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आसपास की कहानियाँ ||  छींटें और बौछारें ||  तकनीकी ||  विविध ||  व्यंग्य ||  हिन्दी || 2000+ तकनीकी और हास्य-व्यंग्य रचनाएँ -

दाल में काला?

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दाल में मेंढक?
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दोस्तों, अपनी पिछली कुछ पोस्टिंग में मैने स्कूलों में मध्याह्न भोजन की व्यवस्था पर कुछ लेखनी चलाई थी (माफ़ कीजिएगा, कम्प्यूटर के कुंजी-पट की कुछ कुंजियाँ दबाईँ थी). उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं. एक मज़ेदार घटना फ़िर हुई है. ज़रा नज़र दौड़ाएँ:



अब दाल में कुछ काला कहने के बजाए हमें दाल में कुछ मेंढक, छिपकली या कॉक्रोच कहना ज्यादा मुनासिब होगा. इस सिलसिले को आगे भी जारी रखेंगे. बस उपयुक्त खबरों का इंतजार रहेगा.

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ग़ज़ल
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अर्थ तो क्या पूरे वाक्यांश बदल गए
जाने और भी क्या क्या बदल गए

गाते रहे हैं परिवर्तनों की चौपाइयाँ
बदला भी क्या ख़यालात बदल गए

मल्टीप्लेक्सों के बीच जूझती झुग्गियाँ
नए दौर के तो सवालात बदल गए

देखे तो थे सपने बहुत हसीन मगर
क्या करें अब तो हालात बदल गए

कब तक फूंकेगा बेसुरी बांसुरी रवि
तेरे साथ के सभी साथी बदल गए

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भारतीय सड़कें पार्ट २

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रोड शो २
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दोस्तों, यह जो चित्र आप देख रहे हैं वह भारत के एक प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग - आगरा मुम्बई (एबी रोड) मार्ग पर हुए चक्का जाम का है. चक्का जाम में वाहनों की २० किलोमीटर लंबी कतार में ट्रक, जीप,कार, बस और अन्य वाहन फंसे हुए दिखाई दे रहे हैं. यह जाम पिछले ४८ घंटों से लगा हुआ था और इन पंक्तियों के लिखने तक जारी था...



पर मज़ेदार बात यह है कि यह जाम किसी प्राकृतिक विपदा या घटिया निर्माण के चलते किसी पुल टूटने इत्यादि के कारण नहीं लगा. यह जाम बहुत ही मजेदार तरीके से, हमारे इंडियन चलताऊ एटीट्यूड के कारण लगा. दरअसल किसी प्रकरण के सिलसिले में न्यायालय ने आदेश दिया कि महाराष्ट्र से आने वाले सभी ट्रकों को तुलवाया जाए ताकि ट्रकों में ओवरलोडिंग कानूनन रोकी जा सके. सामान्य भारतीय ट्रकें जो १५-२० टन के लिए डिज़ाइन होती हैं, उनमें २५-३० टन सामान लादना आम बात है. अब चाहे पर्यावरण को लगे चूना या खस्ताहाल सड़कें और हों बदहाल इससे क्या? बहरहाल, सरकारी बाबुओं ने आनन फानन उस आदेश पर अमल किया कि कोई भी मालवाहक वाहन बिना तुलवाई किए बार्डर पार न हो सके. पर अदूरदर्शिता देखिए कि नाके पर सिर्फ एक ह…

करोड़ी मल की भारतीय कहानियाँ

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कहानी करोड़ी मल की
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नीचे दी गई छवि की कड़ी को क्लिक करने पर आपको दिखाई देगी भ्रष्टाचार से कमाई गई करोड़ों रूपयों के नोटों की गड्डियाँ:



ये गड्डियाँ हाल ही में एक्साइज़ विभाग के एक अफ़सर के पास से नक़द बरामद की गई है. उस अफ़सर को हिरासत में लेते ही ज़ाहिर है, सीने में तक़लीफ़ हुई और वह जेल के बजाए अस्पताल में आराम फ़रमा रहे हैं.

ऐसे करोड़ी मल की कहानियाँ भारत देश में कई हैं. पूर्व में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के घर से सात करोड़ रूपए नक़द मिले थे. सीबीआई के उस वक्त के निर्देशक जोगिंदर सिंह का कहना था कि उन्होंने अपनी जिंदगी में उससे ज्यादा रूपए कभी नहीं देखे. वे महानुभाव आज भी राजनीति में सक्रिय हैं और कहीं मंत्री संत्री भी हैं! ऐसी कई कहानियाँ तो अभी भी कई होंगी और ढंकी छुपी होंगी.

करोड़ी मलों की ऐसी कहानियाँ भारत के अलावा शायद ही कहीं और सुनने को मिलें.
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ग़ज़ल
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दीनो-ईमान बिक रहा कौड़ियों में
नंगे खेल रहे हैं रूपए करोड़ों में

फ़ोड़ डाली हैं सबने आँखें अपनी
सियासत बची है अगड़ों पिछड़ों में

किस किस के चेहरे पहचानोगे
अब सब तो बिकता है दुकानों में

कोई और दौर था य…

मेरे भारत की सड़कें और उस पर चलती गाड़ियाँ

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सड़कों पर सर्कस
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भारतीय सड़कें आज़ीवन ख़स्ताहाल रहने को अभिशप्त तो हैं हीं, कहीं उनका नामोनिशाँ काग़जों पर ही रहता है तो कहीं गड्ढों और खड्ढों पर. तारीफ ये है कि इन पर भी हम आराम से अपनी यात्रा पूरी करते हैं. और कोई चूं नहीं करता. जरा इस छवि पर ग़ौर फ़रमाएँ:



यह कोई सर्कस का कमाल या गिनीज़ बुक में अपना नाम दर्ज कराने का प्रयास नहीं है. वरन् यह है भारतीय दारूण ट्रैफिक का जीवंद दृश्य. एक ही जीप में २५ से ३० यात्री सवार! (सामान्य स्वीकृत डिज़ाइन ९-१० यात्रियों के लिए है). कारण अनेकों हैं, पर मुख्य हैं यातायात विभाग में फैला आकंठ भ्रष्टाचार. उचित संख्या में परमिट जारी नही किए जाते, चेकिंग के नाम पर अवैध वसूली आम बात है (किसी पिछली पोस्टिंग में इस बात का जिक्र है). जहाँ एक ओर दिल्ली मुम्बई में पर्यावरण के मद्देनज़र आटो - टैक्सियों में सीएनजी की अनिवार्यता है, वहीं छोटे शहरों में अधिसंख्य आटो टैम्पो केरोसीन से चलते हैं जो अस्वास्थ्यकर धुँआ छोड़ते हैं. यह है एक और एक्सट्रीम उदाहरण...

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ग़ज़ल
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ये वो रास्ता तो नहीं था
उठा था गया तो नहीं था

हँसी देख गुमा होता है
कोई ख्वाब तो नही…

विचित्र कथा

विचित्र कथा
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दोस्तों, यह कथा बड़ी विचित्र, परंतु सत्य है. भारतीय सेना से कुछ जवान कारगिल युद्ध के दौरान लापता हो गए थे जिन्हें सेना ने भगौड़ा घोषित कर दिया था. उनमें से एक मोहम्मद आरिफ़ भी था. उसकी नई नई शादी हुई गुड़िया से हुई थी. चूंकि आरिफ़ भगौड़ा घोषित हो गया और उसका कोई अता पता नहीं था, गुड़िया की शादी तौफ़ीक से कर दी गई. इस बीच खबर मिली कि आरिफ़ पाकिस्तान में युद्ध बंदी है. वह शीघ्र ही रिहा हो गया, तथा सेना ने भी अपनी ग़लती सुधार ली.
मगर, कहानी में ट्विस्ट यहाँ से शुरू होती हैः धर्माचार्यों, गांववासियों, पंचायत तथा अभिभावकों ने तय किया कि चूंकि आरिफ़ ने कभी भी गुड़िया को तलाक़ नहीं दिया था, अतः उसकी तौफ़ीक से हुई शादी शरीयत के अनुसार अवैध है लिहाजा उसे तौफ़ीक को छोड़कर आरिफ़ के पास वापस आना होगा.
इधर, आरिफ़ की शर्त है कि वह गुड़िया से मुहब्बत तो करता है, मगर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे जो तौफ़ीक का है, उससे नहीं. गुड़िया को उसके अपने बच्चे को कहीं और छोड़ कर उसके पास आना होगा.
एक बच्चे, और एक माँ के दिल के लिए, या ख़ुदा, तूने ऐसी शरीयत क्यों बनाई? या तेरे बन्दे तेरी वाणी क…

पुलिस स्टोरी२

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पुलिसः भाग २
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मैंने अपनी पिछली पोस्टिंग में पुलिस के बारे में लिखा था. उस कड़ी को आगे बढ़ाते हैं. एक और अख़बार की क़तरन पर जरा नज़र डालिएः



Nirbhay_Gujjar
Originally uploaded by raviratlami. पुलिस स्टोरी२



इंसपेक्टर जनरल रिज़वान अहमद ने डायरेक्टर जनरल को रपट दी है कि २३ पुलिस मैन डकैत निर्भय गुज्जर के पे-रोल पर हैं. और व्यवस्था कुछ नहीं कर पा रही. यही वज़ह है कि निर्भय डकैतियाँ और फ़िरौती करता तो घूम ही रहा है, वह खुले आम मीडिया (टीवी चैनल सम्मिलित) को अपना इंटरव्यू देता फिर रहा है कि वह राजनीति में धमाके के साथ प्रवेश करने वाला है!
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एक माइक्रॉन मुस्कान
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महाराष्ट्र और बिहार में चुनावी सरगर्मियाँ तेज़ हो गईं हैं. मेरा पुत्र जो कक्षा नवीं का छात्र है, उसने मुझसे पूछा कि आपको अगर चुनाव में लड़ना हो, तो आप कौन सा चुनाव चिह्न लेंगे? उसे स्कूल में इस विषय पर बोलना था, और वह कुछ विचारों पर काम कर रहा था. मेरे दिमाग में तत्काल बिज़ली सी कौंधी. अगर मैं चुनाव में लड़ता तो कौन सा चुनाव चिह्न लेता?

मेरा चुनाव चिह्न होता डंकी (गधा नहीं). वज़हें ख़ूब सारी हैं-
।। डंकी कुछ पढ़ा लिखा न…

पुलिस के कई रूप

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दोस्तों, नीचे की कुछ अख़बारी क़तरनों पर जरा गौर फ़रमाइयेगाः



ज़ाहिर है, भारतीय पुलिस की छवि अगर लोगों के मन में अच्छी नहीं उतर पाती है तो इसके लिए जिम्मेदार वे तो हैं ही, बहुत कुछ यहाँ की व्यवस्था भी जिम्मेदार है. यहाँ की पुलिस के कार्य घंटे और कार्य वातावरण अत्यंत अमानवीय है. वे सबसे कम तनख्वाह पाते हैं और सबसे कठिन ड्यूटी बजाते हैं. कार्य हेतु प्रायः उन्हें कोई सुविधा नहीं मिलती. एक सिपाही बिना किसी सपोर्ट के 8 घंटे से लेकर 16-18 घंटे तक ड्यूटी बजाता है, नतीजतन उसे सबसे सुरक्षित और आसान रास्ता नज़र आता है वह होता है भ्रष्टाचार का. वह पास के चाय की दुकान से मुफ़्त की चाय और नाश्ते का हकदार हो जाता है. उसके बगैर उसका काम चलना मुश्किल होता है. यह तो मानवीय पहलू है, परंतु जब यह अनिवार्य आवश्यकता से आगे जा कर पैसे की भूख में परिवर्तित हो जाता है तो वह भारत देश का नासूर बन जाता है.

एक सर्वेक्षण के मुताबिक वैसे भी, भारतीय पुलिस से आम जनता डरती हैं. उसे वह अपना संरक्षक के बजाय भक्षक समझती है. वजह? ऊपर की अख़बारी क़तरनें हमें कुछ संकेत तो देती ही हैं...

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ग़ज़ल
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मुल्क के संरक्षक ही भक्ष…

कुत्ते मैं तेरा...

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कुत्ते मैं तेरा ख़ून पी जाऊँगा...
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यह कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं है जो धर्मेंद्र अजीत को स्क्रीन पर देता है. यह तो आज के राजनीतिज्ञों की डिफ़ॉल्ट भाषा बनती जा रही है.



कुछ नमूने आपके लिए प्रस्तुत हैं-

।। मनमोहन सिंह शिखंडी हैं - यशवंत सिन्हा

।। अमर सिंह दलाल है - लालू यादव

।। लालू मसख़रा है - अमर सिंह

।। बीजेपी अजगर है और उसके साझा दल मेंढक और चूहे - लालू यादव

।। अटल बिहारी धृतराष्ट्र है - काँग्रेस का एक नेता

।। आडवाणी अंतर्राष्ट्रीय भगोड़ा है - लालू यादव

इनकी भाषाओं पर अब हम हँसें, रोएँ, अपना सिर नोचें या फ़िर अपन भी इनकी गाली मंडली में शामिल हो जाएँ?

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ग़ज़ल
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राजनीति अब शिखंडी हो गई
सियासती सोच घमंडी हो गई

सोचा था कि बदलेंगे हालात
ये क़ौम और पाखंडी हो गई

भरोसा और नाज हो किस पे
व्यवहार सब द्विखंडी हो गई

अब पुरूषार्थ का क्या हो रवि
राजशाही सारी शिखंडी हो गई

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निज़ी क्षेत्र में आरक्षण

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कोई ताक़त इन्हें देश को बर्बाद करने से नहीं रोक सकती...

दोस्तों, यह है आज के अख़बार की ताज़ा सुर्खी-



सचमुच, जब भारत देश के फ़ौलाद मंत्री जिनका ख़्वाब बिहार में लालू को उखाड़ कर अपना राज जमाना है, यह कहते हैं तो हमें उनपर विश्वास करना ही होगा.(मनमोहन ने मंडल के लिए मंत्रियों का एक समूह भी गठित किया है जो इस बारे में एक कार्य योजना तैयार कर रहा है)

पर, क्या आपको अंदाज़ा है कि आने वाले दिनों की सुर्खियाँ क्या हो सकती हैं?
प्रस्तुत है कुछ कपोल कल्पनाएँ:

।। १५ अगस्त सन् २०१०: कोई ताक़त सेना (आरक्षण से अब तक अछूता है, जाने क्यों?) में आरक्षण व्यवस्था को नहीं रोक सकती.

।। २६ जनवरी सन् २०१५: कोई ताक़त मंत्री पदों में (आरक्षण से अब तक अछूता है, जाने क्यों?) में आरक्षण व्यवस्था को नहीं रोक सकती.

।। २ अक्टूबर सन् २०२०: कोई ताक़त आपकी आय (Income) (आरक्षण से अब तक अछूता है, जाने क्यों?) में आरक्षण व्यवस्था को नहीं रोक सकती.(पिछड़ों को अगड़ों की तुलना में समान कार्य पर ज्यादा आय अर्जित करने की पात्रता होगी. यह जुदा बात होगी कि पिछड़ों का पिछड़ापन से कोई लेना देना नहीं होगा, वरन् यह आधार वोट बैंक हो…

कवि कुटिलेश की कुटिलताएँ

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कवि कुटिलेश की गड़बड़ दोहावली
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दोस्तों, पिछले दिनों एक किताब पढ़नें में आई. किताब बहुत पुरानी थी, सन् १९५३ की, कीमत एक रूपया! शायद उस समय एक रूपए की भी कीमत रही होगी. बहरहाल, किताब का शीर्षक है - गड़बड़ दोहावली.


शीर्षक देखकर ही ज़ेहन में आया कि कुछ गड़बड़ जरूर होना चाहिए. अंदाज़ा सही था. किताब एक ही बैठक में आद्योपांत पढ़ डाली. गड़बड़ दोहावली कमाल की है. और कमाल के हैं लेखक कवि कुटिलेश. भई, नाम भी कमाल का. कहीं कहीं दोहे अति साधारण भी हैं, पर कुटिलेश के पैने व्यंग्य आमतौर पर पाठक को मज़ा तो देते ही हैं, सोचने को भी मज़बूर करते हैं. आज मैं उसी दोहावली के कुछ दोहे आपके लिए प्रस्तुत करता हूँ-

दस के चाहे सौ करो, सौ के चाहे तीस ।
टोटल होना चाहिए, मगर चार सौ बीस ।।

जीवन है दिन चार का, खुल के खेलो खेल ।
बहुत हुआ हो जाएगी, थोड़े दिन को जेल ।।

भैया या संसार में, भांति भांति के लोग ।
भांति भांति के डाक्टर, भांति भांति के रोग ।।

मँहगाई चूल्हे पड़े, जायँ भाड़ में रेट ।
सदा ठाठ से पीजिए, बीड़ी या सिगरेट ।।

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, का के लागूँ पाँय ।
क्यों ना दो कप चाय ही, दीजै इन…

लिनक्स में वायरस!

लिनक्स वायरसः एक दुःस्वप्न
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विंडोज़ के लिए घटिया, रद्दी, वाहियात वायरस लिख-लिख कर जब उबकाई सी होने लगी तो ज़ेहन में बिजली सी कौंधी. चलो लिनक्स के लिए वायरस लिखा जाए. आखिर अब यह विंडोज़ के बाद दूसरे नंबर पर तो है ही अतः लोगों को ज्यादा न सही थोड़ा-मोड़ा नुकसान तो पहुँचाएगा ही सही. फटाफट एक ट्रोज़न हॉर्स लिखा जो रिमोट लिनक्स तंत्र में जा कर वहाँ के सीडी रॉम ड्राइव ट्रे को अंदर बाहर कर सकता था.

अब बारी आई उसके परीक्षण की. पर, अरे यह क्या? ट्रोज़न हॉर्स चलने के बजाए हर बार नए नए त्रुटि संदेश लेकर लौट आता था. जैसे कि तंत्र के /etc/fstab या mtab में कोई सीडी रॉम पारिभाषित नहीं है, कोई सीडी रॉम डिवाइस /dev में उपलब्ध नहीं है. या फ़िर सीडी रॉम ड्राइव सिर्फ रूट उपयोगक्ता के द्वारा ही माउन्ट / अनमाउन्ट किया जा सकता है. फ़िर ड्राइव माउन्ट / अनमाउन्ट करने के लिए अलग अलग अनुमतियों के कारण हर बार अलग अलग उपयोक्ताओं के पासवर्ड के त्रुटि संदेश ले आता था. ट्रोज़न चलने के बजाए यह भी त्रुटि बताता था कि सीडी रॉम ड्राइव माउन्ट / अनमाउन्ट नहीं किया जा सकता चूंकि उपकरण व्यस्त है. ख़ूब मगज़…

हिन्दी शब्दकोश सॉफ़्टवेयर

सॉफ़्टवेयर समीक्षाः
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कंप्यूटर आधारित अँग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश
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लिनक्स के हिन्दी अनुवाद कार्य के दौरान अँग्रेज़ी शब्दों के उपयुक्त अर्थ तथा उतने ही उपयुक्त हिन्दी शब्दों को ढूंढने में खासी मुश्किलें आती रहीं. प्रायः अँग्रेज़ी शब्दों के अर्थ मोटे तथा भारी भरकम शब्दकोशों के पन्ने पलटने के उपरांत भी उचित प्रकार से मिल नहीं पाते थे चूंकि भिन्न शब्दकोशों का दायरा भिन्न होता है. ऐसे में, जब आप कंप्यूटर पर कार्य कर रहे होते हैं तो कंप्यूटर पर ही संस्थापित या ऑनलाइन क़िस्म के शब्दकोश आपको खासा राहत पहुँचाते हैं. यहाँ पर आपको भारी भरकम शब्दकोशों के पन्ने पलट कर शब्द-दर-शब्द ढूंढने की आवश्यकता नहीं होती. बस, दिए गए इनपुट फ़ील्ड में वांछित अँग्रेज़ी का शब्द भरा और आपके पास उसका हिन्दी शब्द, अन्य समानार्थी शब्दों सहित हाजिर. कंप्यूटर आधारित शब्दकोश न सिर्फ उपयोग में आसान होते हैं, बल्कि आपके कार्यों में तीव्रता भी लाते हैं. कुछ अच्छे, ऑनलाइन शब्दकोश इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं, पर इस हेतु आपको २४x७ ऑनलाइन होना पड़ेगा, जो प्रायः बहुतों को हासिल नहीं होता है. ऐसे में…

विशाल लाइब्रेरी में से पढ़ें >

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