टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

उम्र का तक़ाज़ा

ये तो उम्र का तक़ाज़ा है भाई…



बचपन में मैं इंद्रजाल कॉमिक्स पढ़ने में मज़ा लेता था. जैसे ही किशोरावस्था में कदम पड़े, रानू, गुलशन नंदा और मिल्ज़ बून की रोमांटिक किताबें मज़ा देने लगीं. पता नहीं कब इयॉन फ्लेमिंग, जेम्स हेडली चेईज़, इरविंग वैलेस (सेकेण्ड वूमेन तो अभी भी याद है), फ्रेडरिक फोरसाइथ और अपने शुद्ध देसी सुरेन्द्र मोहन पाठक तक कैसे पहुँच गया. इस बीच हंस, सारिका, प्रेमचंद, हरिशंकर परसाई, कुरआन शरीफ़, बाइबल, पुराण और पता नहीं क्या क्या बाँच डाले. और, प्रायः हर अलग अलग समय में इन चीज़ों को पढ़ने में बड़ा मज़ा आया. पर अब न कॉमिक्स, न रोमांटिक उपन्यास और न चेइज़ पढ़ा जाता है. अब तो कोई आई टी तकनॉलाज़ी से संबंधित कोई चीज आकृष्ट करती है या फ़िर ऊपर दी गई जैसी ग़ज़लें (माणिक वर्मा की लिखी ग़ज़ल (कविता?) जो नई दुनिया के दीपावली विशेषांक 2004 में छपी है.)

ग़ज़ल
*+*+*
माणिक वर्मा की ग़ज़लः
***+++***
जो सच बोले उसे सूली चढ़ा दो
ये तख्ती हर कचहरी में लगा दो

हमें दुनिया का नक्शा मत बताओ
हमारा घर कहाँ है ये बता दो

करो तुम कत्ल जब भी आस्था का
बजाकर शंख चीखों को दबा दो

यक़ीनन कल जलेगा घर में चूल्हा
ये वादा करके बच्चों को सुला दो

दीवाली आपके बच्चे भी देखें
ये माचिल लो हमारा घर जला दो

*-*-*
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बेनामी

रवि जी,

क्या बात है। मैं तो अभी भी सुरेन्द्र मोहन पाठक का पाठक हूँ। क्या सूनील, सुधीर,सोहल, जीता सीरीज़ सब पढ़ डाले। अब तो जब भी देश जाना होता है एक दो नए नावल आ चुके होते हैं वही पढ़ते हैं। क्या हिन्दी थ्रिलर नावलों में कोई नया नाम नहीं आया।

पंकज

उम्र के तकाज़े का हवाला देना मेरे ख़याल से ठीक नहीं है रविजी।

उम्र का तकाज़ा इस लिए कि बचपन में मै मिठाई का खूब शौकीन था. सपने देखता था कि मिठाई की दुकान खोलूंगा. परंतु अब मिठाई की दुकान से दस गज दूर रहता हूँ....

थ्रिलर में सुमोपा के कुछेक कैरेक्टर्स के बाद तो कोई नया नाम आया ही नहीं और अब सुमोपा की किताबें भी साल के छः के हिसाब से नहीं निकल रहीं...

रवि भाई
हमने भी अपने जमाने मे खूब मिठाइयाँ खायी, और इन्द्रजाल कामिक्स पढे, थोड़े बड़े हुए तो हिन्दी नावेल पर भी हाथ साफ किया,
लेकिन हमारे प्रिय उपन्यासकार तो वेद प्रकाश शर्मा थे, कभी कभी सुरेन्द्र मोहन पाठक भी पढ लिया करते थे. हमारा एक नावेल तीन घन्टे मे खत्म हो जाता था, चाहे जितने पेज का हो.

अब नावेल पढने के नाम से ही बुखार आ जाता है.

murtuza

kuchh baante kuchh hobby waqt ke saath nahi badlte hum aaj bhi s.m.p. ke upanyaas utne hi suok se padte he jaise 15 saal pahle padaa karte the ha ab likhnaa kam ho gayaa he unkaa

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