मंगलवार, 17 अगस्त 2004

भीगता भविष्य

बारिश में भीगता देश का भविष्य
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मेरे शहर में पंद्रह अगस्त के दिन सुबह से मूसलाधार बारिश हो रही थी. पंद्रह अगस्त के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बाबूराज की शासकीय अनिवार्यता ने स्कूली बच्चों को किस कदर परेशान हलाकान किया इसकी बानगी देखिए. स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम के दौरान सारे बच्चे स्टेडियम में खुले में बारिश में सारे समय भीगते खड़े रहे. जो छोटा सा शामियाना लगाया गया था वह हर जगह टपक रहा था. अधिकारी तो छातों की छांव में बचते रहे, पर बच्चों की सुध किसी ने नहीं ली. ठीक है कि हम सभी बच्चे-बूढ़े बारिश में भीगने का आनंद लेते हैं, परंतु मजबूरन, भीगने की अनिवार्यता, वह भी अव्यवस्था के कारण, तो यह कतई बर्दाश्त नहीं की जाना चाहिए. आयोजकों के चलताऊ एटीट्यूड के चलते स्वतंत्रता दिवस के इस गरिमामयी आयोजन में देश का भविष्य भीगता रहा. और, प्रायः ऐसी स्थिति हर जगह है.

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ग़ज़ल
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भीगे भविष्य बिखरे बचपन यहाँ सब चलता है
लूट -पाट फ़िरौती-डकैती यारों सब चलता है

किस किस का दर्द देखोगे जख़्म सहलाओगे
क़ौमों की रंजिश और हों फ़ायदे सब चलता है

इस जमाने में फ़िक्र क्यों किसे किसी और की
अपने गुल खिलें चाहे जंगल जलें सब चलता है

दिन ब दिन तो बढ़ता ही गया दायरा पेट का
दावत में कुल्हड़ हो या हो चारा सब चलता है

तू भी शामिल हो बची खुची संभावनाओं में रवि
ज़ूदेव, शहाबुद्दीन या हो वीरप्पन सब चलता है

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