मेरी ग़ज़लें

अशआरों में अर्थ नहीं
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मेरी ग़ज़लों को लेकर पाठकों की यदा कदा प्रतिक्रियाएँ प्राप्त होती रहती हैं. जो विशुद्ध पाठक होते हैं, वे इन्हें पसंद करते हैं चूंकि ये क्लिष्ठ नहीं होतीं, किसी फ़ॉर्मूले से आबद्ध नहीं होतीं तथा किसी उस्ताद की उस्तादी की कैंची से कंटी छंटी नहीं होतीं. वे सीधी, सपाट पर कुछ हद तक तल्ख़ होती हैं.

परंतु कुछ रचनाकार पाठक और विशुद्धतावादी ग़ज़लकारों को मेरी कुछ ग़ज़लें नाग़वार ग़ुज़रती हैं और वे इनमें से कुछेक को तो ग़ज़ल मानने से ही इनकार करते हैं.

मैं यहाँ मिर्जा ग़ालिब के दो उदाहरण देना चाहूँगा, जो उन्होंने अपने तथा अपने ग़ज़लों के अन्दाज़ के बारे में कभी कहे थे. मुलाहिज़ा फरमाएँ-

न सतायश की तमन्ना न सिले की परवा,
गर नहीं है मेरे अशआर में माने न सही.

तथा यह भी-

पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है,
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या.

साथ ही यह भी, कि जब ग़ालिब, दीवाने ग़ालिब के लिए अपनी ग़ज़लों की छंटाई कर रहे थे, तो उन्होंने अपने लिखे हुए करीबन २००० से अधिक अशआरों को नष्ट कर दिया चूंकि उनमें शायद वज़नों की कुछ कमी रह गई थी.

बहरहाल मैंने तो अभी लिखना शुरू ही किया है. मेरे अशआर दो हजार से ऊपर हो जाएंगे, तो मैं भी अपने कुछ कम वज़नी अशआरों को नष्ट कर ही दूंगा, ऐसा सोचता हूँ ),

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एक माइक्रॉन मुस्कान
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क्या आपको किसी ऐसे धनाढ्य आदमी का पता है जो अपने पास चार रॉल्स रायस रखता हो? चारों दिशाओं के लिए एक-एक.

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ये तो ठीक नहीं कि अपने को सही मानते रहने के लिए विशुद्ध पाठक की बात कर दी जाए। पाठक हर तरह के हैं।

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