सोमवार, 4 अक्तूबर 2004

शर्म! शर्म!!

भारतीय शर्मागार में आपका स्वागत है...

कुछ लोगों का कहना है कि मीडिया अच्छी बातों को इतनी तरजीह नहीं देता जितनी बुरी बातों को. ठीक है, जो घोर आशावादी हैं, उनका यह कहना सही हो सकता है. परंतु बुरी बातों को सामने लाने से कम से कम हम अपनी कमजोरियों पर निगाह डाल कर उसे सुधारने का संकल्प तो ले ही सकते हैं.
प्रस्तुत है एक और बुरी ख़बरः



कितनी बुरी बात है कि भारतीय राष्ट्रीय संग्रहालय में भारत के पुरातन दस्तावेज़ रख रखाव के अभाव में सड़ते जा रहे हैं. भवन में पिछले चार साल से बरसाती पानी चू रहा है! हद की भी कोई सीमा होती है. इन दस्तावेज़ों की सामग्रियों को माइक्रोफ़िल्मों के द्वारा सहेजा जाना तो संस्थान के लिए शायद दूर की कौड़ी लाना होगी.


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ग़ज़ल
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कब तक लूटोगे यारों कुछ तो शर्म करो
चर्चा में आने को कोई उलटा कर्म करो

छिपी नहीं हैं आपकी कोई कारगुजारियाँ
थोड़ा रहम करो अपने अंदाज नर्म करो

जमाने ने छीन ली है रक्त की रंगीनियाँ
बस अपने पेट भरो अपनी जेबें गर्म करो

भाई चारे की तो हैं और दुनिया की बातें
लूट पाट दंगे फसाद का नया धर्म करो

साधु के वस्त्रों में रवि उड़ने लगा जेट से
ये क्या हुआ कैसे हुआ लोगों मर्म करो

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