्टेड था. रुपए को छोड़कर. अब वह कमी भी पूरी हो जाएगी. मोना डार्लिंग वाह ! मजा आ गया. अब तो रुपया भी इम्पोर्टेड आ गया और इस देश में कभी इम्पोर्टेड चीज़ों का शौक कभी खत्म हुआ है? अब तो लॉयन के बिजनेस एम्पायर के लिए एक और स्कोप मिल गया है.”

रुपए के इम्पोर्टेड होने न होने का मेरा कन्फ्यूजन नींद के अगले स्पैल में तुरंत दूर हो गया. बाजार में विदेशों से छपकर आए नए नोटों की भारी डिमांड हो गई. लिहाजा उसकी भारी कालाबाजारी शुरू हो गई. इम्पोर्टेड नए नोटों का बंडल ऑन में बिकने लगा. किसी जमाने में सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी जैसी होती थी वैसी इन इम्पोर्टेड रुपयों की होने लगी. एक का नोट दस में, दस का पच्चीस में और सौ का हजार में बिकने लगा. जाहिर है इस कारण इन इम्पोर्टेड, बढ़िया, कुरकुरे नोटों की क्रय शक्ति, देश में छपे गंदे, कटे फटे, फूहड़ नोटों की तुलना में बढ़ गई. लोगों का अपने पास इम्पोर्टेड नए नोट रखना स्टेटस सिंबल बन गया. हाई क्लास बार, क्लब, रिसॉर्ट इत्यादि में प्रवेश के लिए नए नियम बन गए. अब इन स्थानों में उन्हीं लोगों को प्रवेश मिलता था जो इम्पोर्टेड रुपया लेकर आ सकते थे. देश में एक नया विभाजन हो गया. मेजॉरिटी और माइनारिटी की. मेजॉरिटी पूअर क्लास जिनके पास पुराने नोट थे और माइनारिटी, रिच क्लास जो अपने नए इम्पोर्टेड नोटों पर इतराते थे.

बात इम्पोर्टेड रुपयों की थी, सो लोगों का जमीर भी जाग गया था. ये नए, विदेश से छपकर आए नोट नई तकनॉलाजी के थे जो नॉन टियरेबल, डस्ट-रस्ट-स्टेन प्रूफ होने तथा गारंटीड एवरफ्रेश होने के बावजूद, कैपेबल ऑफ वेरी रफ हैंडलिंग होने के बावजूद लोगों के दुलारे बने रहे. लोग इन नए रुपयों को अपनी जान से भी ज्यादा संभालकर रखने लगे. कोई आदमी उसे मोड़कर अंटी में नहीं रखता था. कोई औरत उसे अपनी चोली में ठूंसती नहीं थी. कोई उस पर कुछ लिखता नहीं था. इस मामले में सभी सेल्फ डिसिप्लिन्ड हो गए थे. बैंकों में नियम बन गए थे कि इन इम्पोर्टेड रुपयों को पंच नहीं किया जाएगा, केयरलेस हैंडलिंग नहीं की जाएगी. थूक-पानी लगाकर सर्र-सर्र गिना नहीं जाएगा ताकि इनका ओरिजिनल कुरकुरापन-नयापन बना रहे – इत्यादि, इत्यादि. कुछ बैंकों ने इन इम्पोर्टेड रुपयों की गड्डियों के लिए पाउच, पैकेट निर्धारित कर दिए तो कुछ बैंकों ने विशेषज्ञों को एंगेज कर लिया इन नोटों की गड्डियों के लिए एवरफ्रेश पैकिंग ईजाद करने के लिए.

चूंकि नोट छापने के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए गए थे और जैसा कि होता ही है, ऑर्डर अमरीका, जापान और जर्मनी की कुछ एमएनसीज़ ने मैनेज कर लिए थे. इम्पोर्टेड नोट इन्हीं देशों की कम्पनियों से आते थे. जापान में छपी नोटों की डिमांड जरा ज्यादा ही थी. यूं तो सभी नोटों का डिज़ाइन एवं ड्राइंग एकसार ही था, परंतु फिर भी प्रिंटेड इन जापान देखकर लोग ज्यादा रोमांचित होते थे, और उन नोटों में लोगों को कुछ अतिरिक्त विशेषताएँ नजर आने लगती थीं. ऐसे नोटों को प्राप्त करने और उसे खर्चने का आनन्द अलग ही आता था. रिश्वत, भेंट इत्यादि के लिए तो जाहिर है इन्हीं नए नोटों का ही प्रयोग होने लगा था.

पर, सपने तो सिर्फ सपने ही होते हैं. सपने कोई हकीकत थोड़े ही हो जाते हैं. क्या हुआ जो सपने के क्लाइमेक्स में मैंने देखा कि देश में छपे हुए रुपए का चलन अंतत: बन्द हो गया है. कोई उसे रद्दी के मोल भी नहीं लेता. देश के कर्णधारों, प्लानरों ने उसे अघोषित रुप से इल्लीगल करार जो दे दिया है.

(दैनिक भास्कर में दि. 1 मार्च 1997 को पूर्व प्रकाशित)

ये देश लंबित है…
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2 लाख फ़ाइलें निपटारे के लिए वर्षों से लंबित... और वह भी मंत्रालय में जहाँ शासकीय निर्णय होते हैं... देश, प्रांत और समाज के विकास के लिए. फिर अन्य सरकारी विभागों की बात तो छोड़ ही दें.

दरअसल सारा सरकारी कार्यालयीन तंत्र ही जंग खाया हुआ है. मैंने भी 20 वर्ष सरकारी सेवा में गुजारे हैं. सरकारी ऑफ़िसों की स्थिति सचमुच शोचनीय है और कोई भी बदलना नहीं चाहता. धूल-खाती, सड़ती हुई फ़ाइलों के बंडलों के बीच बैठने वाले सरकारी अफसर और बाबू कार्यालयीन समय में देर से आते हैं और समय से पूर्व चले जाते हैं. कोई काग़ज़, मसलन किसी का जेनुइन आवेदन किसी कार्यालय में पहुँचता है, तो वहाँ का आवक बाबू उस पर ठप्पा लगाकर, क्रमांक व दिनांक डालकर आवक फ़ाइल में लगा देता है. उसके पश्चात् उस फ़ाइल का अंतहीन सफर शुरू हो जाता है. अगर उस फ़ाइल में संबंधित अफसर को कोई काम नहीं करना है, तो उसपर कोई टीप लिख देगा, कोई जानकारी मांग लेगा या उसे अपने ऊपर-नीचे किसी अन्य अफसर के पास निर्णय के लिए भेज देगा. यानी अपनी कोर्ट में बाल नहीं रखेगा ताकि जिम्मेवारी न ठहराई जा सके. फ़ाइलों को लंबित रखने का सारा काम बड़े ही जेनुइन तरीके से होता है. और अगर कोई बंदा किसी फ़ाइल को जल्दी से निपटाने की फ़िराक में रहता है तो सबको उसमें कुछ निहित स्वार्थ नज़र आने लगते हैं. वैसे भी आमतौर पर वही फ़ाइलें चलती हैं जिनमें वज़न होता है. शेष को तो लंबित रहना होता है. इस देश की तरह...

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व्यंज़ल
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क्यों हो गया मेरा देश लंबित है
सोच कर ये मन होता कंपित है

मेरी आशाओं का महल क्योंकर
अर्ध शती में हो गया खंडित है

मेहनतकशों का मुकाम नहीं और
अकर्मण्य होता महिमा मंडित है

मनीषियों के दिन लद गए कबसे
यहाँ पूजा जाता पोंगा पंडित है

मुफ़्त में आँसू बहा कर रवि यूँ
क्यों तू करता खुद को दंडित है
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क्योंकि ये सरकार मेरी है...

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मुलायम सिंह ने अपने भाई, जो कि यूपी के पीडबल्यूडी मंत्री भी हैं, के निजी कालेज के लिए 34.5 करोड़ रुपयों का अनुदान स्वीकृत किया है. क्यों न करें? आखिर समाजवादी सरकार उनकी अपनी है और वे अपने भाई, भतीजे और अपने समाज का भला नहीं करेंगे तो क्या राह चलता दूसरा आदमी करेगा? समाजवादी/साम्यवादी पार्टियों-नेताओं का छद्म समाजवाद/साम्यवाद का इससे बढ़िया उदाहरण और नहीं हो सकता. हिन्दुत्ववादी-सेकुलरवादी पार्टियों के छद्म विचारधाराओं के बारे में भी भारतीय बुद्धिजीवियों को पता है कि ये सिर्फ अपना वोट बैंक बनाने-बचाने के लिए वोटरों के सामने रोना रोते रहते हैं.

यह स्थिति भारत में हर कहीं है. प्राइवेट स्कूलों कालेजों की संख्या अधिकतर नेताओं के परिवारों की हैं. पेट्रोल पंपों के छद्म मालिक नेता हैं. इसीलिए तो सरकार बनाने, सरकार में शामिल होने के लिए तमाम तरह की मारा मारी चलती रहती है और, शहाबुद्दीन की तरह कुछ नेता तो खुले आम यहाँ तक कहते हैं कि हम अपनी सरकार बनाने के लिए किसी भी हद तक, किसी भी एक्स्ट्रीम तक जाएंगे. देश सेवा के लिए आज कोई सरकार में शामिल नहीं होता. सरकार का रूप परिवर्तन हो गया है. आज की सरकार स्व-सेवा के लिए है.

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व्यंज़ल
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कुछ करुँ या न करुँ कि सरकार मेरी है
मैं देता नहीं जवाब कि सरकार मेरी है

अपने बन्धुओं में ही किया है वितरण
है खरा समाजवाद कि सरकार मेरी है

मांगता रहा हूँ वोट छांट बीन तो क्या
मैं पूर्ण सेकुलरवादी कि सरकार मेरी है

रहे मेरी ही सरकार या मेरे कुनबों की
मैंने किए हैं जतन कि सरकार मेरी है

मुल्क की सोचेगा तो रवि कैसे कहेगा
मैं ही तो हूँ सरकार कि सरकार मेरी है
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अँग्रेज़ी में हिन्दी कि हिन्दी में अँग्रेज़ी?
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शनिवार को टाइम्स ऑफ इन्डिया तथा इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय पृष्ठों पर दो विरोधाभासी चीज़ें एक साथ दिखाई दिए. परंतु ये कोई राजनीतिक नज़रिया या टीका टिप्पणी नहीं थे.

भले ही भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा राष्ट्र हो जिसकी जनता अँग्रेज़ी भाषा बोलती है, परंतु इस अँग्रेज़ी में हिन्दी भी घुलती मिलती दिखाई देने लगी है. हिन्दी में अँग्रेज़ी तो खैर, एक इमल्शन की तरह घुल मिल गई है, और प्राय: आम बोलचाल तथा अब तो गंभीर लेखन में भी, अँग्रेजी के शब्दों का बख़ूबी इस्तेमाल हो रहा है. मैंने अपनी ग़ज़लों में कई मर्तबा अँग्रेज़ी के शब्दों का बख़ूबी प्रयोग किया है.

ट्रू ह्मूमन ग्लोबलाइज़ेशन - विश्वमानववाद का इससे सटीक उदाहरण और क्या हो सकता है भला.

राही, कोई नई राह बना जिससे कि तेरे पीछे आने वाले राही तुझे याद करें...
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जावेद अख़्तर, जिन्हें इस साल के फ़िल्मफ़ेयर के पाँचों नॉमिनेशन उनके गीतों के लिए मिले थे, ग़जलों के बारे में बेबाकी से कहते हैं कि – इतनी खूबसूरत ट्रेडिशन का धीरे-धीरे लोगों को इल्म कम होता जा रहा है. ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने में इसकी दो पंक्तियों में – इशारों में, कॉम्पेक्ट तरीके से कही जाने वाली बातों का खासा योगदान रहा है, जो ग़ज़लकारों को मेहनत से लिखने के लिए मज़बूर करती हैं. इसके साथ ही इसके रदीफ, क़ाफिए और मकता-मतला जैसी पारंपरिक और नियमबद्ध चीज़ें भी ग़ज़ल लिखने के दौरान कठिनाइयाँ पैदा करती हैं.

मगर, फिर भी लोग ग़ज़लें लिख रहे हैं और क्या खूब लिख रहे हैं. भले ही पाठक, श्रोता और प्रशंसक नदारद हों – ग़ज़लें आ रही हैं... हिन्दी में भी और उर्दू में भी. और, मेरा तो यह मानना है कि पारंपरिक और नियमबद्ध रचना के पीछे पड़ने की जरूरत ही नहीं है. रचना ऐसी रचिए जिसमें पठनीयता हो, सरलता हो, प्रवाह हो और जिसे रच-पढ़ कर मज़ा आए. बस. कट्टरपंथी आलोचक तो हर दौर में अपनी बात कहते ही रहेंगे और उनसे हमें घबराना नहीं चाहिए, जैसा कि जावेद अपनी बात को समाप्त करते हुए कहते हैं- तुलसी दास ने जब राम चरित मानस लिखी तो उसकी बिरादरी ने निकाल बाहर किया कि किस घटिया जुबान (दोहा-छंद तो बाद की बात है!) में रामायण जैसी पवित्र किताब लिखी. वैसा ही सुलूक शाह अब्दुल क़ादिर के साथ हुआ था जब उन्होंने कुरान का उर्दू में तर्जुमा किया था.
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ग़ज़ल
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अवाम को आईना आखिर देखना होगा
हर शख्स को अब ग़ज़ल कहना होगा

यही दौर है यारो उठाओ अपने आयुध
वरना ता-उम्र विवशता में रहना होगा

बड़ी उम्मीदों से आए थे इस शहर में
लगता है अब कहीं और चलना होगा

जमाने ने काट दिए हैं तमाम दरख़्त
कंटीली बेलों के साए में छुपना होगा

इश्क में तुझे क्या पता नहीं था रवि
फूल मिलें या कांटे सब सहना होगा
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हास्य व्यंग्य
नई शब्दावली नए शब्द
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इंटरनेट और इन्फ़ॉर्मेशन तकनॉलाजी ने नित्य नए नए शब्दों और वाक्याँशों को जन्म दिया है. उदाहरण के लिए ब्लॉग, जिसे हम हिन्दी में चिट्ठा कहते हैं. परंतु इससे इतर हमारे भारत में कुछ समय से नए नए शब्दों का गठन सप्रयास-अनायास हुआ है, और आपकी सामाजिक शब्दावली के भंडार में ऐसे नए-नए शब्दों का समावेश हुआ होगा. आइए, आपकी पुनश्चर्या के लिए एक बार फिर से इन नए शब्दों और उनके अर्थों पर चर्चा करते हैं. कुछ खास नए शब्द ये हैं, जिन्हें जानना समझना हर भारतीय के लिए आवश्यक है. क़यास लगाए जा रहे हैं कि इन शब्दों को प्रत्येक भारतीय जनता को समझने-समाझने के लिए सरकार कोई अध्यादेश लाने की भी तैयारी कर रही है!
गरीब रैला: इस नए शब्द का जन्म स्थान पटना है. इसका अर्थ गरीबों के लिए पटना तक की मुफ़्त यात्रा, बस-ट्रक मालिकों तथा रेलवे के लिए जबरिया मुफ़्त-बिना टिकट यात्रा तथा राजनीतिज्ञों के लिए एक-दूसरे को अपना बाहुबल दिखाना है. महा रैला इसका अपभ्रंश है.
हल्ला बोल : परिवर्तन इसी का नाम है. लखनऊ कहाँ एक समय तहजीब को लखनवी अंदाज से पहचाना जाता था और अब नेताओं की कृपा से हल्ला बोल के जनक के रूप में पहचाना जाने लगा है. यह त्रि-अर्थी शब्द है. इस शब्द का अर्थ राजपक्ष के दृष्टिकोण से क़ानून व्यवस्था में विपक्ष द्वारा विध्न है तो विपक्ष की नज़र से साम-दाम... वाली कहावत में से दंड का प्रयोग सिर्फ कुर्सी हथियाने के लिए है. मज़ेदार बात यह है कि आम जनता के लिए इसका अर्थ है मज़ेदार नज़ारे.
महाबंद: कल भी, आज भी, कल भी और संभवत: परसों भी. जी हाँ, बंद, बंद, और सिर्फ बंद. किसी को विरोध करना हो, किसी की मर्जी का कुछ नहीं हुआ, कहीं कोई गड्ढे में गिरकर मरा – कारण कोई सा भी हो – भारत के गाँव मुहल्ले से लेकर शहर, प्रांत और देश में हर तरफ बंद और सिर्फ बंद. कई दिनों तक बंद. यह है महा बंद और कुछ बचा है क्या बंद के सिवा भारत में? इसकी उत्पत्ति असम में हुई, बिहार में फैली और इतनी फैली कि अब तो भारत का विपक्ष तो क्या सत्तापक्ष भी महाबंद का आयोजन करने में आनंद लेने लगा है.
न्यायिक सक्रियता : मीडिया ने इस शब्द को जन्म दिया, परंतु फिर भी इसकी उत्पत्ति के जिम्मेदार नेता ही रहे हैं. इसका अर्थ हो सकता है – भ्रष्ट नेताओं-अफसरों के सिरों पर लटकती तलवार. भारत में यूँ तो न्याय अपना काम अपने हिसाब से तो करता ही है (लॉ विल टेक इट्स ओन कोर्स) जहाँ एक-एक मुकदमा बीस-बीस साल तक चलता है, परंतु कुछ खास नेताओं, अफसरों पर न्याय ने पीआईएल के जरिए अपने काम में सक्रियता दिखाई तो भीषण अक्रियता के बीच में लोगों को न्यायिक सक्रियता नज़र आने लगी.
सामाजिक न्याय : इस शब्द का अर्थ सही मायने में कन्फ़्यूजिंग है. पिछड़ों पर सदियों से जो सामाजिक अन्याय हो रहा था उसकी भरपाई के लिए सामाजिक न्याय का नारा (जी हाँ, सिर्फ नारा) नेताओं द्वारा दिया गया. यह नारा कइयों को सामाजिक अन्याय सा लगता है. वैसे, कुल मिलाकर इसका अर्थ चुनिंदा नेताओं तथा चुनिंदा राजनीतिक पार्टियों के लिए कुर्सी प्राप्त करने का महामंत्र है जिसे वे हमेशा जपते रहते हैं.
कल्याण निकाय : इसका शाब्दिक अर्थ आपको भ्रमित करेगा. इसकी उत्पत्ति भी बिहार में कुछ समय पूर्व हुई थी. बिहार में कुछ भ्रष्ट अफसरों को गिरफ़्तार किया गया था तो इन अफसरों की आर्थिक जरूरतों को संबल देने के लिए तथा इनके तथाकथित कल्याण के लिए अन्य साथी अफसरों से चंदा लेकर बनाया जाने वाला निकाय है यह. अब यह दीगर बात है कि जिनके लिए कल्याण निकाय बनाया जा रहा है वे कई लोगों का कल्याण करने की कूवत तो पहले ही रखते हैं, कईयों का कल्याण वे पहले ही कर चुके होंगे.
तबादला उद्योग : भारत देश का यह सबसे बड़ा सरकारी उद्योग है. इस उद्योग में रॉ-मटीरियल, पूंजी, इनपुट कुछ नहीं लगता मगर प्रॉफ़िट बहुत है. इसमें किसी भी उद्योग से ज्यादा पैसा, ज्यादा प्रॉफ़िट होने की संभावना रहती है. न हींग लगे न फ़िटकरी... जैसी कहावतों के लिए यह अप्रतिम उदाहरण है. परंतु प्रॉफ़िट किसे होता है यह शोध का विषय है.

यह शब्द सूची अधूरी है, चूंकि इस मामले में मेरा ज्ञान अधूरा है. आपसे विनती है कि इस शब्द सूची को पूर्ण करने में मेरी मदद करें. वैसे, क्या आपको यह नहीं लगता कि इस तरह के नए नए शब्द आते रहेंगे और इस तरह यह सूची कभी भी पूरी नहीं की जा सकेगी?
(टीप: संपादित अंश दैनिक भास्कर, 2 जुलाई 1997 में पूर्व-प्रकाशित)

डरावनी सरकार!

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दैनिक भास्कर के 28 फरवरी के अंक में प्रीतीश नंदी ग्राफ़िक डिटेल में लिखते हैं कि सरकार और उसके नुमाइंदे आम जनता को डराने और तंग करने के अलावा और कुछ खास नहीं करते. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आमतौर पर यह बात सही है. मुझे एक हृदयविदारक घटना याद आती है. पिछली छुट्टियों में रेल सफर के दौरान गांव के एक गरीब परिवार की दास्तान सुनने को मिली. वह अपना गांव छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में शहर को जा रहा था. उस गरीब से रास्ते में कुछ पुलिस वालों ने पैसे उगाह लिए. इस लिए नहीं कि उसके पास टिकट नहीं था. वह भला आदमी तो सही टिकट के साथ यात्रा कर रहा था. उसे इस लिए तंग किया गया चूंकि सरकारी क़ायदे के अनुसार उसे अपना गांव छोड़ने के लिए गांव के सरपंच से लिखवा कर लाना था (क्योंकि शासन ने गांवों से पलायन रोकने के लिए यह क़ानून बनाया है) जो वह नहीं लाया है!

सच है, सरकार डराती और तंग करती है. भले ही वह गांव का ग़रीब हो या प्रीतीश नंदी जैसा शख्स.
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व्यंज़ल
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लोगों को डराती और तंग करती है सरकार
लूली लंगड़ी क़ौम किस तरह से दे ललकार

जनता की सरकार है या सरकार की जनता
सरकार के लिए भी कोई सरकार है दरकार

यह नमूना नहीं था आजादी के दीवानों का
क्या नक़्शे नए होंगे, नए होंगे कभी परकार

मेरा ये मुल्क दौड़ के वहाँ जा पहुँचा है जहाँ
निर्दोषों को करनी होती है दुष्टों की जयकार

एक अकेला तू चला था ईमान के रस्ते रवि
मिलना तो था सारे जमाने का तुझे बदकार
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परालौकिक अनुभव की गूँज

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बात बहुत पुरानी है. तब नई नई नौकरी लगी थी. अम्बिकापुर जैसे पहाड़ी जिले के सामरी तहसील के मुख्यालय कुसमी में मेरे जैसे कोई दो दर्जन से अधिक बैचलर्स भिन्न भिन्न विभागों में कार्यरत थे. हममें से अधिकतर के कई छोटे छोटे ग्रुप थे, और हम काम के बाकी बचे समय में प्राय: मौज मस्ती करते रहते थे जिनमें शुमार होता था जंगल की सैर, तालाबों की तैर और अकसर ताश की रमी का खेल. क्योंकि तब न तो केबल था न टीवी और न ही कम्प्यूटर्स. हमारे ग्रुप में एक डाक्टर खेस, जो वहाँ के प्रायमरी हेल्थ सेंटर में पदस्थ थे, बड़े मस्तमौला थे और वे हर प्रकार का नशा करते थे. गाँजा, चरस, सिगरेट, तम्बाखू, शराब, हँड़िया (वहाँ की देशी शराब जो चावल को सड़ाकर और जंगली जड़ी बूटी मिलाकर तैयार की जाती है, जो पीने में थोड़ी सी खट्टी लगती है, परंतु सीधे सिर पर चढ़ती है) इत्यादि सब कुछ, और प्राय: एक साथ दो-तीन चीज़ों का नशा. सही मायनों में वे एडिक्ट थे. और अगर पहाड़ी क्षेत्र के नाते उन्हें कभी कोई नशे की चीज़ नहीं मिलती थी, तो वे अस्पताल में उपलब्ध जिंजर (कंसन्ट्रेटेड इथाइल अल्कोहल जो दवाई के काम आता है) को टॉलू सोल्यूशन (खांसी की दवाई) के साथ मिलाकर पीते थे.

एक दिन हमारे ग्रुप के लोगों ने, जिसमें जाहिर है, डाक्टर खेस (जो कि क्रिश्चियन थे, अंग्रेजी में स्पेलिंग Xess) भी शामिल थे, ठंडी रात में एक पहाड़ी को कॉन्कर करने का प्रोग्राम बनाया जो कि मेरे ऑफ़िस के ठीक पीछे था. जम कर सर्दी पड़ती थी वहाँ. और हवा भी इतनी ठंडी चलती रहती थी कि मई-जून के गर्मी के दिनों में भी वहाँ के नेटिव लोग मोटे-मोटे लबादा (जिसे वे बोरकी कहते थे) ओढ़े रहते थे. बहरहाल हम सब रात दस बजे रवाना हुए. पहाड़ी के ऊपर तक पहुँचते पहुँचते एक बजने को हो रहा था. ठंड को काटने के लिए सबने भूत-प्रेतों की कहानियाँ सुनानी शुरू कर दी थीं, और साथ लाए सिगरेट-शराब का दौर तो साथ साथ चल ही रहा था. किसी ने कहानी सुनाया था कि वहाँ की किंवदंती के अनुसार जिस पहाड़ी पर हम चढ़ रहे थे, वहाँ के शीर्ष पर एक प्रेत रहता है जिसने कई जानें भी ले ली हैं. पहाड़ी के दूसरे सिरे पर अस्पताल का मुर्दाघर था जहाँ डाक्टर खेस प्राय: पोस्टमॉर्टम करते थे. उन्होंने भी मुर्दाघर के मुर्दों के साथ के अपने अनुभव की कई झूठी सच्ची, परंतु जीवंत कहानी सुनाई. पहाड़ी के सिरे तक पहुँचते-पहुँचते डाक्टर खेस द्वारा दी गई सिगरेट के कई कशों के बावजूद मेरे जिस्म में सिहरन दौड़ रही थी और मेरे मन में अजीब से अनुभव जागृत हो रहे थे. मुझे लगा कि जैसे मुझे ठंड जरा ज्यादा ही लग रही है.
अचानक ही मेरे हाँथ पाँव काँपने लगे और मेरे मुँह के भीतर से अनियंत्रित लार बहने लगी. दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया और मैं गिर पड़ा. मेरे साथी दौड़ते हुए मेरे पास चले आए. एक ने मुझे उठाने की कोशिश की परंतु वह असफल रहा. मेरे हाथ पैर शिथिल हो गए थे. एकाध मिनट के लिए मुझे लगा कि यह दौरा क्षणिक था और कहीं कुछ नहीं हुआ है. परंतु फिर दूसरे ही पल फिर अजीब अहसास होने लगा और लगने लगा कि मैं मरने वाला हूँ. मुझे कोई शक्ति, शायद पहाड़ी का भूत मुझे अपने पास बुला रहा है. मेरा दिमाग प्रत्येक क्षण-दो क्षण में रह रह कर अजीब चीजें सोच रहा था. मैंने बदहवासी में बड़बड़ाना चालू कर दिया कि अब मैं मरने वाला हूँ और मेरी लाश यहीं कहीँ दफन कर दी जाए. मैं अंधेरे में दोस्तों से कागज़ कलम की माँग करने लगा ताकि मैं अपना वसीयत कर सकूँ और यह भी लिख सकूँ कि मेरे मृत्यु में किसी का कोई हाथ नहीं है, अन्यथा मेरे ये साथी बिला वजह परेशान होते. इस बीच मैं कब बेहोश हुआ, पता ही नहीं चला.

जब मुझे होश आया तो मैंने पाया कि मैं भूतों से घिरा हुआ हूँ. कोई मेरे पैर में मालिश कर रहा था तो कोई सिर पर. मैंने चिल्लाने की बेतरह कोशिश की, परंतु मेरे मुँह से आवाज़ ही नहीं निकली. डर के कारण मेरी घिग्घी बंध गई थी.

मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई दी. एक भूत कह रहा था- इसे कुछ नहीं हुआ है यार. लगता है भूल से इसे मैंने अपनी गाँजा वाली सिगरेट दे दी थी. थोड़ा सा नशा चढ़ गया है इसे. पंद्रह-बीस मिनट में ठीक हो जाएगा. मुझे उस भूत की आवाज थोड़ी पहचानी सी लगी. वह डॉक्टर खेस की आवाज़ थी.
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राजेश रंजन, जो अभी रेडहैट पर हिन्दी का कार्यभार देख रहे हैं, ने एक लिंक भेजा है. वागर्थ में हमारे हिन्दी चिट्ठों की जमकर चर्चा हुई है. आप भी देखें:
http://vagarth.com/feb05/internet/index.htm

धन्यवाद राजेश.
रवि

तिरंगे का अपमान?
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भारतीय खिलाड़ियों, या कहें कि भारत की जनता का ये दुर्भाग्य है कि तिरंगे के मान-अपमान के बारे में किसी लकीर-के-फकीर सरकारी बाबू या सोच-विहीन राजनेता (जिनके ऊपर इसे तय करने का भार है) तय करते हैं कि सही क्या है. वह तो भला हो न्यायालय का, अन्यथा तीन-चार साल पहले तो आप तिरंगे को अपने घर पर भी नहीं टाँग सकते थे. आम जनता को तिरंगे का दर्शन साल में सिर्फ दो दिन यानी 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही हो पाता था, वह भी किसी जर्जर, टूटते-फूटते, वर्षों से रँगाई-पुताई को मोहताज शासकीय कार्यालयों के ऊपर! और फिर कहा जाता है कि तिरंगे का अपमान न हो. तिरंगे का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है भला?
खेल मंत्री सुनील दत्त के प्रयासों के बावजूद खिलाड़ियों के द्वारा तिरंगे के उपयोग को उसके अपमान का कारण मान कर किसी सरकारी बाबू/सोच-विहीन राजनेता द्वारा फिर से मना कर दिया गया है. अगर हमारे खिलाड़ी अपने अमरीकी खिलाड़ी बंधु की तरह जो हर कहीं, गर्व से स्टार और स्ट्राइप लगाए फिरते हैं, अगर तिरंगा लगा लेते हैं तो यह भारत देश का और तिरंगे झंडे का अपमान होगा! इससे घटिया विचारधारा तो कुछ और हो ही नहीं सकती.
दरअसल, यह निर्णय समस्त भारतीय जनता का अपमान तो है ही, और बड़ा दुर्भाग्य कि वह अपने राष्ट्रीय झंडे के प्रतीक, तिरंगे को गर्व से कहीं प्रदर्शित भी नहीं कर सकता.

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व्यंज़ल
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नकारेगा भी कोई ये विचार घटिया
बरसों से बिछी पड़ी है टूटी खटिया

जमाने में बहुत हैं मख़मली मसनद
हमें माकूल वही अपनी फटी चटिया

जमाना हँसता है तो इससे हमें क्या
समंदर को चले उठाए अपनी पटिया

हम सा अमीर कोई नहीं जमाने में
हमने दरवाजे पे लगा ली है टटिया
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इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार गरीब, मेधावी विद्यार्थियों को पहुँचा…
धन्यवाद अमित और अतुल, आपके इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार की राशि से रतलाम के पास ग्राम सेजावता के शासकीय हाई स्कूल में कक्षा दसवीं के गरीब, परंतु मेधावी विद्यार्थियों को दिनांक 22 फरवरी को पुरस्कार प्रदान किया गया. दसवीं की प्री-बोर्ड परीक्षा में विषयवार अधिकतम अंक लाने वाले प्रत्येक विद्यार्थियों को रू.175/- मूल्य के नोट बुक्स तथा एक हीरो फाउन्टेन पेन रु. 25/- मूल्य के प्रदान किए गए. कुल सात पुरस्कार प्राचार्य श्री सुरेशचन्द्र करमरकर के हाथों से प्रदान किए गए जिसके विवरण निम्न हैं-
कुमारी मंगल कुंवर- हिन्दी भाषा, कु. ममता- अंग्रेजी, धनंजय- संस्कृत, कु. सुमित्रा- गणित, संतोष कुमार- विज्ञान, राजपाल- सामाजिक विज्ञान, कु. सुमित्रा- कुल सर्वाधिक अंक.
इनबच्चों के चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें.ये बच्चे फटे-पुराने टाट पट्टियों में जमीन में बैठकर, टूटे फूटे भवनों में पढ़ाई करते हैं. और ऐसी घोर ग़रीबी में भी अपनी पढ़ाइयाँ जारी रख अच्छे अंक लाते हैं. आइए, इनके प्रयासों के लिए इन्हें दिल से बधाई दें.

आइए, शर्म से जरा सिर झुकाएँ...
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हमारे भारत में एक ईनामी डाकू ददुआ सरेआम एक गांव में एक मंदिर बनवाता है, आसपास ऐलान करता है कि अमुक दिन मंदिर में भगवान की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी. वह गांव वालों समेत सबको निमंत्रण भेजता है और इस आयोजन में पहले से ऐलान कर खुद भी भेष बदलकर पूजा अर्चना में शामिल होता है. और यह सब जानते हुए भी, वोटों की गणित के पीछे विधायक-सांसद (जिनमें उ.प्र. के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह का सांसद भतीजा भी शामिल है) भी उस आयोजन में शामिल होते हैं जिसमें दो लाख (जी हाँ, दो लाख) लोगों की उपस्थिति होती है.

और, हमारे असहाय भगवान अपनी प्राण प्रतिष्ठा का यह नाटक बुत बन कर देखते रहे. अगर भगवान में जान होती, तो वे भी शर्म से डूब मरते.

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व्यंज़ल
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राजा नए हुए हैं गूजर हो या ददुआ
मानव या तो मरा पड़ा या है बंधुवा

जाति-धर्म के समीकरणों में उलझा
मेरे देश का नेता हो गया है भड़ुआ

उस एक पागल की सच्ची बातों को
पीना तो होगा लगे भले ही कड़ुआ

अवाम का तो होना था ये हाल, पर
ये क़ौम किस लिए हो गई है रंडुवा

एक अकेला रवि भी क्या कर लेगा
इसीलिए वो भी खाता बैठा है लड़ुवा

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आइए, झगड़ा करें

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लीजिए, यह भी ग़ज़ब है. झगड़ों के भी अपने फ़ायदे हैं. अध्ययनों के अनुसार, जो दम्पति आपस में झगड़ा करते रहते हैं, वे औरों की तुलना में ज्यादा फ़िट रहते हैं, उन्हें तनाव के फलस्वरूप होने वाले हृदय रोगों की संभावना कम होती है, इत्यादि इत्यादि.
लगता है अब हमें झगड़ने के लिए और झगड़ते रहने के लिए कारणों की तलाश करते रहना पड़ेगा. अब पति को अपने अख़बार के अध्ययन के बीच पत्नी के द्वारा किए गए किसी प्रकार के व्यवधान को सहने के बजाए उस पर झगड़ा किया जाना ही उचित होगा और पत्नी द्वारा यह देखे जाने के बाद कि पढ़ा गया अख़बार ठीक ढंग से मोड़ कर उचित प्रकार नहीं रखा गया है, कुढ़ कर चुप रहने या ताने मारने के बजाए, इस बात पर जमकर झगड़ा करना- पति-पत्नी दोनों की सेहत के लिए उचित रहेगा.

तो, दोस्तों, झगड़े को अब नई निगाह से देखो और झगड़ते रहो.
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व्यंजल (हास्य ग़ज़ल=हज़ल के तर्ज पर)
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प्रिये, है ये प्रेम, नहीं है झगड़ा
आओ यूँ सुलझाएँ अपना रगड़ा

जिंदगानी के चंद चार क्षणों में
ऊपर नीचे होते रहना है पलड़ा

करम धरम तो दिखेंगे सबको
चाहे जित्ता डालो उस पे कपड़ा

जब खत्म होगी तो सुखद होगी
यूँ पीड़ा को रखा हुआ है पकड़ा

जिया है जिंदगी को बहुत रवि
मौत कितनी है ये असली पचड़ा
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अपने ब्लॉग चित्रों के लिए एक और मुफ़्त सेवा

फ्लिक्र (और ऐसे ही अन्य कई सेवाओं) के द्वारा अपने ब्लॉग के चित्रों पर काँट-छाँट-तोड़-मरोड़ किए जाने से परेशान यह बंदा कई दिनों से इंटरनेट की किसी मुफ़्त अच्छी सेवा की तलाश में था. अभी-अभी पता चला कि स्ट्रीमलोड न सिर्फ चित्र, बल्कि अन्य मीडिया जैसे कि वीडियो/ऑडियो स्ट्रीमिंग की भी मुफ़्त सुविधा (100 मे.बा. तक) प्रदान कर रही है, और वह भी बिना तोड़े-मरोड़े. अब देखना यह है कि यह भरोसेमंद और तेज सेवा है या नहीं. मेरे पिछले ब्लॉग में चिड़िया के घोंसले का चित्र स्ट्रीमलोड से ही है. अगर आपको सही दिख रहा है तो मुझे बताएँ और आप भी उपयोग करें.

कंकरीट के जंगल और पॉलिथीन के घोंसले

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पिछले दिनों हमारे घर के सामने हमारे छोटे से बग़ीचे में, सीढ़ियों के नीचे से जाती हुई बेल की शाखाओं पर सुंदर, नन्हे चिड़िया के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया. चिड़ी और चिड़ा दिन रात मेहनत करते, तिनका-तिनका जोड़ते और देखते ही देखते उनका घोंसला बन कर तैयार हो गया. पर यह क्या? जब घोंसला बनकर तैयार हुआ तो पता चला कि उसमें घासफूस, पत्ते और प्राकृतिक तिनके तो कम, पॉलिथीन के रेशे, काग़ज और पॉलिथीन थैलों के टुकड़े और न जाने क्या-क्या सिंथेटिक वस्तुएँ थीं. जिस घोंसले को अपने प्राकृतिक रूप में सुंदर, प्यारा और निर्मल दिखाई देना चाहिए था, वह इन पॉलीथीन और काग़ज़ के टुकड़ों के कारण बदसूरत और घिनौना हो गया था.

मनुष्य के ग़लत कार्यों का खामियाजा बेचारे नन्हे पशु पक्षी भुगत रहे हैं. उन्हें पेड़ पौधों के जंगल नसीब नहीं हो रहे हैं लिहाज़ा वे कंकरीट के जंगल में शौकिया तौर पर उगाए गए किसी पौधे की किसी शाखा के एक टुकड़े में पॉलीथीन का घोंसला बनाने को अभिशप्त हैं.

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दोस्तों, एक सप्ताह के लिए बंदा ऑफलाइन होने जा रहा है. अब जबकि सुबह की कॉफ़ी को तो भले ही छोड़ा जा सकता है, इंटरनेट को नहीं, तब सप्ताह भर के लिए ऑफलाइन होना मज़ाक सा लगता है. परंतु छत्तीसगढ़ / बस्तर के बीहड़ों में जाना है, जहाँ इंटरनेट के पग अभी पहुँच नहीं पाए हैं. लिहाजा मेरी कुछ पुरानी ग़ज़लें जिनमें से कुछ यदा कदा प्रकाशित भी हो चुकी हैं और लंबे समय से जियोसिटीज़ में भी थीं, यहाँ ब्लॉग पर डाल रहा हूँ. सप्ताह भर आराम से पढ़िए और मुझे गरियाइए कि क्या फूहड़ ग़ज़लें लिखी हैं… हे..हे...हे...

ग़ज़ल 01
पानी की कीमत किसी पसीने से पूछना
बयार क्यों बहती नहीं उल्टी मत पूछना

जोड़ घटाना गुणा भाग के गणितीय सूत्र
राजनीति में ऐसे चले आए क्या पूछना

सत्ता- कुर्सी के खेल में नियम- कायदे
वो भला आदमी चले- चला था पूछना

नया क्या आत्मघाती का बेरोजगार होना
जेहन में आता है फिर क्यों ये पूछना

रवि, खुदा ने तो तुझे बनाया था बेजात
फिर क्यों सभी जात तेरी चाहते हैं पूछना

ग़ज़ल -02
जरा से झोंके को तूफान कहते हो
टूटता छप्पर है आसमान कहते हो

उठो पहचानो मृग मरीचिका को
मुट्ठी भर रेत को रेगिस्तान कहते हो

अब तो बदलनी पड़ेंगी परिभाषाएं
सोचो तुम किनको इंसान कहते हो

नैनों का जल अभी सूखा नहीं है
पहचानो उन्हें जिन्हें महान कहते हो

सूचियाँ सब सार्वजनिक तो करो
जानते हो किनको भगवान कहते हो

जमाने को मालूम है बदमाशियाँ
कैसे अपने को नादान कहते हो

कभी झांके हो अपने भीतर रवि
औरों को फिर क्यों शैतान कहते हो

ग़ज़ल -03
जीने की खबर है
रने की खबर है

अपने दोस्तों के
जलने की खबर है

उनके नासूरों के
भरने की खबर है

डरावने लोगों के
डरने की खबर है

दो प्रेमियों के
लड़ने की खबर है

किसी कंगाल के
खाने की खबर है

दर्द को रवि के
सहने की खबर है
ग़ज़ल -04
खुदा को ही दुआएं दे रहा हूं मैं
जले चराग़ बुझाए दे रहा हूं मैं

चाहत में मन्जिल-ए-इश्क की
खुद ही को मिटाए दे रहा हूं मैं

राह-ए-मोहब्बत में मरकर
वफा सबको सिखाए दे रहा हूं मैं

मोहब्बत डरने वालों का नहीं
जान लो यह बताए दे रहा हूं मैं

लम्हे भर को उन्हें भूले नहीं
खुद को ऐसे भुलाए दे रहा हूं मैं

जरा सी बात थी उनके मिलने की
और अफसाना बनाए दे रहा हूं मैं

इतना तो तेरी खातिर है रवि
अपना दिल जलाए दे रहा हूं मैं
ग़ज़ल -05
यूं तो दुनिया में कुछ कम गम नहीं
हमें तो गम है कि कोई गम नहीं

मरने को तो मरते हैं सभी मगर
जिंदगी जीने का किसी में दम नहीं

साथ देने का वादा तो सबने किए
यहां तो हम सफर खुद हम नहीं

रोया किए हैं ता उम्र तेरी याद में
आलम है अब आंख भी नम नहीं

फिर से मिलने की किसी मोड़ पर
मांगी थी दुआ खुदा से कुछ कम नहीं

समझे थे पैगम्बर-ए-वफा तुझे
सोचा ये था कि हमें कोई भ्रम नहीं

मिलेगा मुकद्दर में सुकून रवि
ये सोच के किया था कोई श्रम नहीं
ग़ज़ल -06
निकलो गर सफर पे लोग मिलते जाएंगे
पोंछ लो ये चंद आँसू वरना ढरक जाएंगे

माना अंधेरों में साए भी नहीं देते साथ
आखिरी मोड़ तक उनके अहसास जाएंगे

अश्कों का जाम बना पिया है जिन्होंने
वे दीवाने तेरे पास दर्दे दिल ले के जाएंगे

जब भी गिरो बढ़ाओ सहारे के लिए हाथ
लोग तो खुद डूब कर तुझे बचा जाएंगे


सहर होने पर भी खोलो न आँख अपनी
उनके बिखरे ख्वाब संवर ही जाएंगे

मंजिल इन्हीं राहों पर ही मिलेगी रवि
बाकी है जोश बहुत फिर कैसे घर जाएंगे
ग़ज़ल -07
अनाजों के ढेर में बैठा भूखा हूँ मैं
भरा है पेट मगर बैठा भूखा हूँ मैं

जनाजों के मेले में भीड़ है मगर
बेगुनाह लाशों का बैठा भूखा हूँ मैं

इस जंग में हुईं हैं सभी हदें पार
कुर्सियाँ पकड़ा बैठा भूखा हूँ मैं

सड़कें, नहरें, बांध और न जाने क्या
थालियाँ सजाए बैठा भूखा हूँ मैं

गरीबों के गले से निवाले निकाल
अमीर शहर में बैठा भूखा हूँ मैं

ये है तेरे मुल्क की हालत रवि
सबकुछ खा के बैठा भूखा हूँ मैं
ग़ज़ल 08

मेरे शहर के सड़कों के गड्ढों की कहानियाँ हैं
बेजान बिजली के खम्भे भी कहते कहानियाँ हैं ।

वहाँ कोई पूल टूटा, तो यहाँ कोई ट्रेन टकराई
नए किस्सों में क्यों भूलते पिछली कहानियाँ हैं ।

धारावी के झोंपड़े, वरली सी- फेस के बंगले
कहीं रसभरी, तो कहीं करूणामयी कहानियाँ हैं ।

भीड़ का ये मंजर ख़तम होता नहीं दिखता
करोड़ों के देश में अकेलेपन की कहानियाँ हैं ।

तेरे चेहरे पे आज मुस्कान चौड़ी क्यों है रवि
क्या तू ने सुन ली कोई दर्द भरी कहानियाँ हैं ।
ग़ज़ल 09

जमाने, तेरी खातिर हम बरबाद हो गए
क्यों लोग कहते हैं कि मिसाल हो गए ।

इस दौर में तो अब मुहब्बत से पहले
नून, तेल और लकड़ी के सवाल हो गए ।

अब दोस्तों ने शुरू किया कत्ले आम
सभी बन गए बुत, हवा दीवार हो गए ।

पता नहीं कि यह आखिर कैसे हो गया
सपने थे तूफ़ान के पर बयार हो गए ।

वीरान बस्ती में था सिर्फ हमारा जलवा
जमाने तेरे सितम से हम बेकार हो गए ।

हुआ है मेरे शहर में एक अजीब हादसा
कुछ खा के, बाक़ी भूख से बीमार हो गए ।

अरमाँ मत रख बेवकूफ क्या पता नहीं
राजपथ के कुत्ते अब सब सियार हो गए ।

इतना आसाँ नहीं जमाने को बदलना
रवि तुझसे पागल कई हजार हो गए ।
ग़ज़ल 10

मच्छरों ने हमको काटकर चूसा है इस तरह
आदमकद आइना भी अब जरा छोटा चाहिए ।

घर हो या दालान मच्छर भरे हैं हर तरफ
इनसे बचने सोने का कमरा छोटा चाहिए ।

डीडीटी, मलहम, अगरबत्ती, और आलआउट
अब तो मसहरी का हर छेद छोटा चाहिए ।

एक चादर सरोपा बदन ढंकने नाकाफी है
इस आफत से बचने क़द भी छोटा चाहिए ।

सुहानी यादों का वक्त हो या ग़म पीने का
मच्छरों से बचने अब शाम छोटा चाहिए ।
ग़ज़ल 11

तेरी मुहब्बत में कोई लहर नहीं है
चलो कोई बात मगर नहीं है ।

ये रास्ता तो थर्राता था आहटों से

चीखों का कोई खास असर नहीं है ।

किए तो थे वादे इफ़रात क्या करें
इनमें से कोई याद अगर नहीं है ।

तेरे बगैर जीने को सोचा नहीं था
जमाने से तेरी कोई खबर नहीं है ।

तुझे भूलने की कोशिशों में सफल
याद ऐसी कोई शाम-सहर नहीं है ।

तूने खाई होंगी कसमें ढेरों मगर
कोशिशों में खास क़सर नहीं है ।

वो तो वादा निभाकर भी दिखाते
अफसोस कोई पास ज़हर नहीं है ।

दीवानों की भीड़ में पहचानें जिसे
रवि वैसा कोई नाम नज़र नहीं है ।
ग़ज़ल 12

हमसे आप इस तरह क्यूँ शरमाने लगे
नज़र मिला के फिर क्यूँ शरमाने लगे ।

किसी ने कोई बात न की महफिल में
लो वो खुद की बात पे शरमाने लगे ।

ज़रूरत नहीं शै को किसी सबब की
वो आप ही आप ऐसे शरमाने लगे ।

या खुदा क्या होगा मेरे तसव्वुर का
वो ख्वाब में भी आके शरमाने लगे ।

आज क्यूँ ये दुनिया बदली सी है
जाने क्या हुआ कि वो शरमाने लगे ।

कोई तो समझाए रवि को कि क्यों
कल की बात पे आज शरमाने लगे ।
ग़ज़ल 13

रिश्ते अब बेमाने हो रहे
जख्म भी प्यारे हो रहे ।

तुझसे मिले लम्हा न हुआ
और हम तुम्हारे हो रहे ।

दिले गुबार निकालें तो कैसे
अश्क भी अब न्यारे हो रहे ।

क्या हुआ दिल टूटा अपना
वो भी तो अब बंजारे हो रहे ।

किससे कहें हाले दिल यहाँ
अपने तो बेगाने हो रहे ।

तसव्वुर में बैठे हैं आँखे मूंदे
भरी दुनिया में नजारे हो रहे ।

मुहब्बत तो डूबना है रवि
फिर वो कैसे किनारे हो रहे ।
ग़ज़ल 14

जरा सी बात थी जो पूरी दास्ताँ बन गई
नज़र क्या मिली मुहब्बत का सामाँ बन गई ।

उनके खुदा का हाल तो पता नहीं हमको
यहाँ मुहब्बत अपना धर्म और ईमाँ बन गई ।

वो क्या आए मेरे दर पे एक पल के लिए
मेरा ग़रीब खाना खुशियों का जहाँ बन गई ।

पता नहीं कि ऐसा हुआ आखिर किसलिए
सारा जहाँ यकायक मेरी मेहरबाँ बन गई ।

न कोई ग़मी हुई न कोई हादिसा ही हुआ
जाने क्यों खामोशी अपनी जुबाँ बन गई ।

सबके खयाल से भले ही वो बहार थी
मेरे दर पे आके तो वो तूफाँ बन गई ।

रहने ही दो फ़जूल है ये दावा आपका
अपनी चाहत तो अब आस्माँ बन गई ।

अब हम ये खुशियाँ ले के कहाँ जाएंगे
कफ़स ही जब अपना आशियाँ बन गई ।

पहले वो पूछते थे कि वो कौन हैं तेरे
जिंदगी जान के रवि वो नादाँ बन गई ।
ग़ज़ल 15
जिक्र बेवफ़ाई का जब किया जाएगा
उसके साथ तेरा नाम लिया जाएगा ।

हाल अच्छा अपना कहें तो किस तरह
जुबां खुलेगी जब जाम पिया जाएगा ।

आलम है कि यहाँ कोई हम सफर नहीं
बात बनेगी जब कहीं दिल दिया जाएगा ।

कहते हैं वो हमसे मिलने की फुर्सत नहीं
तसल्ली है जनाजे पे मिल लिया जाएगा ।

बात की थोड़ी सी और वो रूस्वा हो गए
बनेगी बात कैसे जो न किया जाएगा ।

अभी तो बैठे हैं खयालों में खोए हुए
देखेंगे जो महफिल में याद किया जाएगा ।

उनकी वसीयत थी जनाजे पे न रोए कोई
नई बात नहीं दिल थाम लिया जाएगा ।

मंज़िल की ये दौड़ तो खत्म होने से रही
चलो अब कहीं आराम किया जाएगा ।

उसे खबर है कि उनके इन्तेज़ार में रवि
अपनी जिंदगी यूँ बरबाद किया जाएगा ।
ग़ज़ल 16
इस जमाने की बहार को क्या कहिए
गुल हैं काँटों से लगें तो क्या कहिए ।

गुमाँ था बहुत तेरी यारी पे अबतक
अब दुश्मनी सी लगे तो क्या कहिए ।

समंदर के किनारे है आशियाँ अपना
गर प्यास न बुझे तो क्या कहिए ।

दुपहर की धूप में निकला है दीवाना
उजाला न मिले उसे तो क्या कहिए ।

कहते हैं जिंदगी बड़ी आसाँ है रवि
लोग मानें न मानें तो क्या कहिए ।
ग़ज़ल 17

इक दर्द सा है क्यूँ दिल में कोई बताए तो हमको
सभी मेहरबाँ हो रहे क्यूँ, कोई सताए तो हमको ।

मांगी है दुआ तेरे ही लिए ईश और अल्लाह से
दे रहे सभी बद्दुआ यहाँ दे कोई दुआएँ तो हमको ।

जब भी चाहा तबस्सुम को अश्क निकल जाते हैं
एक अश्क की खातिर ही कोई हँसाए तो हमको ।

सब कहते हैं बहुत कठिन है राह उस मंजिल की
राहबर बनकर राह अरे, कोई दिखाए तो हमको ।

निकल चुकी है जान कासिद के इन्तेजार में
कुछ खबर उनकी सुना कोई जिलाए तो हमको ।

हर चीज है मुमकिन कहने को लोग कहते हैं
इक दिन मेरे महबूब से कोई मिलाए तो हमको ।

वो वफा करें डर से लुटी नींद अपनी है रवि
झूठी तसल्ली दे के सही कोई सुलाए तो हमको ।
ग़ज़ल 18
महफिल में सुनाई दास्ताँ सबने अपनी
हम पे गुजरी ऐसी कि सुनाई न गई ।

उनके पूछने का अंदाज था कुछ ऐसा
कोई सूरत वो बात बताई न गई ।

उनका दोष नहीं न उनने की बेवफाई
हम ही रूठे थे ऐसे कि मनाई न गई ।

दीवानगी में अपने दिल जलाए बैठे
होश आया पर आग बुझाई न गई ।

तन्हाई का खौफ इस कदर है रवि
वो आ गए पर मेरी तन्हाई न गई ।
ग़ज़ल 19

जाने किस बात पे हमें रोना आया
बेदर्द जमाने क्यों हमें रोना आया ।

कोई तो दे हमें ज़हर का प्याला
जाम पी के तो हमें रोना आया ।

इन चरागों को बुझा दो यारों
रौशनी देख के हमें रोना आया ।

बस करो छेड़ो न चर्चा फिर
जिन बातों पे हमें रोना आया ।

के कहकहे लगाए सबने रवि
सुनके जो बात हमें रोना आया ।
ग़ज़ल 20
इस कदर कर कोशिश ख़िजा-ए-गुल खिलाने
बने मुस्कान गुलिस्ताँ की के तेरा मुरझाना ।

माना खार भी लेते हैं साँस इस चमन में
इक फूल की खुशबू से है दामन भर जाना ।

इन अश्कों के टपकने से मिलता है सुकून
दो बूंद देगा सागर-ए-सुकून तुझे अंजाना ।

उन्हें याद दिलाने से क्या होगा हासिल
याद रहें वो क्या फिर याद आना न आना ।

करले तू अपनी जुबाँ को इस कदर प्यासा
ज़हर भी तू अमृत समझ पचा जाना ।

न कर इंतजार आखिरी साँस का रवि
हर साँस आखिरी है और दिल है बेगाना ।
ग़ज़ल 21
कुछ नहीं तो वायदों की बौछार लाऊँगा
इस चुनाव में जीता तो त्यौहार लाऊँगा ।

अभी तो याचक बना हूँ तेरे दर पर
कुर्सी पे बैठ तेरे लिए इन्तेजार लाऊँगा ।

परोसा है सभी को आश्वासनों के प्याले
होगी जेब गर्म तभी ऐतबार लाऊँगा ।

अभी तो होगा वो तुम चाहते हो जो
बाद में फिर मैं झूठा इक़रार लाऊँगा ।

लगते हो आज तुम मेरे अपने से
कल को पहचानने से इनकार लाऊँगा ।

जब बीतेंगे पांच बरस खामोशी से रवि
चीखता हुआ फिर सच्चा इसरार लाऊँगा ।
ग़ज़ल 22


भूले हुए है खुशी को खुशी की तलाश में
हो गए ख़ुद बेवफा वफा की तलाश में ।


बे-दिल दुनियाँ में एक इन्साँ न मिला
हम भटका किए थे खुदा की तलाश में ।


समंदर की लहरों से भी न मिटी प्यास
गोता लगाया व्यर्थ शबनम की तलाश में ।

थे बेखबर जल रहा था अपना आशियाना
भटका किए दरबदर रौशनी की तलाश में ।

लोग तिनकों के सहारे लांघते हैं दरिया
हमसे डूबी कश्ती सहारे की तलाश में ।

अब तक थे शिकार गलतफ़हमी के रवि
मिली थी मौत जिंदगी की तलाश में ।
ग़ज़ल 23
इक दर्द सा है क्यूँ दिल में कोई बताए तो हमको
सभी मेहरबाँ हो रहे क्यूँ, कोई सताए तो हमको ।

मांगी है दुआ तेरे ही लिए ईश और अल्लाह से
दे रहे सभी बद्दुआ यहाँ दे कोई दुआएँ तो हमको ।

जब भी चाहा तबस्सुम को अश्क निकल जाते हैं
एक अश्क की खातिर ही कोई हँसाए तो हमको ।

सब कहते हैं बहुत कठिन है राह उस मंजिल की
राहबर बनकर राह अरे, कोई दिखाए तो हमको ।

निकल चुकी है जान कासिद के इन्तेजार में
कुछ खबर उनकी सुना कोई जिलाए तो हमको ।

हर चीज है मुमकिन कहने को लोग कहते हैं
इक दिन मेरे महबूब से कोई मिलाए तो हमको ।

वो वफा करें डर से लुटी नींद अपनी है रवि
झूठी तसल्ली दे के सही कोई सुलाए तो हमको ।

सुदर्शनी विचार?
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सरकार द्वारा पिछली दफा जारी भारत के जनसंख्या आंकड़ों पर हर कोई अपनी अपने अपने चश्मे से दृष्टि डाल रहा है, और जनसंख्या विस्फोट की असली समस्या पर कोई दृष्टि डालने को तैयार ही नहीं है. आग में घी डाल रहे हैं रा स्व संघ प्रमुख सुदर्शन जो यह कहते हैं कि प्रत्येक हिन्दू को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए. उनकी धर्म सम्बन्धी गणनाओं के अनुसार हिन्दुओं के भारत में अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा है, चूंकि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं. (जबकि वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार, वर्तमान दर पर ऐसा होने में हजारों साल लगेंगे)

अगर हिन्दू के अल्पसंख्यक होने का खतरा है तो फिर चार क्या हमें तो चौबीस बच्चे पैदा करने चाहिए. हमें जीवन भर बच्चे ही पैदा करते रहने चाहिए. हर साल एक. फिर देखो हम तो दुनिया में दो चार साल में ही बहु संख्यक हो जाएंगे. भारत में तो हैं ही, पूरी दुनिया में बहुसंख्यक हो जाएँगे. मुसलमान ही क्या, वर्तमान वैश्विक ईसाई समुदाय को भी हम अल्प संख्यक बना देंगे. पूरा विश्व हिन्दू मय हो जाएगा. कितना मजा आएगा तब. भले ही हम कीड़े मकोड़े की तरह जीवन जी रहे हों, बच्चे पैदा करते ही जाएँगे. वाह क्या हिटलरी विचार-धारा है. सलाम! लाल सलाम!!

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व्यंज़ल
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उनने कमज़ोर कर ली हैं अपनी नज़र
कहते हैं न रखेंगे दूसरों की कोई खबर

उनने चल दी हैं अपनी शातिराना चालें
देखें कि क़ौम पर क्या होता है असर

उनने ऐलान किया है समाजवाद का
हम तो बेताब हैं किस घड़ी किस पहर

मंजिलें तो तय कर लीं बहुत दूर की
रास्ते किस ओर को जाएंगे जरा ठहर

लोग इतने नादान नहीं हो सकते रवि
नतीज़े से पहले रख ले जरा सी सबर

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इंजीनियर्स कैसे करते हैं...

हाल ही में मैंने क्लिफ़र्ड साहनी की लिखी किताब “वर्ल्ड’स बेस्ट प्रोफ़ेशनल जोक्स” पढ़ी. अमूनन चुटकुलों की किताबों में या कहीं और जगह (रीडर्स डाइजेस्ट को छोड़कर) मौलिक चुटकुले कम ही मिल पाते हैं. घूम फिर कर वही पुराने, घिसे-पिटे चुटकुले दोहराए जाते हैं. परंतु पुस्तक महल, दिल्ली से प्रकाशित महज़ साठ रूपयों की इस किताब में बहुत से लतीफ़े मुझे नए-नए से लगे. इन्हीं में एक पुराना लतीफ़ा (पृष्ठ 75, संस्करण 2004) फिर पढ़ने में आया. पर है यह बहुत मज़ेदार. आप भी पढ़िए:
• इंजीनियर्स प्रिज़ीशियन से करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स इंपल्स में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स जब करते हैं, शॉक्ड हो जाते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स लार्ज कैपेसिटी में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स अधिक फ्रिक्वेंसी और कम रेज़िस्टेंस में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स हाई फ्रिक्वेंसी और ज्यादा पॉवर में करते हैं
• मेकेनिकल इंजीनियर्स स्ट्रेस और स्ट्रेन में करते हैं
• मेकेनिकल इंजीनियर्स लेस इनर्जी तथा ग्रेटर एफिशिएंसी में करते हैं
• केमिकल इंजीनियर्स फ्लूइड स्टेट में करते हैं
• पेट्रोलियम इंजीनियर्स लुब्रिकेशन के साथ करते हैं
• एरोनॉटिकल इंजीनियर्स थॉरोली तथा लाट ऑफ सिमुलेशन के साथ करते हैं
• ड्रिलिंग इंजीनियर्स स्मूथ पेनीट्रेशन के साथ करते हैं
• सॉफ़्टवेयर इंजीनियर्स टेस्टिंग एवं फ़िक्सिंग के साथ करते हैं और हर बार फेल या क्रैश होने पर नए वर्जन्स के साथ करते हैं
• सिविल इंजीनियर्स स्पेशल, आर्किटेक्चरल वे में करते हैं और आर्किटेक्चरल इंजीनियर्स मोर सिविलाइज्ड वे में करते हैं

अब आपकी इंजीनियरिंग ब्रान्च इसमें छूट गई हो, तो उसे भी अपनी टिप्पणी के द्वारा यहाँ जोड़ देवें.
धन्यवाद.

110 अरब रुपयों की सालाना रिश्वत
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भारत में 110 अरब रुपयों की सालाना रिश्वत पुलिस, यातायात पुलिस और अन्य सरकारी कर्मचारियों को दी जाती है. यह धनराशि केंद्र तथा राज्य सरकारों को करों और अन्य शुल्कों के रूप में सालाना प्राप्त होने वाली राशि से 30 अरब रुपए ज्यादा है. प्राय: हर मार्ग पर ट्रकों / वाहनों से वसूली करती दिखाई देती पुलिस इन आंकड़ों की पुष्टि करती है. हाल ही में पुलिस का मुख्य काम यह हो गया था कि वह मुम्बई जैसे महानगर से लेकर मेवासा गांव तक वह यह सुनिश्चित करे कि दो पहिया वाहन चालक हेलमेट पहन कर ही वाहन चलाएँ. हेलमेट निर्माताओं ने भी रिश्वत का सहारा अपने उत्पादों को बेचने के लिए ले लिया लगता है. पुलिस के अनुसार हेलमेट पहन कर आप संपूर्ण सुरक्षित हो जाएँगे- भीड़ भरी, अनियंत्रित ट्रैफिक सहित, गड्ढों से परिपूर्ण सड़कों में. धन्य है!

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व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल, हज़ल के तर्ज पर)
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जीवन के शर्त में शामिल है रिश्वत
मयस्सर है कफन जो होगी रिश्वत

क़िस्सों में भी नहीं प्यार की बातें
भाई-भाई के रिश्तों में घुसी रिश्वत

ऐसे दौर की कामना नहीं थी हमें
अपने आप को देना पड़े है रिश्वत

बदल चुके हैं इबादतों के अर्थ भी
कोई फ़र्क़ नहीं रस्म हो या रिश्वत

हवालात की हवा खाना ही थी रवि
तूने लिया जो नहीं था कोई रिश्वत

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व्यंग्य
पते की बात
आपका पता आपके लिए जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा औरों के लिए है, ख़ासकर तब जब आपके पते में 10 जनपथ, 7 रेसकोर्स रोड या ए.बी. रोड जैसे मार्ग या फिर नरीमन पाइंट, एक्सप्रेस टावर, प्रेस कॉम्प्लेक्स या चेतक सेंटर जैसे पहचान चिह्न हों. आपका पता महज एक पता हो सकता है या फिर आपका संपूर्ण अता-पता बताने वाला साधन भी हो सकता है. आपका पता आपके रहन-सहन, स्टेटस-सिंबल और दुनिया भर के, ढेर सारे अन्य कई ढंके छिपे चीजों के बारे में विस्तार से प्रकाश डालने वाला साधन भी हो सकता है. मसलन, कनाट प्लेस का चपरासी और नरीमन पाइंट का गार्ड भी हो सकता है कि अपनी ड्यूटी करने को मर्सिडीज़ बैंज में आएँ और उधर साइबेरिया का लैंडलॉर्ड भी जरा-जरा सी सुविधाओं को तरसे.

किसी का पता बहुत छोटा होता है तो किसी का बहुत लंबा. छोटे पते तो तत्काल याद हो जाते हैं परंतु बड़े-बड़े पते याद रखना मुश्किल होता है. परंतु आदमी अगर बड़ा है तो उसका मीलों लंबा पता भी लोग जाने कैसे याद रख लेते हैं. एक गाँव का गरीब रमई अपने पते में अपने नाम के आगे गांव, ब्लॉक, तहसील, जिला, प्रांत इत्यादि सभी कुछ लिख डालने के बाद भी अपनी चिट्ठी के मिल पाने की उम्मीद जरा कम ही रखता है. कारण, ऐसे पते को कोई याद ही नहीं रखना चाहता. वैसे उस रमई के पास हर पाँचवे साल में कुछ भिखारियों की फ़ौज जरूर पहुँच जाती है जो उससे हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ा कर और कुछ लोग अपने जाति धर्म का वास्ता देकर वोट माँगने चले आते हैं.

वैसे कुछ ख़ास किस्म के पते को लोग खुशी-खुशी याद रखने की कोशिश करते हैं, जैसे कि ख़ूबसूरत लैलाओं के कई-कई पते आज के आधुनिक मजनूँ जुबानी याद रखते हैं, और जिस मजनूं के पते की ऐसी सूची ज्यादा लंबी होती है वह उतना ही ज्यादा सफल माना जाता है. इसके विपरीत कुछ पतों को लोग याद ही नहीं रखना चाहते, वरन् यह भी चाहते हैं कि दुनिया से ऐसे पतों का नामोनिशान मिटा दिया जाना चाहिए. उदाहरण के लिए टैक्स ऑफ़िसों का पता कोई भी किसी सूरत याद नहीं रखना चाहेगा और सपने में भी उसे भूलने की कोशिश करेगा. कुछ पते लोगों को मज़बूरी में, जबरन, जबर्दस्ती याद रखने पड़ते हैं, जैसे कि लेखकों को कई-कई संपादकों के पते हमेशा याद रखने होते हैं, ताकि उनकी स्वीकृत-अस्वीकृत, प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाओं को उचित-अनुचित स्थान मिल सके.

जहाँ एक ओर चंद लोगों के कई-कई पते हो सकते हैं, वहीं बहुसंख्य अन्यों के साथ ये हो सकता है कि वे ता-उम्र एक अदद पता पाने की तलाश में जिंदगी गुज़ार दें. पते की बात यह भी है कि जहाँ एक ओर चुनावी चक्कर में, दिल्ली में रहने वाले नेतागण सुदूर आसाम या कन्याकुमारी का पता लिखवा रखते हैं, तो बड़े-बड़े माफिया डॉन के पते उनके द्वारा खुले आम अपहरण, मारकाट करवाने के बावजूद पुलिस रेकॉर्ड में उपलब्ध नहीं रहते. ऐसे माफिया-डान-और-नेता अपने पते में मीटिंगें-पार्टियाँ करते रहने के बाद भी पुलिस रेकॉर्ड में पते से फरार बताए जाते हैं. चुनावों के समय नेता मतदाताओं के पते तलाशते फिरते हैं तो चुनावों के बाद इसके उलट मतदाता अपने नेता का पता तलाशता फिरता है. इसी प्रकार, जिंदगी भर हसीनाओं के पतों के पीछे भागने वाला सदाबहार आशिक अपने अंतिम समय में मुक्ति और शांति की तलाश में मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरुद्वारों के पते तलाशते फिरते हैं.

आज के युग में लोगों के पते में भी परिवर्तन हो रहा है. अब अगर आपके पास आए किसी के पत्र में उसके पूरे पते की जगह ऐसा लिखा मिले: रवि@याहू.कॉम तो अचरज से अपनी उँगली मत दबाइए. यह उस व्यक्ति का आज के आधुनिक ब्रह्मांड का एकमात्र सच्चा और सही पता, ईमेल पता है, जिसके द्वारा आप भले ही उसके पास नहीं पहुँच पाएँ, आपकी भेजी लानतों के उस तक पहुँचने की पूरी गारंटी है, और इस बात की भी पूरी गारंटी है कि उस पते पर आपका भेजा हुआ संदेश डाक में कहीं भी खो नहीं सकता. हाँ, यह हो सकता है कि पाने वाले ने आपकी चिट्ठियों को खोलने से पहले ही रद्दी की टोकरी में डालने की पूर्व व्यवस्था कर रखी हो. ईमेल पर भेजी गई आपकी चिट्ठियाँ तत्काल और तत्क्षण सामने वाले को मिल जाती हैं. इधर आपने चिट्ठी भेजी नहीं उधर चिट्ठी मिली नहीं और इधर जवाब आया नहीं. यह नहीं कि एक बार चिट्ठी भेज दिया तो फिर इंतजार करते रहिए हफ़्ते-दस दिन अपने जवाब का. इसीलिए ईमेल उपयोक्ता बंधु अब डाक-घरों की चिट्ठियों को स्नेल-मेल कहने लगे हैं. यानी रेंगने वाले कीड़े की गति से चलने वाली डाक.

अमूनन व्यक्ति को अपनी चीज़ें प्यारी लगती हैं, परंतु पते के मामले में प्राय: उलटा होता है. यहाँ उसे दूसरों की पत्नियों की तरह दूसरों के पते प्यारे लगते हैं. उदाहरण के लिए लैलाओं को मजनुओं के पते, व्यापारियों को ग्राहकों के पते, नेताओं को अपने मतदाताओं के पते प्यारे लगते हैं. औरतों को अपने मायके का पता प्यारा लगता है तो विवाहित पुरुषों को अपनी सालियों के पते. रतलाम के रहने वाले रवि को इंदौर का पता ललचाता है तो इंदौर वाला मुंबई की ओर दौड़ लगाता है. मुंबई वाला शंघाई, न्यूयॉर्क और सिडनी की ओर दौड़ लगाने की फ़िराक़ में रहते हैं.

इससे पूर्व कि बेपते की बेतुकी, इन फ़िजूल बातों को पढ़ते-पढ़ते आपके सब्र का अता पता भी गायब हो और आप मेरे पते तलाशते फिरें, इन पतों को अभी अधूरा ही छोड़ता हूँ.
(नवभारत, 25 जुलाई 1999 में पूर्व-प्रकाशित)

बेमौसम बहार
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आज सुबह-सुबह जब नियमित-अनियमित बिजली कटौती नहीं हुई तो सुखद आश्चर्य हुआ. परंतु फिर ध्यान आया कि भई, यह व्यवस्था तो सिर्फ आज के लिए है चूंकि शहर में आज मुख्यमंत्री, पूर्वप्रधानमंत्री-लोकसभा-नेताप्रतिपक्ष पधार रहे हैं. इनके स्वागत के लिए शहर में पिछले सप्ताह भर से तैयारियाँ चल रही थीं. अविरल बिजली प्रवाह के अलावा इन नेताओं के क्षणिक प्रवास से शहर को और भी बहुत सी सौगातें मिलीं. मुलाहिजा फ़रमाएँ:

• जिन क्षेत्रों-सड़कों से इन नेताओं को गुजरना है, उन की साफ़ सफाई की गई, सड़कों के गड्ढे भरे गए, स्पीड ब्रेकर्स हटाए गए तथा नए सिरे से डामरीकरण किया गया. कुछ सड़कों को चौड़ा भी किया गया. उन सड़कों के आसपास के अतिक्रमण हटाए गए तथा सड़कों पर रेहड़ी लगाने वाले, वाहन पार्क करने वालों को भगा दिया गया. पहली मर्तबा लगा कि शहर में सड़क नाम की कुछ चीज़ें हैं.
• शहर के पेयजल प्रदाय के लिए नगर निगम ने करोड़ों की लागत से एक ओवरहेड टंकी बनाई थी. परंतु उद्घाटन के अभाव में वह पिछले पाँच वर्षों से अनुपयोगी पडा हुआ था, तथा उसमें दरारें पड़ गई थीं, उसमें टूटफूट हो गई थी. मुख्यमंत्री के हाथों आज उसका उद्घाटन होना है, अत: आनन फानन उसमें सुधार कर उद्घाटन लायक बनाया गया है. देखते हैं कि पानी दे भी पाता है या नहीं.
• शहर में नगर निगम ने करोड़ों खर्च कर सिविक सेंटर नामक बहुउद्देशीय आवासी-व्यवसायिक परिसर का निर्माण पिछले पाँच वर्ष पूर्व कर लिया था. परंतु शासकीय विभागों की आपसी खींचातानी के कारण उस का किसी प्रकार का उपयोग नहीं हो पा रहा है. तैयार शुदा नए-नए बिल्डिंगों के दरवाजे-खिड़कियाँ टूट रहे हैं... खबर है कि मुख्यमंत्री इस बाबत कोई घोषणा करेंगे.
• चूंकि प्राय: सारा पुलिस महकमा मंत्रियों की व्यवस्था में लगा था, अत: राहगीरों-वाहन चालकों को जगह-जगह पुलिस-चेकिंग-वसूली से दो-एक दिन की मुक्ति मिली.
• ट्रैफ़िक लाइटें सुधर गईं, प्रशासन चुस्त दुरूस्त हो गया, गलियों में झाड़ू भी बढ़िया लग गए.
• इन नेताओं के आने से धूप में लाली ज्यादा प्रतीत हो रही है, चिड़ियाँ ज्यादा चहचहाती प्रतीत हो रही हैं और माहौल भी जरा खुशनुमा सा लग रहा है. आप आए शहर में बहार आई... (मुझे ऐसा लग रहा है, औरों को नहीं तो इसमें मेरा क्या कसूर?)
मैं उम्मीद करुंगा कि मेरे शहर में हर हफ़्ते दो हफ़्ते में कोई न कोई ऐसा बड़ा नेता आए. पर, सिर्फ उम्मीदों से काम नहीं चलेगा. तो चलिए इसके लिए, पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, प्रार्थना-इबादत इत्यादि करते हैं. आपसे अनुरोध है कि आप भी मेरी प्रार्थना में शामिल हों. मेरा आपसे वादा है कि आपके शहर के लिए भी मैं प्रार्थना करुंगा.
*-*-*
व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल, हज़ल के तर्ज पर)
*-*-*
आती हैं अब बेमौसम बहारें
कुछ की रखेल हो गई बहारें

अब तक पड़ा नहीं साबिका
कैसे जानेंगे जो आएंगी बहारें

सियासतों से लुट गई क़ौमें
बनानी होगी अब अपनी बहारें

जीने के जद्दोजहद में यारों
कैसा बसंत और कैसी बहारें

इस क़द्र नावाक़िफ़ रहा रवि
आकर गुजर चुकी कई बहारें

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रे मूर्ख, अश्लील कौन?

एक तरफ तो एक सरकारी एजेंसी बीएसएनएल पूरे भारत में इंटरनेट के लिए बहुत ही सस्ती दरों पर ब्राडबैंड ला रही है, वहीं दूसरी तरफ एक दूसरी सरकारी एजेंसी बहुत ही बेवकूफाना तरीके से ऐसे क़ानून ला रही है, जिससे आम आदमी इंटरनेट का उपयोग करने से भी डरेगा. और ऐसा हुआ भी है. उत्तर-प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से साइबर कैफ़े में छापा मारकर उपयोक्ता – मालिक दोनों को ही गिरफ़्तार किया गया कि वे अश्लील साइट देख-दिखा रहे थे. अवनीश बजाज का उदाहरण ताज़ातरीन है ही.

परंतु जिन्होंने ये क़ानून बनाया है उन्हें इंटरनेट तकनॉलाज़ी, स्पॉम, ब्राउज़र हाइजेकर्स, वॉर्म/वायरस, पॉप-अप विंडोज़ तथा मिलते-जुलते नाम वाले स्पूफ़्ड पॉर्न साइटों के बारे में जानकारी है भी या नहीं? मुझे नहीं लगता. मेरे ई-मेल पर प्रतिदिन दर्जनों-सैकड़ों की संख्या में स्पॉम आते हैं जिनमें अधिकतर वायग्रा या पॉर्न साइटों के होते हैं. और ऐसा तो प्राय: हर ईमेल उपयोक्ता के साथ होता है. बेचारे गरीब बिल गेट्स को प्रतिदिन दस लाख ईमेल प्राप्त होते हैं. आप क्या सोचते हैं उनमें क्या होता होगा? उनमें अधिकतर ऐसे ही ईमेल होते हैं. अगर बे-ध्यानी में इनमें से किसी पर क्लिक हो गया तो ये साइटें खुल ही जाती हैं. इसी प्रकार वेब पता टाइप करते समय ब्लॉगस्पॉट की जगह गलती से आपने ब्लॉगपोस्ट टाइप किया तो यह सीधे पॉर्न साइट को खोलता है, क्योंकि चालाक भाई लोगों ने अपनी पॉर्न साइटों के रजिस्ट्रेशन ऐसे ही मिलते जुलते नामों से भी करवा रखे हैं. फिर वॉर्म/वायरस और पॉपअप विंडो का क्या करें जो पता नहीं कहाँ-कहाँ से नमूदार हो जाते हैं. इंटरनेट पर तमाम तरह से सर्च करना होता है, और इस बीच ये साइटें कहीं न कहीं से टपक ही पड़ती हैं.

अब तो आपको कोई भी पुलिसिया आपको आपके कम्प्यूटर का उपयोग इन कामों के लिए करता रंगे हाथों पकड़ ही लेगा. वह कहेगा कि भाई, आपने अपने ईमेल में इतने पॉर्न साइटों के आमंत्रण और वायग्रा के इतनी सारी दुकानों के अते-पते मंगा रखे हैं इसका अर्थ है कि आप अश्लील हैं, चलिए जेल की हवा खाइए.

हे! ईश्वर. तू भी मूर्खों से बहुत डरता होगा. है ना?
*-*-*
व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल, हज़ल की तर्ज पर)
*-*-*
किस बिना पर रहना होगा
मूर्खों की तरह रहना होगा

मूर्खों के राज में कैसे यारों
दानिशमंदों का रहना होगा

मूर्खों की जमात का फौजी
कहता है यहीं रहना होगा

बन जा खुद या दूसरों को
मूर्ख बना कर रहना होगा

मूर्खों के दौर में सोचे रवि
किस तरह कैसे रहना होगा

//**//

त्रिनेत्र
*-*-*

*-*-*

अगर यह खबर सच है, कुछेक साल पहले के हर्बल पेट्रोल की तरह गलत खबर नहीं है, तो फिर निश्चित रूप से यह हमारे बहुत काम का है. जिनकी आँखें नहीं हैं, उनके लिए तो ख़ैर यह खोज वरदान है ही, मेरे जैसे लोग जिनकी दो-दो अच्छी-भली आँखें हैं, उनके लिए भी यह वरदान से कम नहीं है.

मैं भी चाहूँगा कि त्रिनेत्र धारी भगवान शिव की तरह मेरे भी तीन नेत्र हों. परंतु वे माथे पर, बीचों-बीच नहीं हों. मैं चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र मेरे सिर के पीछे की तरफ हो, जिससे कि मैं अपने पीठ पीछे बातें करने वालों को देख सकूँ. पीठ-पीछे वार करने वालों से बच सकूँ. और यह देख सकूँ कि मेरे पीठ पीछे क्या-क्या होते रहता है.

कभी मैं यह भी चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र पैरों में ठेठ अँगूठे के पास हो. ताकि मैं देख सकूँ कि देश दुनिया में टेबल के नीचे लेन-देन का व्यापार किस तरह चलते रहता है.

मैं यह भी चाहूँगा कि भोले भंडारी की तरह मेरे तीसरे नेत्र में वह शक्ति प्राप्त हो जिससे समाज की बुराइयों का अंत देखते ही हो जाए, और मेरा वह तीसरा नेत्र हमेशा खुला रहे...
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व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल यानी हज़ल के तर्ज पर)
*-/-/*
समाज को बुरा हमने बनाया दोस्तों
आईना दूसरों को ही दिखाया दोस्तों

जाना था मंजिल-ए-राह में मुद्दतों से
खुद बैठे सबको साथ बिठाया दोस्तों

अपने ही जिले से होकर जिला-बदर
हमने है बहुत नाम कमाया दोस्तों

कल की खबर नहीं किसी को यहाँ
शतरंजी चालें क्यों है जमाया दोस्तों


हममें तो न दिल है न ही जान रवि
अपनी लाश तो कबसे जलाया दोस्तों

***---***

इस दफ़ा के इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों के विजेता अमित और अतुल ने अपने-अपने पुरस्कार की राशि को चैरिटी के नाम समर्पित करने की घोषणा की है. उन्होंने पुरस्कार राशि से समाज के गरीब बच्चों के लिए नोटबुक्स खरीद कर वितरित करने का आग्रह मुझसे किया है.
मैंने पास ही के एक गांव में वहाँ के हाई स्कूल के प्रिंसिपल श्री करमरकर से इस सम्बन्ध में बात की. उनका कहना है कि गांव के प्राय: सभी बच्चे गरीब हैं. अभी दसवीं कक्षा के बच्चों की प्री-बोर्ड परीक्षा चल रही है. स्कूल में घोषणा कर दी गई है कि जो बच्चे प्री-बोर्ड परीक्षा में प्रथम दस स्थान प्राप्त करेंगे उनमें से प्रत्येक को 100-100 रुपए मूल्य के नोटबुक्स पुरस्कार स्वरूप दिए जाएँगे. जाहिर है ये पुरस्कार अमित और अतुल के सहयोग से दिए जाएँगे. परीक्षा परिणाम फरवरी मध्य में आने की संभावना है. तदुपरांत गरीब परंतु सुपात्र बच्चों को ये नोटबुक्स प्रदान किए जाएँगे. उन बच्चों के विवरण आपको तब पढ़ने को मिलेंगे.

धन्यवाद अमित और अतुल. और धन्यवाद इंडीब्लॉ... ओह.. देबाशीष. (आख़िर भाई लोगों ने आपकी आइडेंटिटी ओपन करवा ही ली :))

याचक

भरी दुपहरी में, ज्येष्ठ के महीने में, जब रोहिणी नक्षत्र में सूर्य अपनी पूरी तपन वातावरण में प्रेषित कर रहा था, एक याचक नंगे पाँव द्वार-द्वार जाकर भिक्षा मांग रहा था.

कुछ ने उस याचक की याचनामयी आवाज़ों को गर्मी के भय से अनसुना कर दिया और अपने द्वारों के पट नहीं खोले. कुछ ने उसे लाखों लानतें भी भेजीं, क्योंकि उसने अपनी द्रवित आवाज़ों से लोगों के आराम में खलल पैदा कर दिया था.

कुछ को उसकी याचनामयी आवाज और उसकी बीमार, कृशकाय काया असर कर गई और उसे कुछ-कुछ कहीं से मिल भी गया. एक को उसका दोपहर की तपती धूप में नंगे पाँव याचनारत रहना जरा ज्यादा ही द्रवित कर गया और उसने अपना फटा पुराना जूता जो कचरे के डब्बे में डालने के लिए अलग रख दिया था, निकाला और याचक को दे दिया, ताकि उसके पाँव को तपती धरती से थोड़ी राहत तो मिले.

याचक ने हजारों धन्यवाद देते हुए उस जूते को कृतज्ञता से तत्काल पहन लिया, परन्तु दो द्वारों के आगे जाने के उपरांत उसने उन जूतों को अपने पैर से उतारा और अपने थैले में रख लिया.

वह दानवीर जिसने अपना जूता दिया था, अपने सत्कर्म से गदगद उस याचक को थोड़ा सा आगे जाकर भी देख रहा था कि उसका पुराना जूता भी किस प्रकार एक अच्छे प्रयोजन के लिए काम आ रहा है. परन्तु जब उसने याचक को जूता उतार कर अपने थैले में रखते देखा तो वह पश्चाताप से बुदबुदाया – साला अब उसे कबाड़ी में जाकर बेच देगा.

उधर याचक के मन में विचार दूसरे थे. वह गंभीर था, और सोच रहा था कि अगर वह जूते पहन कर याचना करेगा तो फिर लोगों के मन में दया और करूणा कैसे उपजेगी?

(रविवारीय नव भारत में पूर्व प्रकाशित)

आम आदमी को पद्म विभूषण

इस दफ़ा 26 जनवरी 2005 को पद्म पुरस्कारों में आम आदमी भी पुरस्कृत हुआ है. आर. के. लक्ष्मण को पद्म विभूषण का पुरस्कार प्रदान किया गया है. इसके लिए उन्हें ढेरों बधाईयाँ. आम आदमी की पीड़ा को अपनी कूँची से गढ़कर, अपने पैने व्यंग्य चित्रों से तो वे पिछले अर्द्ध शती से लोगों को बताते आ ही रहे हैं, समाज की विकृतियों, राजनीतिक विदूषकों और उनकी विचारधारा की विषमताओं पर भी वे तीख़े ब्रश चलाते हैं. वे धरती के सर्वकालिक महान कार्टूनकार हैं, जो समाज को आईना दिखाते आ रहे हैं. इस अवसर पर यह ग़ज़ल उन्हें समर्पित है:

*-**-*
ग़ज़ल
//**//
मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
हम खुद से खुद को छुपाते रहे

दूसरों की रोशनियाँ देख देख के
आशियाना अपना ही जलाते रहे

कहाँ तो चल दिया सारा जमाना
हम खिचड़ी अपनी बैठे पकाते रहे

यूँ दर्द तो है दिल में बहुत मगर
दुनिया को गुदगुदाते हँसाते रहे

कभी तो उठेगी हूक दिल में रवि
यही सोच कर ग़ज़लें सुनाते रहे

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सानिया वायरस का हमला...


अन्ना कुर्निकोवा वायरस के बाद टेनिस जगत में अब सानिया मिर्ज़ा वायरस का हमला हो चुका है. आस्ट्रेलियन ओपन में तीसरे दौर तक पहुँचने और सेरेना विलियम्स को तगड़ी टक्कर देने के बाद इस ख़ूबसूरत बाला का इन्फ़ेक्शन महामारी की तरह प्रिंट और दृश्य-श्रव्य माध्यम में फैल गया है. जहाँ सहारा समय ने पूरे पेज का सानिया पिनअप गर्ल फोटो प्रकाशित किया है तो वहीं सानिया दिन में 8-10 घंटे का इंटरव्यू दे रही है और पत्रकारों की कतारें हैं कि कम ही नहीं हो रहीं. टाइम्स ऑफ इंडिया के एडीटोरियल बहस में भी सानिया अवतरित हो गई. कई सालों बाद क्रिकेट को किसी एक व्यक्ति ने आखिरकार फ़ीका कर ही दिया.



इस ब्लॉग में भी इनफ़ैक्शन हो गया और ग़ज़लों में शब्द गुम हो गए. आशा करें कि यह इनफ़ैक्शन फैले. इसीलिए आइए, हम दुआ करें कि सानिया आगे और कामयाब हो, ताकि उससे प्रेरणा ले कुछ सानियाएँ और अवतरित हों और हम भारतीय, क्रिकेट से आगे की भी कुछ सोचें...

महोदय, हम सचमुच गंदे लोग हैं.

गुरचरण दास ने अजमेर यात्रा के अपने अनुभवों को बताते हुए पिछले सप्ताह टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि वहाँ के संगमरमर से बने सुंदर, ऐतिहासिक बड़ा दारा के चहुँओर कचरों का अंबार लगा हुआ था क्योंकि आसपास कचरा पेटी का अकाल था. लोग दीवारों की आड़ में सरेआम थूक मूत रहे थे क्योंकि आसपास कहीं कोई टॉयलेट नहीं था. बड़ा दारा एक पर्यटन स्थल भी है जहाँ हजारों की संख्या में सैलानी नित्य आते हैं.

भाई गुरचरण दास, यह स्थिति तो मेरे रतलाम में भी है. और रतलाम क्या भारत के प्राय: सभी नगरों, शहरों और गांवों में है. 2 लाख की जनसंख्या वाले पूरे रतलाम शहर में एक भी, फिर-से, एक भी सार्वजनिक मूत्रालय नहीं है. अगर आप शहर में किसी काम से निकले हों और आपको जोर की पेशाब आने लगे तो आपके सामने, अपने सामने की किसी झाड़ या दीवार का आड़ लेकर मूतने के सिवा और क्या रास्ता हो सकता है? पान खाकर पीक थूकने के लिए तो खैर भारत में कहीं कोई समस्या ही नहीं है- कहीं भी थूक सकते हैं- सड़कों पर चलते चलते भी और बिल्डिंगों की सीढ़ियों पर भी... कहीं अगर कचरा पेटी या थूकदान होता भी है तो आदत से लाचार लोग उसका उपयोग करने में झिझकते हैं, शर्माते हैं, अपने को हीन समझते हैं.

गुरचरण दास उदाहरण देते हुए आगे लिखते हैं कि सिंगापुर जो पहले किसी भी भारतीय शहर से भी ज्यादा गंदा था, आज विश्व का सबसे साफ-सुथरा शहर बन गया है. सिंगापुर को स्वच्छ बनाने में ली कुआन यू का योगदान वे गिनाते हैं. पर क्या भारत के लिए, या भारत के किसी एकाध शहर या गांव के लिए ही सही, कभी कोई ली कुआन यू पैदा हो सकेगा ?
*-*-*
ग़ज़ल
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मनुज आजन्म गंदा न था
साथ में लाया फंदा न था

सियासतों में मज़हबों का
ये धंधा खासा मंदा न था

लोग अकारण ही चुक गए
फेरा गया अभी रंदा न था

महफ़िल से लोग चल दिए
किसी ने मांगा चंदा न था

रवि मरा बैमौत कहते हैं
पागल दीवाना बंदा न था
***

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