रविवार, 26 सितंबर 2004

मेरे भारत की सड़कें और उस पर चलती गाड़ियाँ

सड़कों पर सर्कस
----------

भारतीय सड़कें आज़ीवन ख़स्ताहाल रहने को अभिशप्त तो हैं हीं, कहीं उनका नामोनिशाँ काग़जों पर ही रहता है तो कहीं गड्ढों और खड्ढों पर. तारीफ ये है कि इन पर भी हम आराम से अपनी यात्रा पूरी करते हैं. और कोई चूं नहीं करता. जरा इस छवि पर ग़ौर फ़रमाएँ:



यह कोई सर्कस का कमाल या गिनीज़ बुक में अपना नाम दर्ज कराने का प्रयास नहीं है. वरन् यह है भारतीय दारूण ट्रैफिक का जीवंद दृश्य. एक ही जीप में २५ से ३० यात्री सवार! (सामान्य स्वीकृत डिज़ाइन ९-१० यात्रियों के लिए है). कारण अनेकों हैं, पर मुख्य हैं यातायात विभाग में फैला आकंठ भ्रष्टाचार. उचित संख्या में परमिट जारी नही किए जाते, चेकिंग के नाम पर अवैध वसूली आम बात है (किसी पिछली पोस्टिंग में इस बात का जिक्र है). जहाँ एक ओर दिल्ली मुम्बई में पर्यावरण के मद्देनज़र आटो - टैक्सियों में सीएनजी की अनिवार्यता है, वहीं छोटे शहरों में अधिसंख्य आटो टैम्पो केरोसीन से चलते हैं जो अस्वास्थ्यकर धुँआ छोड़ते हैं. यह है एक और एक्सट्रीम उदाहरण...

-----
ग़ज़ल
***

ये वो रास्ता तो नहीं था
उठा था गया तो नहीं था

हँसी देख गुमा होता है
कोई ख्वाब तो नहीं था

प्रतिदिन परीक्षा फिर कोई
अंतिम जवाब तो नहीं था

खोने का गम क्यों हो
कुछ पाया तो नहीं था

सुधरे कैसे रवि जब कोई
कुछ करता तो नहीं था

*-*-*-*

0 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें

एक टिप्पणी भेजें

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
कृपया ध्यान दें - स्पैम (वायरस, ट्रोजन व रद्दी साइटों इत्यादि की कड़ियों युक्त)टिप्पणियों की समस्या के कारण टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहां पर प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

----

नया! छींटे और बौछारें का आनंद अपने स्मार्टफ़ोन पर बेहतर तरीके से लें. गूगल प्ले स्टोर से छींटे और बौछारें एंड्रायड ऐप्प image इंस्टाल करें. ---