टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

दाल में काला?

दाल में मेंढक?
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दोस्तों, अपनी पिछली कुछ पोस्टिंग में मैने स्कूलों में मध्याह्न भोजन की व्यवस्था पर कुछ लेखनी चलाई थी (माफ़ कीजिएगा, कम्प्यूटर के कुंजी-पट की कुछ कुंजियाँ दबाईँ थी). उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं. एक मज़ेदार घटना फ़िर हुई है. ज़रा नज़र दौड़ाएँ:



अब दाल में कुछ काला कहने के बजाए हमें दाल में कुछ मेंढक, छिपकली या कॉक्रोच कहना ज्यादा मुनासिब होगा. इस सिलसिले को आगे भी जारी रखेंगे. बस उपयुक्त खबरों का इंतजार रहेगा.

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ग़ज़ल
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अर्थ तो क्या पूरे वाक्यांश बदल गए
जाने और भी क्या क्या बदल गए

गाते रहे हैं परिवर्तनों की चौपाइयाँ
बदला भी क्या ख़यालात बदल गए

मल्टीप्लेक्सों के बीच जूझती झुग्गियाँ
नए दौर के तो सवालात बदल गए

देखे तो थे सपने बहुत हसीन मगर
क्या करें अब तो हालात बदल गए

कब तक फूंकेगा बेसुरी बांसुरी रवि
तेरे साथ के सभी साथी बदल गए

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विषय:

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