टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

ओलंपिक में भारत की नगण्य संभावना

ओलंपिक में नगण्य भारतीय संभावनाएँ
कुछ दिनों पश्चात एथेंस में ओलंपिक खेलों का आयोजन होने जा रहा है. लगता है कि हम भारतीय इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करने जा रहे हैं कि ओलंपिक खेलों में जीतना या पदक प्राप्त करना महत्वपूर्ण नहीं बल्कि भाग लेना ही महत्वपूर्ण है. भारत के खाते में इस ओलंपिक में भी शायद ही कोई भूला भटका पदक हाथ आ जाए, वरना तो कोई उम्मीद ही नहीं है.
ऐसा नहीं है कि हमारे यहाँ खिलाड़ी नहीं हैं. खिलाड़ी तो हैं, पर व्यवस्थाएँ ऐसी हैं कि खेलों को कोई प्रोत्साहन ही नहीं है. क्रिकेट (जहाँ फ़िक्सिंग से लेकर चयन समितियों को घूसखोरी तथा सट्टा तक की संभावनाएँ हैं) के अलावा अक्खा इंडिया में किसी भी खेल में कुछ नहीं रखा है. अंजू जॉर्ज जो भारतीय दल का नेतृत्व करेंगी, और जिनसे किसी पदक की उम्मीद है, वे भी अपनी स्वयं की लगन और मेहनत के बल पर वहाँ पहुँची हैं, और जिसमें भारतीय व्यवस्था का कोई योगदान नहीं है. खेल भी यहाँ क्षेत्रीयता और आरक्षण की भेंट चढ़ गए हैं.

ग़ज़ल

मंज़िल पाने की संभावना नगण्य हो गई
व्यवस्था में जनता और अकर्मण्य हो गई

जाने कौन सा घुन लग गया भारत तुझे
सत्यनिष्ठा ही सबसे पहले विपण्य हो गई

इतराए फ़िरते रहिए अपने सुविचारों पर
अब तो नकारात्मक सोच अग्रगण्य हो गई

हीर-रांझों के इस देश को क्या हुआ कि
दीवानों की संख्या एकदम नगण्य हो गई

अब तक तो तेरे कर्मों को थीं लानतें रवि
क्या होगा अब जो सोच अकर्मण्य हो गई
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