अ-न्याय

न्याय, अन्याय और अ-न्याय
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आइये डालते हैं पिछले दिनों की घटनाओं पर एक नज़रः
।। झारखंड में केंद्रीय मंत्री शिबू सोरेन को दो दशक से अधिक पुराने किसी केस में वारंट तामील किया गया, नतीजतन उन्हें अपनी कुर्सी खोना पड़ी.
।। हुबली के एक अदालत ने दस साल पुराने प्रकरण में मध्य प्रदेश की मुख्य मंत्री को १५ दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा. मज़े की बात यह कि उसी सिलसिले के बाकी अन्य अभियुक्तों के प्रकरण राज्य सरकार द्वारा वापस ले लिए गए.
।। बिहार के एक केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन के विरूद्ध एक प्रकरण में वारंट तामील हो जाने के बाद आनन फानन में राज्य सरकार ने जन हित में उस प्रकरण को ही वापस ले लिया.
।। मध्य प्रदेश के एक अदालत में विधायक कैलाश विजयवर्गीय बरसों पुराने किसी आंदोलन प्रकरण के सिलसिले में वारंट तामील हो जाने से उन्हें पहले अपनी जमानत करवानी पड़ी तब फिर वे जाकर मंत्री पद की शपथ ले सके.

-- इनमें बिहार के प्रकरण को छोड़कर (जो क्रिमिनल केस था, और जिसे राज्य हित में वापस ले लिया गया!) बाकी सभी राजनीतिक आंदोलनों से जुड़े प्रकरण रहे हैं. ऐसे, या कोई भी प्रकरण न्याय पाने की उम्मीद में न्यायालय में लगाए जाते हैं पर भारतीय न्यायालय इस मामले में काफी कुख्यात हैं कि एक एक प्रकरण के निपटारे में दशकों लग जाते हैं. लोग कहते हैं कि दस रूपए देकर न्यायालय के बाबू से पेशी की अगली तारीख़ ले ली जाती है. ये न्याय है, अन्याय है या फिर अ-न्याय?

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ग़ज़ल
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कोई ख्वाब देखे जमाना गुज़र गया
क्या आया और क्या क्या गुज़र गया

चमन उजड़े दरख़्तें गिरीं नींवें हिलीं
भला हुआ वो एक गुबार गुज़र गया

मुश्किलें कुछ कम थीं तेरे मिलने पे
न सोचा था वो सब भी गुज़र गया

इन्सानियत तो अब है अंधों का हाथी
वो बेचारा कब जमाने से गुज़र गया

एक बेचारा रवि भटके है न्याय पाने
इस रास्ते पे वो सौ बार गुज़र गया

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