टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

कुत्ते मैं तेरा...

कुत्ते मैं तेरा ख़ून पी जाऊँगा...
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यह कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं है जो धर्मेंद्र अजीत को स्क्रीन पर देता है. यह तो आज के राजनीतिज्ञों की डिफ़ॉल्ट भाषा बनती जा रही है.



कुछ नमूने आपके लिए प्रस्तुत हैं-

।। मनमोहन सिंह शिखंडी हैं - यशवंत सिन्हा

।। अमर सिंह दलाल है - लालू यादव

।। लालू मसख़रा है - अमर सिंह

।। बीजेपी अजगर है और उसके साझा दल मेंढक और चूहे - लालू यादव

।। अटल बिहारी धृतराष्ट्र है - काँग्रेस का एक नेता

।। आडवाणी अंतर्राष्ट्रीय भगोड़ा है - लालू यादव

इनकी भाषाओं पर अब हम हँसें, रोएँ, अपना सिर नोचें या फ़िर अपन भी इनकी गाली मंडली में शामिल हो जाएँ?

*+*+*
ग़ज़ल
---

राजनीति अब शिखंडी हो गई
सियासती सोच घमंडी हो गई

सोचा था कि बदलेंगे हालात
ये क़ौम और पाखंडी हो गई

भरोसा और नाज हो किस पे
व्यवहार सब द्विखंडी हो गई

अब पुरूषार्थ का क्या हो रवि
राजशाही सारी शिखंडी हो गई

*+*+*
विषय:

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सहारनपुर के गीतकार रामेंन्द्र त्रिपाठी इसीलिये गाते हैं:-
राजनीति की मंडी बडी नसीली है,
इस मंडी ने सारी मदिरा पी ली है.

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