करोड़ पति नेता

करोड़ पति एमपी - एमएलए

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महाराष्ट्र के पिछले चुनाव में एक तिहाई एमएलए ऐसे विजयी हुए हैं जो करोड़ पति हैं. करोड़ो रुपयों की संपत्ति जो उन्होंने मजबूरन घोषित की है वह चुनाव आयोग की अनिवार्यता के कारण घोषित की है. भारत के मौजूदा एमपी के बारे में इंडिया टुडे, आउटलुक और इंडियन एक्सप्रेस जैसे समाचार पत्र पत्रिकाओं ने पहले ही प्रकाशित किया है कि इनमें से सौ से ऊपर ऐसे हैं जिनके ऊपर किसी न किसी वजह से मुक़दमे चल रहे हैं और कइयों पर तो हत्या जैसे गंभीर अपराधिक प्रकरण चल रहे हैं. वैसे भी अब एक चुनाव में लड़ने के लिए जहाँ लाखों रुपयों की आवश्यकता होती है, एक आम आदमी के किसी चुनाव में खड़ा होकर उसका जीत पाना अब असंभव हो गया है. ऐसी स्थिति में अगर हमारे एमपी और एमएलए करोड़ पति या बाहुबली नहीं होंगे तो और क्या होंगे. आम आदमी की स्थिति तो एक सच्चे वोटर की भी नहीं रह गई है. जब वह वोट देने जाता है तो पता चलता है कि उसका वोट तो कोई लठैत पहले ही डाल चुका है, या उस आम आदमी का वोट एक एद्धा दारू की बोतल में पहले ही बिक चुका है या फिर उस आम आदमी का वोट जाति, धर्म, क्षेत्रवाद ने पहले ही खरीद लिया है.
चलिए, कम से कम यह तो हुआ है कि वोटर चाहे गर्त में जाता जाए, प्रायः नेताओं - एमपी , एमएलए की जमात में खासी प्रगति हो रही है. भारत में प्रॉस्पैरिटी पाने के लिए नेता बनने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है. अभी तो एक तिहाई एमएलए ही करोड़ पति हैं, उम्मीद करें कि बाकी बेचारों का रहन सहन भी शीघ्र सुधरे और अगले चुनाव में हमें शत प्रतिशत एमएलए करोड़ पति मिलें. करोड़ पति ही क्यों अरब पति एमएलए मिलें. आमीन.
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ग़ज़ल
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नेता और वोटर की पोज़ीशन देखिए
जाति और धर्म के परमुटेशन देखिए

बीती है अभी तो सिर्फ अर्ध शताब्दी
नेताओं के पहरावों में प्रमोशन देखिए

आँसुओं से साबका पड़ा नहीं कभी
वोटरों को लुभाने के इमोशन देखिए

सियासती जोड़ तोड़ में माहिर उनके
मुद्दे पकड़ लाने के इग्नीशन देखिए

अपनी पाँच साला नौकरी में रवि ने
कहाँ कहाँ नहीं खाए कमीशन देखिए
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विषय:

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और हम कहते हैं कि हिन्दुस्तान ग़रीब है। वाह वाह।

जहाँ तक करोड़पति या लखपति होने की बात है रवि भाई वो तो अमरीका सहित दुनिया के ज्यादातर देशों में लागू है (जाँच कर के देख लें)। हमारे देश में अलग बतिया ई है कि करोड़पति होने के साथ साथ नेतवन सब घाघपनी कामचोरी, ढीठई और गुंडई में भी एक नंबर हैं।

आपके ये जो व्यंजल हैं, मुझे बार-बार कुछ अजीब ही लगते हैं…वाह रे नेताओं-विधायकों…ये तो संरक्षक हैं न…सब अपने पास रखते हैं ताकि दूसरों को कम कष्ट हो…

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