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November, 2004 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रेडहैट लिनक्स हिंदी में

रेडहैटलिनक्सहिंदीसमेत 5 भारतीय भाषाओं में जारी
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रेडहैट का फेदोरा कोर 3, हिंदी समेत 5 भारतीय भाषाओं, यथा- बंगाली, पंजाबी, गुजराती तथा तमिल में जारी किया जा चुका है तथा यह संपूर्ण सर्वर ऑपरेटिंग सिस्टम अपने साथ ढेरों अन्य अनुप्रयोगों सहित मुफ़्त डाउनलोड हेतु अब यहाँ सेः http://fedora.redhat.com/download/mirrors.html उपलब्ध है. फेदोरा कोर 3 में प्रारंभिक संस्थापना स्क्रीन से लेकर प्रायः सभी प्रकार के अनुप्रयोगों तक पूर्णतः आपको भारतीय भाषा का वातावरण प्राप्त होगा. इसमें केडीई 3.2 , एक्सएफसीई 4.2 के लगभग सभी मॉड्यूल्स तथा साथ ही गनोम 2.8 सहित कुछ अन्य अनुप्रयोग जैसे कि गेम इंसटैंट मैसेंजर के प्रायः अधिकतर हिंदी अनुवादों का कार्य हमारी टीम ने किया है. यूँ इससे पूर्व रंगोली नाम से भारतीय भाषाओं का एक जीवंत लिनक्स सीडी का बीटा संस्करण भी जारी किया जा चुका है जिसमें ऊपर दी गई भाषाओं के अलावा मराठी, कन्नड़, मलयालम इत्यादि भाषाओं के आंशिक समर्थन भी हैं. उड़िया तथा तेलुगु भाषा में भी कार्य जोरों से जारी है. शायद लिनक्स में भारतीय भाषाओं की सक्रियता को देखते हुए माइक्रोसोफ्ट की भी नींद उड़ी ह…

उम्र का तक़ाज़ा

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ये तो उम्र कातक़ाज़ा है भाई…



बचपन में मैं इंद्रजाल कॉमिक्स पढ़ने में मज़ा लेता था. जैसे ही किशोरावस्था में कदम पड़े, रानू, गुलशन नंदा और मिल्ज़ बून की रोमांटिक किताबें मज़ा देने लगीं. पता नहीं कब इयॉन फ्लेमिंग, जेम्स हेडली चेईज़, इरविंग वैलेस (सेकेण्ड वूमेन तो अभी भी याद है), फ्रेडरिक फोरसाइथ और अपने शुद्ध देसी सुरेन्द्र मोहन पाठक तक कैसे पहुँच गया. इस बीच हंस, सारिका, प्रेमचंद, हरिशंकर परसाई, कुरआन शरीफ़, बाइबल, पुराण और पता नहीं क्या क्या बाँच डाले. और, प्रायः हर अलग अलग समय में इन चीज़ों को पढ़ने में बड़ा मज़ा आया. पर अब न कॉमिक्स, न रोमांटिक उपन्यास और न चेइज़ पढ़ा जाता है. अब तो कोई आई टी तकनॉलाज़ी से संबंधित कोई चीज आकृष्ट करती है या फ़िर ऊपर दी गई जैसी ग़ज़लें (माणिक वर्मा की लिखी ग़ज़ल (कविता?) जो नई दुनिया के दीपावली विशेषांक 2004 में छपी है.)

ग़ज़ल
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माणिक वर्मा की ग़ज़लः
***+++***
जो सच बोले उसे सूली चढ़ा दो
ये तख्ती हर कचहरी में लगा दो

हमें दुनिया का नक्शा मत बताओ
हमारा घर कहाँ है ये बता दो

करो तुम कत्ल जब भी आस्था का
बजाकर शंख चीखों को दबा दो

यक़ीनन कल जलेगा घर में चूल…
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ये भारतीय क़ानून हैं....

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क़ानून के किस्से बड़े निराले हैं. कहा जाता है कि क़ानून अंधा होता है. यह भी कहा जाता है कि बड़े और पैसे वालों के लिए क़ानून नाम की कोई चीज़ नहीं होती. कुछ लोगों के अपने क़ानून होते हैं. कहीं क़ानून तो होता है, परंतु क़ानून के पालन हार ही उसे तोड़ते फ़िरते हैं. आज जीवन के हर क्षेत्र के लिए इतने क़ायदे क़ानून हो गए हैं कि हममें से हर कोई हर पग पर क़ानून तोड़ता चलता है. जब कोई नेता शासक बनता है तो विरोधियों को अंदर कर देता है और कहता है क़ानून अपना काम करेगा. जब वह विरोधी पार्टी में होता है तो चिल्लाता है कि क़ानून को शासकों ने बंधक बना लिया है और मनमाना क़ानून लगा रहे हैं. बहुत से क़ानून हैं जिसे हम आप रोज तोड़ते हैं पर खुदा का शुक्र है कि हम में से अधिकतर नेता नहीं हैं. अन्यथा या तो क़ानून के काम के कारण या तो अंदर होते या क़ानून को काम देने के नाते अपने विरोधियों को अंदर कर रहे होते.

बहरहाल, चर्चा भारत के एक विचित्र क़ानून की हो रही है. इसके लिए एक घटना सुनिए.
एक भारतीय व्यक्ति अपने विदेशी मेहमान की मेहमान नवाज़ी के लिए फ़ाइव स्टार होटल ले गया. ज़ाह…

इंडीब्लॉग अवॉर्ड

इंडीब्लॉग अवॉर्ड 2004
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भारतीय तथा भारत से जुड़े अंग्रेजी भाषा में तथा भारतीय भाषाओं में लिखे जाने वाले ब्लॉगों के लिए इस साल के इंडीब्लॉग अवॉर्ड के लिए तैयारियाँ ज़ोरों से चल रही हैं. (धन्यवाद इंडीब्लॉगी,आपके तारीफ़े काबिल प्रयास के लिए :). तो दोस्तों आप भी कमर कस कर मैदान में कूद पड़िए. आखिर आपके ब्लॉग में भी तो कोई न कोई अवॉर्ड पाने की खासियत मौजूद है ही और वैसे भी आपका ब्लॉग किसी से कम है क्या? ऊपर से इंडीब्लॉग में दर्जन भर से ज्यादा वर्ग/श्रेणियाँ हैं जिन में अवॉर्ड दिया जाना है. अतः आपके ब्लॉग को कोई न कोई अवॉर्ड मिलने की पूरी संभावना है. न भी मिले तो क्या, ओलंपिक की तरह इसमें भी शामिल होना ज्यादा महत्वपूर्ण है, बजाय इनाम प्राप्त करने के.
अवॉर्ड में शामिल होने के अलावा आप यह भी कर सकते हैं:

** आप चाहें तो अवॉर्ड के लिए जूरी मेम्बर बन सकते हैं
** आप चाहें तो कोई पुरस्कार प्रायोजित कर सकते हैं
** आप चाहें तो अपना स्वयं का या किसी अन्य ब्लॉग के लिए केनवासिंग कर सकते हैं – इसके लिए जूरी सदस्यों को ई-मेल करना होगा.
** आप अन्य इंडियन ब्लॉगर्स को इसके बारे में बता सकते हैं

अधिक जानक…

भारत में सब बरोबर !

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भारत में अमीर-ग़रीब सब बराबर



विश्व प्रसिद्ध कार्टूनकार आर. के. लक्ष्मण का एक कार्टून 22 नवंबर के अंक में छपा है.

वे अपने पैने व्यंग्य की कूची चलाते हुए स्पष्ट करते हैं कि भारत में क्या अमीर क्या ग़रीब सब

बराबर हैं. सभी भुगतने के लिए अभिशप्त हैं. ग़रीब रोटी कपड़ा मकान की समस्या से त्रस्त

है तो अमीर पावर कट, लोड शेडिंग, गड्ढे और धूल युक्त सड़कों, ट्रैफिक जाम, पानी की

कमी, स्कैम इत्यादि समस्याओं से त्रस्त है.

समाजवादी / साम्यवादी लोगों को खुश होना चाहिए कि कम से कम भुगतने के मामले में तो

भारत में सभी बराबर हैं. अमीरी-ग़रीबी का फ़र्क़ वास्तव में यहाँ मिट गया है.

पर, अगर कोई फ़र्क़ कहीं नज़र आता है तो वह राजा और रंक (बक़ौल अमिताभ बच्चन) के

बीच है. और यह फ़र्क़ दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है.
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ग़ज़ल
**//**
आदमी है आदमी के पीछे बराबर
सोचता नहीं होना है हिसाब बराबर

चाँदी का चम्मच ले के आया पर
चार दिन की जिंदगी सबकी बराबर

रत्न जटित ताबूत है तो क्या हुआ
भीतर कीड़े और दुर्गंध सभी बराबर

सच है कि अपने आवरणों के अंदर
कहीं कोई फ़र्क़ नहीं है बाल बराबर

काल को तुम भूल गए रवि शायद
कल दुर्ग था …

भारत में भगदड़...

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या भगदड़ में भारत?



नई दिल्ली के रेल्वे स्टेशन पर पिछले दिनों जन साधारण एक्सप्रेस ट्रेन में चढ़ने उतरने के

दौरान मची भगदड़ में आधा दर्जन व्यक्तियों की मौत हो गई तथा कई गंभीर रूप से घायल हो

गए. जाहिर है, ऐसे भगदड़ में मरने तथा घायल होने वालों में अधिकतर महिलाएँ एवं बच्चे

ही थे.
भारत में भगदड़ कोई नई बात नहीं है. हर जगह भगदड़ मची रहती है. चाहे वह रेल्वे स्टेशन

हो, हवाई अड्डा हो या फिर मरीन ड्राइव. जहाँ भीड़ है, और सुविधाओं का अभाव हो वहाँ

भगदड़ तो मचेगी ही.
फिर नई दिल्ली, जो भारत देश की राजधानी है, वहाँ के रेल्वे स्टेशन पर भगदड़ मचना इस

बात की गवाही देता है कि यहाँ की जनता किस हाल में गुज़र बसर करने को अभिशप्त है. नई

दिल्ली रेल्वे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर आपको कहीं भी सूचना पट्ट देखने को नहीं मिलेंगी जो

बताएँगी कि कौन सी ट्रेन किस समय पर और कब उस पर आएगी और जाएगी. सुविधाओं का

घोर अभाव है. भीड़ नियंत्रित करने का कोई प्लान ही नहीं है. ऐसे में भगदड़ तो मचना ही

है.
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ग़ज़ल
*/*/*
क्या मिलना है भगदड़ में
जीना मरना है भगदड़ में

मित्रों ने हैं कुचले हमको
अच्छा बहाना है भगदड़ में

लूटो या खुद लु…

माइ हार्ट इज़ हाइजैक्ड...

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एअरपोर्ट का अपहरण
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बैंगलोर में एक अंतर्राष्ट्रीय एअरपोर्ट बनाए जाने की योजना पिछले दस साल (जी हाँ,

पिछले दस साल !) से चल रही है, और अभी भी मामला विभिन्न सरकारों और

सरकारी विभागों की स्वीकृति की प्रतीक्षा में उलझा पड़ा है. तारीफ़ की बात तो यह है कि

कर्नाटक की पिछली काँग्रेस सरकार ने इस परियोजना को स्वीकृति दे दी थी, परंतु नई

सरकार जो काँग्रेस की ही है (क्या बात करते हैं, मंत्री तो बदल गए हैं न भाई), इस

परियोजना की स्वीकृति पर पुनर्विचार कर रही है !
इस परियोजना की शीघ्र स्वीकृति के लिए इन्फ़ोसिस के नारायण मूर्ति भी लगे रहे हैं.

उनके प्रयासों से इसमें थोड़ी गति भी आई, परंतु और भी कई अन्य परियोजनाओं की

तरह यह भी हाईजैक हो गया राजनीतिबाजों, अफसरशाहों और लालफ़ीताशाहों के द्वारा.

परियोजनाओं पर विचार और पुनर्विचार करते-करते ये अपहृत हो जाते हैं और भारत का

इन्फ्रास्ट्रक्चर जहाँ का तहाँ पड़ा रह जाता है- ठस. भूले भटके कभी कोई परियोजना पूरी

होती भी है तो वह भ्रष्टाचार के चलते लड़खड़ाती / दम तोड़ती ही चलती है...

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ग़ज़ल
**+**
मूल्यों में गंभीर क्षरण हो गया
मुल्क का भी अपहरण हो गया

भ्र…

इबादत कीजिए

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आइए, थोड़ी पूजा-अर्चना करें
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पहले मिग 21 और अब मिराज विमानों के दुर्घटना ग्रस्त होने की अधिक संख्या को देखते

हुए एअरफोर्स द्वारा पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठान करवाया जा रहा है, ताकि ऐसी वारदातों

को, प्रभु की कृपा से रोका जा सके.

वाह भाई क्या बात है. फ़्लाइट इंजीनियर प्रभु से प्रार्थना करता होगा कि हे प्रभु, आज मैंने

अपनी व्यस्तता के कारण मिराज का आवश्यक मेंटेनेंस नहीं किया है, अतः कृपा करना,

आज दुर्घटना नहीं होने देना. खरीदी विभाग का चीफ़ प्रार्थना करता होगा कि हे दयालु प्रभु

तूने अब तक विभिन्न खरीदी में कमीशन पाने में साथ दिया है, अब डुप्लीकेट पार्ट्स के साथ

विमानों को बढ़िया उड़ने में मदद करना.

मैं अपना एक अनुभव बताता हूँ. कुछ समय पूर्व की बात है जब 11 किलो-वोल्ट के कुछ

सर्किट ब्रेकर्स के कॉन्टेक्ट्स बुशिंग के साथ ही ज्यादा संख्या में, अकारण ही जलने लगे थे.

सब तरह की जाँच के बाद भी कुछ पता नहीं चल पा रहा था कि कॉन्टेक्ट्स क्यों भीषण गर्म

होकर जलने लगे हैं. बारीकी से छानबीन की गई तो पाया गया कि एक खास बैच के

कॉन्टेक्ट्स में ये समस्या है. तह में उतरा गया तो पाया गया कि लोहे के पार…

मेड फॉर इंडिया

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मेड फॉर इंडिया, रीयली?
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नोकिया ने अपने आर एंड डी टीम में अरबों डालर निवेश कर भारतीय परिवेश के लिए

अलग प्रकार का सेलफ़ोन ईज़ाद किया है. यह सेलफ़ोन टॉर्च लाइट युक्त है ताकि भारतीय

घनघोर अंधियारा में खासा काम आ सके. इसमें धूल सुरक्षा भी है ताकि भारत के सर्वत्र

अत्यंत धूल भरे इलाकों में यह सुरक्षित रह कर काम कर सके. इसमें ना फिसल ग्रिप

भी है, ताकि चोर उचक्कों की छीना झपटी से सुरक्षा मिल सके. भाई वाह ! क्या

बात है. पर कुछ और ऐसी ही ईज़ादें भारतीयों के लिए हो जाए तो मज़ा आ जाए.
मेरी कुछ इच्छाएँ (विश लिस्ट) हैं –

1 ऐसे वाहन ईज़ाद किए जाएँ जो गड्ढों युक्त, भीड़ भरे, जाम लगे भारतीय सड़कों पर

भी फर्राटा से दौड़ सकें, तथा घासलेट, कुकिंग गैस, नेफ्था, साल्वेंट इत्यादि (वैसे

भी ये पेट्रोल/डीज़ल/सीएनजी में तो धड़ल्ले से मिलाए ही जाते हैं) से भी चल सकें.

2 ऐसी घड़ियाँ बनाई जाएँ जो इंडियन स्टैंडर्ड टाइम का लिहाज रखें. यानी की किसी

समारोह के उद्घाटन पर नियत समय पर या किसी नेता के लंबे उबाऊ भाषण पर वह रूक

जाए जब तक कि उद्धाटन न हो जाए और भाषण समाप्त न हो जाए ताकि लोगों को यह

आभास न हो कि वे ले…

धन्य धान्य धर्माचार्य – भाग 2

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चोला राम का दिल रावण रावण
यही है रवि हाहाकारी असलियत




भाग 1 में मैंने बोहरा समाज के धर्मगुरु का परिवार मुम्बई के कामा हाउस को 1 अरब से अधिक रुपयों में खरीदे जाने के बारे में लिखा था. वह तो भला हो कुछ समाचार पत्रों का जिसमें इस विवादास्पद सौदे का हल्ला मचा और वह रद्द हो गया. भाग 2 तो और भी कलंकित है. काँची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य को हत्या के अपराध में मुख्य अभियुक्त क्रमांक 1 के रूप में विगत दिनों गिरफ्तार किया गया. मामला पीठ के पाँच हजार करोड़ रूपयों से अधिक की सम्पत्ति का है, जिसके दुरुपयोग के बारे में मृतक बरसों से शंकराचार्य पर उंगली उठाते रहे थे.

मैं फिर से एक बार कहना चाहूँगा कि ये धार्मिक गुरु चाहे जिस पंथ, रीति और धर्म के हों, वे खतरनाक परजीवी हैं जो समग्र विश्व को चूसकर उसके विकास में बाधा डालते रहे हैं. उम्मीद करते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इनकी असलियत को पहचान लेंगीं.

ग़ज़ल
****
खुद की नहीं पहचानी असलियत
तलाश में हैं औरों की असलियत

यहीं तो है उस लोक की हकीकत
जनता कब पहचानेगी असलियत

मत मारो उस दीवाने को पत्थर
पहले देख लो अपनी असलिय…

अपसाइड डाउन इंडिया

उल्टा पुल्टा इंडिया
********
जग सुरैया ने टाइम्स ऑफ इंडिया (नवंबर ७, २००४) में इंडिया के बारे में काफी कुछ लिखा है. जग सुरैया पत्रकारिता से ताउम्र जुड़े रहे हैं और उन्होंने विश्व के तमाम देशों की यात्राएँ भी की हैं. अपने अनुभवों को वे बेबाकी से लिखते रहे हैं. उस लेख का छोटा सा हिस्सा प्रस्तुत हैः

इंडिया उल्टा पुल्टा देश है. यहाँ की हर चीज उल्टी पुल्टी है. विश्व के अन्य प्रजातंत्रों में प्रजा शासकों को चुनती है ताकि प्रजा खुशहाल हो सके. इंडिया में प्रजा शासकों को चुनती है ताकि शासक, प्रजा के खर्चे से खुशहाल हो सकें. अन्य जगह पानी, बिजली, स्कूलों और हस्पतालों की व्यवस्था हर एक की सुगम पँहुच में हो इस पर ध्यान दिया जाता है. इंडिया में इन यूटिलिटीज़ को गोली मारो, अपना हिस्सा पार करो का नारा चलता है. अन्य जगहों पर सिस्टम इस लिए चलता है चूंकि वहाँ सिस्टम मौज़ूद है और हर व्यक्ति उससे बंधा है- चाहे लाइन में लगना हो, रास्ते पर चलना हो, टैक्स जमा करना हो... पर अरबों की जनसंख्या वाले देश इंडिया में तो सिस्टम है ही नहीं फालों क्या करें, वह भी तब जब इंडिया का हर बंदा अपने कर्मों से बंधा है!

***
ग़…

हिंदी शब्दकोश

जालघर के अँग्रेज़ी -हिंदी शब्दकोश



पढ़ने लिखने के लिए कंप्यूटरों पर हमारी निर्भरता बढ़ती ही जा रही है.

निकट भविष्य में अधिसंख्य जन, प्रायः अधिसंख्य कार्यों हेतु, अधिसंख्य समय
कंप्यूटरों का ही उपयोग करने लगेंगे. अच्छे लेखन के लिए तथा लिखे हुए को अच्छे ढंग

से समझने के लिए प्रायः शब्दकोशों की आवश्यकता होती है. अब चूंकि हम अपने कार्य
कंप्यूटर पर ही करने लगे हैं, तो फिर मोटे-मोटे शब्दकोशों के पन्ने पलटने आवश्यकता

कतई नहीं है. अब आपके कंप्यूटर पर ही ढेरों, विभिन्न भाषाओं के शब्दकोश और समांतर
कोश उपलब्ध हैं. कंप्यूटर पर उपलब्ध संस्थापन योग्य तथा ऑनलाइन शब्दकोशों के द्वारा

शब्दों को ढूंढा जाना न सिर्फ आसान होता है, वरन कई प्रकार के सहायक अनुप्रयोगों
यथा ‘काट तथा चिपका’ इत्यादि का उपयोग कर अपने कार्य को और भी आसान बनाया जा सकता

है. हिंदी भाषा के लिए कुछ समय पूर्व तक जालघर में तथा कंप्यूटर पर संस्थापन योग्य
अँग्रेज़ी-हिंदी-अँग्रेज़ी शब्दकोश इक्का-दुक्का ही उपलब्ध थे. परंतु अब स्थितियाँ

तेजी से बदली हैं और आज हमारे पास बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं, और प्रायः हर
प्लेटफॉर्म चाहे विंडोज़9x / …

नुक्ता चीनी कादम्बिनी नवंबर 04 अंक में अवतरित

बधाईयाँ. अंततः प्रिंट मीडिया में भी अपने हिंदी ब्लॉग (ब्लांग? जैसा कि छपा है, पर

उम्मीद है यह प्रूफ़ की गलती है - क्यों गौरी पालीवाल जी?) की चर्चा हो रही है.कादम्बिनी

के नवंबर 04 अंक में नुक्ता-चीनी, अभिव्यक्ति तथा प्रतीक-पुनीत के हिंदी ब्लॉग की चर्चा रही. आइए,

उम्मीद करें कि एक दिन हमारे हिंदी ब्लॉग प्रिंट मीडिया से ज़्यादा पढ़े जाएँगे.

निम्न ग़ज़ल उसी पत्रिका की समस्या 'मुस्कराओ' की पूर्ति है.

*****
ग़ज़ल
***

बात तो तब है जब दर्द में मुस्कराओ
चाहे चीत्कारो भीतर बाहर मुस्कराओ

नायाब दोस्तों की ये फ़ितरत है नई
भोंक के खंजर वो कहते हैं मुस्कराओ

सियासती चालों ने मजबूर किया है
बिसूरती हालातों में तुम मुस्कराओ

गुजरनी है ज़िंदगी जब आँसुओं में
हिचकियों के बीच तनिक मुस्कराओ

सीख लो जमाने से कुछ आदतें रवि
पर-पीड़ा में तुम भी तो मुस्कराओ

दिन के उजाले में दिया तेरे हाथ में...

चित्र
अँधेरा ही अँधेरा
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भारत के प्रायः सभी राज्य बिजली की घोर कमी से जूझ रहे हैं तथा पापुलर वोट बैंक के चलते किसानों को मुफ़्त बिजली देने के चक्कर में कई बिजली बोर्ड दीवालिया हो चुकने के कगार पर हैं. बिजली में

राजनीतिक व्यवधानों के बीच एक खबर यह है कि भिंड के जिला अस्पताल के बिजली बिल के बकाया भुगतान नहीं होने के कारण वहाँ की बिजली काट दी गई. बिजली के अभाव में उचित उपचार नहीं मिलने

के कारण वहाँ चार लोगों की मौत हो गई.
एक दूसरी खबर मज़ेदार है. ग्यारह हजार वोल्ट की बिजली के ट्रांसफार्मर को बिजली के खंभे पर लगाने के कई कायदे क़ानून हैं जिसमें सुरक्षा से लेकर विद्युत अभियांत्रिकी तक की बातें सम्मिलित हैं. परंतु

इन्हें धता बताते हुए एक गांव में ऐसे ही एक ट्रांसफार्मर को बैलगाड़ी के ऊपर रख कर चालू कर लिया गया है (बिजली कर्मचारियों के पास समय और उपकरणों का अभाव है) और बैलगाड़ी पर रखा यह

ट्रांसफार्मर बेखटके पिछले डेढ़ माह से कार्य कर रहा है. ठीक ही कहा गया है – आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है- बैलगाड़ी पर रख कर 11 हजार वोल्ट के ट्रांसफार्मर को चार्ज कर काम में लेने का
कार्य नायाब है और…

विशाल लाइब्रेरी में से पढ़ें >

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