रविवार, 8 अगस्त 2004

ख्वाहिशें

भास्कर के रस रंग में ख्वाहिश पर ग़ज़ल मांगी गई. मैंने थोड़ीसी सी अक्ल लगाई और जोड़-तोड़ कर अपनी ख्वाहिश यूँ पेश की. अब यह जुदा बात है कि वे अपने पृष्ठों पर छापेंगे कि नहीं. बहर हाल, अपना ब्लॉग पृष्ठ तो है ही. मुलाहजा फ़रमाएँ...

ग़ज़ल
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ख्वाहिशें

ये उम्र और तारे तोड़ लाने की ख्वाहिशें
व्यवस्था ऐसी और परिवर्तन की ख्वाहिशें

आदिम सोच की जंजीरों में जकड़े लोग
और जमाने के साथ दौड़ने की ख्वाहिशें

तंगहाल घरों के लिए कोई विचार है नहीं
कमाल की हैं स्वर्णिम संसार की ख्वाहिशें

कठिन दौर है ये नून तेल और लकड़ी का
भूलना होगा अपनी मुहब्बतों की ख्वाहिशें

जला देंगे तुझे भी दंगों में एक दिन रवि
फ़िर पालता क्यूँ है भाई-चारे की ख्वाहिशें

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